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शब्दों के वीर हैं हमारे नेता

विश्व में भारत की उभरती आर्थिक ताकत और उसकी राजनीतिक शक्ति के बीच इतना असंतुलन क्यों है? जब राजनयिक शक्ति प्रदर्शन का सवाल आता है तो दुनिया क्यों भारत को एक कमजोर देश या सॉफ्ट स्टेट की नजर से देखती है।
अक्सर मन में ये विचार उठता है कि अपना देश शब्दवीर हो कर क्यों रह गया है? जब भी देश की अस्मिता और सामूहिक चेतना पर कोई चोट पहुंचाता है तो हमारा नेतृत्व, चाहे वो पक्ष हो या विपक्ष, बस बयानबाजी करने लग जाता है। एक शोर सा उठता है। टीवी और मीडिया में कोलाहल उत्पन्न होता है और फिर कुछ समय बाद सब सामान्य हो जाता हैए जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। पाकिस्तान द्वारा हमारे सैनिकों की हत्या कर सर विहीन धड़ लौटाने का मामला हो या फिर इटली के नौसैनिकों द्वारा केरल की समुद्री सीमा में हमारे मछुआरों की हत्या के बाद उनपर मौत का मुकदमा ना चलाये जाने का सरकारी वादा हो या फिर सरबजीत की लाहौर की कोट लखपत जेल में नृशंस हत्या, पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार हों या फिर उनके वहां से भाग कर भारत आ जाने के बाद यहां उनकी दुर्दशा। हर बार हमारी सरकार और नेता सिर्फ बयान देकर ही रह जाते हैं। अब तो ऐसा लगता है कि ये हमारी आदत में शुमार हो गया है। हर बार मुझे महाकवि तुलसीदास की एक पंक्ति याद आती है विद्यमान रन पाई रिपु, कायर करहिं प्रलापए हमारा नेतृत्व सिर्फ प्रलापी हो कर रह गया है।विश्व में भारत की उभरती आर्थिक ताकत और उसकी राजनीतिक शक्ति के बीच इतना असंतुलन क्यों है? जब राजनयिक शक्ति प्रदर्शन का सवाल आता है तो दुनिया क्यों भारत को एक कमजोर देश या सॉफ्ट स्टेट की नजर से देखती है।

इसके दो बड़े कारण साफ दिखाई देते हैं। भारत की विदेश नीति चलाने और देश की रणनीतिक, सामरिक सोच बनाने की जिम्मेदारी एक तो राजनेताओं के पास है और दूसरी भारतीय विदेश सेवा के अधिकारिओं के पासए ये दोनों ही वर्ग आज के भारत की सोच से कोई बीस बरस पीछे चल रहें हैंए संभवत: उन्हें आज भी भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक याचक ही नजर आता है। देश की ताकत का अंदाजा उन्हें नहीं है। ये ताकत सिर्फ आर्थिक नहीं है। ये ताकत है भारत की नयी पीढ़ी के आत्मविश्वास और सपनों की ताकत। सारी बाधाओं, अभावों, रुकावटों और परेशानियों के बीच सफलता हासिल करने की उसकी अदम्य इच्छा की ताकत, जो अमेरिका की सिलिकोन वैली से लेकर गुडग़ांव, बंगलोर और गुजरात एवं चेन्नई के कारखानों तक दिखाई देती है। रोजमर्रा की भारतीय विदेश नीति चलाने वालों यानी भारतीय विदेश सेवा के अधिकारिओं की बात करें तो उनकी मानसिकता अभी भी सामन्तवादी दिखावे और राजनयिक नफासत के सिद्धांतों से आगे नहीं बढ़ पाई है। लगता नहीं कि राजनीतिक शक्ति सिद्धांत यानी श्रियल पोलिटिकश् के सबक उसे आते हैं। इसलिए हर बार उसकी सारी शक्ति सिर्फ सही शब्दों के चयन भर में सीमित हो कर रह जाती है। असली शक्ति यानी श्हार्ड पावरश् के इस्तेमाल के साथ उसकी सहजता नहीं हैं।

दूसरी तरफ राजनेताओं की सोच बहुत सीमित दिखाई देती है। वे आगामी चुनाव से आगे की सोचते ही नहीं। देश की दीर्घकालिक सामरिक आवश्यकता क्या है, उसकी सामूहिक चेतना क्या चाहती है। इन सबसे जैसे उनका सरोकार ही नहीं लगताए नहीं तो क्यों अब तक 26ध्11 का प्रतिकार नहीं हुआ? क्यों सैनिकों के सिर काटने की घटना को चुप चाप सह लिया गया।

जब अल्पसंख्यक हिंदुओं पर पाकिस्तान और बंगलादेश में अत्याचार होते हैं तो उसे दुनिया भर में क्यों नहीं उठाया जाता? देश का नेतृत्व बयानबाजी से आगे बढ़कर एक निश्चित कार्य योजना पर क्यों नहीं जाताघ् कल्पना कीजिये कि दुनिया के किसी और देश में अगर मुंबई हमले जैसी या सरबजीत जैसी घटना होती तो क्या वो देश सिर्फ बयान देकर चुप हो जाते? नहीं, वे इसका मुंहतोड़ जबाव देने की योजना बनाते और उसपर अमल करते।

इसलिए अब हिंदुस्तान चाहता है कि हमारा नेतृत्व सिर्फ शब्दवीर न रहकर कर्मवीर बने। इन घटनाओं पर पूरे देश में हो रहे धरने प्रदर्शन इस बात का सबूत हैं कि अब सख्त बयानों की नहीं, कार्रवाई की जरूरत है

उमेश उपाध्याय

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