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कैसे बुझेगी प्यास? राजस्थान में है पानी का अकाल

देश के कृषि योग्य भूमि का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में है। अधिकतर खेती मानसून की वर्षा पर निर्भर है। अल्प और असमान वर्षा के हालात में सिंचित क्षेत्र बढ़ाने के प्रयास निरंतर जारी हैं। इसी तरह प्रदेश की जनता और पशुधन के अलावा उद्योगों तथा अन्य जरूरतों के लिए पानी पहुंचाना टेढ़ी खीर है। केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा अरबों-खरबों रूपयों की योजनाएं बनाने के बावजूद, कागजों तक सिमटी ये योजनाएं, अब तक पानी की समस्या का स्थायी समाधान निकालने में विफल रही है।
भौगोलिक क्षेत्रफल के लिहाज से राजस्थान सबसे बड़ा प्रदेश है, जिसमें देश के कुल क्षेत्रफल का करीब दस फीसदी हिस्सा आता है। विडम्बना यह है कि देश के कुल स्त्रोतों का लगभग एक प्रतिशत जल इस प्रांत में उपलब्ध है।

आजादी से पहले और बाद के वर्षों में राजस्थान को प्राय: अकाल एवं सूखे की विभीषिका का सामना करना पड़ता रहा है। कभी पूरा प्रदेश तो कभी कुछ इलाके सूखे की चपेट में आते रहते हैं।

हिमालय से भी प्राचीन अरावली पर्वतमाला ने इस प्रदेश को दो प्राकृतिक भूखण्डों में विभक्त किया हुआ है। उत्तर-पश्चिम के मरूस्थलीय भू-भाग में अल्प वर्र्षा के कारण प्राकृतिक जल की उपलब्धता अत्यंत कम है। इस इलाके में बरसाती नदी लूनी, मुख्य नदी है। दक्षिण-पूर्वी भाग में मुख्य नदी चम्बल राजस्थान के थोड़े से हिस्से से होकर बहती है। इसकी सहायक नदियां बनास, बेडच, गम्भीरी इत्यादि अरावली पर्वत के पूर्वी भाग से निकलकर सवाईमाधोपुर जिले में चम्बल नदी में मिलती है। इसी तरह दक्षिणी राजस्थान में माही मुख्य नदी है और इसकी सहायक नदियां सोम, बनास, जाखम, साबरमती, गुजरात से होकर अरब सागर में मिलती है। थार मरूस्थल, वर्षा की कमी तथा विशाल भू-भाग होने के कारण दूरदराज के इलाकों में पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य,परिवहन इत्यािद सामुदायिक सेवाओं को उपलब्ध कराना बहुत बड़ी चुनौती है। इसलिए पिछले कई दशकों से राजस्थान को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की जाती रही है लेकिन केन्द्र सरकार की बेरूखी बनी हुई है।

देश के कृषि योग्य क्षेत्र का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में है। अधिकतर खेती मानसून पर आधारित है। अल्प और असमान वर्षा के कारण सिंचित क्षेत्र बढ़ाने के प्रयास निरंतर जारी हैं। इसी तरह प्रदेश की जनता और पशुधन के अलावा उद्योगों तथा अन्य जरूरतों के लिए पानी पहुंचाना टेढ़ी खीर है। केन्द्र और राज्य के स्तर पर अरबों-खरबों रूपयों की बनाई गई योजनायें कागजी कार्यवाही में सिमटी, हकीकत से अब तक कोसों दूर हैं और पानी की समस्या के स्थायी समाधान निकालने में विफल है।

