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सेंसर के बिना बेलगाम सिनेमा

सौ साल पहले 1913 में भारत में पहली पूरी लंबाई की फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्रÓ दादासाहब फालके ने बनाई थी। इन सौ वर्षो में सिनेमा ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे हैं। कथाकार और फिल्म पत्रकार सुरेश उनियाल इन सौ सालों का लेखाजोखा प्रस्तुत कर रहे हैं। आप पढ़ चुके हैं कि किस तरह की चुनौतियों का सामना करते हुए दादासाहब फालके ने भारतीय सिनेमा को एक शुरुआत दी। इस बार हम बात कर रहे हैं दादासाहब फालके की दूसरी फिल्मों और दूसरे फिल्मकारों के पदार्पण की। चर्चा सिनेमा में बढ़ती व्यावसायिकता और उसके खतरों की भी:

सन् 1914 के मध्य में फालके की तीसरी फिल्म ‘सत्यवान सावित्री’ की घोषणा होने पर सावित्री की भूमिका करने के लिए चार महिलाएं तैयार थीं। इन महिलाओं के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन माना जा सकता है कि ये समाज के उस तबके से आई थीं जिसे बहुत सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता था। अपनी फिल्मों को लेकर फालके लंदन गए। वहां भी ये सराही गईं। वहां के लोग फालके की तकनीक और कहानी कला से इतना प्रभावित हुए कि उनके सामने वहीं रहकर फिल्में बनाने का प्रस्ताव रख दिया। यह बात अलग है कि फालके ने इनकार कर दिया।

भारत लौटने के बाद 1917 में उन्होंने ‘लंका दहन’ बनाई। इसके बाद 1918 और 1919 में कृष्ण कथा पर आधारित दो फिल्में ‘कृष्ण जन्म’ और ‘कालिया मर्दन बनाई। इन दोनों में बालक कृष्ण की भूमिका फालके की बेटी मंदाकिनी ने निभाई। इस फिल्म की शूटिंग के समय मौजूद लोग बताते हैं कि कृष्ण बनी मंदाकिनी जब कालिया नाग के सिर के ऊपर से कूदने में डर रही थी तो उसके पिता फालके उसकी हिम्मत बढ़ाते रहे और अंतत: सफल हुए। इस तरह मंदाकिनी की ख्याति पहली बाल कलाकार के रूप में होने लगी और अभिनय के लिए उसे कई पुरस्कार भी मिले। 1920 में फालके की फिल्मों में काम करने के लिए कई महिलाएं तैयार थीं। इस तरह फिल्मों में महिलाओं के काम करने को लेकर जो पूर्वाग्रह लोगों में बना हुआ था, फालके उसे तोडऩे में सफल रहे।

पुरस्कार प्राण के घर गया
किसी भी कलाकारा के लिए यह सम्मान की बात होती है कि वह मंच पर जाकर राष्ट्रपति के हाथों अपनी कला के लिए पुरस्कार पाए। हमारे फिल्म उद्योग के लोगों को यह मौका मिलता है, हर साल आयोजित होने वाले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के मौके पर। इन पुरस्कारों में भी सबसे सम्मानित होता है, दादा साहब फालके पुरस्कार जो उस व्यक्ति की पूरे जीवन की फिल्मी उपलब्धियों के लिए उसे दिया जाता है। मशहूर खलनायक और चरित्र अभिनेता प्राण किशन सिकंद, जिन्हें हम प्राण के नाम से जानते हैं, इस पुरस्कार को लेने के लिए जब स्वयं समारोह में न आ सके तो पुरस्कार ही सूचना प्रसारण मंत्री के हाथों उनके पास उनके घर चला आया।

10 मई को सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने प्राण के घर जाकर उन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया। उनके साथ उनके मंत्रालय के सचिव उदय कुमार वर्मा और संयुक्त सचिव (फिल्म) राघवेंद्र सिंह भी थे। इस पुरस्कार में प्रतीक चिह्न के रूप में स्वर्ण कमल, 10,00,000 रुपए और एक शाल दिए जाते हैं।

यह कोई अकेली घटना नहीं है जब यह पुरस्कार लेने के लिए कोई व्यक्ति मंच पर न आ सका हो। ऐसे पहले व्यक्ति पृथ्वीराज कपूर थे, जिनका पुरस्कार समारोह से पहले ही निधन हो गया था। उनका पुरस्कार उनके बेटे राज कपूर ने मंच पर जाकर लिया था।

