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ढहा दक्षिण का भगवा दुर्ग

कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनावों में करारी हार मिलने के बाद एक वरिष्ठ भाजपा नेता की त्वरित प्रतिक्रिया थी, ‘पार्टी इसी हार के लायक थी।’ उनके चेहरे पर क्षोभ, पीड़ा, दु:ख और गुस्सा साफ देखा जा सकता था। प्रदेश के हजारों कार्यकर्ताओं, जिनसे इस संवाददाता की फोन पर बात हुई, की राय और मूड ऐसा ही था, बल्कि उनमें गुस्सा कुछ अधिक ही था।कर्नाटक भाजपा और उसकी पहली सरकार के पिछले पांच वर्षों में में जो कुछ घट रहा था, उसके मद्देनजर यह हार अनपेक्षित नहीं थी। वास्तव में भाजपा के केंद्रीय व प्रदेश दोनों नेतृत्व इस सुनामी जैसी हार की प्रतीक्षा ही कर रहे थे। प्रदेश नेताओं की आंतरिक कलहए असंतोष, घिनौने आचरण और व्यवहार के साथ-साथ केंद्रीय नेताओं द्वारा स्थिति को गलत ढंग से संभाले जाने के कारण पार्टी की यह दुर्गति हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येद्दीयुरप्पा उतनी सीटें (25-30)तो नहीं जीत पाए, जितनी की आशा की जा रही थी, परंतु लगभग 55 सीटों पर उन्होंने भाजपा को नुकसान पहुंचाया, जिससे कांग्रेस को नौ साल बाद दोबारा सत्ता में आने में मदद मिली।

कांग्रेस को यह जीत मुख्यत: येद्दीयुरप्पा की पार्टी कर्नाटक जनता पार्टी (केजेपी)द्वारा भाजपा का

वोट काटे जाने के कारण मिली है। केजेपी केवल छह सीटें ही जीत पाई, जिसमें येद्दीयुरप्पा की शिकारीपुरा की सीट भी शामिल है। केजेपी 37 सीटों पर 100 से 5000 के अंतर से दूसरे स्थान पर रही। इन 37 सीटों में से 33 पर कांग्रेस की जीत हुई और इस प्रकार केजेपी भाजपा और जीत के बीच में दीवार बन गई। भाजपा की अंतर्कलह के कारण प्रदेश में बना भाजपा विरोधी वातावरण भी कुछ हद तक भाजपा की इस हार का कारण बना।इस प्रकार देखा जाए तो कांग्रेस की जीत भाजपा मेंअंतर्कलह के कारण हुई है, परंतु पार्टी इसका श्रेय सोनिया-राहुल की जोड़ी को देने में जुटी हुई है। यह कांग्रेस की नीति ही रही है, हर जीत का श्रेयश्पवित्र परिवार्य को दे दिया जाता है। प्रदेश में सोनिया-राहुल-मनमोहन सिंह समेत कांग्रेस के सभी केंद्रीय नेताओं के चुनावी प्रचार में एक ही बात कही जा रही थी कि कांग्रेस प्रदेश को एक स्थिर और भ्रष्टाचार-मुक्त सरकार देगी। मतदाता कांग्रेस के पहले दावे को तो गंभीरता से ले रहे थे, परंतु उसका भ्रष्टाचार-मुक्त सरकार देने का दूसरा दावा जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रहा था।
भाजपा ने भी लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज और नरेंद्र मोदी सहित अपने सभी बड़े नेताओं को प्रचार में उतार दिया था। प्रदेश में पार्टी को दोबारा सत्ता में लाने की चुनौती अपने व्यक्तिगत जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करने वाले अनंत कुमार ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चुनाव प्रचार के लिए बुलाया था। इन सबके प्रचार के बावजूद भाजपा को केवल 40 सीटें ही मिलीं। इससे सिद्ध होता है कि जनता भाजपा द्वारा कांग्रेस की केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने से प्रभावित नहीं हुई और उस पर प्रदेश भाजपा का अंतर्कलह का मुद्दा ही हावी रहा।कर्नाटक चुनाव परिणामों से एक और सवाल खड़ा होता है और वह सवाल है गुजरात के
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात से बाहर चुनाव जिता पाने की क्षमता का। मोदी ने तीन बड़ी जनसभाएं की थीं – बेंगलुरू, मेंगलोर और बेलगाम। तीनों स्थानों पर भारी भीड़ आई, परंतु वह वोट में न बदल सकी। लोग आए, लोगों ने उन्हें सुनाए परंतु उन्होंने भाजपा को वोट देने का निर्णय नहीं लिया। कन्नड़ में कहते हैं – वेनिए विदिए विसि यानी कि वे आए, उन्होंने देखा और वे जीत गए। परंतु चुनाव परिणामों को देखें तो लगता है कि मोदी ने अपना भविष्य तो सुरक्षित कर लिया पर वे कर्नाटक भाजपा का भविष्य सुरक्षित नहीं कर पाए।
उदाहरण के लिए कुछेक तथ्यों और आंकड़ों पर नजर डालते हैं। बेंगलुरू में भाजपा ने 2008 में 28 में से 17 सीटें जीती थीं, परंतु इन चुनावों में मोदी के सम्मोहक और प्रभावशाली भाषण के बावजूद वह 11 सीटों पर सिमट गई। हालांकि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता और सांसद अयानुर मंजुनाथ का कहना है कि यदि मोदी नहीं आए होते तो इससे भी खराब स्थिति होने वाली थी। दक्षिण कन्नडा जिले में भाजपा ने 2008 में आठ सीटें जीती थीं, परंतु इस बार वह केवल दो सीटें ही निकाल पाई जबकि जिला मुख्यालय मेंगलोर में मोदी की जबरदस्त रैली हुई थी। यहां यह उल्लेखनीय है कि दक्षिण कन्नडा और उडुपी जिले में संघ परिवार की जड़ें पिछले कई दशकों से काफी मजबूत हैं। इसके बावजूद भाजपा की वहां पराजय से पता चलता है कि लोग किस कदर भाजपा से निराश थे।स्वाभाविक ही है कि कांग्रेस इन परिणामों को मोदी के उतरते जादू के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, जोकि मोदी के लिए अच्छा नहीं है। वास्तव में प्रदेश के भाजपा कार्यकर्ता मोदी के चुनाव प्रचार में आने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उन्हें पता था कि मोदी आएं या नहीं, भाजपा की हार सुनिश्चित थी।

