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देश नारों और जुमलों से नहीं चलता

हमारे दागी, ‘तुम्हारे दागियों से उजले हैं’ या हमारे दल या प्रधानमंत्री का ‘चेहरा’ ज्यादा सक्षम, उजला या ताकतवर है की इस बहस में जनतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया है। मुद्दा यह नहीं है कि कौन सा नेता ज्यादा दागदार है, मुद्दा यह है कि दागी नेता को ही क्यों उम्मीदवार बनाने की जिद हो और मुद्दा यह भी है कि दागी नेता ही हमारे राजनीतिक दलों के सिपहसलार क्यों हो?
लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट अब साफ-साफ सुनाई दे रही है। कौन सा दल सत्ता में आता है और कौन प्रधानमंत्री बनता है, इससे हमारा सीधा कोई संबंध नहीं है। संबंध है लोकतंत्र के पीछे अदृश्य ‘लोकजीवन’ से। संस्कृति, परम्पराएं, विरासत, व्यक्ति, विचार, लोकाचरण से लोक जीवन बनता है और लोकजीवन अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति से ही लोकतंत्र स्थापित करता है, जहां लोक का शासन, लोक द्वारा, लोक के लिए शुद्ध तंत्र का स्वरूप बनता है। चुनावों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरूआत मानी जाती है, पर आज चुनाव लोकतंत्र का मखौल बनते जा रहे हैं। चुनावों में वे तरीके अपनाएं जाते हैं जो लोकतंत्र के मूलभूत आदर्शो के प्रतिकूल पड़ते हैं। पन्द्रहवीं लोकसभा के चुनाव से पहले आज आवश्यकता हमारी राजनीति की दशा बदलने की है और यह तब होगा जब राजनीति अपनी दिशा बदलेगी। भावी प्रधानमंत्री के नाम उछालने या लुभावने सपने दिखाने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित व्यक्ति या केन्द्र की सत्ता में आने का दावा करने वाले दल से इतनी तो उम्मीद की ही जाती है कि वह ऐसा कोई नक्शा, ऐसा कोई प्रारूप, जिसे आज की भाषा में श्रोड मैप्य कहा जाता है, देश के सामने रखेगा। दुर्भाग्य से, अब तक ऐसा नहीं हुआ है। बात चाहे राहुल गांधी की हो, नरेन्द्र मोदी की होए मुलायम, केजरीवाल या फिर किसी और की? कहीं कोई रोशनी नहीं दिखाई दे रही है। रोशनी दिखाई भी कैसे देगी? क्योंकि झूठ और मूल्यहीनता के सहारे रोशनी अवतरित नहीं होती।

