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पाकिस्तान से आ तो गये, पर जाएं कहां?

वंदे मातरम… जय श्री राम…। दिल्ली हरियाणा सीमा पर गुडग़ांव के निकट गांव बिजवासन के एक घर में जोर-जोर से लगते इन नारों को सुनकर अचानक ही कदम थम जाते हैं। जिस घर में इन नारों का उद्घोष हो रहा है, वहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या विश्व हिंदू परिषद् का कोई प्रशिक्षण शिविर नहीं लगा है, कि लोग ये नारे लगाए जा रहे हैं। पास जाकर पूछने पर पता चलता है कि नारे लगाने वाले लोग पाकिस्तान से आए हिंदू हैं। क्यों लगा रहे हैं नारे? पूछने पर उनमें से लक्ष्मण नाम के युवक ने कहा, ”अच्छा लगता है। पहली बार खुल कर नारे लगा पा रहे हैं, अपने धर्म का जयघोष कर पा रहे हैं। इसलिए सभी बार बार ये नारे लगा रहे हैं।्य्य बताते हुए उनके चेहरे पर खुशी चमकती है।
अपने धर्म के ये अभिमानी पाकिस्तान से किसी प्रकार बच कर भारत आए हैं, ताकि वहां रहकर इन्हें देर सवेर मुसलमान न बनना पड़े। वे अपना परिवार वहां छोड़ कर आए हैं। कई लोग अपने मां-बाप को, तो कई अपनी संतानों को वहां छोड़कर आए हैं। एक मां अपने कलेजे पर पत्थर रखकर तीन दिन के बच्चे को वहां छोड़ कर आई है। एक परिवार ने अपने दो-ढाई साल के बच्चे को भेज दिया है। केवल इसलिए कि उन्हें अपना धर्म ना छोडऩा पड़े। जिनका भी पासपोर्ट और वीसा बन सका, वे निकल आए और अब वे भारत सरकार से विनती कर रहे हैं कि उन्हें भारत में रहने और बसने की अनुमति दी जाए। परंतु भारत की सरकार ऐसी संवेदनहीन है कि उसे इन हिंदुओं की पीड़ा दिखाई नहीं दे रही।
इन बेचारे हिंदुओं को कुंभ मेले के नाम पर आठ अप्रैल, 2013 तक का वीसा दिया गया था। फिर उसे आठ मई, 2013 तक बढ़ाया गया। वीसा समाप्त होने पर इन्हें वापस ‘इनके देश पाकिस्तान्य भेज दिया जाएगा। पाकिस्तान जाने की कल्पना भर से वे कांप उठते हैं।

पाकिस्तानी हिंदुओं का पहला जत्था
असल में कहानी शुरू हुई थी वर्ष 2011 के नवंबर से जब पाकिस्तान से 145 हिंदू भारत आए थे। वे नई दिल्ली में मजनूं के टीले पर ठहरे थे। उस समय हिंदू महासभा, विश्व हिंदू परिषद् आदि अनेक संगठन सक्रिय हो गए थे और उनके ठहरने और भोजन आदि की व्यवस्था की गई थी। वे लोग केवल घूमने नहीं आए थे। वे भारत शरण लेने आये थे। वे भारत आए थे पाकिस्तान में होने वाले अत्याचारों से छुटकारा पाने। यह तब संभव था जब भारत सरकार उन्हें भारत में रहने की स्वीकृति देती। परंतु उनके वीसा की अवधि समाप्त हो रही थी और वे परेशान थे। उस समय उनकी सच्चाई का दर्द कई अखबारों में छपा था। ऐसे समय में बिजवासन गांव के निवासी नाहर सिंह ने वह काम किया जो इस देश की सरकार को या फिर हिंदू संगठनों को करना चाहिए था। उन्होंने इस पूरे जत्थे की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। सभी 145 लोगों को वह अपने घर लेकर

गए। भगवान की कृपा से उनका घर काफी बड़ा है। उनके घर में 28 कमरे है। उनका ये मकान उस समय किराये पर चढ़ा हुआ था। इससे उन्हें अच्छी आय भी होती थी। परंतु नाहर सिंह ने उस आय पर लात मारते हुए अपना मकान पूरा खाली करवा कर पाकिस्तान से आए हिंदुओं को रहने के लिए दे दिया और वह खुद उनकी भारत की नागरिकता की लड़ाई लडऩे लगे।