लोग भाजपा सरकार में चल रहे नाटकों से ऊबे हुए थे। भले ही भाजपा सरकार की अधिकांश योजनाएं लोगों के हित में थीं और उनका फायदा भी लोगों को मिल रहा था, इसके बावजूद अपने कई विधायकों और मंत्रियों के खराब व्यवहार और आचरणों के कारण भाजपा अपना ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ की छवि बरकरार नहीं रख पाई। सबसे अधिक नुकसान इसके मुख्यमंत्री येद्दीयुरप्पा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से हुआ, भल ही वे आरोपों को राजनीति-प्रेरित बताते रहे। भाजपा के लिए एक तरफ कुंआ था तो दूसरी तरफ खाई। येद्दीयुरप्पा को निकालने से पार्टी को नुकसान होना था, जोकि इन चुनावो से साफ है कि हुआ भी, और उनको बनाए रखने से केंद्रीय स्तर पर उसकी छवि खराब हो रही थी और उसकी भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम कमजोर पड़ रही थी।

लोकायुक्त की रिपोर्ट में अवैध खनन के मामले में येद्दीयुरप्पा का नाम आने के बाद जब पार्टी ने उनसे पद छोडऩे के लिए कहा था, तो उन्होंने बड़े क्षोभ में पार्टी छोड़ी औऱ कर्नाटक जनता पार्टी बनाई। वे केंद्रीय नेतृत्व के धोखे से नाराज थे। पार्टी आलाकमान ने उन्हें कहा था कि मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के तुरत बाद उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाएगा, पर उसने ऐसा नहीं किया।

येद्दीयुरप्पा के पार्टी छोडऩे के बाद आडवाणी ने कहा था कि अब पार्टी से भ्रष्ट नेता जा चुके हैं और पार्टी अब काफी मजबूत हो गई है। यदि यह तर्क सही होता तो भाजपा दोबारा सत्ता में आई होती, परंतु ऐसा नहीं हुआ।

चूंकि प्रदेश में कांग्रेस का सामाजिक और राजनीतिक विस्तार सबसे बड़ा है, इसलिए भाजपा में हुए दोफाड़ का सीधा फायदा उसे मिला। परंतु यह कहना कि लोगों ने कांग्रेस को पसंद करने के कारण वोट दियाए काफी दूर की कौड़ी है।

इस चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया है कि लिंगायत समुदाय जगदीश शेट्टार को अपना नेता नहीं मानता। वह आज भी येद्दीयुरप्पा को ही नेता मानता है। भले ही येद्दीयुरप्पा अधिक सीटें नहीं जीत पाए हों, परंतु वे आज भी लिंगायत समुदाय के निर्विवाद नेता हैं। उनके कारण इस समुदाय ने भाजपा को वोट नहीं दिया। एक अनुमान के अनुसार येद्दीयुरप्पा को कुल 10 प्रतिशत वोट प्राप्त हुआ है।

इन चुनावों में जनता दल (एस) के नेता देवेगौड़ा ने एक बार सिद्ध कर दिया है कि वे वोक्कालिंगा समुदाय के नेता हैं। जनता दल (एस) के प्रदेश अध्यक्ष कुमारस्वामी ने कहा है कि विपरीत परिस्थितियों में भी 40 सीटें जीत कर उनकी पार्टी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है।

एस ए हेमंत कुमार

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