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काली रात में होता है… काले पानी का काला धंधा

आधी रात के सन्नाटे में अवैध टैंकरों के काफिले दर काफिले सड़कों पर दौड़ते हुए मिल जाएंगे। साउथ दिल्ली और नोएडा के बड़े होटलों में यह पानी सीधे टैंकरों से सप्लाई होता है। छोटे-बड़े तमाम होटलों में प्लास्टिक की टंकियों में रेहड़ी से भेजा जाता है।
चीन दुनिया से बेखबर होकर, संसार की सबसे बड़ी ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर भारत के लिए जल संकट एवं अन्य खतरे पैदा कर रहा है। मौसम का मिजाज लगातार बिगडऩे से मीठा पानी तेजी से रसातल में जा रहा है।इस वर्ष जून से सितंबर तक 98 फीसदी बारिश होने की संभावना व्यक्त की गई है। मानसून की बारिश कम होने से देश की नदियों का जलस्तर घट रहा है। पिछले वर्ष पहाड़ों पर बारिश सामान्य से कम हुई थी।
नदियों पर बने बांधों का पानी सूख रहा है। सूखने वाले सभी बांध पहाड़ी जगहों में हैं। वहां मानसून की बारिश हमेशा सामान्य होती थी। इससे इन बांधों का जल स्तर सामान्य बना रहता था। इस वर्ष हिमाचल के बांधों में जल स्तर सामान्य से 53 प्रतिशत कम है।

देश की अन्य नदियों पर बने 80 प्रतिशत बांधों का जल स्तर सामान्य से नीचे आ गया है। 84 बांधों में से 67 की हालत बेहद खराब है। गंगा और नर्मदा को छोडकर सिंधु, गोदावरी, कृष्णा व कावेरी नदियों में सामान्य से कम जल बह रहा है।

केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक पीने के पानी की स्थिति भयावह है। 84 बांधों में से केवल 17 में सामान्य पानी है, जबकि 67 का जल स्तर 40 प्रतिशत से नीचे यानी सामान्य से नीचे चला गया है। बारिश नहीं होने से बांध, नदी, नाले व जौहड़ सूख रहे हैं।महाराष्ट्र के बांधों में सामान्य से 44 प्रतिशत पानी कम है। महाराष्ट्र में पानी नहीं मिलने के कारण वहां के किसानों ने मौसमी खेतों में आग लगा दी। किसान पानी की किल्लत के कारण आत्महत्याएं कर रहे हैं। महाराष्ट्र की जयकवाड़ी भीमा नदी का स्तर शून्य पर और येल्दारी में केवल 1 प्रतिशत पानी बचा है।
झारखंड में बांधों में 15 प्रतिशत से कम पानी है। ओडिशा के बांधों में सामान्य से 24 प्रतिशत से कम, पश्चिम बंगाल के बांधों में सामान्य से 46 प्रतिशत कमए त्रिपुरा के बांधों में सामान्य से 32 प्रतिशत कम पानी बह रहा है। उत्तर प्रदेश के बांधों में सामान्य से 49 प्रतिशत कम, उत्तराखंड के बांधों में सामान्य से 8 प्रतिशत कम पानी है।आंध्र प्रदेश के बांधों में सामान्य से 41 प्रतिशत कम, कर्नाटक के बांधों में सामान्य से 58 प्रतिशत कम, केरल के बांधों में सामान्य से 57 प्रतिशत कम और तमिलनाडु के बांधों में सामान्य से 30 प्रतिशत कम पानी रह
गया है। भाखड़ा बांध में 26 प्रतिशत पानी बचा है, जो पिछले 10 वर्षों के 47 प्रतिशत से कम है।पंजाब में बांधों में पानी 27 प्रतिशत बचा है, जो पिछले साल के 46 प्रतिशत के मुकाबले काफी कम है। उत्तर प्रदेश के माताटीला बांध का जलस्तर 25 प्रतिशत पर आ गया है, जबकि यहां पिछले साल 82 प्रतिशत पानी था। उत्तराखंड के टिहरी बांध का स्तर 21 प्रतिशत पर पंहुच गया है, रामगंगा का स्तर 19 प्रतिशत पर है, जो पिछले 10 साल के औसत से बहुत कम है।

मध्यप्रदेश के गांधी सागर का स्तर शून्य पर आ गया है। बारिश न होने के कारण नदी बेसिनों का पानी भी सूखने लगा है। गंगा नदी के ग्लेशियरों से निकलने के कारण इसका जलस्तर अभी भी सामान्य बना हुआ है। लेकिन सिंधु नदी का जल स्तर सामान्य से 50 प्रतिशत कम हो गया है।

