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चुनौती चुनाव की?

गठबंधन के द्वितीय कार्यकाल और साल भर में दिखाने को बहुत कम होने के कारण कॉन्ग्रेस ने यूपी, के पहले और दूसरे कार्यकाल को एकल रुप में पैकेजिंग करने की शुरूआत कर दी है ताकि उपलब्धियों के नाम पर दोनों कार्यकाल के दौरान किए गए कामों को दिखाकर एनडीए से तुलना की जा सके।
कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए-2 अपनी चौथी वर्षगांठ 22 मई को मनाने जा रही है। हालांकि 2004 में सत्ता में आने के बाद उसकी यह नौवीं वर्षगांठ होगी। यूपीए-2 अपनी यह वर्षगांठ तब मना रही है, जब उसके मंत्री और नेता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं। अर्थव्यवस्था में गिरावट और घटती विकास दर लोगों की ऊर्जा और सहनशीलता की परीक्षा ले रही है। सरकार में नीति-निर्धारण करने की क्षमता को लकवा मार गया है। विपक्ष के साथ रिश्तों में गतिरोध ने बजट सत्र के दूसरे चरण को पूरी तरह से ठप कर सरकार को संसद के दोनों के सत्रों को समय से पूर्व ही स्थगित करने पर मजबूर कर दिया।पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी 22 मई को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, यूपीए प्रमुख एवं कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी और गठबंधन के अन्य नेता एकत्र होकर सत्ता में गठबंधन की दूसरी पारी की उपलब्धियों का चौथा और अंतिम
रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत करेंगे। वैसे राजनीतिक गलियारों में कयामत नहीं आई है, लेकिन वातावरण में उदासी जरूर है। अगले आम चुनाव समय पर अप्रैल-मई 2014 में ही हुए तो भी उन चुनावों से पहले बहुत अधिक समय नहीं बचा है। लगता है कि नैतिकता और राजनैतिक अविश्वसनीयता का गंभीर संकट झेल रही मनमोहन सिंह सरकार को समझ नहीं आ रहा कि इन चुनावों से पहले एक साल का जो थोड़ा सा समय बचा है, उसमें वह इन हालातों से कैसे निपट सकेगी।2009 में दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से यूपीए-2 की अब तक की यही कहानी रही है। पार्टी ने पिछले चुनाव में नरेगा (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून, जिस के आगे बाद में महात्मा गांधी का नाम जोड़ कर मनरेगा कर दिया गया), कृषि ऋण माफी और सूचना का अधिकार जैसे जनोन्मुखी और गरीबोन्मुखी एजेंडे के आधार पर कुल 206 सीटें जीती थीं, जो 2004 में जीतीं गईं कुल सीटों के मुकाबले 145 सीटें ज्यादा थीं। इसके अतिरिक्त दुर्जेय त्रिमूर्ति के रूप में मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी को पेश किया गया। इनमें मनमोहन ंिसंह तो मध्यम वर्ग के शुभंकर थे जबकि सोनिया गांधी को वंचितों एवं गरीबों की मसीहा के रूप में प्रचारित किया गया। अमेठी के सांसद राहुल गांधी देश के युवा वर्ग के आइकॉन बने। यह एक तरह का मादक मिश्रण था, जिसने मजबूरी में गठबंधन करने वाली पार्टी को सुनहरे भविष्य का स्वप्न दिखाया कि वह एक दिन अपने बलबूते पर केन्द्र में सरकार का गठन कर सकती है।पस्त और चोटिल
लेकिन कुछ ही दिनों में सारा परिदृश्य बदल गया। 2009 में प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के दो महीनों के भीतर ही वह पाकिस्तान के साथ एक संयुक्तवक्तव्य पर हस्ताक्षर करने के लिए विपक्ष का निशाना बन गए जब उन्होंने पाकिस्तान के साथ समग्र वार्ता प्रक्रिया में आतंकवाद की शर्त को हटा दिया और बयान में बलूचिस्तान का जिक्रकर दिया। उसके बाद तो यह एक सिलसिला ही बन गया।
राष्ट्रमंडल खेल, आदर्श सोसायटी, टू-जी, कोलगेट, स्पेक्ट्रम बैंड, ऑगस्ता वेस्टलैंड और रेलगेट जैसे कई घोटाले उजागर हुए। पी.जे. थामस की मुख्य सतर्कता आयुक्त पद पर नियुक्ति (जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया) और कोलगेट मामले में सीबीआई की रिपोर्ट को कानून मंत्री अश्विनी कुमार द्वारा बदलवाने जैसे मामलों के कई विवादों में सरकार फंसी। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मसले पर सरकार की नीतियों का विरोध करते हुए कई सहयोगी दल यूपीए से अलग हो गए। कुछ दलों ने सरकार पर सांप्रदायिक राजनीति करने के आरोप भी लगाए। यूपीए छोड़ कर जाने वाली पार्टियों के नामों की सूची में तृणमूल कांग्रेस, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन, झारखंड विकास मोर्चा, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया और द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (डीएमके) प्रमुख हैं। डीएमके ने श्रीलंका में तमिलों के खिलाफ मानवाधिकार हनन के मामले में संयुक्त राष्ट्र में सरकार के रुख की वजह से अपना समर्थन
