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विश्वयुद्ध होगा जल को लेकर?

पड़ोसी देशों के साथ भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को बरकरार रखने में नदियों की विशेष भूमिका है। ब्रह्मपुत्र नदी भारत और चीन के संबंधों को मजबूत करने में मददगार साबित हो सकती है। चीन ब्रह्मपुत्र पर तीन बांधों का निर्माण कर रहा है। भारत ने आपत्ति जताते हुए कहा है कि ब्रह्मपुत्र के ऊपर तीन बांधों के निर्माण से भारत में भयंकर बाढें आएंगी। बांग्लादेश ने भी चीन के इस कदम पर चिंता जताई है। बांग्लादेश में बाढ़ के प्रकोप से लाखों जानें जाती है । चीन ने यदि ब्रह्मपुत्र के पानी के बहाव को बदल दिया तो बांग्लादेश में परिस्थितियां और विकट हो जाएंगी। भारत और चीन के बीच ब्रह्मपुत्र के पानी के बंटवारे को लेकर वार्ता जारी है। ब्रह्मपुत्र पर बांध बनाकर बिजली उत्पादन हेतु पानी इक्कठा करने के लिए नदी के बहाव को बदलने की कोशिश करने से भारत के उत्तर-पूर्व, भूटान और बांग्लादेश में पर्यावरण और पानी का संतुलन बिगड़ जाएगा।
विश्व के हालात पर नजर रखने वाले विद्वानों का कहना है कि अगर अब तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो वह पानी के लिए होगा। आज पूरी दुनिया का एक तिहाई हिस्सा पानी की कमी से जूझ रहा है। हर दिन बढ़ती जनसंख्या के साथ पानी की मांग भी बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार विश्व में 1.6 बिलियन जनता पानी की कमी से त्रस्त है। विश्व के 43 देशों में 700 बिलियन जनता पानी की कमी झेल रही है। विश्व की करीब दो तिहाई जनता पानी की कमी से प्रभावित होगी। विश्व के साथ-साथ पानी का संकट भारत में भी तेजी से बढ़ रहा है। भारत की आधी आबादी पानी के संकट अर्थात सूखे जैसे हालात से ग्रसित है। भारत में औसत वर्षा के बावजूद ज्यादातर इलाकों में यही हालत है। 90 प्रतिशत पानी की सप्लाई अंतर्राज्यीय नदियों से होती है। इसकी वजह से राज्यों के बीच मतभेद तीव्र होते जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पानी की
कमी के कई कारण हैं। मुख्य रुप से इनमें जनसंख्या में वृद्धि, कृषि उत्पादन में वृद्धि, व्यापक निर्माण कार्य आदि शामिल हैं। शहरीकरण भी पानी की कमी का एक बड़ा कारण है। जलवायु में परिवत्र्तन और इन सबके चलते एक कारगर जल प्रबंधन की कमी से यह समस्या तीव्रतर होती जा रही है।

भारत में पानी के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। जून से सितंबर तक के चार महीनों में जो वर्षा होती है, उसी से भारत की जनता को पूरा साल गुजारना होता है। भारत में कही वर्षा से बाढ़ आ जाती है, तो कहीं अनावृष्टि से सूखा पडऩे लगता है। पश्चिम राजस्थान में 13 से.मी. से भी कम वर्षा होती है। मेघालय में 1141 से.मी. वर्षा होती है। 2050 तक भारत की जनसंख्या करीब 1.6 बिलियन हो जाएगी। इस जनसंख्या का 55 प्रतिशत शहरों में होगा। जनसंख्या में वृद्धि पानी की मांग भी बढ़ाएगी। 80 प्रतिशत पानी की मांग केवल अन्न उत्पादन के लिए होगी। तब भूजल स्तर में 25 प्रतिशत कमी हो जाएगी।

भारत में पिछले कई दशकों से विकास कार्य तेजी पर है। उससे पानी खर्च करने वाले उद्योगों में भारी वृद्धि होगी। उर्जा मंत्रालय के अनुसार, 2050 तक उद्योगों में पानी की मांग करीब 65 प्रतिशत तक बढ़ेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर परिस्थितियां आज जैसी रहीं तो वह दिन दूर नहीं, जब पानी के दर्शन दुर्लभ हो जाएंगे।

