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तुम्हारी मौत की सच्ची खबर जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था

तुम्हारी मौत की सच्ची खबर जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था

फरवरी 2016 का दूसरा सप्ताह उर्दू शायरी को पूरी दुनिया में पसंद करने वाले लोगों को गमजदा कर गया। 8 फरवरी को जाने-माने शायर निदा फाजली का दिल का दौरा पडऩे से मुंबई में इंतकाल हो गया। वे 77 साल के थे। निदा फाजली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था, लेकिन उनका बचपन ग्वालियर में गुजरा। घरवालों ने पहले उनका नाम मुक्तदा हसन रखा था। उनके पिता खुद भी एक शायर थे। वे अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे। उन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज जो अब लक्ष्मीबाई कॉलेज के नाम से जाना जाता है वहां से साल 1958 में पीजी की पढ़ाई पूरी की।

कामयाबी के पीछे का संघर्ष

कहा जाता है कि देश में होने वाले साम्प्रदयिक दंगों से तंग आकर निदा फाजली के माता -पिता पाकिस्तान चले गए, लेकिन निदा फाजली ने हिन्दुस्तान में ही रह कर अपना संघर्ष जारी रखा। रोजी-रोटी की तलाश में उन्हें कई शहरों में भटकना पड़ा। उन दिनों मुंबई से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘धर्मयुग’ और ‘ब्लिट्ज’ की काफी चर्चा हुआ करती थी। ऐसे में साल 1964 में उन्होंने मुंबई का रुख किया और यहां आने के बाद इन पत्रिकाओं के लिए लेखन शुरू किया। जल्द ही उनके लेखों की सरल भाषा ने लोगों के बीच उन्हें काफी लोकप्रिय   बना दिया। साल 1969 में उनकी उर्दू शायरी का पहला संग्रह प्रकाशित हुआ।

फिल्मों में मिला पहला ब्रेक

बात उन दिनों की है जब जाने-माने फिल्मकार कमल अमरोही, धर्मेन्द्र और हेमा मालनी को लेकर ‘रजिया सुल्तान’ फिल्म का निर्माण कर रहे थे। इस फिल्म का गाना जानिसार अख्तर लिख रहे थे, लेकिन अचानक उनका इंतकाल हो गया। जानिसार अख्तर भी ग्वालियर से ताल्लुक रखते थे। ऐसे में बातचीत के क्रम में उन्होंने एक बार निदा फाजली के लेखन का जिक्र कमल अमरोही से किया। ऐसे में कमल अमरोही को लगा की जानिसार अख्तर के गुजर जाने के बाद निदा फाजली ही बाकी के दो गीतों को लिख सकते हैं और उन्होंने निदा फाजली से सम्पर्क किया। इस तरह निदा फाजली की फिल्मों में एंट्री हुई।

रजिया सुल्तान फिल्म के लिए उनके द्वारा लिखा गया पहला गीत ‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है ,तेरा गम मेरी हयात है’ को लोगों ने काफी पसंद किया।

उसके बाद उन्होंने फिल्म ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ के लिए ‘कभी किसी को मुक्कमल जहां नहीं मिलता, किसी को जमीं तो किसी को आसमां नहीं मिलता’ लिखा जिसे लोगों ने काफी सराहा।

बाद में उन्होंने फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता के लिए ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है’ फिल्म ‘सरफरोश’ के लिए ‘होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है’ फिल्म सुर के लिए ‘आ भी जा, आ भी जा’ लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए।

टीवी धरावाहिक ‘सैलाब’, ‘नीम का पेड़’ और ‘ज्योति’ प्रोग्राम के शीर्षक गीत भी उन्होंने ने ही लिखे थे।

कैसे बने शायर

निदा फाजली की जिंदगी जितनी रोचक रही उनके शायर बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। कहते हैं की पहली मुहब्बत ने उन्हें शायर बना दिया था। कॉलेज के दिनों में उनकी आगे की बेंच पर एक लड़की बैठा करती थी। उस लड़की की खूबसूरती के निदा बेहद कायल हो गए थे और उनका लगाव हो गया था। लेकिन, जब एक दिन कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर उस लड़की की एक सड़क दुर्घटना में मौत के बारे में सूचना दी गयी तो निदा फाजली बेहद भावुक हो गए। उन्हें लगा की अपने इस गम को बयां करने के लिए उन्हें कुछ अलग से लिखना चाहिए। इसी दौरान जब वे एक दिन मंदिर के नजदीक से गुजर रहे थे तो उन्होंने महान कवि सूरदास द्वारा लिखे गए भजन ‘मधुबन तुम क्यों रहत हरे, बिरहा वियोग स्याम सुन्दर के ठाढें क्यों न जरे’ भजन को सुना। इस भजन में कृष्ण के मथुरा से द्वारिका चले जाने पर उनके वियोग में डूबी राधा और गोपियां फुलवारी से पूछ रही हैं की कृष्ण के चले जाने के बाद तुम हरी क्यों हो, उनके वियोग में जल क्यों नहीं जातीं। इस भजन ने निदा फाजली के मन पर गहरी छाप छोड़ी और उन्होंने शायर बनने का फैसला कर लिया।

