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चीन ने फिर की हिमाकत! कैसे पैदा होगा रिश्तों में भरोसा ?

हिंद महासागर भारत का स्वाभाविक सागरीय इलाका माना जाता है लेकिन वह इस इलाके में भी छोटे द्वीप देशों जैसे सेशेल्स मडागास्कर और मारीशस को कई तरह की आर्थिक मदद देकर भारत से दूर जाने को प्रेरित करने की रणनीति पर चल रहा है।
लद्दाख में चीन के साथ तीन हफ्ते चला सैन्य गतिरोध खत्म करने के लिए भारत को चुमार इलाके के अग्रिम क्षेत्र में बने अपने टीन शेड को हटाना पड़ा। ताजा घटनाक्रम के बाद भारत ने चीन की ओर से भेजे गए सीमा मामलों पर रक्षा सहयोग के नये प्रस्ताव पर भी सक्रियता से विचार शुरू कर दिया है इस बीच लद्दाख के दिपसांग बल्ज क्षेत्र से अपने तंबूओं को हटाने के बाद चीनी सैनिक अपनी हद में लौट गए हैं।

सूत्रों के मुताबिक मानव रहित टोही विमानों (यू ए वी) से मिली तस्वीरों से पुष्टि हो गयी है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय हद में दाखिल हुआ चीनी फौजी दस्ता अपने इलाके में लौट गया है। हांलाकि 15 अप्रैल से पहले की स्थिति बहाल करने पर बनी द्विपक्षीय सहमति के लिए भारत को चुमार क्षेत्र से अपना टीन से बना शेड भी हटाना पड़ा। सूत्रों के मुताबिक इस शेड का काम 18 अप्रैल को पूरा हुआ था। यह शेड चुमार इलाके में भारतीय सेना की अंतिम चौकी से करीब 8 किमी. आगे था। चीनी सैनिकों द्वारा 15 अप्रैल का दिपसांग बल्ज के राकीनाला में तंबू गाडऩे के बाद भारत ने भी अपने दस्तों को चुमार में अग्रिम मोर्चे पर बढ़ा दिया था। चुमार के झिपुगी अरला क्षेत्र में बने मोर्चे से चीन का एक बड़ा इलाका भारतीय निगरानी में आता है।

रक्षा मंत्री ए. के. एंटनी ने बताया कि दोनों पक्ष 15 अप्रैल से पहले की स्थिति बहाल करने पर सहमत हुए हैं। हांलाकि रक्षा मंत्री इस सवाल को टाल गए कि क्या इसके लिए चुमार क्षेत्र से भारतीय सैन्य दस्तों के हटने या रणनीतिक अहमियत के निगरानी स्थान को छोडऩा पड़ा। समझा जाता है कि भारत व चीन के बीच तीन हफ्ते से चली आ रही मोर्चाबंदी खत्म करने के लिए भारत को अपने कई बंकरों से समझौता करना पड़ा।

सूत्रों का कहना है कि भारत ने राजदूत से लेकर सैन्य वात्र्ताओं तक हर स्तर पर यही बताया कि किसी भी मतभेद पर बात संभव है, लेकिन चीन को 15 अप्रैल से पहले की स्थिति में लौटना होगा। वैसे भारतीय खेमा अब भी चीन के

साथ गतिरोध के कारणों पर मंथन कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक सीमा मामलों पर सहमति बनाने के लिए चीन की ओर से कुछ उतावलापन जरूर नजर आया। चीन ने दो-तीन महीने पहले सीमा पर सैन्य सहयोग व संपर्क बढ़ाने के लिए एक समझौते का प्रस्ताव भेजा था। इसमें दोनों सेनाओं के बीच बेहतर संवाद व दोस्ताना संपर्क की बात कही गयी थी। इस बारे में सरकार के भीतर विचार विमर्श शुरू हो गया है। विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने इससे इनकार किया कि चीन के साथ कोई लेन-देन हुआ या भारत अपने बंकर ध्वस्त करने को राजी हो गया।

