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भाप्पे, ठंड रख… ठंड!

कौन कहता है कि पड़ोसी की जीत से हमारा दिल जलता है। हमें तो लगता है कि दिल पसीज जाता है और इतना पसीज जाता है कि भले ही चुनाव नतीजे पूरे आए हों या ना आए हों और पड़ोसी शरीफ हो या बदमाश हो, हमारा दिल मुबारकबाद देने को मचल उठता है, जैसे कि हमारे डॉक्टर साहब का मचल उठा। उनके प्रिय मियां साहब की सरकार अभी बनी भी नहीं थी कि सरदार साहब ने उन्हें भारत आने का निमंत्रण दे दिया। बोले, पाकिस्तान के लिए कितना सोणा दिन चढ़ा है और धूप खिली है। वे तो ऐसे बोल रहे थे मानो हिन्दुस्तान के सारे दिलजलों के दिल भी खिल उठे हो और वे उनके इंतजार और जी-भर दीदार के लिए पलक पांवड़े बिछाए बैठे हों। इसे कहते है आप दादा आप मुरादा। मैं कहता हूं कि कम से कम माता रानी से तो पूछ लिया होता। इतना भी ख्याल दिल में नहीं किया कि इन दिनों उनकी भृकुटियां तनी हुई हैं क्योंकि उनका हाथ दिन-ब-दिन कमजोर हो रहा है। भाप्पे तुसी भूल गए कि एन्ना दी सरकार दे कार्यकाल विच एन्ना दे जनरल ने लाहौर गई बस के टायर पंचर कर डाले थे और लाहौर घोषणापत्र का कारगिल कर दिया था। होता है, पड़ोसी की जीत में ऐसा ही होता है। लोग अगले दा पाप भुल्ल जांदे ने। दूसरी तरफ चुनावी जीत खराब से खराब आदमी को भी शरीफ बना देती है और विनम्रता का परिचय देने के लिए वह भी मचल उठता है
जैसे कि मियां साहब। वे कह रहे हैं कि जनाब इस बार बस से आओ या टैम्पू से आओ पर आओ जरूर। और कुछ ना हो तो साइकिल उठाओ और चले आओ मेरे शपथ ग्रहण समारोह में। और हां, वह धागा वह थ्रैड जरूर ले आना जो वाजपेयी साहब बस यात्रा के बाद लाहौर छोड़ गए थे। हम दोनों मिलकर पतंग उड़ाएंगे उसी धागे से। डाक्टर साहब तो वैसे भी पंतग को नई ऊंचाई तक ले जाना चाहते हैं। उन्होंने तो शर्म-अल-शेख में ही डोर को सूतना शुरू कर दिया था। वे तो इतिहास में अमर होने के लिए बेताब हैं, भले ही देश में उन्होंने अपनी आब खो दी हो और बीजेपी वाले उनके पीछे हाथ धो कर पड़े हों। हमें लगता है कि भाप्पे इतनी भी क्या जल्दी है, जरा देखो तो सही कि शरीफ साहब का ऊंट किस करवट बैठता है। सॉरी शेर किस करवट बैठता है। शेर पर वे बैठते हैं या शेर उन पर चढ़ बैठता है, जैसे कि बेनजीर के खाविन्द जनाब जरदारी साहब के साथ हुआ। वे तो शरीफ की बनिस्पत भारत के ज्यादा दोस्त थे। क्या कर पाए बेचारे। तो भाप्पे साइकिल मत उठाओ। पहले ये देखो तो सही कि सेना हाफिज सईद, मसूद अजहर और दाऊद इब्राहीम जैसी अपनी भारत विरोधी सामरिक सम्पत्ति भारत को सौंपती भी है या नहीं। मुम्बई के दहशतगर्दों को हमें सौपती भी है या नहीं। यही शरीफ साहब कारगिल के दौरान परमाणु बम का डर दिखा रहे थे, वो तो भला हो बिल क्लिन्टन का और वाजपेयी जी के संकल्प
का कि दुम दबाकर वापस हो गए। फिर भी अपने सैनिकों के शव तक हमारे ढोने के लिए छोड़ गए। अभी तो नई नई जीत है और नया-नया जोश है और मर-मर कर उठ खड़ी होती अमन की मरजीवड़ी आशा है। ऐसे में पुराने धागे से नई पंतग उड़ाना काफी बमुश्किल काम है। आप चाहो तो आगे डंडे पर बैठा कर आडवाणी जी को भी छुटकैया देने-कन्नी देने के लिए ले जा सकते हो, जिन्होंने कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना की शान में कसीदे पढ़े थे, मगर गुड्डी तब भी नहीं उडऩे वाली। नहीं उडऩे वाली लिख लो भाप्पे। पतंग तब तक नहीं उड़ेगी, जब तक सेना नहीं चाहेगी और सेना क्यों चाहेगी, उसका क्या दिमाग खराब हुआ है? वह क्या घास चरने लगी है जो सरेआम आपको मियां साहब के साथ मिलकर पतंग उड़ाने देगी? पाकिस्तान में जम्हूरियत आ गई होगी मगर सेना, सेना है। पाकिस्तान की सेना के बारे में तो कहा जाता है कि करेला और नीम चढ़ा। यानी करेली और नीम चढ़ी। तो भाप्पे मान जाओ। उछलो मत। साइकल पर मत चढ़ो। पैडल मत मारो। हलकान मत होवो। और भी मौके आएंगे। तब मारना पैडल और पहुंच जाना झट पाकिस्तान। अभी देखो कि शरीफ ही बदले हैं या बदमाश भी बदल गए हैं। और बदल गए हैं तो सचमुच कितने बदल गए हैं। उनके कपड़े बदल गए हैं या काया भी बदल गई है? मन बदला है या सिर्फ माया बदल गई है। भाप्पे ठंड रखो ठंड। पहले देश के हालात तो देखो। माता रानी का मूड तो देखो। पंजाबी में कहावत है आप ना जोगी जग बलावै (अर्थात अपनी खबर नहीं और पूरे जग की खैर)। अपने घर के बाहर होते धरने और प्रदर्शन तो देखो, कहीं पिछले दरवाजे से साइकिल पर ही भागना न पड़े।

 

मधुसूदन आनन्द

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