अपने पिता के इंतकाल के बाद निदा फाजली उनकी अंतिम यात्रा में शामिल तो नहीं हुए, लेकिन उन्होंने अपनी शायरी से उन्हें इस तरह श्रद्धांजलि दी।

तुम्हारी कब्र पर मैं

फातेहा पढऩे नही आया,

मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते

तुम्हारी मौत की सच्ची खबर

जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,

निदा फाजली की शायरी की खास बात यह थी की वे अपनी शायरी में उर्दू के भारी – भरकम शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे। उनकी शायरी काफी आसान भाषा में लिखी जाती थी जो लोगों को आसानी से समझ में आ जाती   थी। अच्छे आदमी की पहचान बताते हुए वे लिखते हैं-

उसके दुश्मन हैं बहुत, आदमी अच्छा होगा वो भी मेरी तरह इस शहर में तन्हा होगा प्यास जिस नहर से टकराई वो

बंजर निकली

जिसको पीछे छोड़ आये वो दरिया होगा।

कामयाबी पाने के लिए किसी भी हद तक जुनून से गुजर जाने वाले लोगों के लिए वे लिखते है कि इस दुनिया में कोई भी शख्स कितनी भी कामयाबी हासिल क्यों ना कर ले वो अधूरा ही रहता है –

कभी किसी को मुकम्मल

जहां नहीं मिलता

कहीं जमी तो कहीं आसमां

नहीं मिलता।

उन्होंने अपनी शायरी से हर उस शख्स पर हमला किया जो कट्टरपंथ के समर्थक थे। हालांकि उनकी ये बेबाकी उनके ही धर्म के कई लोगों को पसंद नहीं थी। लेकिन, उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की और बेबाकी से लिखते रहे।

क्या हुआ शहर को कुछ भी तो दिखाई दे कहीं, यूं किया जाए कभी खुद को रुलाया जाए

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो,

यूँ कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये

बाग में जाने के आदाब हुआ करते हैं , किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए

पाकिस्तान की यात्रा से लौटने के बाद उन्होंने कुछ ऐसे शेर लिखे जो दोनों देशों में मौजूद कट्टरपंथी विचारधाराओं का समर्थन करने वाले लोगों पर गहराई से चोट करती है।

इंसान में हैवान यहां हैं, वहां भी

अल्लाह निगहबान यहाँ भी है, वहां भी

खूंखार दरिंदों के फकत नाम अलग हैं

शहरों में बयाबान यहाँ भी हैं, वहां भी

हिन्दू भी मजे में है, मुसलमान भी मजे में

इंसान परेशान यहां भी, वहां भी।

देश में धर्म के नाम पर होने वाले दंगों के बारे में निदा फाजली ने लिखा था –

कोई हिंदू, कोई मुस्लिम, कोई ईसाई है

सब ने इंसान न बनने की कसम खाई है।

निदा फाजली द्वारा उर्दू शायरी में दिए गए योगदान के लिए उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान से भी नवाजा गया था। साल 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था।

निदा फाजली के इंतकाल पर जाने-माने कवि कुमार विश्वास ने ट्विट कर लिखा

निदा तन्हा तन्हा हम रो लेंगे महफिल महफिल गायेंगे

जब तक आंसू पास रहेंगे, तब तक

गीत सुनायेंगे…’श्रद्धांजलि’ निदा फाजली

निदा फाजली के निधन पर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हुए मशहूर गायिका लता मंगेशकर ने ट्विट कर लिखा ”आज मशहूर शायर निदा फाजली का इंतकाल हो गया, इस बात का मुझे दु:ख है।

अल्लाह उन्हें जन्नत की अता फरमाएं ये मेरी दिली दुआ है’’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी निदा फाजली के इंतकाल पर शोक प्रकट करते हुए ट्विट किया कि ”निदा फाजली को हम लोगों ने भले ही खो दिया है, लेकिन वे अपनी शायरी और गीतों के जरिये हम सब के बीच हमेशा जिन्दा रहेंगें।’’

नक्शा उठा के कोई नया शहर ढूंढिय़े

इस शहर में तो सबसे मुलाकात हो गयी

निदा फाजली द्वारा लिखा गया यह शेर उनके इंतकाल के बाद काफी सामायिक लगता है। इस दुनिया में उनकी सब से मुलाकात हो गयी थी, इसलिए उन्होंने नक्शा उठा कर ऐसा शहर ढूंढ़ लिया जहां जाने के बाद कोई वापस नहीं आता।

मुंबई से लतिकेश शर्मा

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