आज जिस तरह से हमारा राष्ट्रीय जीवन और सोच विकृत हुए हैं, हमारा व्यवहार झूठा हुआ है, चेहरों पर ज्यादा नकाबें ओढ़ रखी हैं, इसने हमारे सभी राजनीतिक मूल्यों को धराशायी कर दिया। राष्ट्र के करोड़ों निवासी देश के भविष्य को लेकर चिन्ता और ऊहापोह में हैं। वक्त आ गया है जब देश की संस्कृतिए लोकतांत्रिक मूल्यों, गौरवशाली विरासत को सुरक्षित रखने के लिए कुछ शिखर के व्यक्तियों को भागीरथी प्रयास करना होगा। दिशाशून्य हुए नेतृत्व वर्ग के सामने नया मापदण्ड रखना होगा। कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़ाई के लिए तैयार खड़ी कौरवों और पांडवों की सेनाओं के बीच जाकर अर्जुन द्वारा हथियार डाल देने और युद्ध न करने की बात कहने का कारण समझ में आता है, लेकिन हम क्यों अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष से भाग रहे हैं? हम क्यों राजनीति को प्रदूषित होते हुए देखकर भी मौन हैं? इन स्थितियों में कौन आदर्श उपस्थित करेगा? क्या हो गया उन दो प्रतिशत लोगों को जिन्होंने सदैव ही हर कुर्बानी करके आदर्श उपस्थित किया। लाखों के लिए अनुकरणीय बने, आदर्श बने। चाहे आजादी की लड़ाई हो, देश की सुरक्षा हो, धर्म की सुरक्षा हो, अपने वचन की रक्षा हो अथवा अपनी संस्कृति और अस्मिता की सुरक्षा का प्रश्न हो, उन्होंने फर्ज और वचन निभाने के लिए अपना सब कुछ होम दिया था। महाराणा प्रताप, भगत सिंहए दुर्गादास, शिवाजी जैसे वीरों ने अपनी तथा अपने परिवार की सुख-सुविधा को गौण मान कर बड़ी कुर्बानी दी थी। गुरु गोविन्दसिंह ने अपने दोनों पुत्रों को दीवार में चिनवा दिया और पन्नाधाय ने स्वामी भक्ति के लिए अपने पुत्र को कुर्बान कर दिया। आज राजनीति को सही दिशा देने के लिये ऐसे ही आदर्श को स्थापित करने के लिये किसी न किसी को संघर्ष की मुद्रा में आगे आना होगा। सबसे बड़ी बात अपने भीतर के न्यायाधिपति के सामने खड़े होकर खुद को जांचने, सुधारने और आगे का रास्ता तय करने की शुरुआत करनी होगी। कोई भी प्रधानमंत्री का लुभावना मुखौटा पहनकर ‘आदर्श’ नहीं बन सकता।

हमारे दागी, ‘तुम्हारे दागियों से उजले हैं, हमारा दल या प्रधानमंत्री का ‘चेहरा’ ज्यादा सक्षम, उजला या ताकतवर है की इस बहस में जनतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया है। मुद्दा यह नहीं है कि कौन सा नेता ज्यादा दागदार है, मुद्दा यह है कि दागी नेता को ही क्यों उम्मीदवार बनाने की जिद हो और मुद्दा यह भी है कि दागी नेता ही हमारे राजनीतिक दलों के सिपहसलार क्यों हो?

यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि हमारी राजनीति में नैतिकता और चरित्र की परम्परा धूमिल होती जा रही है और कोई इस बारे में नहीं सोच रहा है कि किस तरह उजले दामन और उन्नत चरित्र वाले लोगों को राजनीति में आने की कोई परम्परा पुनरू शुरू हो। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि कोई ऐसा कानून नहीं है, जिसके अंतर्गत गंभीर अपराधों के आरोपियों के चुनाव लडऩे पर पाबंदी हो। लेकिन इस सबसे अधिक विडम्बना पूर्ण यह तथ्य है कि हमारा मतदाता दागी नेताओं को देखकर भी अनदेखा कर देता है। राजनीति में अपराध के खिलाफ बात सब करते हैं, पर मतदान के समय यह भूल जाते हैं कि आपराधिक तत्वों को नकारने की क्षमता उनकी उंगली में है। उंगली के एक इशारे से मतदाता राजनीति का चेहरा बदल सकता है। होती होंगी राजनीतिक दलों की विवशताएं, पर मतदाता क्यों मजबूर हो किसी गलत व्यक्ति का समर्थन करने के लिए? इन स्थितियों से गुजरते हुए, विश्व में अव्वल दर्जे का कहलाने वाला भारतीय लोकतंत्र आज अराजकता के चौराहे पर है। जहां से जाने वाला कोई भी रास्ता निष्कंटक नहीं दिखाई देता। इसे चौराहे पर खड़े करने का दोष जितना जनता का है उससे कई गुना अधिक राजनैतिक दलों व नेताओं का हैए जिन्होंने निजी व दलों के स्वार्थो की पूर्ति को माध्यम बनाकर लोकतंत्र को बहुत कमजोर कर दिया है।

आज ये दल और ये लोग इस दलदल से निकालने की क्षमता खो बैठे हैं। क्यों न हमारे राजनीतिक दल सभ्य बनने की कोशिश करें, दागी चेहरों को महिमामंडित करने के लालच से बचें? दाग को मेरा या तेरा में बांटकर राजनीति हो सकती हैए पर ऐसी राजनीति में जनतंत्र की आत्मा नहीं बस सकती।