परंतु यह सब उतना आसान नहीं था। नाहर सिंह बताते हैं, ”मैंने 30 नवंबर 2011 को अखबार से जाना कि पाकिस्तान से आए हिंदू भाई बहन मजनूं के टीले में रह रहे हैं। मैं अपने कुछ साथियों (जो मेरे साथ ही भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ता हैं) को लेकर उनकी सहायता करने गया। वहां जाकर देखा कि पाकिस्तान से आये उन हिन्दू भाई-बहनों की हालत काफी खराब है। मैंने उनके खाने और रहने की व्यवस्था की। वहां विभिन्न संगठनों के लोग आए थे जिनसे मुझे पता चला यदि कोई इन्हें गोद ले ले तो ये लोग भारत में रह सकते है। मैं सहर्ष इन्हें गोद लेने के लिए तैयार हो गया।

ये 145 लोग तीन महीने का वीसा लेकर भारत आए थे और उनकी वीसा की अवधि समाप्त हो रही थी। इससे वे घबरा रहे थे और काफी लोग पाकिस्तान में होने वाले व्यवहार की कल्पना से रो भी रहे थे। यह सब देख कर वहां उपस्थित सभी हिंदू संगठनों के लोगों की आंखें नम हो रही थीं। नाहर सिंह ने उन हिंदू भाई-बहनों की सहायता का बीड़ा उठाया।

नाहर सिंह 17 दिसंबर 2011 को उन्हें अपने घर ले गए और उनकी नागरिकता के लिए भारत सरकार को आवेदन कर दिया। सरकार ने इस पर मौन साधे रखा। सरकार ने इन्हें भगाया तो नहीं, परंतु नागरिकता भी नहीं दी। इस पर नाहर सिंह ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया कि यदि ये लोग वापस नहीं जाना चाहते, तो नागरिकता मिलने तक सरकार इन्हें यहां रहने दे। इस आदेश के बाद नाहर सिंह ने उन 145 में से 113 लोगों को आसपास के गांवों में बसा दिया और शेष 32 लोग उनके घर में ही रहने लगे।

खबर पाकिस्तान पहुंची
यहां से कहानी में एक नया मोड़ आ गया। हिंदुओं को यहां बसाए जाने की खबर पाकिस्तान पहुंची। यह खबर वहां की सरकार के पास नहीं, बल्कि वहां के हिंदू समाज के पास पहुंची। इन 145 लोगों ने अपने-अपने गांव के लोगों को नाहर सिंह और उनके प्रयासों के बारे में बताया और फिर पाकिस्तान के हिंदू चुपचाप भारत आने की तैयारी करने लगे। पाकिस्तान के विभिन्न गांवों से तीन जत्थों में हिन्दू भारत आए। पहला जत्था 229 हिंदुओं का 10 मार्च 2013 को आया। फिर 18 मार्च को 222 हिंदू भारत आए और अंतत: 27 मार्च को 29 हिंदू यहां आए। कुंभ मेले के नाम पर 8 अप्रैल तक के लिए इन सभी को तीर्थयात्रा का वीसा मिला था। ये सभी 480 हिंदू सीधे नाहर सिंह के घर पहुंचे। नाहर सिंह ने इन सबको अपने घर में शरण दी और साथ ही वह इनकी नागरिकता के लिए भी आवेदन करते रहे। इन लोगों को अपने घर में शरण देने के बाद भी नाहर सिंह ने मीडिया को खबर नहीं की। उन्हें डर था कि यदि सबके आने से पहले यह खबर मीडिया में फैल गई तो भारत आने वालों हिन्दुओं को पाकिस्तान में रोका जा सकता है। सभी 480 लोगों के आने पर मीडिया को खबर की गई। मीडिया में यह खबर तेजी से फैल गई।
ये पीडि़त हिंदू लोग सताए हुए और परेशान हैं। सबके पास अपनी दुखभरी कहानियां हैं।। उनकी दर्द भरी दास्तानों में इस्लाम स्वीकार करने का दबाव, अमानवीय अत्याचार, बेइज्जती, हिन्दुओं लड़कियों का अपहरण व बलात्कार, सामाजिक तिरस्कार और शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों में अपमान की ज्वाला है। कोढ़ में खाज यह है पाकिस्तान में रहने वाले किसी हिन्दू के लिए भारत आना सरल नहीं है। पहले तो पासपोर्ट बनना ही कठिन होता है पासपोर्ट बनवा भी लिया जाये तो भारत सरकार वीसा नहीं देती।
पाकिस्तानी हिन्दू नागरिक लक्ष्मण बताते हैं, ”पूरे परिवार में अगर चार लोग हों तो सरकार केवल तीन को ही वीसा देती है। इससे एक वहीं पाकिस्तान में रह जाता है। इससे भारत से वापस लौटने की उनकी विवशता हो जाती है।