कावेरी जल विवाद
भारत में नदियों के जल के बंटवारे को लेकर सारे राज्य तलवार खींचे खड़े है। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के जल को लेकर 1992 से संघर्ष चला आ रहा है। कर्नाटक में 32000 किमी. और तमिलनाडु में 44000 किमी. का कावेरी नदी का बेसिन क्षेत्र है। कर्नाटक का कहना है उसे उसके प्राप्य से वंचित किया जा रहा है। कर्नाटक शुरू से कहता रहा है कि जल समझौते का झुकाव तमिलनाडु के प्रति ज्यादा है। तमिलनाडु का कहना है, उसने करीब 12000 किमी. कृषि क्षेत्र का कावेरी नदी के बेसिन पर विकास किया है। राज्य के किसानों का भाग्य कावेरी नदी के जल पर निर्भर है। दोनों राज्यों के बीच सालों-साल चली वात्र्ता निष्फल रहीं। 1990 में भारत सरकार ने इस समस्या को निपटाने के लिए एक ट्रिब्यूनल का गठन किया था। 16 साल तक दोनों राज्यों के तर्क सुनने के बाद 5 फरवरी 2007 को इस ट्रिब्यूनल में अंतिम राय दी कि कावेरी नदी से प्रति वर्ष तमिलनाडु को 419 बिलियन फुट पानी और कर्नाटक को 270 बिलियन फुट पानी मिलेगा। इसके साथ-साथ केरल को 30 बिलियन फुट और पुद्दिचेर को 7 बिलियन फुट पानी मिलेगा। ट्रिब्यूनल के इस फैसले के बाद भी कोई रास्ता नहीं निकला। इन राज्यों के बीच कावेरी नदी पर जल विवाद अभी भी जारी है। तमिलनाडु की मांग थी कि उसे कम-से-कम 566 बिलियन फुट पानी मिले, और कर्नाटक को 177 बिलियन फुट। कर्नाटक की मांग है कि उसे 466 बिलियन फुट पानी मिलना चाहिए।

इसरो के अनुसार 1801 से 2002 तक भारत में 42 बार सूखे के प्रकोप हुए। 1979 में 20 प्रतिशत उत्पादन कम हुआ। 1987 में 58.6 मिलियन कृषि जमीन नष्ट हो गयी। 285 मिलियन जनता इस सूखे से प्रभावित हुई। 2002 से लेकर 2012 तक भारत को तीन-तीन सूखे के प्रकोप झेलने पड़े। 2013 की विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार सूखे के प्रकोप से भारत की जीडीपी में आधी फीसदी की कमी आई। हमारी आबादी के लगभग 70 प्रतिशत लोग अभी भी गांव में रहते हैं। उनमें से 58 प्रतिशत केवल कृषि पर निर्भर हैं। 355 मिलियन जनता गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने को मजबूर है।

इधर गुजरात में नर्मदा नदी के ऊपर सरदार सरोवर बांध के निर्माण को

लेकर नर्मदा बचाओ आंदोलनकारी और सरकार के बीच जंग छिड़ी हुई है। 1979 में इस परियोजना को हाथ में लिया गया था। सरदार सरोवर की ऊंचाई को लेकर विवाद खड़ा हुआ। काफी वाद-विवाद के बाद नर्मदा के उपर बनने वाले बांध की ऊंचाई 163 मीटर (535 फुट) कर दी गई, पर यह विवाद अभी थमा नहीं है। परियोजना के अनुसार गुजरात के सूखा ग्रस्त इलाकों में हरियाली लाने की कोशिश है ये बांध। करीब-करीब 18000 किमी. क्षेत्र की सिंचाई की दृष्टि से ये बांध बनाया गया। इससे सूखे से प्रभावित सौराष्ट्र और कच्छ के इलाके में सिंचाई होगी। इसके अलावा 1450 मेगावाट बिजली पैदा करने का लक्ष्य है। आलोचकों का कहना है कि नर्मदा के ऊपर इतना विशालकाय बांध बनाना पर्यावरण की दृष्टि से सही नहीं है।
चीन की जल कूटनीति
पड़ोसी देशों के साथ भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को बरकरार रखने में नदियों की विशेष भूमिका है। ब्रह्मपुत्र नदी भारत और चीन के संबंधों को मजबूत करने में मददगार साबित हो सकती है। चीन ब्रह्मपुत्र के उपर तीन बांधों का निर्माण कर रहा है। भारत ने आपत्ति जताते हुए कहा है कि ब्रह्मपुत्र के ऊपर तीन बांधों के निर्माण से भारत में भयंकर बाढें आएंगी। बांग्लादेश ने भी चीन के इस कदम पर चिंता जताई है। बांग्लादेश में बाढ़ के प्रकोप से लाखों जानें जाती हैं। चीन ने यदि ब्रह्मपुत्र के पानी के बहाव को बदल दिया तो बांग्लादेश में परिस्थितियां और विकट हो जाएंगी।
भारत और चीन के बीच ब्रह्मपुत्र के पानी के बंटवारे को लेकर वार्तालाप जारी है। ब्रह्मपुत्र के उपर बांध बनाकर बिजली उत्पादन के लिए पानी इकऋा करने के लिए नदी के बहाव को बदलने की कोशिश करने से भारत के उत्तर-पूर्व, भूटान और बांग्लादेश में पर्यावरण और पानी का संतुलन बिगड़ जायेगा। चीन में इन तीन बांधों के अलावा 26 और बांधों का निर्माण पाइपलाइन में है। जिससे गर्मी में करीब-करीब 85 प्रतिशत पानी का बहाव कम हो जायेगा। असल में चीन ब्रह्मपुत्र को एक राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। दक्षिण एशिया में जल सीमा का उल्लंघन भारत के लिए गंभीर सुरक्षा का प्रश्न खड़ा कर देगा। चीन, भारत और बांग्लादेश के बीच राजनीतिक, कूटनीतिक संपर्क बरकरार रखने के लिए ब्रह्मपुत्र की प्रमुख भूमिका है। सन 2000 में भारत ने चीन पर आरोप लगाया था कि चीन की जमीन पर ब्रह्मपुत्र पर हाइड्रोलोजिकल आंकड़ों की कोई सूचना भारत को नहीं मिलने से भारत में बाढ़ की विषम स्थिति उत्पन्न हो गयी है। 2002 में दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ जिसके अनुसार दोनों देशों में पानी के स्तर, वर्षा की स्थिति, और पानी छोडऩे की रिपोर्ट और आंकड़ों का लेन-देन होगा। ब्रह्मपुत्र के बहाव को बदलने की स्थिति में भारत को पहले सूचना देनी होगी। ब्रह्मपुत्र का बहाव तकरीबन 651.334 किमी. का है, जिसमें से 58 प्रतिशत भारत के हिस्से में और 20 प्रतिशत चीन के हिस्से में आता है।
उमा भारती की गंगा यात्रा
पिछले साल 2012 के श्रावण मास में उमा भारती ने पहले चरण में देश के सभी ज्योतिर्लिंगों का गंगोत्री के जल से अभिषेक किया। उसके बाद दूसरे चरण में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, भाजपा के वरिष्ठ नेताओं समेत संसद के दोनों सदनों के सवा सात सौ सासंदों को गंगाजली भेंट की गई।

