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जरूरत है देश में बेहतर जलनीति और जल प्रबंधन की

एक अनुमान के अनुसार यदि हालत नहीं सुधरी (जिसकी कोई उम्मीद नजर नहीं आती) तो 2025 तक विश्व की दो तिहाई जनता पीने के पानी से महरूम हो जाएगी। अन्य देश तो जाग रहे हैं और उसके अनुसार उनकी जल नीतियां भी बन रही हैं। भारत को भी इस संबंध में गंभीरता से विचार करना होगा। भारत की जल नीति पानी पर देश की जनता का पहला अधिकार देने के आधार पर जल माफिया को दूर रखने की होनी चाहिए। देश की जनता को जल के उपयोग और जल संरक्षण के बारे में जागरूक करने के प्रभावी कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।
बेलगाम बढ़ती जनसंख्या और घटते संसाधानों ने विश्व को एक बार फिर युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है। विश्व की आबादी में बढ़ोत्तरी और प्राकृतिक संसाधनों में कमी से इस बात में कोई संदेह दिखाई नहीं देता कि यदि तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो वह या तो तेल के लिए होगा या फिर पानी के लिए होगा। आधुनिक युग में तेल के बगैर जीवन कठिन लगता है और जिस प्रकार से तेल का प्रयोग बढ़ रहा है, उसे देखते हुए विशेषज्ञों का अनुमान है कि दुनिया के तेल भंडारों को समाप्त होने में आधी शताब्दी से कुछ ही अधिक समय रह गया है। लेकिन विशेषज्ञ तेल को लेकर बहुत अधिक चिन्तित नहीं हैं। कारण है कि तेल के विकल्प की जिस प्रकार से खोज चल रही है, वह आज नहीं तो कल तो मिल ही जाएगा। …और नहीं तो कभी न खत्म होने वाली सौर ऊर्जा तो वैज्ञानिकों के मन में गहरी छाप लिए है। इसके बाद घटते हुए जिन प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संसार सबसे अधिक चिन्तित है, वह जल है। यूं तो पृथ्वी का एक तिहाई हिस्सा समुद्र के पानी से लबालब भरा है। लेकिन समुद्र का खारा पानी जीवन को चलाए रखने के लिए उपयुक्तनहीं है। उसे पीने के काम में नहीं लाया जा सकता। पानी ईश्वर की ऐसी देन है जिसके विकल्प की कम से कम आज तो कल्पना भी नहीं की गई है। कुछ पेय पदार्थ जल का विकल्प नहीं हो सकते। जंगलों के अंधाधुंध कटान ने बादलों को धरती से रूठा दिया है जिससे भूजल लगातार गिरता जा रहा है। जो भी वर्षा हो रही है उसके प्रबंधन की तरफ तो गंभीरता से नीति निर्धारकों को नीतियों को लागू करने वालों का गंभीरता से ध्यान भी नहीं जा रहा है।
वर्षा के गिरते औसत से जहां भूजल का स्तर लगातार गिरा है वहीं बावडिय़ां, जोहड़ भी सूख रहे हैं। भूजल के स्तर का गिरनाए बावडिय़ों, जोहड़ों, प्राकृतिक नालों और नदियों का सूखना असल में जल का एक दुष्चक्र में फंसने का परिणाम है। बावडिय़ों और जोहड़ों के स्थान पर कंकरीट के जंगलों की बाढ़ आई हुई है। बढ़ती जनसंख्या ने प्राकृतिक संसाधनों पर जो दबाव बनाया है उससे हरे-भरे जंगलों का स्थान कंकरीट के जंगल ले रहे हैं। बिल्डर माफिया चांदी काट रहे हैं। धरती का तापमान बढ़ रहा है। मौसम के चक्र में अविश्वसनीय परिवर्तन आ रहा है। ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ रही है। किसान आसमान की तरफ सूनी आंखों से देख कर तरस कर रह जाता है, लेकिन बादल किसान पर तरस नहीं खाते। किसान को मजबूरन आत्महत्या का रास्ता अख्तियार करना पड़ता है। मराठवाड़ा में राष्ट्रीय औसत से बहुत कम वर्षा होने के कारण 12हजार गांवों में दो करोड़ लोग भयंकर सूखे की चपेट में हैं। यह तो
पूरे हालात की केवल हल्की सी बानगी है, देश में पानी की कमी को लेकर आगे क्या हाल बनेंगे, अब यह दिवारों पर लिखा पढ़ा जा सकता है। देशवासियों के लिए ‘जल ही जीवन है!्य केवल एक कहावत नहीं रह जाएगी, बल्कि देश को इसकी हकीकत भी नजर आएगी। देश की राजधानी और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों के आसपास के इलाकों में जल के बारे में किए गए अध्ययनों के अनुसार भूजल का स्तर इतना गिर गया है कि उसकी गहराई कुतुब मिनार की ऊंचाई से मुकाबला कर रही है। राजधानी हो या देश का अन्य कोई राज्य, जल की कमी का नाजायज लाभ उठाने में माफिया पीछे नहीं है। रात के अंधियारे में गैरकानूनी ढंग से भूजल निकाल कर उसमें शामिल प्रदूषण की परवाह किए बगैर लोगों के पीने और भोजन तैयार करने के लिए उपलब्ध करा कर अधिकारियों और नेताओं के साथ धन की बंदरबांट करने में जल माफिया कोई कसर नहीं छोड़ रहा। सरकार की नीतियां भी जल माफिया का ही साथ दे रही हैं। जल पर पहला अधिकार हालांकि जनता का होना चाहिए, लेकिन सरकार की नीतियों ने उसे जल माफिया को सौंप दिया है। छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी पर माफियाओं ने जिस प्रकार कब्जा किया है वह सरकार के संरक्षण के बगैर संभव नहीं है। सरकार तो जैसे आम आदमी को पीने का पानी मुहैया कराने की जिम्मेदारी से पल्ला झाडऩे के बहाने ही खोज रही है। पीने के पानी को लेकर गृह युद्ध से पूर्व की स्थिति दिखाई देने लगी है। आसानी से यदि जल उपलब्ध होता है तो उसकी परवाह किसी को नहीं होती और जल उपलब्ध न हो तो सिर फुटव्वल की नौबत आ जाती है। इसरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक कृषि प्रधान देश भारत में घटते जल का हाल यह है कि 1801 से 2002 तक यहां 42 बार सूखा पड़ चुका है और एक अनुमान के मुताबिक 2025 तक भारत की आधी जनता के पास पीने का पानी नहीं होगा। देश की तीन बड़ी नदियों में से गंगाए यमुना और सरस्वती में से सरस्वती विलुप्त हो चुकी है और सरस्वती की तरह यमुना भी इतिहास के पन्नों में छिपती नजर आती है।
वैसे आज हालत यह है कि राज्यों की राजनीति भी जल पर आधारित होती जा रही है। पानी को राज्यों के अधिकार क्षेत्र में डले होने से राष्ट्रीय स्तर पर कारगर जलनीति का अभाव है। पानी को लेकर दिल्ली और हरियाणा के बीच तथा कावेरी जल को लेकर कर्नाटक तथा तमिलनाडु के बीच तलवारें खिंची रहती हैं। केन्द्र, हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस की सरकारें होने के बावजूद दिल्ली का जल संकट दूर नहीं हो पा रहा है। गुजरात में जरूर छोटी नदियों को जोडऩे का काम हुआ है जो अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय है। सरदार सरोवर बांध से गुजरात के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में हरियाली लाने और 1450 मेगावाट बिजली पैदा करने की योजना है। देश को बाढ़ और सूखे से बचाने के लिए वाजपेयी सरकार ने
तत्कालीन ऊर्जा मंत्री सुरेश प्रभु को देश की नदियों को जोडऩे का काम शुरू करने की जिम्मेवारी सौंपी थी। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने भी केन्द्र सरकार को निर्देश दिए थे। इसका उद्देश्य बाढ़ वाले इलाकों की नदियों के पानी को सूखे इलाकों तक ले जाकर बाढ़ की विभिषिका से उन इलाकों को बचाना और सूखाग्रस्त इलाकों में पानी उपलब्ध कराना था। भारत के सामने अन्य देशों का उदाहरण भी था जहां सड़क और वायु परिवहन के साथ-साथ जल परिवहन को भी एक साधन बनाया गया है। वहां नदियों के किनारों को पर्यटन स्थल बना कर राजस्व में वृद्धि की गई है। लेकिन वाजपेयी सरकार गई तो यह योजना भी ठंडे बस्ते में पहुंच गई। पड़ोसी देशों से अन्तरराष्ट्रीय रिश्ते दोनों देशों के बीच बहने वाली नदियों के जल का आधार बन रहे हैं। ब्रह्मपुत्र पर चीन एक नहीं कई बांध बना कर भारत और बांग्लादेश को सकते में डाल रहा हैं। एक ओर जल का नियन्त्रण चीन के हाथ में पडऩे से भारत को मिलने वाले जल की मात्रा पर प्रभाव पड़ेगा तो दूसरी ओर बाढ़ का खतरा बना ही रहेगा। सूचनाओं के अनुसार चीन ब्रह्मपुत्र पर कई बांध बनाने की तैयारी में है। इसी प्रकार से भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल और भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा पानी का बंटवारे के समझौते पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं।