पन्द्रह अप्रैल को लद्दाख की देपसांग घाटी में चीन की घुसपैठ से भारत सकते में था। 1986 में अरुणाचल प्रदेश की समदुरोंग छू घाटी में घुसपैठ करने के बाद यह दूसरी वारदात थी जब चीनी सैनिक भारतीय इलाके में आए और तम्बू लगा कर वहीं बैठ गए। चीनी सैनिक यूं तो भारतीय इलाके में अक्सर घुसते रहे हैं लेकिन भारतीय सेना द्वारा देखे जाने और ऐतराज करने के बाद वापस चले जाते रहे थे लेकिन इस बार चीनी सेना ने लगता है कि कछ खास इरादे से घुसपैठ करने के बाद अपना डेरा भारतीय सीमा के 19 किलोमीटर भीतर जमा लिया। भारत की ओर से पहले सैनिक और फिर राजनयिक स्तर पर यह मसला उठाया गया लेकिन चीन अपनी जिद पर अड़ा रहा। भारत भी जवाबी कार्रवाई कर सकता था जैसा कि 1967 में नाथुला में चीनी अतिक्रमण को भारतीय सैनिकों ने निरस्त करने का साहस दिखाया था। तब तो 1962 की हार की वजह से भारतीय सेना का मनोबल वैसे ही गिरा हुआ था लेकिन तब स्थानीय कमांडर ने हिम्मत दिखाई और चीनी सैनिकों को जोरदार चुनौती दी। तब चीनी सैनिकों ने साफ समझ लिया था कि उनकी दाल बार-बार गलने वाली नहीं है। लेकिन साढ़े चार दशक बाद चीन की सेना ने एक बार फिर ललकारा तो भारतीय सेना को जवाबी कार्रवाई करने के निर्देश देने से राजनीतिक नेतृत्व केपसीने छूट रहे थे।

चीन के इस रवैये से यहां सामरिक हलकों में हैरानी थी। चीन ने आखिर यह वक्त क्यों चुना जब एक महीने बाद चीन के प्रधानमंत्री ली ख छ्यांग अपने पहले विदेश दौरे के लिये भारत यात्रा पर आने वाले हैं? क्या चीन की यह चाल है कि मीठा बोल कर जेब काट लो? आखिर भारत का दौरा कर वह भारत से और क्या हासिल करना चाहते हैं। चीन के नये प्रधानमंत्री ली ख छ्यांग ने अपने पहले विदेश दौरे के लिये भारत को चुना है जिसे भारतीय राजनयिक हलकों में चीन के भारत के प्रति बदले हुए रुख के तौर पर देखा जा रहा था लेकिन लद्दाख में चीनी सेना ने घुसपैठ कर इन सब उम्मीदों पर पानी फेर दिया। ताजा घुसपैठ से चीन का असली चेहरा एक बार फिर उजागर हुआ है। 1962 की लड़ाई के पहले भी भारत चीन भाई भाई का नारा लगा था और भारत और चीन के प्रधानमंत्रियों ने एक दूसरे के यहां दौरे किये थे पर इसका जो नतीजा निकला उसके घाव आज भी भारत सहला रहा है। भारत चीन सीमा की चौकसी के लिये भारतीय सेना की तैनाती इतनी बढ़ानी पड़ी जिससे भारतीय करदाताओं पर हजारों करोड़ रुपये का हर साल अतिरिक्त बोझ पड़ जाता है। चीन से लगी 4057 किलोमीटर वास्तविक नियंत्रण रेखा अरुणाचल प्रदेश से लेकर उत्तराखंड और हिमाचल से होते हुए लद्दाख तक फैली है और चूंकि इस सीमा का निर्धारण नहीं हुआ है इसलिये इसका बहाना लेकर चीनी सेना भारतीय इलाके में निरंतर घुसती चली रही है। इसके पीछे चीन का इरादा यही लगता है कि धीरे धीरे भारतीय इलाके में घुसते जाओ और जब सीमा निर्धारण के समझौते की कोई बातचीत होगी तो चीनी सैनिक जहां हैं उसे ही वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सीमा की मान्यता मिल जाएगी। 1954 में चीन के साथ पंचशील का समझौता करने के बाद भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा तो मान लिया, लेकिन इसके साथ बड़ी भूल की कि तिब्बत और भारत के बीच की सीमा रेखा का स्पष्ट निर्धारण नहीं करवाया। तब चीन ऐसा करने को तैयार हो जाता और मैकेमोहन रेखा को लेकर अपना विरोध त्यागने को मजबूर होता, क्योंकि तब तिब्बत को चीन के हिस्से के तौर पर भारत की मान्यता हासिल करना चीन की सबसे बड़ी रणनीति थी।

