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नदियां जोड़ो, भारत जुड़ेगा

किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिये जल सुरक्षा एक बहुत बड़ा मुद्दा है। भारत की खेती, उद्योग, जनजीवन सब कुछ भूजल पर निर्भर है। जिस तरह से भूजल के स्तर में कमी आ रही है, उससे आने वाले दिनों में संकट के संकेत मिल रहे हैं। देश के आधे भाग में सूखे की स्थिति है। पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी बाजपेयी की ‘नदियां जोड़ो-भारत जोड़ो’ की महात्वाकांक्षी परियोजना आज धूल चाट रही है। गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी में न जाने कितना पानी बह चुका है, पर नदियों का मिलन अभी अधूरा ही है। 37 नदियों को जोडऩे की परियोजना अगर करोड़ों लोगों को भूख, महामारी, सूखा और बाढ़ से बचाने का काम करेगी, फिर क्यों इसकी प्रगति अभी धीमी है? 11 साल हो चुके हैं इस परियोजना को, पर इसकी कहीं कोई प्रगति नजर नहीं आती। आज भी केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर उलझे हुए हैं। हरियाणा, दिल्ली और पंजाब में पानी के लिए खींचतान ज्यों की त्यों बनी हुई है। सूखा और बाढ़ से देश की जनता को निजात दिलाने का यह स्वप्न, आज दुरूस्वप्न सा नजर आने लगा है। यह दुरूस्वप्न और भी काला हो गया है। जब से चीन ने विशालकाय इंजीनियरिंग परियोजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए भारत की नदियों का रास्ता ही बदल दिया। इससे भारत के उत्तर-पूर्व में जलस्तर की समस्या बढऩे लगी है।
चीन ने आधा दर्जन बांधों का निर्माण करने की योजना बनाई है जो कि भारत में नदियों के बहाव को प्रभावित करेगी। इसके चलते 2016 तक नदी जोड़ो परियोजना खटाई में पड़ती नजर आ रही है। हमारे यहां के कुछ अर्थशास्त्री और पर्यावरणविद दोनों मानने लगे हैं कि नदी जोड़ो परियोजना नामुमकिन सी लगती है। साउथ एशिया रिवर, डैम एण्ड पिपुल के हिमांशु ठक्कर कहते हैं कि नदी जोड़ो परियोजना अव्यवहारिक है। ठक्कर मानते हैं कि नदियों के जल के बंटवारे को लेकर अभी भारी राजनीति और संघर्ष हो रहा है। यदि एक पूरे नदी-बेसिन को दूसरे राज्य के साथ जोड़ा गया तो इससे दोगुना संघर्र्ष छिडऩे का अंदेशा है। इस पूरी योजना में करीब-करीब 140 बिलियन डॉलर खर्च होने का हिसाब लगाया गया है। उम्मीद है अगले तीन सालों में यह आकड़ा और बढ़ जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी इतने बड़े पैमाने के खर्च पर शंकाएं जाहिर की है। पिछले साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की आलोचना करते हुए निर्देश जारी किया कि इस नदी जोड़ो परियोजना को तुरन्त बिना किसी देर के लागू किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह योजना राष्ट्रीय हित में है। सुप्रीम कोर्ट की इस राय के बाद नदी जल विशषज्ञों ने इस परियोजना का विरोध करते हुए अपनी आपत्तियां सुप्रीम कोर्ट के सामने रखीं। सुप्रीम कोर्ट की राय थी कि नदी जोड़ो परियोजना के लिए एक विशेष कमेटी का गठन किया जाए।
नदी जोड़ो परियोजना के समर्थकों का कहना है कि इस परियोजना से सूखा और बाढ़ की संभावना कम हो जाएंगी। बहुत सारी छोटी और मंझली नदियां एक दूसरे के करीब हैं, जिनको आसानी से जोड़ा जा सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे नकारते हैं। उनका कहना है कि इतनी विशालकाय परियोजना को पर्यावरण की दृष्टि से नहीं देखा गया। इससे पर्यावरण को खतरा पैदा होने की आशंका है। इससे गम्भीर स्थिति पैदा होगी। नदी जोड़ो परियोजना को लेकर कानूनी लड़ाई के अलावा राजनीतिक खेमाबन्दी भी हो गई है। लालकृष्ण आडवाणी सरकार पर छींटाकशी करते हुए कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की राय के बावजूद सरकार इस परियोजना को लागू करने में ढि़लाई बरत रही है।
इतिहास योजना की
नदियों को जोडऩे के बारे में अगर हम इतिहास की ओर नजर डालें तो पाएंगे कि 1972 में तत्कालीन सिंचाई मंत्री के. एल. राव ने 2640 कि.मी. लम्बाई तक गंगा और कावेरी को जोडऩे का एक प्रस्ताव रखा था। 1974 में ‘गालैंड कैनाल्य के नाम से एक और नदी जोड़ो परियोजना का प्रस्ताव भी आया था। 1982 में
राष्ट्रीय जल विकास संस्था की तरफ से परियोजना की व्यावहारिकता को लेकर सर्वेक्षण किया गया। नदी जोड़ो परियोजना तब प्रकाश में आईए जब 14 अगस्त 2002 में स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर देश को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि भारत के कई राज्य सूखे की चपेट में रहते हैं, तो कई राज्य बाढ़ के थपेड़ों से बह जाते हैं। इस प्राकृतिक आपदा का कोई निदान निकाला जा सकता है या नहीं। राष्ट्रपति के इस अभिभाषण पर कानूनविद् रंजीत कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.एन. कृपाल ने कहा कि देश में नदियों को जोड़ा जाना चाहिए, ताकि जनता को सूखे व बाढ़ जैसी आपदा से बचाया जा सके। उन्होंने परियोजना को दस साल के अन्दर यानी 2012 तक लागू करने का निर्देश दिया। वाजपेयी सरकार ने पूर्व ऊर्जा मन्त्री सुरेश प्रभु को इस परियोजना को लागू कराने का दायित्व सौंपा और मई 2016 तक यह काम पूरा कर लेने के निर्देश दिए थे। प्रधानमंत्री वाजपेयी अपनी स्वर्ण चतुर्भुज राजमार्ग परियोजना से इतने उत्साहित थे कि उन्होंने नदी जोड़ो परियोजना को व्यक्तिगत समर्थन दिया।