तापी का जल स्तर सामान्य से 15 प्रतिशत कम, कच्छ की नदियों का पानी सामान्य से 67 प्रतिशत कम, गोदावरी का 33 प्रतिशत कम, कृष्णा का 55 प्रतिशत कम, कावेरी का 38 प्रतिशत कम और दक्षिण भारत की पश्चिम की तरफ बहने वाली नदियों का पानी सामान्य से 45 प्रतिशत कम हो गया है।

घटा भूजल कुतबमीनार के बराबर
दिल्ली का भूजल स्तर कुतब मीनार की लंबाई के बराबर पिछले 3 दशकों में घट चुका है। यदि पानी की बरबादी को रोका नहीं गया तो वह दिन दूर नहीं है, जब सूखे हलक को पीने का पानी नसीब नहीं होगा।इसके बावजूद राजधानी में पानी का दुरूपयोग हो रहा है। दिल्ली में 835 मिलियन गैलन प्रतिदिन की जलापूर्ति हो रही है। इसमे से 40 फीसदी पानी बर्बाद हो रहा है। इस बर्बादी को रोकने में एक तरफ दिल्ली जलबोर्ड नाकाम दिख रहा है। वहीं दूसरी तरफ अमूल्य जल भंडार तेजी से रसातल को जा रहा है।

पानी माफियाओं ने चांदी काटने के लिए दिल्ली के उत्तम नगर तथा उससे

सटे कॉलोनियों में पेयजल की आपूर्ति बंद करा दी है। इनके हिस्से का पानी दूसरे क्षेत्रों को दे दिया गया है। उत्तम नगर व उससे लगी कॉलोनियों के लोगों को ब्लैक में पानी खरीदना पड़ रहा है।पानी का माफिया जमकर मोटा मुनाफा काट रहा है। इसका हिस्सा जल बोर्ड के अधिकारियों तक पहुंचता है। सिटीजन फ्रंट फॉर वाटर डेमोक्रेसी के संयोजक एस ए नकवी ने कहा है कि दिल्ली जल बोर्ड के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। मिनिस्ट्री ऑफ अर्बन डेवलपमेंट के मुताबिक प्रत्येक दिल्लीवासी को 135 लीटर पानी मिलना चाहिए।
काले पानी का गोरखधंधा
राजधानी के होटलों की थाली में बिना परोसे जहर पहुंच रहा है। होटलों के व्यंजन इसी प्रदूषित पानी से बनते हैं। इस प्रदूषित पानी में टोटल डिजोल्व साल्ट (टीडीएस) 1200 से अधिक पाए जाते हैं, जो कि पानी को गर्म करने पर एक तिहाई रह जाते है।इन खतरनाक रसायनों को शरीर हजम नहीं कर पाता। इसका लगातार इस्तेमाल करने से यह प्रदूषण त्वचा से फूट कर बाहर निकलता है। सरिता विहार में लगे अवैध बोरिंग से निकाला गया प्रदूषित पानी, टैंकरों से सप्लाई हो रहा है। यमुना के इस काले पानी के गोरखधंधे को
राजनीतिक और पुलिस संरक्षण प्राप्त है। पानी के माफिया की पुलिस से सांठगांठ है। इस धंधे को रात के अंधेरे में बड़े सुनियोजित ढंग से चलाया जा रहा है। पानी टैंकर के आने जाने का रूट बकायदा पहले से फिक्स होता है। दिल्ली में काले पानी का काला धंधा काली रात में जमकर होता है।आधी रात के सन्नाटे में अवैध टैंकरों के काफिले दर काफिले सड़कों पर दौड़ते हुए मिल जाएंगे। साउथ दिल्ली और नोएडा के बड़े होटलों में यह पानी सीधे टैंकरों से सप्लाई होता है। छोटे-बड़े तमाम होटलों में प्लास्टिक की टंकियों में रेहड़ी से भेजा जाता है।

एक टैंकर ने बिना किसी रोक टोक के एक रात में करीब 4 फेरे लगाए। उसका एक फेरा करीब 25 किलोमीटर के दायरे में था। इनमें से एक टैंकर 12 हजार लीटर पानी एक बार में ढोता है, जिसकी कीमत 1200 रूपए के करीब है। एक अनुमान के मुताबिक 500 टैंकर और अनगिनत ट्रैक्टरों के पीछे लगे टैंकर, इस गोरख धंधे को अंजाम दे रहे हैं, एक अनुमान के मुताबिक काले पानी का यह काला कारोबार 100 करोड़ रूपए सालाना का है।

