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पाकिस्तान में हिन्दू होना ही जुर्म है!

बंटवारे के बाद पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर दिया, जबकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र बना। लेकिन बावजूद इसके पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं के कल्याण और सुरक्षा का ध्यान रखने के लिए नेहरू-लियाकत समझौता हुआ। लेकिन आज वह समझौता ही कहीं गहरे कुएं में फेंके गए ठंडे बस्ते की तरह अप्रासंगिक बना पड़ा है।
भारत के इतिहास में वर्ष 1947 हमेशा अति महत्वपूर्ण साल रहेगा। उस वर्ष अंग्रेजों की गुलामी से भारत को मुक्ति मिली। आजादी के दीवानों का स्वप्न साकार हुआ। लेकिन देश की आजादी की उस स्वर्णिम बेला में मातम का अंधेरा छाया था। देश आजादी के साथ ही दो भागों में बंट गया। बंटवारा इतना सहज नहीं था। आजादी की ताजी हवा में पैदा होने वाली भारत की नई पीढ़ी को उस दर्द का तनिक अहसास नहीं होगा जो आजादी से पूर्व या आजादी के वक्त मौजूद उस पीढ़ी ने देखा और सहा था।

भारत का बंटवारा केवल जमीन का नहीं, बल्कि आबादी का भी हुआ। भारत के एक टुकड़े को काट कर पाकिस्तान तो बना दिया, लेकिन 15 करोड़ से अधिक जनता विस्थापित हो गई और एक मोटे अनुमान के अनुसार दस लाख से अधिक लोग घृणा, धार्मिक कट्टरता और उन्माद के शिकार हुए।

66 वर्ष बीत गए 1947 को गुजरे। क्या जरूरत पड़ी 66 साल पुरानी उस कहानी को दोहराने की? असल में उस सदी को हम भूल नहीं पाए हैं। भूल भी नहीं सकते। भूलना चाहें तो घृणा से उपजा पाकिस्तान भूलने नहीं देता है। वह तो ऐसा नासूर बन गया है जो लगातार 66 वर्षों से रिसता ही रहा है। अपना वतन मान कर जिस गलतफहमी में हिन्दू वहां रह गए, उनके लिए उनका तथाकथित वतन अब जहन्नुम बनता जा रहा है। पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू भारत के लिए विदेशी नागरिक हैं और भारत सरकार को उनके प्रति अपना कोई कर्तव्य दिखाई नहीं देता। पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू यदि किसी प्रकार से भारत आ भी रहे हैं तो भारत सरकार का रवैया उन्हें अपने ही घर में बेघर कर देता है।

पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना की जिद को महात्मा गांधी ने शायद इसलिए स्वीकार किया था कि भारत के साथ पाकिस्तान एक सहोदर भाई की तरह बेहतर ढंग के रिश्ते निभाएगा और भारत की जनता के साथ उसका प्रेम का नाता रहेगा। लेकिन उसके उलट हुआ यह कि भारत की प्रगति देख कर कट्टरवाद की गोद में झूलता हुआ पाकिस्तान ईष्र्या की अग्नि में लगातार झुलस रहा है। पाकिस्तान की हर नीति की नींव में भारत पर चोट करना शामिल होता है। भारत की तुलना में पाकिस्तान कितना भी छोटा होए अन्य देशों की तरह पाकिस्तान भी भारत को बहुत ही नरम देश मानता है। पाकिस्तान का भारत के साथ जो भी रवैया हो, उसमें पाकिस्तान की यह भावना साफ दिखाई देती है कि भारत के साथ कुछ भी हरकत कर लोए “क्षमा बडऩ को चाहिए” के गुणों से ओतप्रोत भारत कोई कड़ा कदम नहीं उठाएगा। सरबजीत की नृशंस हत्याए भारतीय लोकतन्त्र के मंदिर “संसद” पर हमला, भारत की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई पर हमला, कंधार प्रकरण, आतंकवादी हिंसा फैलाने वालों को पनाहए प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता देने जैसी घटनाओं से पाकिस्तान दुनिया के समक्ष कितना भी पाक साफ दिखने की कोशिश करे लेकिन भारतीय सैनिक का सिर काट कर सिर-विहीन शव देने जैसी घटनाओं से पाकिस्तान अपने हाथ कैसे साफ दिखा सकता है?