यह दास्तां एक नहीं सभी 200 हिन्दू परिवारों की है। कोई अपने मां-बाप को पाकिस्तान छोड़ कर आया है तो कोई अपने बच्चों कोए कोई अपने पति को छोड़ कर आई है तो कोई अपनी पत्नी को छोड़ कर आया है। कोई भी परिवार भारत में पूरा नहीं आ पाया है।

ऐसी विकट स्थिति में वे आखिर आए क्यों? लक्ष्मण कहते हैं, ”धर्म की

रक्षा के लिए आए हैं। घर छोड़ देंगे, जमीन छोड़ देंगे, मां-बाप, परिवार सब छोड़ देंगे, पर हम अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे। हिंदुओं के लिए पाकिस्तान नरक से भी बदतर जगह है। वहां हिंदू ऐसे रहते हैं जैसे कि कसाई के यहां बकरा होता है। जब मर्जी हुई काट दिया
हिंदू होने की सजा
76 वर्षीय बुजुर्ग शोभाराम कहते है, ”हम भारत में हर तरह की सजा भुगत लेंगे, परंतु पाकिस्तान वापस नही जायेंगे क्योंकि हमारा कसूर यह है कि हमने हिन्दू-धर्म में पाकिस्तान की धरती पर जन्म लिया है।्य्य 80 वर्षीय वैशाखी लाल कहते हैं, ”मैं अपनी आंखों के सामने अपने घर की महिलाओ की अस्मिता लुटते नहीं देख सकता।्य्य यह आपबीती कमोबेश सबने सुनाई।
लक्ष्मण की वहां सब्जी व फलों की दुकान थी। उसके भाई का जमीन का व्यवसाय था। अच्छा पैसा कमा रहे थे। परंतु एक दिन अचानक कुछ लोग
उनके पास आये और इस्लाम कबूल करने के लिए दवाब डालने लगे। लक्ष्मण बताते हैं, ”दो दिन लगातार मेरे पास 8-10 लोग आए। उनके पास बैग थे और बोरों में बरतन वगैरा। दाढ़ी बढ़ी हुई थी। उनका अपना झंडा भी था। वे कट्टरपंथी लोग थे। उनका काम है लोगों को इस्लाम में लाना और मना करने पर तकलीफें देना, स्त्रियों की इज्जत लूटना और फिर भी न माने तो मार डालना।्य्य पाकिस्तान में क्या पुलिस कुछ नहीं करती पूछने पर लक्ष्मण ने कहा, ”पुलिस उन्हें कुछ नहीं कहती है। पूरे पाकिस्तान में एक भी हिंदू सिपाही नहीं है। सारे के सारे मुसलमान हैं। शिकायत करने पर वे खुल्लमखुल्ला कहते हैं कि ठीक ही तो है,मुसलमान बन जाओ। यदि मीडिया या किसी और दबाव में वे शिकायत लिख भी लेते हैं तो उन लोगों को कुछ दिनों के लिए पकड़ कर फिर छोड़ देते हैं।

हिंदुओं का आरोप है कि पाकिस्तान में उन्हें इज्जत की रोटी नहीं मिलती। किसी भी सरकारी नौकरी में कोई हिंदू नहीं है। हिंदुओं को केवल नाली साफ करने वाले सफाई कर्मी की नौकरी दी जाती है। इतना ही नहीं, यदि कोई अपनी दुकान से अधिक कमाने लगे तो उसे परेशान किया जाता है।

परेशानियां इसके अलावा और भी हैं। सबसे बड़ी परेशानी पढ़ाई की है। हिन्दू वहां हिंदी पढ़ लिख नहीं सकते। हनुमान बताते हैं, ”बच्चों को अगर हम तालीम लेने भेजते हैं तो उन्हें वहां कलमा पढ़ाया जाता है। इस्लामियत सिखाई जाती है। केवल अरबी व उर्दू भाषा पढ़ाई जाती है। हमारी हिंदी या संस्कृत नहीं पढ़ाई जाती।्य्य यदि वे अपना स्कूल खोलें तो? उत्तर में हनुमान कहते हैं, ”नहीं खोल सकते। वे हमारा कारोबार इतना नहीं बढऩे देते कि हम ऐसे काम कर सकें। यदि हमारा कारोबार बढ़ जाए तो उसे हथिया लिया जाता हैं। हम वहां कोई बड़ा कारोबार नहीं कर सकते। हम वहां होटल नहीं खोल सकते। पूरे पाकिस्तान में किसी हिंदू का कोई होटल नहीं मिलेगा।

