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तवायफों ने भी कर दिया था इनकार

सौ साल पहले 1913 में भारत में पहली पूरी लंबाई की फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ दादासाहब फालके ने बनाई थी। इन सौ वर्षों में सिनेमा ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे हैं। इस बार हम बात कर रहे हैं भारत में सिनेमा की शुरुआत और दादासाहब फालके की पहली दो फिल्मों के निर्माण में आई दिक्कतों की:
वरिष्ठ अभिनेत्री दुर्गा खोटे ने लिखा है? ”मेरी शूटिंग के करीब दो महीने बाद अखबारों में ‘फरेबी जाल’ फिल्म के विज्ञापन प्रसिद्ध (प्रकाशित) होने लगे। मिस्टर भवनानी ने धूर्त-व्यवसायी बुद्धि से मेरे नाम का पूरा-पूरा लाभ उठाया। मेरे मायके और ससुराल के दोनों खानदान मराठी समाज में अत्यंत प्रतिष्ठित एवं श्रेष्ठ माने जाते थे। इस प्रतिष्ठा का पूरा उपयोग करते हुए भवनानी ने फिल्म के विज्ञापनों में शीर्षक दिया – ‘सुप्रसिद्ध सॉलीसिटर लाड की कन्या तथा विख्यात खोटे खानदान की बहू का सिनेमा सृष्टि में पदार्पण।’

”यह फिल्म महाराष्ट्रीय बस्ती के ‘मेजेस्टिक’ सिनेमाघर में लगी। मेरे दुर्भाग्य से यह फिल्म सभी अर्थों में निकृष्ट और हीन थी। एक बड़े अखबार ने शीर्षक दिया – दुर्गा बाई के खोटे (झूठे) लाड लड़ाए गए! ‘मुझे घर से बाहर निकलना, गिरगांव में कहीं जाना असंभव हो गया। कोई भी ऐरा-गैरा मेरे बारे में जो मन में आए बकता फिरे, ऐसी हालत हो गई। मेरा जीना हराम हो गया। लाड परिवार और खोटे परिवार के लोग तो मानो मेरी जान के दुश्मन बन गए थे, क्योंकि उन्हें पूरा विश्वास था कि मैंने दोनों खानदानों के नाम पर कलंक लगाया है।

1930 में अभिनेत्री दुर्गा खोटे पर यह सब गुजरा था। अपनी आत्मकथा ‘मैं’ में इस बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है। इससे उस समय की फिल्मों और उसमें काम करने वाली महिलाओं की स्थिति का जायजा मिलता है। यह स्थिति तब की है जब हिंदी सिनेमा 34 वर्ष का प्रौढ़ हो चुका था। पूरी लंबाई की फिल्में बनते भी 17 साल हो चुके थे। सन् 1896 में दुनिया में चलती-फिरती छवि वाली फिल्मों का जन्म हो गया था।

जाहिर है, उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षों में जब सिनेमा की शुरुआत हुई थी तब इस मामले में स्थिति और भी बुरी थी। फिल्में ही क्या, समाज में भी औरतों के लिए परदा ही ज्यादा सुरक्षित माना जाता था। मर्दों की दुनिया से बाहर उनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व न के बराबर था। एक तरफ औरतों को खानदान की इज्जत कहा जाता था और दूसरी तरफ उनको इज्जत के इस बोझ से इस बुरी तरह लाद दिया जाता था कि किसी तरह की आजादी उनके पास नहीं रह गई थी।

मुम्बई के संभ्रांत परिवारों की महिलाओं को काम-काज करने की भी इजाजत नहीं थी। फिल्म तो अभी-अभी शुरू ही हुआ एक नया माध्यम था, उस पर विश्वास जमने में समय लगना था। नाटकों में पारसी नाटकों का रिवाज था। इनमें या तो बहादुर नायकों की कहानियां होती थीं या फिर प्रेम कथाएं। संभ्रांत औरतें आखिर खुले आम पराए मरदों से प्यार कैसे जता सकती थीं। औरतों की भूमिकाएं या तो तवायफें निभातीं थीं या फिर कमसिन लड़के। कुछ मामलों में नायक-नायिका की भूमिकाएं पति-पत्नी भी निभा लिया करते थे।

भारत में 7 जुलाई 1896 को शाम छह बजे मुंबई के वाटसन होटल में पहली बार लूमिएर बंधुओं की बनाई लघु फिल्मों का प्रदर्शन हुआ था। 16 साल के एक भारतीय नौजवान हीरालाल सेन ने फ्रांस की पाथे कंपनी में नौकरी करके फिल्मांकन का काम सीखा और 1902 में उन्हीं से कैमरा खरीद कर भारत लौट आया। सेन को हम पहला भारतीय फिल्मकार कह सकते हैं। उन्होंने बीस नाटकों का फिल्मांकन किया। नाटक शुरू होते ही कैमरा चालू होता था और खत्म होने पर बंद होता था। इस तरह पूरा नाटक सीधे-सीधे फिल्मा लिया जाता। बदकिस्मती से उनकी बनाई फिल्मों में से आज कोई भी उपलब्ध नहीं है।

