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बिन पानी सब सून रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती मानुस चून।।

छोटी कक्षाओं में पढ़े रहीम के इस दोहे के कई अर्थ बताये जाते थे लेकिन अब जब इसे विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के साथ पढऩे पर लगा कि रहीम ने किस तरह कई शताब्दी पहले देश का इतना स्पष्ट भविष्य देख लिया था। इस रिपोर्ट के अनुसार 2020 तक भारत एक गहरे जल संकट का सामना करेगा। इस संकट का असर देश में अन्न, जल और बिजली की उपलब्धता पर पड़ेगा। एक अन्य अध्ययन के अनुसार हिमालय के हिमनदों यानी ग्लेशियर से निकलने वाली नदियों के पानी में 2050 तक 10 से 20 प्रतिशत की कमी आएगी। इसके अनुसार गंगा नदी के पानी में 20 प्रतिशत तक और ब्रह्मपुत्र के जल में कोई 10 प्रतिशत की कमी आ सकती है। इसका सीधा असर भारतए चीन, बांग्लादेश और नेपाल पर पड़ेगा। दक्षिण एशिया के अन्य देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। दक्षिण एशिया के सभी देशों और चीन की आबादी तेज़ी से बढ़ेगी, मगर पानी की कमी के कारण गेंहू, चावल और कई अन्य अनाजों की उपज में 40 प्रतिशत तक कमी आने की आशंका है।आप सोच सकते है कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं। आज जब भारत के विकास की रफ्तार थोड़ी सी गिरी है तो पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है। भारत में जब अनाज उत्पादन 40 प्रतिशत तक गिरेगाए तो गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और जनसंख्या के पलायन की भीषण समस्याएं उत्पन्न होंगी। इन देशों में पानी को लेकर लड़ाइयां भी हो सकती है।भविष्य को छोड़ भी दें तो आज भी हालात कोई कम मुश्किल नहीं हैं। देखा जाए तो जल प्रबंधन के लिए लोंगो को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। किसान अपना ट्यूबवैल लगाकर खेत सींच रहा है, तो उद्योगपति अपने कारखाने के लिए खुद पानी का इंतजाम कर रहा है। शहरों में रहने वाले लोग घरों में महंगे उपकरण खरीद कर पानी साफ कर रहें हैं या बोतलें खरीद कर काम चला रहे हैं। कई शहरों में तो नागरिक सिर्फ टैंकर के पानी पर जिंदा हैं। शहरों में टैंकर माफिया काम कर रहे हैं और आम परिवार डेढ़ दो हजार रुपये तक इन पर खर्च कर रहे हैं। गरीब जनता को तो अपने रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है। वे हफ्ते में एक या दो बार मिलने वाला नगरपालिका का गन्दा पानी पीने को मजबूर हैं, क्या लोग टैक्स इसलिए देते हैं कि पानी तक का इंतजाम उन्हें खुद करना पड़े?

सवाल है कि इसका कोई हल है या नही। इसके हल तो हैं पर क्या हमारा नेतृत्व इसके लिए तैयार है? क्या हमारे घोटालेबाज नेताओं और चापलूस एवं रिश्वतखोर नौकरशाहों को फुर्सत है कि वे भविष्य के लिए सोचें? हमारे देश में औसतन 30 दिन की बरसात का पानी बांधों में इकऋा करने की क्षमता हैं। जानते हैं विकसित देशों में कितना पानी जमा करके रखा जाता है तकरीबन 900 दिन का। क्या हम अपने बांधों की क्षमता बढ़ाने का प्रयास नहीं कर सकते? क्या नदियों को जोड़कर जल संसाधन बढ़ाने का प्रकल्प सिर्फ इसलिए नहीं शुरू किया जा सकता, क्योंकि वह एन डी ए का प्रस्ताव था? क्या हिमालय के पर्यावरण को बचाने में संत समाज का बड़े पैमाने पर उपयोग नहीं किया जा सकता? क्या उनको साथ लेने में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का सवाल सामने आना चाहिए? अगर आज भी पानी के संकट से लडऩे के लिए योजना बनाकर पूरे समाज को साथ लिया जाए तो गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र की पवित्रता और अक्षुणता को बचाकर इस गंभीर समस्या को टाला जा सकता हैं अन्यथा ‘बिन पानी सब सून की संत रहीमदास की भविष्य वाणी सच साबित हो सकती है।

उमेश उपाध्याय

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