इस्लाम की शिक्षा का जोर इतना है कि हिंदू नाम तक वहां लोगों को सहन नहीं होता। हनुमान सिंह राजपूत बताते हैं, ”जब मैं पहली बार स्कूल गया और वहां अपना नाम हनुमान बताया तो सभी हंसने लगे। सभी मुझे बंदर कह कर चिढ़ाने लगे, पत्थर मारने लगे। जब मैंने इसकी शिकायत की तो टीचर ने कहा कि यह नाम रखोगे तो ऐसा ही होगा। अपना नाम बदल कर आसिफ रख लो। इस पर मैंने स्कूल जाना छोड़ दिया।

भारत विरोध से हिंदू विरोध तक
भारत में घटने वाली घटनाओं का खामियाजा भी इन्हें भुगतना पड़ता है। हनुमान सिंह राजपूत कहते हैं, ”1992 के बाद पाकिस्तान में सैंकड़ों मंदिर गिराए गए। इसकी शिकायत तक कहीं नहीं लिखी गई। भारत यदि कोई मैच जीत जाए तो इसका बदला वे हमसे लेते हैं। विराट कोहली ने जब 173 रन बनाये तो कोहली खानदान की तीन लड़कियों को उठा लिया गया। पांच दिन तक हम छिप कर रहे।

वे आगे बताते हैं, ”हमारी मां-बहनों को बुर्का डाल कर बाहर निकलना पड़ता है। पिछले वर्ष दिसंबर में रिंकल कुमारी, मीना कुमारी और आशा कुमारी का जो केस हुआ था, उसे मैंने अपनी आंखों से देखा था। मैं स्वयं कोर्ट में मौजूद था। तीनों बहनों ने चिल्ला-चिल्ला कर कहा था कि वे अपने मां-बाप के पास रहना चाहती हैं। उन्हें इन जानवरों से बचाया जाए। परंतु कोर्ट ने उन्हें तीन दिन के लिए रिमांड पर भेज दिया। फिर दोबारा पेशी में उनकी जगह किन्हीं दूसरी लड़कियों को बुर्के में पेश कर दिया गया, जिन्होंने कह दिया कि वे इस्लाम कबूल कर चुकी हैं और वापस नहीं लौटना चाहतीं। पुलिस ने असली रिंकल, मीना और आशा को गायब कर दिया। कोर्ट तक में ऐसा धोखा होता है। वे हंसते रहे और हम रोते रहें।

आक्रोशित हनुमान बताते हैं, ”मीरपुर खास में ग्यारह वर्ष की एक नाबालिग पंडित लड़की को उठाया गया। तीन दिन तक उसके साथ बलात्कार किया गया। जब अपराधियों को पकड़ कर अदालत में लाया गया तो लड़की ने कह दिया कि वह मुसलमान बन गई है। मैं पूछना चाहता हूं कि उसने कुरान नहीं पढ़ाए फिर वह मुसलमान कैसे बन गई। बाद में जब उसके पिता ने उससे पूछा तो उसने कहा कि ‘आपकी और भाई की जिंदगी बचानी थी। यानी धमकी देकर, बलात्कार कर उसे मुसलमान बनाया गया। डॉक्टर की रिपोर्ट थी कि उसके साथ 4 लोगों ने बलात्कार किया था।
इसी प्रकार सिंध से आई यमुना बताती है कि ‘हम वहां अपने त्यौहार भी नहीं मना सकते। हमसे बार-बार कहा जाता है कि यहां रहना है तो मुसलमानों की तरह ही रहना होगा, मुस्लिम त्यौहार ही मनाने होंगे।
भारती की कहानी
मात्र तीन दिन के अपने बेटे को उसके दादा-दादी के पास छोड़कर पाकिस्तान से तीर्थयात्रा वीजा पर भारत आने वाली 30 वर्षीय भारती कहती है, ”मैं अपने तीन दिन के बेटे को बार्डर तक लेकर आई थी, परंतु पुलिस वाले उसका पासपोर्ट-वीसा मांगते रहे। बहुत गिड़गिड़ाने पर भी उन्होंने कोई बात नहीं सुनी। अगर मै अपने बेटे का पासपोर्-वीसा बनने का इंतज़ार करती तो कभी भारत नहीं आ पाती। अपने तीन दिन के बच्चे को भारत मां के नाम पर बलिदान करके आ गई हूं।
नाहर सिंह सच्चा सपूत
नाहर सिंह जैसे लोग बिरले ही होते हैं। पाकिस्तान की सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हिुंदुओं को भारत की सरकार नहीं अपना पाई। परंतु नाहर सिंह ने अपने इन हिंदू भाई-बहनों को अपना लिया। यह नाहर सिंह का ही भरोसा था जो 145 हिंदुओं के बाद 200 और परिवारों ने भारत आने की हिम्मत की। जो आशा और विश्वास हिंदुओं के मन में देश की नाकारा सरकारें नहीं भर पाईं, वह नाहरसिंह ने उन्हें दिया। उन्होंने 625 हिंदुओं को गोद लेकर नया जीवन दिया है।