सुरेश प्रभु का कहना था कि लगभग सारे मुख्यमंत्रियों ने इस प्रकल्प को हरी झंडी दे दी है। 2003 में केरल, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, पंजाब, छत्तीसगढ़ एवं गोवा ने इस परियोजना का विरोध किया। उधर गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और महाराष्ट्र ने सशर्त समर्थन की बात कही थी। केवल हरियाणा और तमिलनाडु इस परियोजना को बिना शर्त समर्थन देने को तैयार थे। शुरू में इस परियोजना का खर्च 5.6 लाख करोड़ आंका गया। बाद में गठित टास्क फोर्स ने कहा कि इसमें खर्च बहुत ज्यादा होगा। इसके साथ भारत की पर्यावरण व्यवस्था जुड़ी हुई है। इस योजना के कारण जो विस्थापित होंगे, उनको पुन: स्थापित करना पड़ेगा। अक्टूबर 2009 में यू.पी.ए. सरकार ने इस परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। तत्कालीन पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश के अनुसार यह परियोजना व्यावहारिक नहीं है। नदियों को प्राकृतिक रुप से नहीं जोड़ा जा सकता, इससे पर्यावरण को बहुत क्षति पहुंचेगी और पर्यावरण के नष्ट होने की पूरी सम्भावना है। उन्होंने कहा कि केवल छोटी नदी बेसिनों को जोडऩे का काम चालू रहेगा।

