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नवाज शरीफ की वापसी पर भारत परेशान क्यों हो?

वर्तमान में पाकिस्तान के पास शायद ही इतनी विदेशी मुद्रा रिजर्व है, जिससे एक महीने के आयात का भुगतान किया जा सके। अगर भारत सैनिक अभियान के माध्यम से पाकिस्तान को मुश्किल में डालकर उसके लिए समस्या पैदा करना चाहता है, तो इसके लिए ये उपयुक्त समय है। ये अलग मुद्दा है कि भारत ऐसा सैनिक हस्तक्षेप नहीं करेगा और न ही करना चाहिए।
पाकिस्तान में 11 मई 2013 को हुए आम चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु उसके परिणाम नहीं, बल्कि वहां चुनाव का होना है। समान रुप से यह भी महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तानी सेना ने देश में चुनाव होने दिए, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया को अपना समर्थन भी दिया।

एक बार चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो किसी न किसी को जीतना होता है और किसी को हारना। जहां तक भारत का संबंध है, पाकिस्तान में हुए इस चुनाव के परिणाम को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

14 साल के लंबे अंतराल के बाद नवाज शरीफ ने इस अस्थिर देश में तीसरी बार प्रधानमंत्री के रुप में वापसी की है।

भारत को वहां की स्थिति पर पैनी नजर रखते हुए यह देखना है कि ऐसे समय में पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री देश के लिए क्या करते हैं, जब आर्थिक संकट पाकिस्तान के लिए अस्तित्व का संकट बन चुका है। पाकिस्तान को एक देश के रुप में अपने अस्तित्व को बरकरार रखना है। यदि ऐसा होता है, तो वहां की अर्थव्यवस्था दीवालियेपन की वर्तमान स्थिति से बाहर आ जाएगी।
वर्तमान में पाकिस्तान के पास शायद ही इतनी विदेशी मुद्रा रिजर्व है, जिससे एक महीने के आयात का भुगतान किया जा सके। अगर भारत सैनिक अभियान के माध्यम से पाकिस्तान को मुश्किल में डालकर उसके लिए समस्या पैदा करना चाहता है, तो इसके लिए ये उपयुक्त समय है। ये अलग मुद्दा है कि भारत ऐसा सैनिक हस्तक्षेप नहीं करेगा और न ही करना चाहिए।

खुद को मजबूत करने से पहले शरीफ को घरेलू स्तर पर बहुत काम करने की जरुरत है। जैसा की भारत के मामले में उन्होंने चुनाव से पहले कहा था। चुनाव परिणामों ने उन्हें पाकिस्तान का अगला प्रधानमंत्री बनाया। उन्हें भारत के साथ संबंधों को बहाल करना होगा, भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देने का वादा और 2008 में मुंबई हमले के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई सहित कारगिल के खट्टे अनुभवों को दूर रखना होगा।
पाकिस्तान में दो बार पहले चुने जाने के दौरान भी शरीफ ने कुछ ऐसा ही बयान दिया था। 2008 में जब आसिफ अली जारदारी सत्ता में आए थे, तब उन्होंने भी कुछ ऐसा ही कहा था। लेकिन जारदारी के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद ही शक्तिशाली पाकिस्तानी सेना द्वारा प्रायोजित भारत में 9/11 की घटना को मुंबई में अंजाम दिया गया।

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत इस बात पर पूरी निगाह रखे हुए है कि पाकिस्तान में नवाज शरीफ का नया शासन कैसा होगा। हालांकि इसमें कम से कम छह महीने का समय लगेगा। ताकि शरीफ इतने सक्षम हो जाएं कि घरेलू दबावों का निवारण और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का उपचार कर सकें। तब तक भारत खुद आमचुनाव के दहलीज पर होगा। ऐसे में अगले साल से पहले शायद ही भारत और पाकिस्तान के बीच भावपूर्ण और ठोस बातचीत की कोई संभावना हो। हालांकि इन दो देशों के नेता कई महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में अन्य देशों में मिलते रहेंगे।

यह इस संभावना के विपरीत है कि आगरा शिखर-वार्ता की तरह की अन्य नीतियों को विदेश नीति के रुप में भविष्य में शामिल करने की संभावना पर भारत को ज्यादा चिंतित होने की जरुरत नहीं है। सच्चाई यह है कि इस तरह का परिदृश्य दुबारा बनने की संभावना कम ही है।

जरुरत है कि भारत इन बिंदुओं पर गहरी निगाह रखे: शरीफ का प्रदर्शन एक सभ्य देश के रुप में पाकिस्तान का प्रदर्शन विशेष रुप से पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी का आचरण और सामान्य रुप से पाकिस्तानी सेना का व्यवहार पूर्व सैनिक तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ का व्यवहार और उनके आस-पास घट रही घटनाओं पर नजर, खासकर मुशर्रफ के प्रति नवाज शरीफ की योजनाएं।

अगले कुछ महीनों में होने वाली पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख की नियुक्ति। देश में स्थित आतंकी ढांचों से निबटना और देश के परमाणु हथियारों को जिहादियों के हाथों में जाने से रोकना।

शरीफ शायद ही इस स्थिति में हो कि वो अपने पुराने दुश्मनों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से बढ़त हासिल करने की होड़ लें। अंतिम सांसें गिन रही अर्थव्यवस्था को इस समय जीवन देने के बजाय शायद ही उनके पास इतना समय होगा कि इन मुद्दों को प्राथमिकता दें। उन्हें ब्लादिमीर पुतिन बनना होगा और पाकिस्तान के लिए वही करना होगा जो रुस के लिए पुतिन ने 9 अगस्त 1999 में सत्ता संभालने के बाद किया था।

छह बिंदुओं को अगर शरीफ अगले छह महीने से एक साल के अंदर संतोषजनक ढंग से संभालने में समर्थ होते हैं, तब अपने पड़ोसियों की तरफ ध्यान दे सकते हैं।

यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि दलदल में धंसे पाकिस्तान को बाहर निकालने वाले नेता के रुप में खुद को पुनस्र्थापित और पुनर्निर्माण में नवाज शरीफ ज्यादा ध्यान देंगे। ऐसे में पाकिस्तानी सेना का आचार और व्यवहार दोनों महत्वपूर्ण होगा।

जनरल कयानी पहले ही देश के राजनीतिक मामलों में दखलअंदाजी करने में अपनी बेरुखी जाहिर कर चुके हैं। यदि वह दखलअंदाजी करना चाहते तो अब कर चुके होते। सैन्य प्रमुख के रुप में कयानी का कार्यकाल अब छह महीने से कम रह गया है। आने वाले कुछ महीनों में वह सिर्फ नाममात्र के सैन्य प्रमुख रह जाएंगे।

नवाज शरीफ के पास अगले कुछ महीनों में नए सैन्य प्रमुख को नियुक्त करने की खुशी और विशेषाधिकार दोनों होगा। लेकिन यहां उन्हें विशेष रुप से सावधान और व्यवहारिक होना होगा। अंतत: मुशर्रफ भी सैन्य प्रमुख के रुप में उनके द्वारा ही नियुक्त गए थे, जिन्होंने 12 अक्टूबर 1999 को अपने ही नियोक्ता के विरोध में रक्तहीन तख्ता पलटने का उदाहरण पेश किया था। स्वभाविक है कि शरीफ अपनी पुरानी गलती को दोहराने की गलती नहीं करेंगे।

राजीव शर्मा

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