इस काले पानी के काले धंधे को अवैध से वैध ठहरा कर ही जांच के घेरे में लाया जा सकेगा। इससे दिल्ली सरकार के राजस्व में इजाफा हो जाएगा। इस प्रदूषित पानी को वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट से साफ करके लोगों के बिगड़ते स्वास्थ्य को बचाया जा सकेगा।

हरियाणा करता है कटौती
राजधानीवासियों को पानी की किल्लत से मुक्ति नहीं मिल रही है। दूसरी तरफ हरियाणा यमुना नहर के माध्यम से पानी में कटौती करने से बाज नहीं आता। हरियाणा द्वारा छोड़े गए पानी के बाद भी वजीराबाद जलशोधन संयंत्र का जल उत्पादन क्षमता से कम है।

हैदरपुर जल शोधन संयंत्र का जल शोधन पहले से ही कम है। हरियाणा द्वारा यमुना नदी के जल स्तर में कटौती कर देने से वजीराबाद जल शोधन संयंत्र का जल शोधन काफी गिर गया था। केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद हरियाणा ने हथिनी कुंड से कुछ पानी और छोड़ा है, जिससे यमुना नदी का जल स्तर 673.10 फुट पहुंचा था, जबकि दिल्ली को हरियाणा 674.5 फुट पानी देने के लिए बाध्य हैै। गौरतलब है कि हरियाणा यमुना नहर के माध्यम से भी पानी में कटौती कर रहा है। इस कटौती से हैदरपुर जल शोधन संयंत्र क्षमता से 30 एमजीडी पानी का उत्पादन कम कर रहा है। वजीराबाद और हैदरपुर जल शोधन संयंत्र में 50 एमजीडी कम पानी का शोधन होने से जलापूर्ति प्रभावित हो रही है। बिजवासन, महरौली, पालम, छतरपुर और आसपास पानी नहीं पहुंच रहा है। कृष्णा नगर, ललिता पार्क, मैदान गढ़ी, साउथ पटेल नगर में पानी बर्बाद हो रहा है। एक तिहाई के करीब 40 लोग पानी से महरूम है। दिल्ली के द्वारका, बवाना तथा ओखला के तीनों वाटर ट्रीटमेंट प्लांट पानी नहीं मिलने से ठप्प पड़े हुए है। दिल्ली सरकार ने इनके निर्माण में हजारों करोड़ रूपए पानी की तरह बहा दिए, लेकिन पानी की एक बूंद मयस्सर नहीं हो पा रही है।

हमेशा की तरह से पानी की कमी का ठीकरा हरियाणा के सिर फोड़ते हुए, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि हरियाणा दिल्ली के पानी में कटौती कर रहा है। इसके जवाब में हरियाणा के मुख्य मंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने कहा कि निर्धारित पानी में कोई कटौती नहीं की जा रही है।

मामले की गंभीरता को समझते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय ने हरियाणा व दिल्ली सरकार को तत्काल बातचीत कर पानी की समस्या सुलझाने का निर्देश दिया। हरियाणा के मुख्यमंत्री हुड्डा दिल्ली पहुुंचे ताकि मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से आमने सामने बैठकर बात की जा सके। हरियाणा के सिंचाई विभाग के सचिव जालान ने दिल्ली के वजीराबाद व हैदरपुर के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का अचानक दौरा कर वहां के जलाशयों में जलस्तर का जायजा लिया। इसके बाद जलस्तर की स्थिति में सुधार होने लगा था। वजीराबाद जलाशय का जलस्तर 673.10 फुट पहुंचा, जबकि पहले यह 673 फुट पर था।हरियाणा तथा दिल्ली के बीच यमुना के पानी के बंटवारे को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद केन्द्र इस विवाद का समाधान नहीं कर पाया है। हरियाणा के कृषि
प्रधान राज्य होने के कारण हरियाणा सरकार किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करना चाहती, पानी संकट के कारण मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को अपनी साख खिसकती दिखाई दे रही है।अगले वर्ष दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं, निगम चुनाव में कांग्रेस परास्त हो चुकी है। ऐसे में मुख्यमंत्री शीला सरकार की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। दिल्ली सरकार 1993 में हुए समझौते के मुताबिक अपने हिस्से के पानी के लिए तो दबाव बना ही रही है, वहीं मुनक नहर से हरियाणा को मिलने वाले अतिरिक्त 130 एमजीडी पानी में भी अपनी हिस्सेदारी चाहती है।

