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बलात्कार रोकने में अब भी ढीला है कानून

गत 16 दिसंबर 2012 दिल्ली के वसंत विहार इलाके में बस में सवार कुछ अपराधियों ने एक लड़की के साथ दरिंदगी की सारी सीमाएं पार कर दीं। मीडिया ने पीडि़ता को निर्भया और दामिनी आदि नाम दिये। पूरा देश हिल गया। निरंतर प्रदर्शन व धरने हुए पर हम उसे बचा नहीं सकें। सरकार ने कड़ें कानून बना दिये पर क्या कानून बनाने से अपराध रूक जाते है? अपराधी कानून की किताब नहीं पढ़ते। यहीं नहीं तब से लगातार यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाओं की बाढ़ आ गई है। देश के हर कोने से रोज लड़कियों पर अमानवीय अत्याचारों की कहानियां सुनाई पड़ रही है। दिल्ली में फिर पांच वर्ष की बच्ची को शिकार बनाया गया। दूध पीती बच्चियों तक को अपराधी निशाना बना रहे है इस समस्या पर क्या सोचते है कानूनविद, मनोरोगो के चिकित्सक और समाजसेवी। पढि़ए…
जिस प्रकार से मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार के अपराध हो रहे हैं, उन्हें मद्देनजर रखते हुए सरकार को बलात्कार के मामलों में फांसी की सजा का प्रावधान कानून में करने पर फिर विचार करना चाहिए। कानून में यह प्रावधान कर दिया जाए कि यदि बलात्कार की शिकार 10 वर्ष से कम आयु की बच्ची है तो बलात्कार करने वाले को फांसी की सजा दी जाए। जब तक कानून में ऐसा प्रावधान नहीं किया जाएगा तब तक इस प्रकार के अपराधों में हो रही वृद्धि रूकने का नाम नहीं लेगी।

आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 11 सालों में बच्चों के यौन शोषण के मामलों में 336 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस दौरान 48 हजार बच्चों पर सेक्सुअल असाल्ट के मामले प्रकाश में आए हैं। बड़ी संख्या में ऐसे भी मामले हो सकते हैं जो किन्हीं वजहों से प्रकाश में नहीं आए। 16 दिसम्बर को हुए गैंग रेप के मामले के बाद भी

छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार होते रहे हैं। बलात्कारी सोचते हैं कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

बिगड़ गया है माहौल
समाज को बच्चों के प्रति लोगों की सोच बदलने में सक्रियता से भाग लेना चाहिए। बाजार में अश्लील सामग्री के वीडियो खुले आम मिल रहे हैं। उन्हें देख कर लोग असंवेदनशील होते जा रहे हैं। 16 दिसम्बर को जो घिनौना अपराध हुआ, उसमें बलात्कारियों ने अपराध करने से पहले वह वीडियो देखा जिसमें एक महिला अपनी दो बेटियों के साथ बाजार जा रही है। चार-पांच लड़के गाना गाते हुए दिखाई देते हैं जो पहले महिला के साथ बलात्कार करते हैं और गाना गाते हुए आगे बढ़ जाते हैं और फिर वे लड़के उस महिला की बेटियों के साथ बलात्कार कर के गाना गाते हुए खुशी जाहिर करते हैं। उनके हाव भाव से लगता है जैसे कोई बहुत बड़ा किला उन्होंने फतह किया हो। उनके चेहरों पर किसी प्रकार की आपराधिक भावना नहीं झलकती।

शिक्षा के अधिकार के कानून को सरकार पूरी तरह लागू नहीं कर पा रही है। लोग अशिक्षित हैं पर अश्लील सामग्री बाजार में खुले आम मिल रही है। यहां तक कि साहित्यक पठन सामग्री में भी खुले आम अश्लीलता घोल दी गई है। जैसे अश्लीलता के बगैर साहित्य पूरा ही नहीं होगा।

जहां तक यौन शिक्षा की बात है तो यदि वह यूएन स्टेंडर्ड की होगी तो उसमें भी बच्चों को अश्लीलता का पाठ पढ़ाने के खतरे पैदा हो जाएंगे। वैसे भी बच्चों को उम्र से पहले ही उस सब का ज्ञान हो जाता है जो एक उम्र से पहले नहीं होना चाहिए। मासूम नन्हें बच्चों को यौन शिक्षा देने के लिए ऐसी पुस्तकें आई हैं जिनमें अश्लील सामग्री को भी मात देने वाली शैली में जानकारी दी गई है। टेलीविजन और इंटरनेट ने बच्चों को समय से पहले ही उस उम्र में पहुंचा दिया है जिसने उनके बचपन को ही समाप्त कर दिया है। नन्हें बच्चों को सेक्स का उतना ज्ञान हो गया है जो पहले सुहागरात में भी दम्पत्ति को नहीं होता था। जस्टिस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट में किशोर की आयु सीमा 18 से 16 वर्ष न किया जाना एक बहुत बड़ी खामी मानी जा सकती है। आज का खान-पान, जीवन शैली, जानकारी के स्रोत आदि इस प्रकार के हैं कि 16 साल की आयु में एक किशोर शारीरिक और मानसिक रूप से वयस्क हो जाता है। लेकिन कानूनन वह किशोर ही माना जा रहा है। इस उम्र में वह कितना भी बड़ा अपराध करे, उसे बाल अवस्था में मानते हुए कानून से बचाव मिल रहा है।