दक्षिणी दिल्ली के बिजवासन में रहने वाले नाहर सिंह पिछले दो साल से ‘पाकिस्तानी हिन्दुओं्य की हर तरह से मदद कर रहे हैं। इन हिन्दुओं के लिए इन्होंने अपने 28 कमरे के मकान को किरायेदारों से खाली करा दिया है, जबकि इन कमरों से 60-70 हजार रुपए हर माह किराये के रूप में मिलते थे। इस मकान का बिजली और पानी का बिल वह अपनी जेब से भरते हैं। एक महीने तक 500 लोगों के भोजन आदि का भी प्रबंध उन्होंने अपनी जेब से किया।

नाहर सिंह केन्द्रीय उत्पाद शुल्क विभाग में अधीक्षक हैं। इससे पहले वह भारतीय सेना और दिल्ली पुलिस को अपनी सेवाएं दे चुके हैं। यदि देश में नाहर सिंह जैसे केवल कुछ लोग भी हो जाएं तो पाकिस्तान में रह रहे सभी 22 लाख हिंदुओं को आसरा दिया जा सकता है।

वीसा न होने के कारण तीन दिन के बेटे को भी अपने साथ लाने नहीं दिया गया। हैरानी की बात हैै कि तीन दिन के बच्चे का भी वीजा मांगा गया। क्या इससे अधिक अमानवीय कोई और बात हो सकती है? यह अमानवीय काम भारत की तथाकथित लोक कल्याणकारी सरकार कर रही है। भारती अपने छह बच्चों, (चार लड़कियां और दो लड़के) और पति के साथ आई है। ”बच्चे और सास-ससुर को छोड़ कर क्यों आईघ््य्य पूछने पर रोते हुए कहती है, ”धर्म बचाने और अपनी बच्चियों की रक्षा के लिए वह भारत आई हैं। जो मेरे साथ हुआ है या अन्य हिंदू लड़कियों के साथ वहां होता है, वह मेरी बेटियों के साथ न हो, इसलिए अपना एक बच्चा कुर्बान करके आई हूं।
कहां गायब हो गए 2 हजार पाकिस्तानी?
देक्कन क्रानिकल में छपी एक खबर के अनुसार पिछले 18 वर्षो में नागपुर आए 2 हजार पाकिस्तानी नागरिक गायब हो चुके हैं। अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी 2 हजार 13 नागरिक पाकिस्तान वापस नहीं लौटे हैं। यह जानकारी सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त हुई। पासपोर्ट और वीसा की अवधि समाप्त होने के बाद भी ये पाकिस्तानी नागरिक 1995 से अपने देश नहीं गए।

नागपुर आने वाले 9 हजार 705 पाकिस्तानी नागरिक 30, 45 और 90 दिनों की अवधि के लिए आए थे। इसके अलावा 2 हजार 546 पाकिस्तानी नागरिक अधिक अवधि के लिए आए थे। इनमें से 533 लोगों को भारत की नागरिकता दी गई है। एक स्थानीय समाजसेवी संस्था ने 1980 से 1985 तक के पाकिस्तानी नागरिकों की जानकारी मांगी थी।

