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चूहे बिल्ली की लड़ाई में उलझे भारत पाकिस्तान संबंध

हिंदुस्तान का विभाजन और पाकिस्तान को बने हुए 65 साल से ज्यादा हो गए हैं लेकिन बदकिस्मती से दोनों देशों में से किसी ने भी मिलजुल कर रहना तो दूर, शांति से रहना भी नहीं सीखा। अटलबिहारी वाजपेयी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में कहा करते थे कि दोनों देश जानते हैं कि वे अपने पड़ोस को नहीं बदल सकते। भारत-पाक रिश्तों में सबसे ज्यादा मूर्खतापूर्ण स्थिति यह है कि यह रिश्ता टॉम और जैरी की तरह है कि एक कोई हरकत करता है तो दूसरा उसका तुर्की-ब-तुर्की जवाब देने के लिए तैयार रहता है।

पिछले 21 साल से पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में रह रहे, मौत की सजा पाए कैदी, भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह की हत्या किया जाना, भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे इसी अलिखित व अकथित सिद्धांत पर ही आधारित है। सरबजीत को 1990 में लाहोर और इस्लामाबाद में तथाकथित बम घमाकों के आरोप में यह सजा हुई थी। उन धमाकों में 14 लोगों की मौत हुई थी।

यह विश्वास करना मुश्किल है कि 26 अप्रैल को जेल में उसके साथ के बंदियों ने तैश में आकर उसके सिर पर ईंटों और सरियों से हमला कर दिया। खुफिया सूत्रों के हवाले से रिपोर्टें आ रही थीं कि लश्करे-तैयबा और तहरीर-ए-तालिबान, पकिस्तान ने अजमल कसाब (21 नवंबर, 2012) और अफजल गुरु (9 फरवरी, 2013) को फांसी पर चढ़ाए जाने के विरोध में सरबजीत पर हमले और उसकी हत्या की योजना बनाई थी।

ऐसी रिपोर्ट हैं कि सरबजीत सिंह पर हमला करने वाले मुदस्सर और आफताब लश्करे-तैयबा और तहरीर-ए-तालिबान, पाकिस्तान के छोटे छोटे मोहरे थे। इन दोनों के अलावा पांच और कैदियों ने सरबजीत पर हमला किया था जिनकी पहचान साफ नहीं है। इन पाकिस्तानी कैदियों ने चम्मचों और तश्तरियों पर धार चढ़ाकर उन्हें सरबजीत पर हमले के लिए इस्तेमाल किया था। अगर सरबजीत सिंह पर हुए घातक हमले में लश्करे-तैयबा और तहरी-ए-तालिबान के हाथ होने की बात में सचाई है तो ये विश्वास करना मुश्किल न होगा कि इन गैर-सरकारी कलाकारों को तब तक यह मौका नहीं मिल सकता था जब तक सरकारी कलाकारों (कोट लखपत जेल के अधिकारियों और अंतरसेवा गुप्तचरों) द्वारा इस ओर से आंख न मूंद ली गई हो।

पाकिस्तान की हो कड़ी भर्तसना
मनमोहन वैद्य, आर.एस.एस.
पाकिस्तान की जेल में हुए जानलेवा हमले में भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह की दु:खद मृत्यु से सारा देश गहरी चोट एवं आक्रोश अनुभव कर रहा है। भारत पर आतंकी हमले के दोषी पाये गए अफजल गुरु को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर फांसी दिए जाने की प्रतिक्रिया के रूप में सरबजीत सिंह पर जेल में हमला हुआ था। यह हमला सरबजीत सिंह नामक व्यक्ति पर नहीं अपितु भारत के संविधान और न्यायिक प्रक्रिया पर किया गया परोक्ष प्रहार था। सरबजीत सिंह ने पाकिस्तानी अधिकारियों के समक्ष स्वयं पर हमला होने की आशंका जताई थी। परंतु इसके बावजूद वहां की सरकार ने उनकी उचित सुरक्षा अथवा उन्हें सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने के लिए कोई उचित कदम नहीं उठाया। यह अपने आप में अति गंभीर त्रुटि है।
सरबजीत का क्या अपराध था? पाकिस्तानी न्यायालय द्वारा उन्हें जो सजा सुनाई गई वह कितनी उचित थी? अभी इस पर भी मतैक्य नहीं है। ऐसे में सजा काट रहे व्यक्ति को जेल में ही निशाना बनाया जाना, पाकिस्तान की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। भारत सरकार को इस विषय का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए पाकिस्तान की कड़ी भत्र्सना करनी चाहिए।
भारत-पाकिस्तान संबंधों के मामले में पारस्परिकता के सिद्धांत के बारे में पाकिस्तानी इरादे भी अनजान नहीं हैं। दरअसल सरबजीत ने भी कसाब और अफजल गुरु की फांसी के बाद अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता प्रकट की थी। दूसरी ओर भारत सरकार ने सरबजीत पर हमले के बाद भारत की विभिन्न जेलों में बंद पाकिस्तानी कैदियों की सुरक्षा अपनी तरफ से ही बढ़ा दी है। यह सब करने के लिए पाकिस्तान ने भारत सरकार से नहीं कहा था।
राजकीय सम्मान के साथ हुई अंत्येष्टि
सरबजीत सिंह का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। अमृतसर के नजदीक भीखीविंड में सरबजीत की अंत्येष्टि के मौके पर हजारों लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा था। इन हजारों लोगों की भीड़ में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल के साथ पूरा कैबिनेट भी मौजूद था। उल्लेखनीय है कि लाहौर की कोट लखपत जेल में कैदियों के हमले में बुरी तरह जख्मी होने के बाद सरबजीत सिंह कोमा में चले गए थे और फिर मौत के बीच झूल रहे सरबजीत सिंह की मौत हो गई थी।
हैरत की बात यह है कि राहुल गांधी के सरबजीत सिंह की बहन से मिलने के लिए जाने के बावजूद केंदेर की कांग्रेस सरकार ने उसके परिजनों की सहायता के लिए प्रधानमंत्री राहत कोष से केवल 25 लाख रुपए की सहायता राशि देने की घोषणा की। यह तो पंजाब की भाजपा-अकाली गठबंधन की सरकार है जिसने सरबजीत के परिवारवालों को एक करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता देने और तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की। इसे आपसी राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है, परंतु फिर भी मानवता के आधार पर पंजाब सरकार के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए।
यह सिर्फ पाकिस्तान सरकार का पागलपन नहीं है क्योंकि पाकिस्तान बरसों की नफरत और अविश्वास की मानसिकता के साथ जी रहा है। कुछ ऐसी ही मानसिकता का दोषी भारत भी है। पाकिस्तान के वैज्ञानिक डॉ. खलील चिश्ती को बीस साल कर जेल में डाले रखने के बाद 12 दिसंबर 2012 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद छोड़ा गया। वह भी इन आरोपों से इनकार करता रहा था।