तीसरे चरण में 21 सिंतबर से 28 अक्टूबर 2012 तक उमा भारती ने गंगासागर से गंगोत्री तक, करीब 3200 किलोमीटर यात्रा की। गंगाजी की लंबाई करीब 2517 किलोमीटर है, लेकिन यात्रा आसपास के क्षेत्रों से गुजरी। यात्रा का प्रारंभ सुबह गंगापूजन से और समापन शाम की गंगा आरती से हुआ। बीच में रोजाना स्वागत सभाएं और जनसभाएं हुईं। चौथे चरण में 2 दिसंबर 2012 के गंगा तटों पर उत्तराखंड से लेकर पश्चिम बंगाल तक मानव दीवार बनी, जिसमें लाखों लोगों ने हिस्सा लिया। आगामी 19 जून को दिल्ली के सिरी फोर्ट में गंगा शिखर सम्मेलन होगा।

गंगा से जुड़े सभी कायक्रमों को अराजनीतिक रखा गया है। इसलिए कार्यक्रमों में किसी राजनीतिक पार्टी के झंडे या बैनर का इस्तेमाल नहीं किया गया।

गंगा यात्रा के दौरान उमा भारती ने कहा :
 कानून बनाकर गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करना चाहिए। ताजमहल को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जा सकता है तो गंगा को क्यों नहीं?
 गंगा के मुद्दे पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और आडवाणीजी एक साथ बैठकर सार्थक परिणाम निकालें।
 देवरहा बाबा कहा करते थे : गायत्री भारत माता का मंत्र, गंगा उसके प्राण और गाय उसका मन है। इनके अस्तित्व पर भारत का अस्तित्व है।
 जो गंगाजल हम खुद नहीं पी सकते, उसे अपने पितरों को कैसे पिला सकते हैं? गंगा सभी धर्मों के लिए पवित्र है। गंगा अविरल और निर्बाध बहनी चाहिए।
 गंगा केवल धर्म व आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि अर्थ का भी आधार है। करीब चालीस करोड़ लोगों को आजीविका भी प्रदान कराती है।
 नदियों पर पहला हक मल्लाहों व निषादों का होना चाहिए।

सिंधु नदी समझौता
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल समझौता 1960 में हुआ था। समझौते पर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति मो. अयूब खान के हस्ताक्षर है। पाकिस्तान को डर था कि सिंधु नदी का उद्गम स्थल भारत में है और युद्ध के समय भारत अगर नदी के बहाव को मोड़ दे तो सारा पाकिस्तान सूखे की चपेट में आ जायेगा, अकाल पड़ेगा। अब तक भारत और पाकिस्तान के बीच तीन लड़ाइयां हुईं पर भारत ने इस समझौते को कभी नहीं तोड़ा।

गंगा पानी के बंटवारे को लेकर भारत और ंबांग्लादेश के बीच वर्षों से विवाद रहा है। हर साल दोनों देशों के अधिकारी बैठक करते हैं, पर कोई ठोस परिणाम अब तक नहीं निकला है। भारत-बांग्लादेश में गंगा के पानी पर 1996 में एक तीस साला समझौता हुआ था। प्रधानमंत्री एच. डी. देवगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच हुए समझौते के बावजूद दोनों देशों के बीच पानी को लेकर मनमुटाव और राजनीति जारी है।

 

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