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धूंआ और चिंगारी

अभी 2014 नहीं आया है लेकिन देश में आम चुनावों की चर्चा काफी जोर शोर से चल रही है। आम आदमी का ड्राईंगरूम हो या दफ्तर की कैंटीन, पनवाड़ी हो या चायवाले का ठीया, चर्चा में सवाल एक ही होता है, इस बार कौन? वैसे बगैर चिंगारी के धूंआ नहीं निकलता। आम आदमी की चर्चाओं के बीच यदि चुनावों का धुंआ उठता दिखाई दे रहा है तो निश्चित रूप से कहीं न कहीं चिंगारी तो होगी! खोजा तो चिंगारी 24अकबर रोड और 11 अशोका रोड पर सुलगती मिली। एक के बाद एक घोटाले सामने आने लगे। पवन बंसल, अश्वनी कुमार जैसे लाडले मंत्रियों के त्यागपत्र लेने सुप्रीम कोर्ट की झाड़ खाने के बाद भी जनता के दरबार में जाने के अलावा यूपीए के पास क्या कोई रास्ता बचता है। बीजेपी के पायलट राजनाथ सिंह ने भी बड़े ही जोर शोर से डॉ. मनमोहन ंिसंह को आत्म निरीक्षण करने का सुझाव देते हुए सीधे सीधे त्यागपत्र ही मांग लिया है। वैसे भी सिंहासन पर बैठने का जनादेश होता तो पांच साल का है, लेकिन सत्ता के गलियारों में पहुंचने के बाद कुछ ऐसी हवा लग जाती है कि या तो प्रमोद महाजन की तरह एनडीए को अगले पांच साल फिर देने का अति आत्मविश्वास आ जाता है या फिर अपनी बोरियां भरने की जल्दी में घोटालों के खेल शुरू हो जाते हैं और समय से पहले ही जनता के दरबार का दरवाजा खटखटाना पड़ जाता है।
सौ ही क्यों?
लगता है इस बार कांग्रेस हारने वाली सीटों पर अलग से दांव लगाने की रणनीति पर सोच रही है। यह कोई राजनीतिक विशलेषण नहीं है, बल्कि 24अकबर रोड में कांग्रेस के एक सचिव के विचार पर बना आकलन है। राहुल गांधी की टीम में माने जाने वाले एआईसीसी के इन सचिव का कहना है कि कांग्रेस के युवा कर्णधार राहुल गांधी को सुझाव दिया गया है कि वह देश में ऐसी 100 सीटों का चुनाव करें जिन पर कांग्रेस को अपनी हार पूरी तरह से पक्की लगती है। उन सीटों पर उन जैसे (सचिव जैसे) कांग्रेस के ऐसे निष्ठावान युवा कार्यकर्ताओं को खड़ा किया जाए जो चुनावी जंग में पहली बार ही कूद रहे हों। कांग्रेस जिन सीटों पर खुद को हारा हुआ मान कर चल रही है, उन पर यदि ये नौसिखिया युवा कार्यकर्ता हार भी जाएंगे तो कोई गम नहीं होगा। लेकिन इनमें से कम से कम दस प्रतिशत ऐसे जरूर होंगे जो अगली बार जीतने की सामथ्र्य बटोर लेंगे। लेकिन यह समझ नहीं आया कि राहुल गांधी को सुझाव देने वाले कांग्रेस के ये निष्ठावान युवा कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस की हार की केवल 100सीटों का हिसाब कैसे लगाया। क्या सचिव महोदय कांग्रेस को अगले चुनावों में 543 में से 443 सीटें देने का दिवास्वपन देख रहे हैं। ऐसा ही है तो उन्होंने 100 सीटों पर हार बताने की
कांग्रेस के साथ ज्यादती क्यों की? जितानी ही थी तो सभी 543 सीटें क्यों नहीं जितवा दीं। लडऩे से पहले ही 100 सीटें हरवाना तो उनकी निष्ठा पर ही बड़ा सा प्रश्न चिन्ह लगा देगा।

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