डॉ. चिश्ती को जब छोड़ा गया तब उसकी उम्र 80 साल हो गई थी। अप्रैल 2012 को जब नई दिल्ली में पाकिस्तानी सदर आसिफ अली जरदारी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से डॉ. चिश्ती को छोडऩे का आग्रह किया, तब भी भारत के कान में जूं तक नहीं रेंगी थी।

सरबजीत के मामले में भारत-पाक राजनयिक रिश्तों में जैसे को तैसा वाली बात तब सामने आई जब मीडिया ने इसे हाई प्रोफाइल केस बना दिया। इसी साल इस तरह के दो और मामले सामने आए हैं। एक तो पिछले महीने के शुरू का ही है जिसमें भारत-पाक रिश्तों के इस मूर्खतापूर्ण सिद्धांत की ओर संकेत मिलता है। फर्क सिर्फ इतना है कि ये मामले अल्पज्ञात लोगों के साथ जुड़े हैं।

इस साल जनवरी में लाहौर की इसी कोट लखपत जेल में साथी पाकिस्तानी कैदियों के हमले के बाद एक भारतीय कैदी मारा गया। सलमान खुर्शीद सहित भारत के कई अधिकारियों के लगातार निवेदन के बाद भी उस मृत कैदी की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई। 5 अप्रैल 2013 को एक पाकिस्तानी कैदी ने गुजरात की बनासकांठा जेल में कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी।

अब समय आ गया है कि नाभिकीय हथियारों से सज्जित दो पड़ोसी अपने संबंध सुधारें। 65 साल का अविश्वास एक रात में खत्म नहीं हो सकता। यह सोचना भी बेवकूफी होगी कि पाकिस्तान सैन्य संस्थान भारत के खिलाफ दुश्मनी को एकदम से छोड़ देंगे और पाकिस्तानी विदेश नीति के हथियार के रूप में आतंकवाद का इस्तेमाल करना बंद कर देंगे। परंतु भारत तब तक चैन की सांस नहीं ले सकता जब तक पाकिस्तान भारत के खून के प्यासे आतंकवादियों की बाढ़ नहीं रोकता।

बड़े मुद्दों के सुलझने में तो समय लग सकता है लेकिन कम से कम एक काम तो ऐसा है जो दोनों पक्ष बिना किसी झंझट के कर सकते हैं। मानवीय धरातल पर एक दूसरे देश के कैदियों के कल्याण के प्रति जागरूक बनें। दूसरे देश के कैदियों को बेजरूरत रखने, उन पर पैसा खर्च करने से कुछ मिलने वाला नहीं है। भारत और पाकिस्तान साथ बैठकर ऐसे कैदियों की सूचियां तैयार कर सकते हैं जिन पर किसी तरह के गंभीर आरोप न हों, देश के खिलाफ युद्ध छेडऩे जैसे आरोप हों, मानवीयता के आधार पर उनका आदान-प्रदान किया जा सकता है। सरबजीत सिंह जैसे लोगों के मामले में ऐसा किया जा सकता था, जिस पर पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेडऩे के आरोप में बरसों पहले फांसी की सजा सुना दी गई थी।

 

राजीव शर्माконкурентная разведка курсыпрофессиональная гигиена зубов

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