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जीवन और साहित्य का विमोचन

बलराम
डॉ. दामोदर खड़से हिंदी के बड़े लेखकों में से एक हैं, जिनको समग्रता में पेश करने की कोशिश डॉ. सुनील देवधर और राजेंद्र श्रीवास्तव ने ‘कागज की जमीन’ पर जैसे ग्रंथ के जरिये की है। इस ग्रंथ में हरिनारायण व्यास, मधुकर सिंह, सूर्यकांत नागर, राजकुमार गौतम, आलोक भट्टड्ढचार्य, अशोक गुजराती, ओमप्रकाश शर्मा, शशिकला राय तथा प्रबोध गोविल जैसे तीन दर्जन से अधिक लेखकों ने डॉ. खड़से के जीवन और साहित्य का बहुकोणीय विवेचन किया है। किताब के पत्र खंड में निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, प्रभाकर श्रोत्रिय, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचलश्, शंकरदयाल सिंह, बालकवि बैरागी, दया पवार, सूर्यबाला, शंकर पुणतांबेकर, शिवमूर्ति, भाऊ समर्थ, तेजेंद्र शर्मा, रूपर्ट स्नेल, सूरज प्रकाश, हरिसुमन बिष्ट, रामकुमार कृषक, भारत यायावर और घनश्याम अग्रवाल जैसे साठ से अधिक लोगों के डॉ. खड़से को लिखे गए महत्वपूर्ण पत्र शामिल हैं और अंत में दिए गए हैं दामोदर खड़से के साथ सौ से अधिक लोगों के छायाचित्र, जिनके जरिये उनके पूरे जीवन को चित्रों में भी देखा जा सकता है। ‘तार सप्तक’ के कवि हरिनारायण व्यास ने इस किताब के पहले ही आलेख में लिखा है कि दामोदर खड़से अजातशत्रु मानुष हैं, अत्यंत सौम्य और सात्विक विचारों के व्यक्ति। यह उनकी विशेषता है कि वे किसी को छोटा नहीं समझते। समदर्शी व्यक्ति हैं और हैं चलती-फिरती इन्सानियत। वे संस्कृत के ‘सुहृद’ शब्द की मूर्ति लगते हैं। खड़से की कहानियों के बारे में व्यास जी कहते हैं कि इनकी कहानियां वास्तविक जीवन के निकट और इतनी स्वाभाविक हैं कि पाठक को कभी लगता ही नहीं कि वह किसी अबूझ मानसिकता से जूझ रहा है।

डॉ. खड़से का कथा साहित्य महत्वपूर्ण है, लेकिन अनेक लोग उन्हें बहुत अच्छा कवि मानते हैं। प्रख्यात कवि लीलाधर मंडलोई लिखते हैं कि दामोदर खड़से अत्यंत संवेदनशील कवि हैं, यह ‘तुम लिखो कविता’ पढ़कर पता चलता है। यह एक लंबी और भव्य प्रेम कविता है। कविता के लिए इस कठिन दौर में यह एक आह्वान है, जिसमें कविता को बचाने का आमंत्रण है। खड़से की इस कविता में समूची सृष्टि के प्रति अद्भुत प्रेम प्रार्थनाओं की दीर्घ शृंखला हैए जिसमें तमाम तत्वों, वस्तुओं, प्रसंगों और जीवन के आयामों को कविता में उकेरा गया है। मानवीय संबंधों की विरल उष्मा में डूबी यह कविता स्वर, संगीत, रंग, ध्वनि,रूप और मौन को अपने भीतर समेट लेने का सार्थक जतन करती है। दामोदर खड़से की कविताओं में अपनापन भरा है। सिर्फ इस गुण के लिए भी इन कविताओं को पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि आज के जीवन में सबसे ज्यादा जो चीज छूट रही है, वह अपनापन ही तो है! इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि डॉ. दामोदर खड़से जितने बड़े कथाकार हैं, उतने ही बड़े कवि भी।

किताब : कागज की जमीन पर /सुनील देवधर /राजेंद्र श्रीवास्तव, प्रकाशक : दिशा प्रकाशन, त्रिनगर, दिल्ली.35

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