बंटवारे के बाद पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर दिया, जबकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र बना। लेकिन बावजूद इसके पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं के कल्याण और सुरक्षा का ध्यान रखने के लिए नेहरू-लियाकत समझौता हुआ। लेकिन आज वह समझौता ही कहीं गहरे कुएं में फेंके गए ठंडे बस्ते की तरह अप्रासंगिक बना पड़ा है। भारत सरकार को पाकिस्तान-बांग्लादेश के साथ किसी भी प्रकार के राजनयिक, व्यापारिक अथवा अन्य प्रकार के समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले नेहरू-लियाकत समझौते के क्रियान्वयन पर जोर देना चाहिए।

कायदे आजम जिन्ना का 11अगस्त 1947 को कंस्टिट्यूट एसेम्बली में यह कहना आज दिखावा ही लगता है कि पाकिस्तान में कोई किसी भी जाति या संप्रदाय का हो, उसे अपना धर्म निभाने की स्वतन्त्रता है। पाकिस्तान से आए हिन्दुओं की अपनी दर्द-बयानी वहां के हाल की जो तस्वीर दिखाती है, वह इतनी भयावह है कि उसे सुन कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

धर्म स्थलों पर जाने के लिए विशेष मौकों पर भारत आने वाले हिन्दू जब अपना वीसा समाप्त होता देखते हैं तो उन्हें लगता है जैसे वे फिर “नरक” में जाने की तैयारी में हों। पाकिस्तान की भूमि पर जन्मे हिन्दुओं को अपनी जन्मभूमि ही नरक लग रही है। वे बताते हैं कि भारत आने के लिए उन्हें अपने परिवार के किसी न किसी सदस्य को वहां छोड़ कर आना पड़ता है। उनमें ऐसी अनेक मां मिल जाएंगी जो अपने दुधमुंहे बच्चे को वहां छोड़ कर आई हैं और इसके बावजूद वह वापस नहीं जाना चाहतीं।

भारत आए हिन्दुओं की दर्द भरी दास्तानों से साफ पता चलता है कि पाकिस्तान में हिन्दू होना ही जुर्म हो गया है। वे बताते हैं कि पाकिस्तान में हिन्दुओं का बलात् धर्म परिवर्तन कराने के लिए हिन्दू स्त्रियों का खुले आम अपहरण कर लिया जाता है। उनसे बलात्कार कर उनका धर्म परिवर्तन करने के लिए दबाव डाला जाता है। पुलिस भी बलात्कारियों और जबरन धर्म परिवर्तन कराने वालों का साथ देती है। ऐसे में उन हिन्दुओं को शाबाशी दी जानी चाहिए जो ऐसे हाल में भी अपने धर्म पर टिके हैं। पाकिस्तान में कट्टरपंथियों के जुल्मों के शिकार हिन्दुओं का हाल यह है कि वे वीसा अवधि समाप्त हो जाने पर भी वे पाकिस्तान जाने की बजाय भारत की जेलों में रहना बेहतर मान रहे हैं। जिस प्रकार से पाकिस्तान से हिन्दुओं को भागने या धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जा रहा है, उससे साफ लगता है कि एक दिन पाकिस्तान में कोई हिन्दू नहीं बचेगा। भारत सरकार को इस संबंध में अपनी विशेष नीति बनाते हुए पाकिस्तान से भारत आए हिन्दुओं के भविष्य की ओर ध्यान देना चाहिए।

जब तक उन हिन्दुओं के लिए भारत सरकार कोई नीति नहीं बनाती, तब तक भारत सरकार को उनके रहने-खाने की व्यवस्था करनी चाहिए और वीसा अवधि बढ़ाने में किसी प्रकार का कोई संकोच नहीं दिखाना चाहिए। इस दिशा में गुडग़ांव के निकट बिजवासन में रहने वाले नाहर सिंह ने जो रास्ता दिखाया है, उसे आगे बढ़ाने में हिन्दू सामाजिक संगठनों को अधिक उत्साह और सक्रियता दिखानी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी पाकिस्तान से आए हिन्दुओं से भेंट कर उन्हें आश्वस्त करके आए हैं, लेकिन केवल आश्वासनों से कुछ होने वाला नहीं है। भाजपा और शिवसेना जैसे राजनीतिक दल भारत सरकार को उचित निर्णय लेने के बारे में दबाव बनाने में पूर्णतया सक्षम हैं। विपक्ष में होने की बात कह कर ये दल जिम्मेदारी निभाने से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते। यह बहुत ही नाजुक और महत्वपूर्ण मसला है, जिसे सभी राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं को गंभीरता से लेना होगा।

श्रीकान्त शर्मा

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