भूमिगत जलस्त्रोतों का दोहन सीमा पार कर चुका है जिसका दुष्परिणाम यह निकला कि प्रदेश के 249 ब्लॅाक में से मात्र 31 ब्लॅाक पानी के मामले में सुरक्षित है। शेष डार्क जोन घोषित हो चुके हंै। ऐसी सूरत में सतही जल स्रोंतों से पेयजल उपलब्ध कराने के मकसद से बीस हजार करोड़ रूपये से अधिक की लागत वाली 85 परियोजनोएं स्वीकृत की गई थीं। इनसे 84 शहरों तथा 12 हजार 770 गांवों को लाभान्वित किया जाना था। अब तक 31 शहर एवं 2683 गांव लाभान्वित हो चुके है। शेष 539 शहरो, कस्बों एवं 10087 गांवों को लाभान्वित करने का कार्य प्रगति पर है। पेयजल योजनाओं को लागू रखने तथा वितरण प्रणाली की मजबूती के लिए चालू वित्त वर्ष के बजट में 250 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया गया है।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने बजट भाषण में प्रदेश के समस्याग्रस्त गांवों तथा कस्बों में पेयजल सुविधा सुलभ कराने के लिए 18 नई परियोजनाओं को लागू करने की घोषणा की है। इसमें कुल 6199 गांव, 14 कस्बे शामिल हैं । इन योजनाओं का अनुमानित खर्च 8166 करोड़ रूपये है। अकेली चम्बल-भीलवाड़ा वृहद् पेयजल परियोजना के तहत विकसित किए जा रहे इंफ्रास्ट्रक्चर से भीलवाड़ा जिले के 1688 समस्या ग्रस्त गांवों तथा 8 कस्बों को पेयजल सुविधा से जोडऩे के लिए 1376 करोड़ रूपये की परियोजना बनाई गई है। केन्द्रीय मंत्री डॉ. सी.पी. जोशी इस संसदीय क्षेत्र के प्रतिनिधि है। इसी प्रकार कुंभाराम लिफ्ट परियोजना से झुंझुनं के 186 गांवों, खेतड़ी के 85 गांवों एवं कस्बाई इलाकों के लिए 955 करोड़ रुपये की लागत वाली पेयजल परियोजना का कार्य हाथ में लिया जाएगा। चम्बल नदी से धौलपुर-भरतपुर जिले के 660 गांवों में पेयजल सुविधा पर 721 करोड़ रूपये खर्च किये जाने है। बीसलपुर-दूदू परियोजना से जयपुर जिले के 646 गांवों में 771 करोड़ रूपये की लागत से पेयजल सुलभ कराया जाएगा।

कुछ नदी बेसिनों में वर्षा के समय अतिरिक्त पानी बहकर प्रदेश से बाहर चला जाता है। इसकी रोकथाम के लिए मुख्यमंत्री ने बजट भाषण में घोषणा की है। जल संसाधन विभाग के प्रमुख शासन सचिव ओ.पी.सैनी तथा मुख्य अभियंता पी.एल. सोलंकी के अनुसार ऐसी विभिन्न परियोजनाओं के सर्वे के लिए टेंडर आमंत्रित कर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डी.पी.आर) बनाने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी गई है। इस दृष्टि से चम्बल नदी से अलवर के जयसमंद बांध, मेज नदी से जयपुर के रामगढ़ बांध, माही नदी से जयसमंद, राजसमंद एवं मेजा में पानी लाने हेतु केन्द्र सरकार के सहयोग से परियोजनाओं के कार्य हाथ में लिए जायेंगे।
श्री सोलंकी ने बताया कि बनास नदी पर बीसलपुर के डाउन स्ट्रीम में स्थित ईसरदा बांध के 500 करोड़ की लागत से प्रस्तावित निर्माण कार्य के लिए डी.पी.आर. बनवायी जा रही है। झालावाड़ और कोटा जिलों में 14478 हैक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा हेतु 228 करोड़ रुपये की लागत से काली सिंध वृहद सिंचाई परियोजना का द्वितीय चरण का कार्य केन्द्र सरकार की स्वीकृति से आरम्भ किया जाएगा। वर्ष 2013-14 में 228 करोड़ लागत की 14 नई लघु सिंचाई परियोजनाओं का कार्य शुरू किया जाना है। गत चार वर्षो में इंदिरा गांधी नहर परियोजना सहित जल संसाधन की विभिन्न परियोजनाओं पर 2630 करोड़ रूपये के खर्च से एक लाख 86 हजार हैक्टेयर से अधिक क्षेत्र में अतिरिक्त सिंचाई क्षमता सृजित की गई है। नर्मदा नहर परियोजना से तीन वर्षों में फव्वारा पद्धति से डेढ़ लाख हैक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई गई। इस साल
50 हजार हैक्टेयर क्षेत्र में अतिरिक्त सिंचाई होगी।

नदी जल समझौतों में राजस्थान को पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से रावी व्यास, यमुना, गंगा आदि नदियों से बाढ़ का पानी दिलाने के लिए राज्य सरकार को दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति अपनानी होगी। वहीं केन्द्र सरकार को इस मरूस्थलीय प्रदेश के साथ न्याय की पहल करनी होगी।

गुलाब बत्रा, जयपुर

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