भारती कहती है, ”वहां हम घर से बाहर नहीं निकल सकते। सभी हमारा उपहास करते हैं। कहते हैं ”देखो काफिर की बहन जा रही है। हमें छेड़ते हैं। उठा ले जाते हैं और इज्जत लूट लेते हैं और फिर कहते हैं कि ‘वह मुसलमान बन गई है। हम अपने बच्चों को पढ़ा नहीं सकते। यदि हम मर जाएं तो जलाने नहीं देते, कहते हैं कि दफनाना पड़ेगा। भारत सरकार से भी भारती की शिकायतें कम नहीं हैं। वह कहती है, ”पासपोर्ट बनवा लेते हैं हम, परंतु वीसा नहीं मिलता। बड़ी कठिनाई से कुंभ के नाम पर हमें वीसा मिल पाया है।
और यूं जीती लड़ाई
नाहर सिंह के जीवट के कारण इन पाकिस्तानी हिंदुओं को आश्रय तो मिल गया परंतु इनकी नागरिकता की लड़ाई बाकी थी। इस लड़ाई में नाहर सिंह की सहायता में खड़ा हुआ विश्व हिंदू परिषद। इसका वास्तविक श्रेय जाता है 25-26 साल के एक युवक राजीव गुप्ता को। राजीव गुप्ता विश्व हिंदू परिषद की दिल्ली शाखा के मीडिया विभाग से जुड़े हुए हैं और उन्हें परिषद की ओर से पाकिस्तानी हिंदुओं पर आलेख तैयार करने के लिए भेजा गया था।

वहां जाकर राजीव ने जब उनकी व्यथा सुनी तो उन्होंने उस पर आलेख तो तैयार किया ही, उसके बाद वे उनकी समस्याओं को उठाने के लिए पूरी ताकत से लग गए। राजीव गुप्ता ने अथक परिश्रम करके न केवल विहिप के अधिकारियों को इस लड़ाई में खड़ा किया, बल्कि भाजपा सहित अन्य दलों के नेताओं को भी इससे जोड़ा। राजीव ने पाकिस्तानी हिंदुओं का एक प्रतिनिधिमंडल तैयार किया और उसे साथ लेकर यूएन और विभिन्न नेताओं के पास गए। राजीव ने यूएन और मानवाधिकार आयोग में भी इस मुद्दे को उठाया और मानवाधिकार आयोग को भारत सरकार को एक निर्देशात्मक पत्र लिखने के लिए विवश किया।

राजीव के नेतृत्व में पाकिस्तानी हिंदुओं का प्रतिनिधिमंडल लालकृष्ण आडवाणी, शरद यादव, अरूण जेटली और सुषमा स्वराज से मिला। इसके बाद सुषमा स्वराज के प्रयास से विश्व हिन्दू परिषद, दिल्ली के नेतृत्व मे पाकिस्तानी हिन्दुओ का एक प्रतिनिधि मण्डल गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे से भी मिला। इसके बाद गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को यह निर्देश दिया कि पाकिस्तान से आये हुए सभी हिन्दू परिवारो को वापस पाकिस्तान नहीं भेजे और उन्हे भारत की नागरिकता देने हेतु प्रक्रिया आरंभ कर दी जाय।

गृहमंत्री श्री सुशील कुमार शिन्दे के निर्देशानुसार श्री खुर्शीद अहमद, अतिरिक्त सचिव (विदेश) की अध्यक्षता में श्री वी. वुमलुनमांग, संयुक्त सचिव(विदेश), श्री अरुण शर्मा, उप सचिव (गृह, दिल्ली सरकार) श्री ए.एस. चीमा, डी.सी.पी, स्पेशल ब्रांच (दिल्ली पुलिस), श्री स्वदेश पाल और राजीव गुप्ता की गृह मंत्रालय में एक बैठक हुई। इस बैठक में यह तय हुआ कि पाकिस्तानी हिन्दू परिवारो को भारतीय संविधान के अनुसार उन्हे भारत की नागरिकता देने हेतु कार्यवाही श्री ए.एस. चीमा के नेतृत्व मे उनके वर्तमान आवास पर ही सरकार द्वारा एक कैम्प लगाकर शुरु की जाएगी।। इसके बाद चीमा पाकिस्तानी हिंदुओं से मिलने बिजवासन भी गए और विधिवत कैम्प का उद्घाटन किया गया। सरकार ने यह भी आश्वासन दिया है कि अब पाकिस्तान मे रह रहे सभी हिन्दू परिवारो को भारत द्वारा वीसा देने की प्रक्रिया मे लचीलापन लाया जायेगा।

रामकली की व्यथा
रामकली केवल चौदह साल की है। दस साल की उम्र में उसकी शादी हो गई थी। वह छह महीने के बच्चे को लेकर आई थी। इतनी छोटी उम्र में शादी क्यों? पूछने पर लोग बताते हैं कि लड़कियां जवान हो जाती हैं तो मुसलमान उठा ले जाते हैं। इसलिए बचपन में ही शादी कर देते हैं। रामकली का बच्चा कमजोर था। वह इलाज के अभाव में कुपोषण के कारण कुछ दिन पहले मर गया।