एलएसी मोटे तौर पर मैकमोहन रेखा पर आधारित है। सबसे पहले चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चओ अन लाए ने ही इस शब्द का प्रयोग करते हुए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को 1959 में पत्र लिखा था कि एलएसी का मतलब पूर्व में मैकमोहन रेखा से लेकर पश्चिम में जहां तक दोनों देशों का वास्तविक नियंत्रण है। तब नेहरू ने चओ अन लाए की इस शब्दावली को स्वीकार नहीं किया था। पहली बार 1993 में विश्वास निर्माण उपाय लागू करने वाले समझौते के तहत दोनों देशों ने इसे वैधानिक दर्जा दिया।

1914 में तत्कालीन ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव हेनरी मैकमेहोन और तिब्बत के प्रतिनिधि के बीच शिमला समझौते के तहत दोनों देशों को विभाजित करने वाली रेखा का नाम मैकमेहोन रेखा पड़ा। तब तिब्बत एक स्वतंत्र देश था इसलिये चीन आज इस समझौते को नहीं मानता है लेकिन इस समझौते के आधार पर मोटे तौर पर एलएसी को मान्यता देता है।

इस ‘लाइन आफ एक्चुअल कंट्रोल’ के बारे में नेहरू ने कहा था कि यह एक मोटी निब से खींची गई थी इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि यह रेखा किस पर्वत या नदी नाले से होकर चलती है। इसी वजह से भारत और चीन के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इस एलएसी को लेकर दोनों देशों की अपनी अपनी अवधारणाएं है। लेकिन दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे के दावे को नहीं मानती हैं। लेकिन अपनी अवधारणा के मुताबिक दोनों देंशों की सेनाएं अरुणाचल प्रदेश से लेकर लद्दाख तक गश्त करती रहती हैं।

गश्त के दौरान दोनों देशों के सैनिक अक्सर एक दूसरे की अवधारणा वाले इलाके में चले जाते हैं। अक्सर गश्त के दौरान दोनों देशों के सैनिक एक दूसरे के आमने सामने भी हो जाते हैं और टोकने के बाद वे अपने-अपने इलाके में वापस चले जाते हैं। गश्ती के दौरान एक दूसरे के इलाके में गलती से जाने के बहाने चीनी सैनिकों की हाल में घुसपैठ काफी बढ़ गई थी।

1986 में अरुणाचल प्रदेश के इलाके में समदुरोंग छू घाटी में इसी तरह एक रात चीनी सैनिक अचानक घुसपैठ कर जम गए थे। इसे हटाने के लिये भारतीय सेना को आपरेशन फालकन चलाना पड़ा। लद्दाख की देपसांग घाटी में घुसपैठ करने और जमे रहने की ताजा वारदात 1986 के बाद पहली है।

चीनी सैनिकों की घुसपैठ पर नजर रखने और उन्हें रोकने के इरादे से ही हाल के सालों में भारतीय सेना ने एलएसी के नजदीक हवाई पट्टियां और सैन्य चौकियां बनाई थीं। ये हवाई पट्टियां न्योमा, फुकचे और दौलत बेग ओल्दी में बनी हैं जहां भारतीय वायुसेना के परिवहन विमान उतरते हैं। इस पर चीन ने ऐतराज किया है जब कि चीन ने भी इसी तरह की सुविधाएं कई इलाकों में बनाई हैं जो एलएसी से काफी पीछे है लेकिन ये सड़क मार्ग से वास्तविक नियंत्रण रेखा से जुड़ी हैं। चीन ने तिब्बत के इलाके में भारत की ओर निशाना कर कई बैलिस्टिक मिसाइले भी तैनात कर ली हैं और केवल भारत को नजर में ही रखकर कई वायुसैनिक अड्डे भी बना लिये हैं जहां चीन अपने लड़ाकू विमानों को तैनात रखता है।

चीन की इसी तैयारी के जवाब में भारतीय वायुसेना ने भी उत्तर पूर्वी राज्यों में कई वायुसैनिक अड्डों पर अपने आधुनिकतम सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों की तैनाती शुरू कर दी है। भारत ने अपनी सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलें भी चीनी सीमा के इलाके में तैनात की हैं जो तिब्बत के इलाके में चीनी सैनिक ठिकानों को तहस नहस कर सकती हैं। साफ है कि सीमा पर विवाद बने रहने की वजह से भारत और चीन दोनों अपने अपने इलाके में सैन्य तैनाती बढ़ाते जा रहे हैं। चीन इतना खर्च वहन कर सकता है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था सात खरब डालर की हो चुकी है जब कि भारत की अर्थव्यवस्था एक खरब डालर के करीब ही है।