वापस ले लिया। समर्थन वापसी के कारण मंत्रियों के इस्तीफों के अलावा यूपीए-2 के कई मंत्रियों को अनुशुचिता और भ्रष्टाचार में संलिप्तता के कारण भी इस्तीफा देना पड़ा। डीएमके के एण्राजा और दायानिधि मारन सहित कांग्रेस के शशि थरुर, वीरभद्र सिंह और रेलगेट एवं कोलगेट कांड जैसे ताजा घटनाक्रम में अश्विनी कुमार और पवन कुमार बंसल की संलिप्तता उजागर होने पर उन्हें तुरंत अपना सामान समेटना पड़ा। जनलोकपाल बिल को लेकर अण्णा हजारे और अरविंद केजरीवाल का आंदोलन, दिल्ली के पैरामेडिकल कॉलेज के छात्रा के साथ वहशियाना सामूहिक दुष्कर्म के खिलाफ आम लोगों का प्रदर्शन और आंध्र प्रदेश में तेलंगाना की मांग को लेकर प्रदर्शनकारियों ने यूपीए-2 की मुश्किलें और भी बढ़ा दीं। यहां तक कि क्रेडिट रेटिंग में भारत की गिरावट के साथ-साथ सरकार ने उच्च विकास दर की रफ्तार को भी खो दिया, जो सरकार की प्रमुख उपलब्धि के रुप में बताया जाता था। मामला तब और भी बदतर हो गया, जब सरकार के प्रमुख मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच दरार पैदा होने की आंतरिक खबरें आयीं जिसे पार्टी ने खंडन करने से पूर्व विपक्ष की खुशियों तक फोड़ा बनने दिया। ताजा उदाहरण अश्विनी कुमार और पवन कुमार बंसल के त्यागपत्रों का है।
संक्षेप में कहा जाय तो सरकार एक के बाद आए संकटों से घिरी रही। वह घरेलू समस्याओं को भी प्रभावशाली तरीकों से हल कर पाने में असफल रही। सरकार की समस्याओं को भारतीय सीमा में चीन की घुसपैठ और मुंबई आतंकी हमलों के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान के असहयोग ने और भी बढ़ा दिया। यह सरकार आश्चर्यजनक ढंग से इन हालात में जीवनदान पा गई क्योंकि कोई दल समय से पहले चुनाव कराने के पक्ष में नहीं था और मुख्य विपक्षी पार्टी, भाजपा अपनी आंतरिक कलह में व्यस्त थी। इस सब में मनमोहन सिंह सरकार पूरी तरह से पंगु नजर आयी और कभी मनमोहन सिंह सरकार की तारीफ में कसीदे कसने वाली देशी और विदेशी मीडिया ने ही उन्हें ‘डॉ. डू लिटिल’ और
‘अंडरएचीवर’ के रुप में प्रचारित कर दिया। पार्टी के अंदर केन्द्र में नेतृत्व परिवर्तन की अफवाहों ने उस व्यक्ति की छवि और विश्वसनीयता को और गिरा दिया, जिसे सोनिया गांधी ने शीर्ष पद के लिए चुना था।दिखावे में छोटा?
तो क्या सत्ता के पांचवें साल में कदम रख रही यूपीए-2 सरकार के पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जिस पर वह अपनी पीठ थपथपा सके? संसद और विधानसभा में एक-तिहाई सीट महिलाओं के लिए आरक्षित करने वाले महिला आरक्षण बिल को राज्यसभा में 9 मार्च 2010 को पारित कराकर सरकार ने उसके लिए आगे का रास्ता को सुनिश्चित करने की कोशिश की। सरकार इसे लोकसभा में पारित कराने में कठिनाई महसूस कर रही थी जहां विपक्षी दल दलितोंए पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए सब-कोटा की मांग कर रहे थे। सब-कोटा की मांग को लेकर इस बिल के पेश करने पर लोकसभा में जमकर विरोध हुआ था। एक तरफ सरकार ने अगस्त 2009 में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को पारित कराने में सफलता पाई, तो दूसरी तरफ मनरेगा के कार्यक्षेत्र को बढ़ाते हुए सरकारी योजनाओं के लाभान्वितों को समयानुसार और तेज से भुगतान के लिए ‘डायरेक्ट कैश ट्रांसफर्य स्कीम को भी लागू किया।
मल्टी-ब्रांड में एफ.डी.आई. को छोड़ कर अब तक सरकार अन्य किसी प्रमुख या सुधार संबंधी बिल को संसद में पेश करने में सफल नहीं हो पाई है। इसमें बीमा और पेंशन क्षेत्र में एफ.डी.आई. भूमि अधिग्रहण बिल सहित 2009 के आम चुनाव में गेम चेंजर की भूमिका निभाने वाले मनरेगा की तरह ही खाद्य सुरक्षा बिल भी शामिल हैं, जिसके तहत अनुदानित खाद्य अनाजों का सीधा लाभ 75 प्रतिशत ग्रामीण और 50 प्रतिशत शहरी जनता को मिलना है। अब यह जुलाई-अगस्त में होने वाले संसद के मानसून सत्र तक के लिए टल गया है। यह बिल बंसल और अश्विनी प्रकरण में विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग की कालिख को धोने में सहायक हो सकता है। मानसून सत्र में भी यदि दोनों सदन फिरभी ठप रहते हैं तो सरकार के पास इसके लिए अध्यादेश जारी करने का विकल्प है, जिसे अगले छह महीनों तक संसद के अनुमोदन की जरूरत होगी।

