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कुछ काम बाकी है…हमने जो किया वह मौन क्रांति है: मनीष तिवारी

बोझ के बंटवारे का सिद्धांत सरकार, प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बीच साफ तौर परिभाषित है। हमारी पार्टी एक मिसाल है। जिसमें नेतृत्व पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है, अपने कार्यक्रमों एवं नीतियों पर लोगों से प्रभावी संवाद की व्यवस्था है। हम इस बात से सहमत नहीं हैं कि प्रधानमंत्री की विश्वासनीयता कम हो रही है। प्रधानमंत्री एक सम्मानित व्यक्ति हैं और कितना भी कीचड़ उछाला जाय, कटाक्ष किया जाय या अटकलें लगाईं जाएं, हकीकत से मुंह नहीं मोड़ ा जा सकता। मनीष तिवारी से सरोज नागी की एक विशेष साक्षात्कार का कुछ अंश:
लोकसभा चुनाव से आगे बढ़कर सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी के पास सरकार की छवि को सुधारने का चुनौतीपूर्ण कार्य है, जो आंशिक रुप से महंगाई, भ्रष्टाचार, अर्थव्यवस्था में गिरावट, आंतरिक सुरक्षा और विदेश नीति में खामियों के विपक्षी दल के आरोपों से बनी है। पढि़ए कांग्रेस नेता एवं मंत्री मनीष तिवारी से सरोज नागी की बातचीत के कुछ अंश:

सरकार की उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाने के लिए मल्टी-मीडिया का सहारा लेने के बाद, आपका अगला कदम क्या होगा।

और हमलोग लोगों को बताने की कोशिश कर रहे हैं कि पिछले नौ सालों में चीजें कैसे बदली हैं। सूचना का प्रसार भी हमारे कार्य का एक हिस्सा है। और हम सब इस कार्य को भलीभांति कर रहे हैं।

अगले वर्ष आम चुनाव है यूपीए-2 के दौरान किए गए वादों को पूरा करना कितना कठिन है।

अभी बहुत काम करना बाकी हैं। जैसे खाद्य सुरक्षा बिल, प्रत्यक्ष फायदों को संस्थागत रुप देना और आश्रय का अधिकार। भूमि अधिग्रहण बिल सहित कुछ ऐसे काम भी हैं जो अभी विचाराधीन हैं।

हम उम्मीद करते हैं कि संसद के मानसून सत्र में विपक्ष उन कार्यो को निबटाने में हमारी मदद करेगा। लेकिन चुनाव को देखते हुए विपक्ष इसमें बाधा उत्पन्न करता है, ऐसी स्थिति में सरकार के पास सभी विकल्प खुले हैं।

तो आपने लोगों से जो वादा किया है, उसे जारी रखेंगे।

देश भर में लोगों के सशक्तिकरण और जीविकोपार्जन के लिए जो काम हमने किया है वह मौन क्रांति है। ऐसे बहुत से काम हमने किये हैं। हम पिछले नौ सालों में यूपीए शासन के दौरान, देश की विकास यात्रा के क्रम जो कुछ भी हमने किया है, उसे लोगों के सामने समग्र रुप से प्रस्तुत करना चाहिए।

आप यूपीए-1 को यूपीए-2 से जोड़ रहे हैं, जिससे यूपीए-2 की नाकामियों को छिपाया जा सके?

इसे अबाध क्रम में देखा जाना चाहिए। क्योंकि समान लोगों के लिए उसी सरकार की समान जनादेश पर आधारित है। हमारे कामों का असर अगले पांच सालों में देखने को मिलेगा।

लेकिन यूपीए.2 में पहले जैसा उत्साह नहीं दिख रहा..

किसी सरकार को पांच आधारों पर मापना चाहिए- राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक एकजुटता, आर्थिक विकास, आंतरिक सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय संबंध। इन सभी मानदंडों के आधार पर अगर आप पिछले नौ सालों के शासन पर नजर डालें तो यूपीए ने बेहतर काम किया है।

2009 में मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के टीम पर गरीबों, युवाओं और मध्यम वर्ग के लोगों का अटूट विश्वास था। लेकिन वो विश्वास अब नहीं दिख रहा है ?

बोझ के बंटवारे का सिद्धांत सरकार, प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बीच साफ तौर परिभाषित है। हमारी पार्टी एक मिसाल है। जिसमें नेतृत्व पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है, अपने कार्यक्रमों एवं नीतियों पर लोगों से प्रभावी संवाद की व्यवस्था है।

हम इस बात से सहमत नहीं हैं कि प्रधानमंत्री की विश्वासनीयता कम हो रही है। प्रधानमंत्री एक सम्मानित व्यक्ति हैं और कितना भी कीचड़ उछाला जाय, कटाक्ष किया जाय या अटकलें लगाईं जाएं, हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

कर्नाटक में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बीजेपी की हार से, केन्द्र में कांग्रेस भी भयभीत है?

हमें वास्तविकता और अफवाह में अंतर समझने की जरुरत है। सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का प्रारंभिक आरोप सीएजी के रिपोर्ट पर आधारित है। कैर्न – वेदांता मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि सीएजी की रिपोर्ट अंतिम सच्चाई नहीं है। अत: हमें कर्नाटक मामला और पिछले तीन सालों में जो कुछ आरोप लगे और उसके क्या परिणाम आए, उसमें भेद करने की जरुरत है। हमें जनता पर पूरा विश्वास है कि वह सही और गलत के फर्क को आसानी से समझेगी।

भ्रष्टाचार के लगातार आरोपों ने सरकार की छवि को धूमिल किया है। पहले भी बोफोर्स घोटाले से घिरी सरकार ने सत्ता खो दी थी और सांप्रदायिक कार्ड खेलने के बाद सत्ता में वापसी हुई थी।

कभी-कभी व्यंग्य और आरोपों का असर वास्तविकता पर भारी पड़ जाता है। 1989 में पूरा राजनीतिक अभियान ही बोफोसज़् घोटाले के आरोप के इर्द-गिर्द घूम रहा था। यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि 14 साल के लंबे समय के बाद 2004 में दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि इस आरोप में एक भी सबूत नहीं हैं और करोड़ों रुपये व्यर्थ जांच में फूंक दिए गए। तब केन्द्र में एनडीए की सरकार थी और सरकार में इतनी साहस नहीं थी कि इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे। यही वास्तविकता है। उम्मीद है कि जनता इसे एक राजनीतिक नाटक के रुप में देखेगी जिसे भाजपा कल्पना से वास्तविकता में बदलना चाहती है।

जहां तक आरोपों की बात है, मेरा मानना है कि इसका निर्णय कोर्ट को करने देना चाहिए। विभिन्न तरह के मामले हैं, जो कि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से अपना रास्ता तय कर रहे हैं। मेरे ज्यादातर सहकर्मियों का मानना है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया। हमें न्यायालय के निर्णय का इंतजार करना चाहिए।

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