सीमा का विवाद दूर करने के लिये भारत और चीन के बीच अस्सी के दशक से ही बात चल रही है लेकिन चीन हमेशा किसी नतीजे पर पहुंचने से इसलिये कतरा रहा है कि वह सीमाओं को शांत बनाकर भारत पर सैनिक दबाव कम होते नहीं देखना चाहता। आर्थिक तौर पर मजबूत भारत चीन के लिये एक बड़ी चुनौती बन सकता है। चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जताता है और संकेत देता है कि भारत यदि तवांग का इलाका चीन को देने को तैयार हो जाए तो दोनों देशों के बीच सीमा मसला हमेशा के लिये सुलझ सकता है लेकिन भारत को यह कतई मान्य नहीं होगा। 2006 में भारत और चीन के बीच सीमा समझौते के हल के लिये एक राजनीतिक दिशानिर्दंश पर सहमति बनी थी जिसमें दोनों पक्षों ने माना था कि सीमा मसले के हल के लिये आबादी का ध्यान रखा जाएगा। तब भारत की ओर से सोचा गया कि चूंकि तवांग आबादी का इलाका है इसलिये चीन इस बारे में सौदेबाजी नहीं करेगा लेकिन चीन ने बाद में इस समझौते की मूल भावना से ही अपने को अलग कर लिया और इस तरह 2006 की संधि की वह अब बात नहीं करता।

इसके साथ ही चीन ने भारत पर अपनी शर्ते थोपने के लिये कई तरह से सामरिक दबाव बनाना शुरू किया है। इसके तहत उसने चारों तरफ से भारत की घेराबंदी करने की रणनीति अपनाई है। वह भारत के पड़ोसी देशों को अपनी आर्थिक ताकत के बल पर अपनी ओर खींचने की रणनीति पर चल रहा है। श्रीलंकाए मालदीव, म्यांमार, नेपाल और बांग्लादेश जैसे भारत के पड़ोसी देशों में बंदरगाह और कई अन्य तरह की ढांचागत सुविधाएं बना कर वह इन देशों को अपने पाले में लाने की कोशिश करता है। पाकिस्तान को तो उसने परमाणु बम और बैलिस्टिक मिसाइलें देकर भारत के लिये मुश्किलें पैदा की ही हैं वह कराची के निकट ग्वादार बंदरगाह का विकास कर वहां अपनी सैन्य मौजूदगी भी बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है।

हिंद महासागर भारत का स्वाभाविक सागरीय इलाका माना जाता है लेकिन वह इस इलाके में भी छोटे द्वीप देशों जैसे सेशेल्स मडागास्कर और मारीशस को कई तरह की आर्थिक मदद देकर भारत से दूर जाने को प्रेरित करने की रणनीति पर भी चल रहा है।

चीन न केवल भारत को उसके पड़ोसी देशों से दूर करने की रणनीति पर चलता है बल्कि अपने दक्षिण चीन सागर के इलाके में अपने सागरीय पड़ोसी देशों के साथ भारत द्वारा दोस्ताना रिश्ते बनाने को पसंद नहीं करता है। चीन ने पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा किया है जिस वजह से वियतनाम, फिलीपींस जैसे देश चिंतित हैं। इस इलाके के द्वीपों पर चीन ने अपना दावा किया है जब कि ये द्वीप दूसरे देशों के समुद्री इलाके में पड़ते हैं। इस तरह चीन ने न केवल भारत से दुश्मनी का रवैया अपनाया है बल्कि अपने सागरीय पड़ोसी देशों के खिलाफ भी उसी तरह का विस्तारवादी रुख अपना रहा है। चीन के इस रवैये से पूरी दुनिया में चिंता है। एक आर्थिक और सैनिक महाशक्ति के तौर पर उभर चुके चीन से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने आसपास और दूर के इलाकों में अपनी महत्वाकांक्षाओं की वजह से तनाव का माहौल नहीं पैदा करे।

चीन के प्रधानमंत्री ली ख छ्यांग जब आगामी 20 मई को भारत दौरे पर आएंगे तब भारतीय नेतृत्व को भी चीन से साफ साफ बात करनी होगी कि दोनों देशों के बीच दोस्ती बराबरी के आधार पर ही हो सकती है। दोस्ती में केवल एक पक्ष को फायदा हो और दूसरे को नुकसान हो तो उससे दोस्ती अधिक दिनों नहीं टिकती। चीन चाहे कितना ही सहयोग और साझेदारी की बात करे प्रधानमंत्री लीख छ्यांग भारत दौरे में रिश्तों में भरोसा पैदा कर स्वदेश नहीं लौट सकेंगे।

रणजीत

фото израиляfbconsult.ru

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