बोतल में पानी
दोनों राज्यों में हुए समझौते के मुताबिक पानी की लीकेज रोकने के लिए 102 किलोमीटर मुनक नहर का निर्माण किया गया था, जिसमें 20 किलोमीटर नहर दिल्ली के क्षेत्र में है। दिल्ली सरकार इस नहर के निर्माण के लिए 414 करोड़ रुपये हरियाणा सरकार को दे चुकी है। इसके निर्माण से लीकेज के कारण नष्ट होने वाला लगभग 120 से 130 एमजीडी हरियाणा का बच गया। अब दिल्ली सरकार इसमें 80 एमजीडी की हिस्सेदारी चाहती है। दिल्ली जल बोर्ड का पानी छोटी बड़ी बोतलों में धड़ल्ले से बिक रहा है, जबकि पानी की किल्लत को लेकर दिल्ली में हाहाकार मचा है। पानी के माफिया अवैध तरीके से दिल्ली जल बोर्ड का पानी बाजार में बेचकर मालामाल हो रहे हैं। उधर पानी की कमी के खिलाफ प्रदर्शन और मारपीट की घटनाएं हो रही हैं।

पूर्वी दिल्ली आर डब्ल्यू ए ज्वाइंट फ्रंट के अध्यक्ष बीएस बोहरा ने आरटीआई के माध्यम से पानी के गोरखधंधे का खुलासा किया। इसमें बताया गया है कि राजधानी में नान ब्रांडेड पानी के जारों की बिक्री नहीं हो सकती है।दिल्ली में पानी का आधा हिस्सा पाइप लाइनों के लीकेज में बरबाद हो जाता है जबकि बाकी बचा पानी जारों सहित आधा से लेकर एक लीटर तक के पाउचों में दुकानों और कार्यालयों में पहुंचा दिया जाता है। इसके अलावा आइसक्रीम फैक्टरियों में भी टैंकरों से पानी की आपूर्ति की जा रही है। जल बोर्ड के टैंकर सीधे चिलर प्लांटों में पानी को ठंडा करने जाते है फिर उसे जारों में भर कर बेचा जाता है।

यह 20-20 लीटर के जार घरों, कार्यालयों, से लेकर उन इलाकों में लोगों

के घरों तक पहुंचा दिए जाते हैं जहां पानी नहीं पहुंचता है। ये चिलर प्लांट पहाडगंज, करोलबाग, बाराखंभा, संगम विहार, उत्तमनगर, नारायणा, रोहिणी, गांधीनगर, शास्त्री नगर, कबीर बस्ती, नजफगढ़, न्यू अशोक नगर, घड़ौली, खिचड़ीपुर, त्रिलोकपुरी मायापुरी, सदर बाजार के अलावा बाहरी दिल्ली के कई मकानों में लगाए गए हैं। पहाडगंज के चिलर प्लांट में काम करने वाले युवक ने बताया कि 20 लीटर पानी का जार 20 से लेकर 30 रुपए तक में मिलता है।अनाधिकृत कालोनियों में दिल्ली जल बोर्ड के पानी की आपूर्ति नहीं होती। पानी माफिया बोर्ड कर्मचारियों की मिली भगत से घरों में पहुंचाता है। पानी ठेलियों में भी दिल्ली जल बोर्ड पानी बेचा जाता है। पानी माफिया बड़े पैमाने पर ठेलियां कमीशन पर लगवाते हैं। कनॉट प्लेस पर जगह-जगह ठेलियों में पानी दिल्ली जल बोर्ड के टैंकरों अथवा जारों से भरा जाता है। एक इंच पानी में पचास ग्लास पानी बनता है। पचास ग्लास पानी में 40 ग्लास पानी का पैसा ठेली मालिक को दिया जाता है और 10 ग्लास पानी का पैसा पानी बेचने वाला लेता है। कनॉट प्लेस में कई ठेलियां लगती हैं। यह करोबार पूरी राजधानी में चल रहा है।

मुनक नहर का पानी
पश्चिमी यमुना नहर कच्ची होने के कारण दिल्ली के हिस्से का काफी पानी बर्बाद हो जाता है। लिहाजा मुनक से हैदरपुर तक 102 किलोमीटर लंबी पक्की नहर बनाई गई,

ताकि दिल्ली के हिस्से का 80 एमजीडी पानी बचाया जा सके। इस बचे हुए पानी के लिए द्वारका, बवाना और ओखला में 3 प्लांट बनाए गए। पांच सौ करोड़ रुपए से भी ज्यादा खर्च करने के बावजूद मुनक नहर से दिल्ली को एक बूंद पानी की आस नजर नहीं आ रही है।