राज कपूर के पास मंच पर जाकर पुरस्कार लेने का एक और मौका था, जब 1987 में स्वयं उन्हें यह पुरस्कार मिला था। वह पुरस्कार समारोह में भी गए थे, लेकिन समारोह के बीच में ही उनकी तबीयत बिगड़ गई और वह उठकर मंच पर जाने की स्थिति में नहीं थे। लिहाजा तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने खुद उनके पास जाकर उन्हें पुरस्कार देकर सम्मानित किया।

तभी पहला विश्वयुद्ध शुरू हो गया। फिल्म निर्माताओं के लिए पैसे के स्त्रोत एकदम बंद हो गए। विदेश से कच्ची फिल्में और दूसरे साज-सामान मंगवाना आसान नहीं रह गया था। लेकिन इसका एक फायदा भी हुआ। यूरोप की कई अभिनेत्रियों के पास वहां काम नहीं रह गया था। कोलकाता के जमशेदजी मदन जैसे फिल्मकारों ने इस मौके का फायदा उठाया और इनको अपनी फिल्मों में इसी तरह की उन्मुक्त भूमिकाएं देने लगे। जमशेदजी फ्रामजी मदन को भारत में व्यावसायिक सिनेमा का सूत्रधार कहा जा सकता है।

जमशेदजी मदन का व्यावसायिक टच महाराष्ट्र में सिनेमा की एक धारा काम कर रही थी तो, दूसरी धारा कोलकाता में अपना काम कर रही थी। यहां के लोगों की नजर फिल्मों से हो सकने वाली मोटी कमाई पर थी। यहां जमशेदजी मदन इस धारा के प्रमुख निमार्ता थे। महाराष्ट्र के फिल्मकारों के कलात्मकता, के विपरीत मदन का ध्यान पूरी तरह से व्यावसायिकता पर था। सिनेमा के लिए किसी सेंसर की तब तक कोई बात नहीं थी, इसलिए मदन ने पूरा फायदा उठाया। उनके लिए यूरोप से आई बेरोजगार अभिनेत्रियां उपलब्ध थीं। उन्हें अपनी देह दिखाने में किसी तरह का ऐतराज नहीं था। उपनिवेशवादी सरकार को भी इसमें किसी तरह का ऐतराज होने का सवाल ही नहीं था।

जब फालके महाराष्ट्र में पूरी लंबाई की कथा फिल्में बना रहे थे लगभग उसी समय कोलकाता में जमशेदजी मदन ने अपनी पहली पूरी लंबाई की फिल्म बनाई। इसका नाम था ‘सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र’ और इसकी लंबाई 7000 फुट थी, जो उस समय के लिहाज से खासी बड़ी मानी जा सकती है। इस फिल्म में तारामती की भूमिका एक थिएटर अभिनेत्री मिस सावित्री ने निभाई थी। हरिश्चंद्र बने थे होमी तंत्रा जो विक्टोरिया थिएटर कंपनी के नाटकों में काम करते थे। इसके बाद तो जमशेदजी को यूरोप से आई अभिनेत्रियों का विकल्प भी मिल गया था।

किसी विदेशी मूल की अभिनेत्री को अपनी फिल्म में लेने की शुरुआत जमशेदजी मदन ने नहीं की थी। यह काम सुचेत सिंह ने किया था, जिसने अपनी फिल्म ‘शकुंतला’ में प्रमुख भूमिका निभाने के लिए एक अमेरिकी अभिनेत्री डोरोथी किंगडम को बुलवाया।

जमशेदजी मदन कोलकाता के पारसी थे और अपनी व्यावसायिक छवि को बनाए रखने के लिए एंग्लो-इंडियन लड़कियों से काम करवा रहे थे। उन्होंने भारतीय समाज में इन लड़कियों को और ज्यादा स्वीकार्य बनाने के लिए इनके मूल नामों को बदल कर इन्हें भारतीय फिल्मी नाम दे दिए थे। रेनी स्मिथ सीता देवी बन गई थी, ऐफी हिप्पोलेट इंदिरा देवी और बौनी बर्ड ललिता देवी कहलाने लगी थीं। इसी तरह तवायफों के नाम भी बदल दिए जाते थे।