यमुना बताती है, ”लड़कियां 6-7 साल की होती हैं, तो उन्हें उठा ले जाते हैं। उनके साथ बुरा सलूक किया जाता है। इज्जत लूटी जाती है। इसलिए काफी सावधान रहना पड़ता है। मां-बाप हमें घर से बाहर नहीं निकलने देते। मुसलमानों ने हमारे बहनोई से उनकी बच्ची मांगी थी। उनके मना करने पर उन्हें गोली मार दी और बच्ची को उठा कर ले गए। हम उनकी लाश लेकर घूमते रहे, परंतु कोई भी हमारी मदद करने के लिए तैयार नहीं था।

हिंदू महिलाएं प्रसव के लिए अस्पताल तक नहीं जा सकतीं। घर में ही प्रसव कराना होता है। कोई

कठिनाई आने पर स्वयं सारा कष्ट झेलना होता है। यमुना बताती है, ”हमारी मदद करने एक हिंदू महिला डॉक्टर आई थी। मुसलमानों को पता चल गया। उसे रात को ग्यारह बजे ले गए। उसकी इज्जत लूटी गई और जबरन मुसलमान बना दिया।
माला के सपने
12 वर्षीय माला हाथों में मेंहदी लगाए हुए खुश दिख रही थी। पूछने पर कहने लगी, ”हम भी पढऩा चाहती हैं। कुछ बनना चाहती हैं। पाकिस्तान में यह संभव नहीं है। वहां हम घर से ही नहीं निकल सकतीं। यहां इन पाकिस्तानी हिंदुओं के बीच सेवा भारती की ओर से कक्षाएं लगाई जा रही हैं। माला ने यहां केवल एक महीने में पढऩा लिखना सीखा है। उसने अपने पिता, मां और फिर अपना नाम लिख कर दिखाया। ”मैं यहीं रहना चाहती हूं। माला कहती है, ”यहां मैं कहीं भी घूम-फिर सकती हूं। आजाद रह सकती हूं। यहां दस बाई दस के कमरे में दस-दस लोग रह रहे हैं। इतनी गरमी है। दिक्कत तो हो ही रही होगी? सवाल सुनकर माला और उसके साथ खड़ी महिलाएं हंस देती हैं, ”कोई दिक्कत नहीं है। यहां हम बहुत खुश हैं। सब दिक्कत हम सह लेंगे, पर वापस नहीं जाएंगे।

अधिसंख्य लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। ऐसे में वापस नहीं जाएंगे तो यहां करेंगे क्या? इस सवाल का जवाब वे बड़ी तत्परता से देते हैं। ”कुछ भी कर लेंगे। हम फलों का व्यवसाय करते थे। जमीन का काम हमें आता है। कैसी भी मेहनत-मजदूरी कर लेंगे। हम सभी खेती कर सकते हैं, लक्ष्मण कहते हैं, ”एक बार सरकार हमें यहां रहने दे। फिर हम मेहनत करके अपना पेट भर लेंगे।

भारत सरकार का रवैया
भारत की सरकार का रवैया अजीब ही है। पहले तो वीसा मिलने में ही परेशानी है। वीसा मिल जाए तो

नागरिकता मिलना कठिन है। दुनिया भर में भारत की पहचान हिंदू देश के रूप में है। हिंदुओं की सबसे बड़ी संख्या भारत में रहती है। 1947 में भारत का बंटवारा हिंदू-मुस्लिम आधार पर ही हुआ था। ये बातें पाकिस्तान ही नहीं, दुनिया भर के हिंदुओं को शरण देने का मजबूत आधार हैं।
पाकिस्तान पर दबाव बनाना जरूरी
राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाजपा
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान से आए हिंदू परिवार जनों से वार्ता के पश्चात् उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि पाकिस्तान से आए सभी हिंदू परिवारों एवं पाकिस्तान में रह रहे हिंदू परिवारों को वर्तमान भारत सरकार से हर सम्भव मदद दिलाने का प्रयास करेंगे। वहीं उन्होंने वर्तमान केन्द्र सरकार का ध्यान निम्न बिन्दुओं की ओर आकर्षित कराते हुए मांग की .