साथ ही करीब 1000 करोड़ खर्च करके बनाए गए द्वारका, ओखला और बवाना प्लांट प्रोजेक्ट भी बेकार पडें़ है। हरियाणा नहर से एक बूंद पानी ना देने की जिद पर अड़ा हुआ है। मामला प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय, अपर यमुना रिवर बोर्ड तक पहुंच चुका है। फिलहाल नहर से पानी की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है। हैरत की बात तो यह है केंद्र, दिल्ली और हरियाणा में तीनों जगह कांग्रेस की सरकार है। इसके बावजूद यह मसला नहीं सुलझ पा रहा है। पानी तो दिल्ली को नहीं मिला, लेकिन मुनक नहर पानी शुरू होने से पहले ही टूट गई है। माना जा रहा था कि इस से करीब 25 लाख लोगों को पानी मिल पाएगा। नहर के निर्माण के लिए पहली बार प्रस्ताव जून , 1997 में लाया गया। उस समय दिल्ली जल बोर्ड एमसीडी के अधीन था और नाम था

दिल्ली वॉटर सप्लाई एंड सीवेज
डिस्पोजल अंडरटेकिंग। इससे पहले हैदरपुर प्लांट के लिए 1979 में मुनक नहर बनाई गई थी। लेकिन उस नहर की क्षमता केवल 400 क्यूसेक पानी की थी। उस समय 50 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता था। इसलिए 727 क्षमता की पक्की नहर बनानी थी। हरियाणा की ओर से नहर बनाने का प्रस्ताव आया। नहर के निर्माण के लिए दिल्ली के उपराज्यपाल और हरियाणा के मुख्यमंत्री के बीच एमओयू साइन हुआ।

उस समय इसके निर्माण की लागत 91.39 करोड़ रखी गई। लेकिन केंद्रीय जल आयोग और सेंट्रल पॉल्यूशन हेल्थ इंजीनियरिंग एंड एनवायरमेंट ने इसकी लागत घटाकर 80.80 करोड़ कर दी। इस नहर का निर्माण शुरू करने के लिए 25 मई, 1996 में तत्कालीन दिल्ली के मुख्यमंत्री ने हरियाणा के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा। तब तक किशाऊ और रेणुका डैम के पानी के लिए भी समझौता हो चुका था।

इसलिए इसकी क्षमता 1200 क्यूसेक तक बढ़ाने की बात कही गयी। नहर का शिलान्यास भी होना था। इसके बाद 1998 में जल बोर्ड का गठन हो गया। करीब 7 साल तक नहर के निर्माण पर कोई तरक्की नहीं हुई। 4 मई 2003 को जल बोर्ड फिर नहर के निर्माण का प्रोजेक्ट लाया। यह प्रोजेक्ट हरियाणा की ओर से ही भेजा गया था, जिसमें नहर के निर्माण का रिवाइज्ड बजट 80.80 करोड़ से 380.18 करोड़ कर दिया गया। 36 महीने के अंदर नहर का निर्माण होना था। लेकिन 3 साल बीत जाने के बाद भी नहर नहीं बनी। अभी भी नहर का एक छोटा हिस्सा बचा हुआ है।

तीन ट्रीटमेंट प्लांट तैयार
नहर से मिलने वाले 80 एमजीडी पानी से द्वारका में 50 एमजीडी क्षमता का प्लांट बनाया गया है। प्लांट और रॉ वॉटर मेन्स पाइप लाइन बिछाने की लागत 747 करोड़ रुपए आई है।

इसी प्लांट से एयरपोर्ट व शॉपिंग मॉल को पानी की सप्लाई होनी है। नहर के पानी से ही 20 एमजीडी बवाना और 40 एमजीडी नांगलोई वॉटर ट्रीटमेंट में साफ किया जाएगा। बवाना प्लांट पिछले करीब 8 सालों से बनकर तैयार खड़ा है। प्लांट को दोबारा शुरू करने में जल बोर्ड को मशीनरी की मरम्मत करानी पड़ेगी। पिछले 6 सालों में प्लांट की मशीनरी को काफी नुकसान हो चुका है। नहर के पानी के लिए तीसरा प्रोजेक्ट ओखला में बनाया गया है। प्लांट बनकर तैयार है। इसके निर्माण पर 107 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं।

प्रस्तुति: उदय इंडिया ब्यूरो

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