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हास्य व्यंग्य के माहिर थे अल्हड़ बीकानेरी

हरियाणा के रेवाड़ी जिले के बीकानेर गांव में 17 मई,1937 को जन्मे प्रख्यात हास्य कवि अल्हड़ बीकानेरी की विशेषता थी कि वह अपनी छंद में हर कविता लिखते थे और कवि सम्मेलनों के मंचों पर उसे गाकर पढ़ते थे। हास्य को गेय बनाने की परम्परा की शुरूआत करने वाले, छंद, गीत, गजल और पैराडियों के रचयिता अल्हड़ जी अनूठे कवि थे। गजल का सम्पूर्ण व्याकरण अल्हड़ जी के रोम-रोम में बसा था। यदि किसी रचनाकार के शेर में जरा भी कोई शब्द इधर-उधर हो जाता तो अल्हड़ जी के कान तुरंत ही खड़े हो जाते थे। उनकी इसी सिद्धि की वजह से देश के अनेक बड़े-बड़े ख्याति प्राप्त कवि और शायर उनसे सलाह लेने के लिए लालायित रहते थे।

अल्हड़ जी ने अपनी हास्य कविताओं के माध्यम से मध्यम वर्ग की जीवन शैली और सामाजिक व राजनैतिक विसंगतियों पर तीखे प्रहार किये। अल्हड़ बीकानेरी ने हास्य-व्यंग्य कवितायें न सिर्फ हिन्दी बल्कि ऊर्दू, हरियाणवी और संस्कृत भाषाओं में भी लिखीं जो कवि-सम्मेलनों में अत्यंत लोकप्रिय हुईं। उनकी कविता ‘दाता एक राम’ हिन्दी कवि सम्मेलनों के इतिहास में एक मील का पत्थर सिद्घ हुई अल्हड़ जी जब इस कविता का पाठ करते थे तो वातावरण इतना गम्भीर और संवेदनशील हो जाता था कि प्राय: इस कविता का पश्चात् मंच पर मौजूद कोई भी अन्य धुरन्धर कवि काव्य पाठ करने का साहस

नहीं जुटा पाता था। सामान्यत: इस कविता के काव्य पाठ के साथ ही कवि सम्मेलन का समापन ही हो जाता था। इस कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं:
पाप-पुण्य है कत्था-चूना
परम पिता-पनवाड़ी
पनवाड़ी की इस दुकान को
घेरे खड़े अनाड़ी
काल है सरौता, सुपारी सारी दुनिया
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया
अल्हड़ जी की कविता अनपढ़ धन्नो और हास्य-कव्वाली ,मत पूछिये फुर्सत की घडिय़ां हम कैसे गुजारा करते हैं्य, ने कवि-सम्मेलनों के मंचों पर लोकप्रियता के नये कीर्तिमान स्थापित किये।
अल्हड़ जी की हास्य कव्वाली का एक अंश यहां प्रस्तुत है:
सामने लाल छड़ी हो तो गजल होती है
जुल्फ गालों पे पड़ी हो तो गजल होती है
‘फेस्य को मोड़ के, कॉलिज की हसीना कोई
बस की लाइन में खड़ी हो तो गजल होती है
तीस तारीख को, पिक्चर के लिए जब मैडम
एकदम जिद पे अड़ी हों तो गजल होती है
दो दिलों का जो खटोला नहीं बिछने देते
खाट ऐसों की खड़ी हो तो गजल होती है
मुंह के अंदर हों ठुंसे, मुंगफली के दाने
आंख छिलकों पे गड़ी हो तो गजल होती है,
रात-दिन होती रहे ठाठ से ‘इनकम’ लेकिन
टैक्स भरने की घड़ी हो तो गजल होती है
दौर हो रम का, लबों से हो लगा पैमाना
आंख साकी से लड़ी हो तो गजल होती है
अपने दूल्हे से, कोई शोख नवेली दुलहिन
पूरे दस साल बड़ी हो तो गजल होती है
अल्हड़ जी का असली नाम श्याम लाल शर्मा था। दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित जी.पी.ओ. पोस्ट ऑफिस से उन्होंने डाक तार विभाग की नौकरी शुरू की। इसी दौरान उनका सम्पर्क दिल्ली के मशहूर कव्वाल श्री नहीफ देहलवी से हुआ और उन्होंने 1962 से माहिर बीकानेरी उपनाम से ऊर्दू में गज़लें लिखनी शुरू कीं। सन् 1968 की बात है कि दिल्ली के शक्ति नगर में एक कवि-सम्मेलन में वह भी गये थे। कवि सम्मेलन में हास्य कवि काका हाथरसी की फुलझडिय़ां सुन कर वह अत्यन्त प्रभावित हुए। यही वह घटना थी, जिसने उन्हें माहिर बीकानेरी से अल्हड़ बीकानेरी बना दिया उसी के बाद उन्होंने में हिन्दी में हास्य कविता, लिखनी शुरू कीं।

सन् 1970 आते-आते अल्हड़ जी देश में लोकप्रिय हास्य कवि के रूप में प्रतिष्ठिड्ढत हो गये। गोपाल प्रसाद व्यास उनके काव्य गुरू थे। अल्हड़ जी की कवितायें लोट पोट, दीवाना तेज, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादम्बिनी और धर्मयुग जैसी पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रही।

अल्हड़ जी को ठिठोली पुरस्कार, काका हाथरसी पुरस्कार, टेपा सम्मान, हरियाणा गौरव सम्मान आदि पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। अल्हड़ जी की प्रकाशित पुस्तकें हैं – भज प्यारे तू सीताराम, घाट-घाट घूमे, अभी हंसता हूं, अब तो आंसू पोंछ, भैंसा पीवे सोमरस, ठाठ गजल के, रेत पर जहाज, अनछुए हाथ, खोल न देना द्वार, जय मैडम की बोल रे, बैस्ट ऑफ अल्हड़ बीकानेरी और मन मस्त हुआ।

वर्ष 2009 के जून मास में काल ने हरियाणा में जन्मे देश के हास्य व्यंग्य के दो प्रख्यात कवियों -ओम प्रकाश आदित्य और अल्हड़ बीकानेरी को हमसे छीन लिया। कविता के क्षेत्र मे ओम प्रकाश आदित्य और अल्हड़ बीकानेरी के विशिष्टड्ढ योगदान और उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने तथा हास्य-व्यंग्य कविता को बढ़ावा देने के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी ने वर्ष 2010 से आदित्य-अल्हड़ हास्य सम्म्मान पुरस्कार शुरू किया है। आदित्य-अल्हड़ हास्य सम्मान से के.पी. सक्सेना और माणिक वर्मा को सम्मानित किया जा चुका है। इस वर्ष यह सम्मान वयोवृद्ध हास्य कवि जैमिनी हरियाणावी को दिया जाएगा।

हाल ही में ‘सब टी.वी. के कार्यक्रम ‘वाह वाह क्या बात है’ के एक विशेष एपिसोड मे हास्य कविता के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए अल्हड़ बीकानेरी को मरणोपरान्त सम्मानित किया गया है। आज अल्हड़ जी सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका लेखन और उनकी कविता, समाज को हमेशा नयी सोच और दिशा प्रदान करती रहेंगी।

(लेखक अल्हड़ बीकानेरी के ज्येष्ठ पुत्र है)

अशोक शर्मा

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