वाजपेयी सरकार की तरफ से इस परियोजना को लेकर टॉस्क फोर्स का गठन किया गया था। उसने पहले 14 नदियों को चिन्हित किया। जिनमें कोसी-घाघरा, कोसी-मैच, घाघरा-यमुना, गंडक-गंगा, फरक्का-सुन्दरबन, ब्रम्हपुत्र-गंगा-सुवर्ण रेखा-महानदी और गंगा-दामोदर-सुवर्ण रेखा आदि शामिल हंै। सुरेश प्रभु का कहना था कि करीब 100 साल से मल्लापुरम बांध और कावेरी को लेकर तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के बीच संघर्ष चला आ रहा है। इस योजना से इस झगड़े का समाधान हो जायेगा।

कावेरी के जल बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच तू-तू मैं-मैं है सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया। इस मुद्दे पर चुनाव भी लड़े गए। रावि और व्यास के पानी को लेकर पंजाब और हरियाणा और गंगा के पानी को लेकर भारत और बंगलादेश के बीच तनातनी है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमन्त्री ममता बैनर्जी तीस्ता जल बंटवारे को लेकर प्रधानमंत्री से ही रुठ गईं। जल राजनीति के चलते अंतर्राज्यीय सम्बन्ध प्रभावित होते हैं, वैसे ही अन्र्तराष्ट्रीय राजनीति भी प्रभावित होती है। भारत को चीन, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के साथ इस विवाद को सुलझाना पड़ता है।

आठ हैं मालिक
अगर ऐसा ही चलता रहा तो 2020 आते-आते जनता को पीने के पानी के लिए राशन कार्ड बनवाना पड़ेगा, नहीं तो कोका कोला और पेप्सी से ही प्यास बुझानी मजबूरी हो जाएगी। संविधान में पानी को राज्यों के अधिकार क्षेत्र में रखा गया है, पर देखा जाए तो असल में इसकी कुंजी केन्द्र के पास है।
हमारे देश की जलनीति आज इसी लिए खटाई में हैं, क्योंकि पानी का सुचारु रुप से संचालन करने के लिए आठ-आठ संस्थाओं पर निर्भर करना पड़ता है। जल नीति में ढ़ांचागत परिवर्तन जरूरी हो गया है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नई जलनीति की घोषणा करते हुए कहा था कि नई नीति के अनुसार देशवासियों का इस पर पूरा अधिकार है। जनता ही जल की मालिक है। इस घोषणा के बाद देखा गया कि कुछ राज्य सरकारों ने पानी का निजीकरण शुरु कर दिया।

छत्तीसगढ़ में पानी सुचारु रुप से सप्लाई करने के लिए एक छोटी नदी शिवनाथ को निजी संस्था के हाथ में दे दिया गया। ऐसा देश में पहली बार हुआ था। जनता को बेरोकटोक सस्ती दरों पर पानी मिलने की आस बंधी थी, पर निजीकरण की नीति ने जनता की मुश्किलें और बढ़ा दीं। केरल की सरकार ने भूजल को विदेशों के हाथ बेचने का फैसला कर लिया। ‘भूजल किसके लिए है और किसको इसका सुख भोगना है, कौन इसका मालिक है’ यह नीति में न लिखे होने के कारण जल प्रशासन ने लूट मार करने के लिए विदेशी विनियोग को खुली छूट दे दी।
अटल बिहारी वाजपेयी ने बताते हुए कहा था कि जल हमारी जीवन रेखा है। हमारे गांव देहात के लोगों का जीना मरना इस पर निर्भर है। देश की अर्थ-व्यवस्था कमोवेश हमारे जल संसाधनों पर टिकी है। वाजपेयी सरकार के बाद आजतक जल के मालिकाना हक की निर्दिष्ट व्याख्या नहीं की गई है । भारत के जल संसाधन दो-राहे पर खड़ा है। प्रश्न
उठता है कि अगर जल देश की सम्पत्ति है तो इसका हक जनता को मिलनी चाहिए। आज जल के निजीकरण को लेकर विश्व के बहुत से देशों में गृहयुद्ध की स्थिति बनी हुई है। वोलीबिया, फिलिपीन्स, पैरागु, अर्जेन्टीना और घाना में जनता को पानी से महरुम करने के कारण जनता का विरोध जारी है।

प्रस्तुति: उदय इंडिया ब्यूरो

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