हो सकती है कार्यवाही
बलात्कार के मामलों से निपटने के लिए बने नए कानून में शामिल एक प्रावधान ने इस कानून को बहुत मजबूत बना दिया है। वह प्रावधान है कि बलात्कार की घटना की प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज न करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ अदालत में अपराधिक मामला चलाया जा सकता है। पुलिस अधिकारी होने के बावजूद उसके विरूद्ध कानूनी कार्यवाही करने के लिए किसी प्रकार की अनुमति की जरूरत नहीं है।
इससे पुलिस की कोताही के कारण बलात्कार के जो मामले प्रकाश में नहीं आ पाते थे और अपराधी इतना घिनौना अपराध करके भी कानून के शिकंजे से साफ बच जाते थे, अब उस पर रोक लगने की संभावना बनेगी। बलात्कारी को बचाने के लिए एफआईआर दर्ज न करने के बारे में सोचने से भी पहले ऐसे पुलिस अधिकारी को अपने हाथ कानून के शिकंजे में कसे नजर आएंगे। इससे पहले ऐसा नहीं होता था। पहले किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ कानूनी मामला दर्ज कराने से पहले विभाग से अनुमति लेनी जरूरी होती थी जो बलात्कारी का साथ देने के बावजूद उसके लिए ढाल बन जाया करती थी। लेकिन अब ऐसे अधिकारी के खिलाफ दो साल की सजा का प्रावधान कानून में रखा गया है।
लेकिन इस कानून में कुछ ढील भी दी गई है जो किसी लड़की पर तेजाब फेंकने के मामलों में अपराधी के लिए कानून को हल्का कर देती है। तेजाब फेंकने के मामलों में आईपीसी की धारा 326 के तहत मामले दर्ज होते रहे हैं जिनमें पहले अधिकतम सजा उम्र कैद की हुआ करती थी। लेकिन अब कानून में बनी अलग धारा में उस सजा को भी घटा कर दस साल कर दिया गया है। कानून की नई धारा में अधिकतम सजा दस साल और दस लाख रूपए जुर्माना रखा गया है। हालांकि पहले भी अधिकतम सजा उम्र
कैद हुआ करती थी, लेकिन अदालतें ऐसे अधिसंख्य मामलों में चार-पांच साल की सजा ही दिया करती थीं। जबकि तेजाब से पीडि़त लड़की की हालत ऐसी हो जाती है कि उसका पूरा जीवन उसके और उसके परिवार के लिए भारी बोझ बन जाता है। किसी की आवाज चली जाती है तो किसी की आंखें चली जाती हैं। चेहरा बदसूरत हो जाता है। भारत सरकार अपने पड़ोसी देशों से भी सीख लेने के लिए तैयार नहीं दिखती जहां तेजाब फेंकने के अपराधों को आतंकवाद निरोधक कानून के तहत निपटाया जाता है। पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि देशों में तेजाब फेंकने के अपराधों को आतंकवाद निरोधक कानून के तहत निपटाया जाता है और उनकी सुनवाई भी आतंकवाद निरोधक अदालतों में ही होती है। उन देशों में खुलेआम तेजाब खरीदना और बेचना अपराध माना जाता है।

अपने देश में ऐसे मामलों में भी अपराधी केवल चार-पांच साल की सजा काट कर खुला घूमने लगता है और पीडि़त लड़की के लिए सजा पूरे जन्म भर की हो जाती है जबकि उसका कोई कसूर नहीं होता। इसलिए ऐसे मामलों में तो होना यह चाहिए था कि उम्र कैद की सजा को अधिकतम से बढ़ा कर न्यूनतम कर सजा को सख्त बनाया जाए।

असल में इन मामलों पर संवेदनशीलता से विचार नहीं किया गया। इसमें भी गलती सरकार की है। बाजार में तेजाब आसानी से मिलता है और उसका खमियाजा भुगतना पड़ता है मासूम लड़कियों को। इन मामलों में कोई भी रकम पीडि़त लड़की के जीवन के लिए काफी नहीं हो सकती, फिर भी पीडि़त लड़की को पूरा मुआवजा दिया जाना चाहिए। साथ ही पीडि़त लड़की को पूरे जीवन हर प्रकार की चिकित्सा सहायता दी जानी चाहिए।

(लेखिका सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं। उन्होंने बलात्कार पीडि़ताओं के प्रति समाज को संवेदनशील बनाने के लिए एक पुस्तक भी लिखी है- बलात्कार होने पर! इस पुस्तक के अतिरिक्त उन्होंने जेलों में अपराधियों के साथ कानून का सलूक, एचआईवी-एड्स, कॉपी राइट कानून आदि विषयों को लेकर भी पुस्तकें लिखी हैं।)

कमलेश जैन

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