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ओडिशा के प्रख्यात सिरुली महावीर

एक किंवदंती के अनुसार भगवान जगन्नाथ ने अपने प्रहरी के रुप में महावीरजी को पुरी धाम के मंदिर में आसीन किया था। महावीर जी रात में बहुत खरार्टे लेते थे। जिसके कारण माता लक्ष्मी सो नहीं पातीं थीं। ऐसे में माता लक्ष्मी ने जगन्नाथजी से शिकायत की कि वे अपने प्रहरी महावीरजी को जल्द से जल्द वहां से हटायें। कहते हैं कि जगन्नाथजी के आदेशानुसार महावीरजी पुरी से सिरुली गांव आये और आज भी वहीं पर हैं।
ओडिशा प्रदेश आर्यावर्त का सांस्कृतिक केन्द्र बिंदु है, जिसे महाप्रभु जगन्नाथजी का देश कहा जाता है। स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण और मत्स्य पुराण में इसकी विस्तृत चर्चा है। महाभारत एवं रामायण में भी जगन्नाथजी और उत्कल का जिक्र आया है। सनातनी परंपरा के आधार पर ओडिशा के कुल चार तीर्थ क्षेत्र हैं: शंख, चक्र, गदा और पद्म क्षेत्र। पुरी धाम को शंख क्षेत्र, भुवनेश्वर को चक्र क्षेत्र, जाजपुर को गदा क्षेत्र और कोणार्क को पद्म क्षेत्र माना जाता है। ओडिशा में सैकड़ों जगन्नाथ मंदिर, शिव मंदिर, देवी मंदिर और
हनुमान मंदिर हैं। पुरी धाम का सिद्ध हनुमान मंदिर, कटक का पंचमुखी हनुमान मंदिर और चंदनपुर के समीप सिरुली गांव का महावीर मंदिर भक्तों की आस्था और विश्वास के प्रतीक हैं।

सिरुली महावीर मंदिर ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर पुरी धाम के रास्ते में सिरुली गांव में है । इसीलिए इसे सिरुली महावीर मंदिर के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि इस मंदिर का निर्माण गंग वंश के प्रतापी राजा अनंग भीमदेव तृतीय ने कराया था। एक किंवदंती के अनुसार भगवान जगन्नाथ ने अपने प्रहरी के रुप में महावीरजी को पुरी धाम के मंदिर में आसीन किया था। महावीर जी रात में बहुत खरार्टे लेते थे। जिसके कारण माता लक्ष्मी सो नहीं पातीं थीं। ऐसे में माता लक्ष्मी ने जगन्नाथजी से शिकायत की कि वे अपने प्रहरी महावीरजी को जल्द से जल्द वहां से हटायें। कहते हैं कि जगन्नाथजी के आदेशानुसार महावीरजी पुरी से सिरुली गांव आये और आज भी वहीं पर हैं। महावीर जी जब सिरुली आ रहे थे, तब रास्ते में एक किसान अपने खेत में हल चला रहा था, जिसकी तेज फाल से महावीर जी की लंबी पूंछ कट गई और देखते ही देखते वह किसान बेहोश हो गया। जब उसे होश आया तो उसने यह संकल्प लिया कि वह अपने गांव सिरुली में महावीर जी का मंदिर बनाएगा और उसीने सिरुली में महावीर मंदिर बनवाया।

एक भक्त आज से करीब 19 साल पूर्व महावीरजी के दर्शन के लिए सिरुली पहुंचा, वहां के टूटे मंदिर को देखकर उसने नये सिरे से मंदिर बनाने का संकल्प लिया। कुल 27 लाख रुपये की

लागत से करीब 8 सालों के भीतर उसने मंदिर की बाहरी और भीतरी दीवारों सहित प्रांगण को नया बनवा दिया।
आज सिरुली महावीर मंदिर में मकर संक्राति, रामनवमी और डोलपूर्णिमा के अवसर पर लाखों भक्त सिरुली आते हैं और भगवान महावीरजी के दर्शन करते हैं। प्रसाद के रुप में चूड़ा घसा और एण्डूरी पीठा बड़े चाव से ग्रहण करते हैं। इस मंदिर में अनेक पुजारी हैं जो पुरी धाम के मंदिर की रीति-नीति की तरह ही महावीरजी की नित्य पूजा करते हैं। यहां एक तालाब है, जिसे अंजनी तालाब कहा जाता है। इस तालाब में महावीरजी भगवान जगन्नाथ की 21 दिवसीय चंदनयात्रा की तरह ही नौका विहार करते हैं। उस मंदिर में गणेश,
महिषासुरमर्दिनी दुर्गा, शिवलिंग और नंदी बैल की प्रस्तर की मूर्तियां हैं। महावीरजी की मूर्ति काले प्रस्तर से बनी है। दीवारों पर नवग्रह की खुदाई की गई है। प्रवेश द्वार पर प्रस्तर के दो सिंह दोनों तरफ खड़े हैं। प्रकृति के खुले और सुरम्य वातावरण में अवस्थित यह महावीर मंदिर अब पूरे भारत के महावीर भक्तों की आस्था और विश्वास का प्रतीक बन चुका है, जहां हर दिन देश-विदेश से आने वाले भक्तों का तांता लगा रहता है। मंगलवार और शनिवार के दिन हजारों की संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते है और अपनी मनोकामना की पूर्ति करते हैं।

अशोक पाण्डेय पुरी से

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