फालके को तारामती नहीं मिली
दादा साहब फालके पहले ऐसे भारतीय फिल्मकार थे जिन्होंने ‘राजा हरिश्चंद्र्’ नाम की कथा फिल्म बनाई। इस फिल्म में तारामती की भूमिका करने के लिए कोई भी

औरत तैयार नहीं हुई। उस समय का भारतीय समाज संभ्रांत महिलाओं के फिल्मों में आने के खिलाफ था। हालत यह थी कि तवायफों ने भी फिल्म में काम करने से इनकार कर दिया था। सालुंके नाम का एक अभिनेता इस भूमिका को करने के लिए तैयार हुआ। फिल्म इतिहासकार फीरोज रंगूनवाला लिखते हैं? ‘दूसरी समस्याओं के साथ सबसे ज्यादा परेशान करने वाली समस्या थी तारामती की भूमिका के लिए किसी महिला की तलाश। सिनेमा अभी शुरू ही हुआ था और उस पर लोगों का विश्वास जम नहीं पाया था। कोई भी औरत, कोई वेश्या भी इस काम को करने के लिए तैयार नहीं हुई। आखिरकार फालके को एक स्टेज एक्टर सालुंके को साड़ी-ब्लाउज पहनाकर रानी तारामती की भूमिका के लिए तैयार करना पड़ा। सालुंके के बारे में श्रीराम ताम्रकर का कहना है कि वह सड़क के किनारे के एक ढाबे में काम करता था। अपने लिए नायिका की तलाश में निराश फालके जब इस ढाबे में चाय पीने के लिए रुके तो उन्होंने वहां काम करने वाले इस सालुंके को देखा। उसकी उंगलियां बड़ी नाजुक थीं। मजबूरन फालके ने उसे ही तारामती की भूमिका में उतार लिया। डी.डी. दुबके ने राजा हरिश्चंद्र और फालके के बेटे भालचंद्र ने राजकुमार रोहिताश्व की भूमिकाएं निभाईं।’

भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री
‘राजा हरिश्चंद्र’ को जबर्दस्त प्रशंसा मिली। फिल्म हिट रही। इसीलिए जब फाल्के ने अगली फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर्य की घोषणा की तो महिला चरित्र निभाने के लिए दो महिलाएं आगे आईं। इस फिल्म में विष्णु भगवान मोहिनी का रूप धारण करके भस्मासुर के साथ नृत्य करते हैं और ऐसी मुद्रा बनाते हैं कि भस्मासुर अपने सिर पर हाथ रख ले। ऐसा करते ही वह शिव के वरदान के कारण भस्म हो जाता है।

इस फिल्म मे नायिका की भूमिका के लिए दादासाहब फालके ने कमलाबाई गोखले को तैयार कर लिया था। कमलाबाई मराठी नाटकों में काम करती थीं। श्रीराम ताम्रकर के अनुसार ‘कमलाबाई के नाना गायक और पेंटर थे। मां दुर्गाबाई भी रंगमंच की कलाकर थीं। कमलाबाई ने पांच साल की अल्पायु से ही (रंगमंच पर) बाल कलाकार के रूप में अभिनय शुरू किया। साथ ही काम करने वाले रघुनाथ राव से तेरह वर्ष की आयु में उनका विवाह हुआ। कमला बाई जब चौबीस वर्ष की हुईं तो रघुनाथ राव का निधन हो गया। ‘ परिवार का भार उन पर आ गया। जल्द ही वह मराठी रंगमंच की एक लोकप्रिय अभिनेत्री बन गईं। मंच पर कमलाबाई औरतों की ही नहीं मर्दों की भूमिका भी निभाती थीं।

श्रीराम ताम्रकर कमलाबाई गोखले के बारे में लिखते हैं-रंगमंच पर लोकप्रियता का शिखर छूने के बाद वे फिल्मों की ओर मुड़ीं। दादासाहब फालके ने 1912-13 में उन्हें ‘भस्मासुर-मोहिनी’ नामक फिल्म में विष्णु और मोहिनी की भूमिका दी। इस फिल्म की शूटिंग दिन में होती थी सारा यूनिट एक परिवार की तरह रहती थी। फिल्म में कमलाबाई के अभिनय को खूब सराहा गया। दादासाहब ने अपनी अगली फिल्म ‘कालिया मर्दन’ में उन्हें फिर लिया।’
लेकिन कमलाबाई को फिल्मों के मुकाबले नाटकों से ज्यादा प्यार था। इन दोनों फिल्मों के बाद उन्होंने सिर्फ एक और फिल्म और की, विश्राम बेडेकर की ‘कंगाल’ जो 1938 में बनी थी। उनके बाद भी उनके परिवार में नाटकों में काम करने की परंपरा बनी रही। कमलाबाई का मझला बेटा चंद्रकांत गोखले भी मराठी फिल्मों का जान-माना अभिनेता है। चंद्रकांत का बेटा विक्रम गोखले आज के हिंदी और मराठी सिनेमा और थिएटर का जाना-माना नाम है।

सुरेश उनियाल

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