एक अनुमान के अनुसार यदि हालत नहीं सुधरी (जिसकी कोई उम्मीद नजर नहीं आती) तो 2025 तक विश्व की दो तिहाई जनता पीने के पानी से महरूम हो जाएगी। अन्य देश तो जाग रहे हैं और उसके अनुसार उनकी जल नीतियां भी बन रही हैं। भारत को भी इस संबंध में गंभीरता से विचार करना होगा। भारत की जल नीति पानी पर देश की जनता का पहला अधिकार देने के आधार पर जल माफिया को दूर रखने की होनी चाहिए।। देश की जनता को जल के उपयोग और जल संरक्षण के बारे में जागरूक करने के प्रभावी कायक्रम चलाए जाने चाहिए। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए ऐसे हालात पैदा होने से रोकने की कोशिश की जानी चाहिए जिससे जल को लेकर देश गृहयुद्ध की ओर न बढ़ जाए। जल की कमी से सभी परिचित हैं, लेकिन उसके बावजूद देश के नीतिनिर्धारकों और नीतियों को लागू करने वालों में बेहतर जल-प्रबंधन का अभाव है।

कुछ जल-प्रबंधन में अनाड़ी होने और कुछ हमारी नीयत में खोट होने के कारण बरबादी की कगार पर पहुंचने की हमारी जल्दी सभी देख रहे हैं। विलुप्त होने के कगार पर पहुंची यमुना का हाल इसका ज्वलंत उदाहरण है। करोड़ों रूपए बहा कर भी हम अपनी नीयत के कारण उसे बचा नहीं पा रहे हैं। जीवनदायिनी नदियों को जल-प्रबंधन में अपनी कमियों के कारण उन्हें यूंही मरने दिया जा रहा है। पड़ोसी देशों के साथ किए गए समझौतों और भविष्य में किए जाने वाले समझौतों में देश हित को सर्वोपरि रखते हुए उन्हें व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए। जो भी कदम उठाए जाएं, उसके पीछे सोच यही होनी चाहिए कि-आखिर, जल ही तो जीवन है!

श्रीकान्त शर्मा

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