 पाकिस्तान से आए हिंदू परिवार यदि पाकिस्तान वापस नहीं जाना चाहते तो उन्हें जबर्दस्ती वापस नहीं भेजा जाना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी भारत सरकार से यह मांग करती है कि पाकिस्तान से आए इन हिंदू परिवारों की मदद व पुनर्वास के लिए केन्द्र सरकार शीघ्र ही नीति का निर्धारण करे, जिसके तहत यदि पाकिस्तान से आए हिंदू परिवार भारत की नागरिकता चाहते है तो उन्हें प्रदान की जाए।
 माननीय प्रधानमंत्री जी स्वयं पाकिस्तान से आए हिंदू परिवार के कैम्पों का दौरा करें और उनसे मुलाकात कर उनकी समस्याओं का जायजा लें तथा उन्हें हर संभव मदद प्रदान करें।
 जो हिन्दू परिवार अभी भी पाकिस्तान में रह रहे हैं, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार पाकिस्तान सरकार पर भरपूर दबाव बनाए।

श्री राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों पाकिस्तान में हिंदूओं पर बढ़ते अत्याचार, पाकिस्तान से हिंदू परिवारों के पलायन की बढ़ती घटनाओं और पाकिस्तान की जेल में भारतीय मूल के सरबजीत पर हुए जानलेवा हमले की निंदा करते हुए भारत सरकार पर ढुलमुल व लचर विदेश नीति अपनाने का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा कि जब भारत की सीमा पर गश्त कर रहे हमारे दो सैनिक शहीद हेमराज व शहीद सुधाकर सिंह के साथ पाकिस्तान सैनिकों के दुव्यवहार पर यदि भारत सरकार ने कड़ा रवैया अपनाया होता और पाकिस्तान पर भरपूर दबाव बनाया होता तो आज इस तरह की घटनाएं घटित नहीं होती।

पाकिस्तान से आए हिंदुओं को अपने घर में शरण देने वाले नाहर सिंह कहते हैं, ”इन लोगों की नागरिकता आज से नहीं, बल्कि 1947 से ही भारत के ऊपर बकाया यानी कि उधार है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पाकिस्तान से ही तो आए हैं। इससे पहले गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी भी पाकिस्तान से ही आए थे। पूर्व प्रधानमंत्री आई. के. गुजराल भी पाकिस्तान से आए थे। यदि ये सब यहां आकर बस सकते हैं और प्रधानमंत्री तक बन सकते हैं तो नये आये लोगों को नागरिकता क्यों नहीं मिल सकती। 1947 में पाकिस्तान बनाए वह इन हिंदुओं ने तो नहीं मांगा था। वह बना था मुसलमानों की मांग पर। दुर्भाग्य है कि भारत सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है।

यदि हिंदुओं की जगह मुसलमान आते हैं तो सरकार का रवैया बदल जाता है। देश में ऐसे हजारों पाकिस्तानी मुसलमान हैं जो वीसा अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी देश में रह रहे हैं और सरकार को उनका पता ही नहीं है कि वे कहां गए। सरकार ने स्वयं ही स्वीकार किया है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान के दो करोड़ से अधिक मुस्लिम घुसपैठिये देश में रह रहे हैं। उन्हें बाहर करने की भारत सरकार के पास न तो कोई योजना है, न प्रयास और न ही कोई मंशा। यह तो सबको पता है कि अवैध रूप से रह रहे ये पाकिस्तानी घुसपैठिए देश में क्या गुल खिला रहे हैं। इनके सहारे ही देश में नासूर बन चुका आतंकवाद फल-फूल रहा है। परंतु पाकिस्तान में अत्याचारों से पीडि़त हिंदू सरकार को खटक रहे हैं। सरकार को इनके रहने और भोजनए चिकित्सा आदि की व्यवस्था करनी चाहिए। सरकार के इस रवैये से साफ है कि वोट बैंक की राजनीति के लिए अब देश के हितों की भी बलि चढ़ाई जा सकती है?

नाहर सिंह के साथ अब अनेक संगठन खड़े हो गए हैं। नागरिकता का विषय सबसे अधिक प्रमुखता से विश्व हिंदू परिषद की दिल्ली शाखा ने उठाया हैं। पाकिस्तानी हिंदुओं का प्रतिनिधिमंडल लालकृष्ण आडवाणी और शरद यादव से मिला। आडवाणी ने उनसे उनकी भाषा सिंधी में बात की। बाद में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी बिजवासन गए और इन हिंदुओं की सहायता करने की घोषणा की। यह प्रतिनिधिमंडल केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे से भी मिला। सरकार ने उनके लिए एक सहायता शिविर शुरू कर दिया है, जहां उनके आवास, भोजन और चिकित्सा आदि की व्यवस्था की जा रही है। सरकार उन्हें नागरिकता दिए जाने के विकल्प पर भी कार्रवाई करेगी।

रवि शंकर

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