समय बीतने के साथ भारत में भी एंग्लो इंडियन लड़कियों को भी फिल्मों में काम करने में कोई संकोच नहीं रह गया था। जमशेदजी मदन के मदन थिएटर्स की फिल्म ‘पति-भक्ति’ में नायिका की भूमिका एक एंग्लो इंडियन अभिनेत्री पेशेंस कूपर ने निभाई थी और खलनायिका बनी थी इतालवी अभिनेत्री सिन्योरा मिनेली। विदेशी अभिनेत्रियों की गुदाज देह को आज की आयटम गल्र्स की तरह ही इस्तेमाल किया जाता था। यह फिल्म आगा हश्र कश्मीरी के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित थी। इसमें नायक की भूमिका मास्टर मोहन ने निभाई थी। इसी कंपनी की दूसरी फिल्म नल-दमयंती में नल की भूमिका खुसरो अडवानी ने और दमयंती की भूमिका पेशेंस कूपर ने निभाई। पेशेंस कूपर को श्रीराम ताम्रकर ‘मूक युग की पहली स्टार हीरोइन’ बताते हैं। उन्होंने मूक युग से शुरुआत करते हुए सवाक फिल्मों तक अपनी अभिनय यात्रा में 30 फिल्में की। इनमें से ‘सती लक्ष्मी’ (1925), ‘जयदेव’ (1926), ‘चंडीदास’ (1927), ‘दुर्गेश नंदिनी’ (1927), कपाल कुंडला (1929) ‘नल-दमयंती’ आदि की गिनती उनकी महत्वपूर्ण फिल्मों में की जाती है। पेशेंस कूपर की बहन वॉयलट ने भी कुछ फिल्मों में काम किया। फिल्मों में ध्वनि आने के बाद पेशेंस कूपर के लिए यहां कोई काम नहीं रह गया, क्योंकि उन्हें हिंदी में संवाद बोलने में काफी दिक्कत होती थी।

इस दौर में मिस गौहर और रूबी मेयर्स उर्फ सुलोचना ने स्टार का दर्जा हासिल कर लिया था। इनके अलावा पुतली बाई, जिल्लो बाई, जुबैदा, सुल्ताना, शहजादी, आदि के नाम भी लोग जानने लगे थे। इन सभी का आदर्श हॉलीवुड की अभिनेत्रियां हुआ करती थीं। ये भी उसी अंदाज में आंखें मिचमिचाती हुई, अधखुले होंठों के साथ संवाद बोलती हुई नायक को रिझाने का प्रयास करती थीं। उन्हीं की तरह के शार्कस्किन के सूट और फैल्ट हैट, होंठों में दबी सिगरेट उनकी प्रिय पोशाक थी। श्री 420 में नादिरा का जो गेट-अप था, कुछ-कुछ वैसा ही।

1917 तक फिल्मों में सेंसर जैसी कोई चीज नहीं थी। ज्यादा से ज्यादा कोई शिकायत मिलने पर पुलिस आयुक्त को यह अधिकार होता था, कि वह किसी दृश्य को आपत्तिजनक मानकर काटने का आदेश दे सकता था। उनकी नजर भी ऐसे दृश्यों पर ज्यादा रहती थी जो राजनीतिक तौर पर आपत्तिजनक हों। इसीलिए हॉलीवुड की फिल्मों की देखा-देखी मूक फिल्मों में चुंबन, अंतरंग दृश्यों और अंग प्रदर्शन पर किसी तरह की रोक नहीं होती थी और इनका भरपूर इस्तेमाल होता था। उस जमाने की एक फिल्म में ललिता पवार को बेझिझक नायक के होंठों को चूमते दिखाया गया था। मदन थिएटर्स की फिल्म ‘पति-भक्त्यि में गुदाज देह वाली खलनायिका सिन्योरा मिनैली ने ऐसी उत्तेजक पोशाकें पहनी थीं कि हॉल में बैठी महिलाएं शर्म से अपनी आंखें बंद कर लेती थीं। इसी तरह शथ्रो ऑफ डायस्य फिल्म में सीता देवी और चारू राय को एक दूसरे के होंठों को चूमते दिखाया गया है। उनके इस चुंबन को उस जमाने की फिल्मों का प्रतिनिधि दृश्य मान लिया गया और खासा चर्चित रहा। किताबों और पत्रिकाओं में इसे छापा जाता था।

इस तरह की नग्नता दर्शक को आकर्षित करने का एक जरिया मानी जाती थी। लेकिन इसका एक नुकसान भी हुआ। सिनेमा को इसी कारण संभ्रांत परिवारों में त्याज्य, घृणित माध्यम मान लिया गया। इन पंक्तियों के लेखक को याद है,1950 के दशक में बड़े-बूढ़े सिनेमा देखना बहुत बुरा मानते थे।

सुरेश उनियाल

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