देश नारों और जुमलों से नहीं चला करता। भारत को दुनिया का हाथी कहना या भारत ‘मधुमक्खी का छत्ता्य कहना, या फिर भारत को माता के रूप में संबोधित करना या भारत को ‘महानतम राष्ट्र्य के रूप में प्रस्तुत करना- ये सभी थोथे जुमले या नारे हैं। इन जुमलों और नारों को उछाल कर कोई बहुत सारगर्भित बात कह दी गयी हो, ऐसा नहीं है। जो जितना बड़ा राजनीतिज्ञ है उसे उतनी ही जादूगरी से शब्दों से खेलना भी आता है शब्दों से प्रभावित करने की कला वह जानता है। लेकिन यहां बात शब्दों की जादूगरी की नहीं है, एक सशक्त राष्ट्र निर्माण की है। बात यहां केवल चतुराई से सपने दिखाने की नहीं है, बल्कि उन सपनों को ईमानदारी से पूरा करने की है। सपने दिखाना राजनीति का एक हथियार हो सकता है और नेतृत्व की एक आवश्यकता भी। पर इसके साथ ही एक समझदार राजनेता से यह भी उम्मीद की जाती है कि वह सपने पूरे करने का कोई रास्ता भी सुझायेगा। ठोस बातों का यही मतलब होता है। पर यहां आगामी लोकसभा के नायक बनने वालो के नारों और जुमलों में कहीं ऐसा नहीं लग रहा है कि उन्हें इस ‘मतलब’ की कोई जानकारी है। इस मतलब की जानकारी रखने वाले व्यक्ति का सपना देश को शक्तिशाली बनाने के साथ-साथ उसके मूल्यों को सुदृढ़ बनाना होता है। जब एक अकेले व्यक्ति का जीवन भी मूल्यों के बिना नहीं बन सकता, तब एक राष्ट्र मूल्यहीनता में कैसे शक्तिशाली बन सकता है?

अनुशासन के बिना एक परिवार एक दिन भी व्यवस्थित और संगठित नहीं रह सकता तब संगठित देश की कल्पना अनुशासन के बिना कैसे की जा सकती है? ‘जैसा चलता है चलने दोश् की नेताओं की मानसिकता और कमजोर नीति ने जनता की तकलीफें बढ़ाई हैं। भ्रष्ट सोच वाले व्यक्तियों को अपना राष्ट्र नहीं दिखता, उन्हें विश्व कैसे दिखेगा।

भारत में जितने भी राजनैतिक दल हैं, सभी ऊंचे मूल्यों को स्थापित करने की, आदर्श की बातों के साथ आते हैं पर सत्ता प्राप्ति की होड़ में सभी एक ही संस्कृति को अपना लेते हैं। मूल्यों की जगह कीमत की और मुद्दों की जगह मतों की राजनीति करने लगते हैं।

चुनाव के साथ-साथ चुनावों की प्रक्रिया को राजनैतिक दलों ने अपने स्तर पर भी कीचड़ में डाल दिया है। प्रत्याशी की बहुत बड़ी शक्ति तो अपने आपको सक्षम उम्मीदवार साबित करने और नारे-जुमले उछालने में ही लग जाती है। शेष बची शक्ति का आधा भाग पार्टी से टिकट प्राप्त करने में लग जाता हैए चौथाई शक्ति साधन जुटाने में और चौथाई शक्ति झूठे हाथ जोडऩे में, झूठे दांत दिखाने में व शराब पिलाने में लग जाती है। ऐसे प्रत्याशी लोक कल्याण की बात सोचेंगे या स्वकल्याण की?

लोकतंत्र के इस सुन्दर नाजुक वृक्ष को नैतिकता के पानी और अनुशासन की ऑक्सीजन चाहिए। अगर ठीक चले तो लोकतंत्र से बेहतर कोई प्रणाली नहीं और ठीक न चले तो इससे बदतर कोई प्रणाली नहीं।

ललित गर्ग

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