गठबंधन का पैकेजिंग
गठबंधन के द्वितीय कार्यकाल और आने वाले साल में पेश करने लायक कुछ खास न होने के कारण, कांग्रेस ने यूपीए के दोनों कार्यकालों की एकल रुप में पैकेजिंग करने की शुरूआत कर दी है ताकि उपलब्धियों के नाम पर दोनों कार्यकाल के दौरान किए गए कामों को दिखाकर यूपीए-1 और 2009 के बाद के कार्यकाल को चमकाया जा सके और 2004 में सत्ता से हटाए गए एनडीए से तुलना की जा सके। सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने यूपीए के दोनों कार्यकालों की बात करते हुए कहा भी कि ‘हम इसे निरंतरता के रूप में देखते हैं।
यूपीए-1 और यूपीए-2 के उपलब्धियों को मिलाना, शायद सत्ता पक्ष द्वारा दो संस्करणों को तुलनात्मक रूप से कमजोर करना था। इसमें कोई शक नहीं है कि किए गए काम के मामले में यूपीए-2 को बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए से पीछे रहने की कमी को छिपाने के लिए ही यूपीए-1 के ट्रैक रिकॉर्ड का सहारा लिए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं। तब यूपीए-1 ने अपनी वैचारिक चमक से वामदलों जैसी गठबंधन के बाहर की पार्टियों का भी 2008 तक समर्थन हासिल किया था। उस समय गांधी परिवार ने भी समेकित विकास, शासन में भागीदारी और आम आदमी पर जोर दिया था। सरकार की तरफ से 22 मई को दो रिपोर्ट जारी करने की उम्मीद की जा रही है-पहला एक साल का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड और दूसरा यूपीए सरकार के प्रदर्शन को दिखाता कुल नौ सालों का संयुक्त रिपोर्ट कार्ड हो सकता है। उसी दौरान यूपीए-2 की छवि को सुधारने के लिए तीव्र अभियान की शुरुआत होने की भी उम्मीद है। यूपीए की उपलब्धियां शानदार ढंग से जनता के समक्ष पेश करने के लिए फरवरी 2014 तक ताबड़तोड़ विज्ञापनों पर 180 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की संभावना है।

इसकी शुरूआत मल्टी-मीडिया अभियान के जरिए शिक्षा, सड़क, दूरसंचार, मध्याह्न भोजन सहित समेकित विकास की अन्य योजनाओं एवं सरकार में भागीदारी के तौर पर भारत निर्माण के रूप में हो सकती है। इन योजनाओं को मौन क्रांति और दूर-दराज क्षेत्रों में ग्रामीण लोगों के जीवन में सुधार करने वाले कार्यों के रूप में प्रचारित किया जा सकता है। यह संयोग हो सकता है कि यूपीए की वर्षगांठ के साथ ‘भारत की कहानी की झलकियां्य विज्ञापन की टैगलाइन ‘मीलों हम आ गए, मीलों हमें जाना है्य चतुराई से यह संदेश देता है कि यूपीए-3 ही ‘भारत के विकास की कहानी्य को आगे ले जा सकता है।

मनीष तिवारी ने कहा -‘यह यूपीए की नौंवी वर्षगांठ है और हम सब मिलकर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि पिछले नौ सालों में चीजें कैसे बदली हैं। पांच मापदंडों – राजनीतिक स्थायित्व, सामाजिक एकजुटता, आंतरिक सुरक्षा, आर्थिक विकास और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को आधार बनाकर यूपीए अपने शासन की खूबियों को लोगों तक पहुंचाएगा।्य बीजेपी की नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लिए 2004 में घातक सिद्ध हुए ‘इंडिया शाइनिंग्य अभियान से इसकी किसी भी समरूपता से उन्होंने इंकार किया है। जमीनी स्तर पर कांग्रेस के कार्यकर्ता उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में जीत और विपक्षी दल भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में बिखराव के बावजूद चुनाव में जीत को लेकर शंकित नजर आ रहे हैं। अब जबकि साल भर से भी कम समय बचा हैए पार्टी और सरकार बुरी तरह धूमिल पड़ चुकी अपनी छवि को चमकाने में लग गयी है। हालांकि यह एक कठिन काम है, फिर भी इस वैतरणी को पार लगाने में गांधी परिवार, ग्रामीण भारत का समर्थन और विपक्ष में बिखराव से उन्हें उम्मीद है कि ये परिस्थितियां उनकी मदद करेंगी और 2014 में यूपीए की सरकार का गठन होगा।

(सरोज नागी दिल्ली में राजनीतिक विश्लेषक हैं)

सरोज नागी

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