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जेएनयू देशद्रोह कांड

जेएनयू देशद्रोह कांड

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कभी विद्वत्तता का केन्द्र समझा जाता था, एक दिन देशद्रोहियों की गतिविधियों का अड्डा बन जायेगा, ऐसा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। भारत के टुकड़े-टुकड़े कर देने के नारों से विश्वविद्यालय का परिसर गूंज गया, इसके वीडियो और फोटो से स्पष्ट प्रमाण मिल गये। इसके बावजूद कुछ नेता आरोपियों को छोड़े जाने की वकालत कर रहे हैं। पुलिस कार्रवाई के लिये भारतीय जनता पार्टी सरकार को दोषी ठहराकर पुलिस पर आरोप मढ़ रहे हैं।

कम्यूनिस्ट पार्टी और जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन के एआइएसएफ सदस्य को छोडऩे की मांग में राजनैतिक स्वार्थसिद्घि की बू साफ दिखाई दे रही है। जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन ने तो सारी हदें पार कर दी हैं। एसोसिएशन ने एआइएसएफ के नेता कन्हैया कुमार की रिहाई व अन्य छात्रों से पूछताछ न किये जाने और छात्रों पर लगी हुई धाराओं को हटाने तक की मांग कर दी। ये जिम्मेदार शिक्षक हैं या देश में राष्ट्रद्रोह का बीज बोने वाले लोग? इन शिक्षकों के कार्यकलापों की जांच भी देशहित में आवश्यक हो गई है। राष्ट्र को छिन्न-भिन्न करने और देश में अस्थिरता फैलाने में जेएनयू टीचर्स एसोसिएशान और कम्यूनिस्ट पार्टी के हाथ होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सरकार को मामले की जांच के लिये दिल्ली पुलिस को सीबीआई के विशेषज्ञ अधिकारी उपलब्ध कराना चाहिए। जांच का दायरा कम्यूनिस्ट पार्टी की गतिविधियों तक बढ़ाया जाना चाहिए। पार्टी के बड़े नेता, जो आरोपी देशद्रोहियों को छोडऩे की बात कर रहे हैं, कहीं उस साजिश में शामिल तो नहीं हैं, यह भी पता लगाना होगा। सीताराम येचुरी और डी. राजा के देशद्रोह में आरोपित लोगों के पक्ष में दिये गये बयानों को जांच के दायरे में लाना होगा। सरकार में चाहे कोई कितना बड़ा नेता हो अपनी जांच से पीछे नहीं हटना चाहिए। आखिर यह देश की अखंडता का प्रश्न है। यदि येचुरी और राजा ऐसी घटनाओं को प्रोत्साहन देने में प्रमाणित होते हैं तो उन्हें भी गिरफ्तार किये जाने पर ही देश का नागरिक सुरक्षित महसूस करेगा।

अफजल गुरु के आरोपों पर सजा का फैसला सरकार ने नहीं किया था, वर्षों-वर्ष मुकदमा चला था। न्यायालय में सफाई के पूरे अवसर उसे मिले थे। फांसी का फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने दिया था। सरकार को दोषी ठहराये जाने का अधिकार किसी का नहीं बनता। किसी भी रूप में अफजल का समर्थन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की धज्जियां उड़ाना है, जो अवमानना की श्रेणी में आता है। जो लोग अफजल की याद में सार्वजनिक रूप में जलसा करते हैं, उसमें मदद करते हैं, सम्मिलित होते हैं या समर्थन देते हैं उन्हें देशद्रोह का मुजरिम करार देना चाहिए।

कांग्रेसी नेताओं ने तो इस मामले में सारी हदें पार कर दी हैं। कांग्रेस का यह कहना कि प्रजातंत्र का गला घोंटा जा रहा है या पुलिस सरकार से मिली है, हास्यास्पद है। पुलिस तो सरकार का अंग ही होती है, राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वालों को गिरफ्तार भी न करे। बेहतर होगा की कांग्रेस राष्ट्र की समस्याओं पर मिल बैठ कर सरकार से बात करे।

कांग्रेस में नौसिखिया के तौर पर आईं सोनिया गांधी राजनीति में शुरू से ही सफल हो गईं क्योंकि वे वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह और प्रणव मुखर्जी की सलाह पर काम करती रहीं। जैसे ही अर्जुन सिंह गये और प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति बने पार्टी का बंटाढार हो गया। राहुल गांधी को भी छुटभैये चम्पूओं की सलाह की बजाय कोने में बिठा दिये गये वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं से विचार-विमर्श कर ही कोई फैसला लेना चाहिए।

यहां जेएनयू के कुलपति की कार्यप्रणाली पर भी उंगली उठती है। एक योग्य और सफल कुलपति को विश्वविद्यालय में होने वाली हर गतिविधि की पल-पल खबर होना चाहिए। धरना या कार्यक्रम की अनुमति देने से पहले उसकी पूरी जानकारी होनी चाहिए। यदि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र नेता सजग न होते तो कुलपति द्वारा कार्यक्रम की अनुमति भी वापस न ली गई होती। जिस विश्वविद्यालय में देश के दुश्मनों और खूंखार आतंकवादियों के हक में जलसा हो जाये, वहां के कुलपति के खिलाफ जांच कर प्रशासनिक कार्रवाई भी आवश्यक है।

ऐसे प्रकरणों में कम्युनिस्टों का समर्थन तो उनकी मजबूरी है क्योंकि उन्हें जगह-जगह से उखाड़ दिया गया है। बंगाल से खदेडऩे के बाद अब केरल से भी समाप्ति की तैयारी है। इसलिए उन्हें जहां कहीं भी थोड़ा सा कोना दिखाई देता है, पहुंच जाते हैं। वहीं कांग्रेस सत्ता की पुन: वापसी की जल्दबाजी में बौखला कर अपने मूल रास्ते से भटक गई है। इस तरह के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तरों पर बयान देकर सत्ता में उसकी वापसी असंभव है।

सरकार जितना कठोर और निर्दयी हो कर देशद्रोहियों के साथ पेश आयेगी वह उतनी ही लोगों के दिलों की गहराई में बैठ जायेगी। आज जो जेएनयू में हुआ है कल दूसरे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में हो सकता है। एक जमाने में इस विश्वविद्यालय ने कई काबिल नेता वर्तमान सीबीआई निदेशक, वर्तमान विदेश सचिव, कई सांसद, पूर्व कुलपति, आईएएस और महान पत्रकार दिये हैं, पर आज उसकी ऐसी दुर्दशा हो गई है कि वहां देशद्रोही पैदा होने लगे। इसका इलाज कर इसे जड़ से न उखाड़ा गया तो ये बीमारी कहीं भी जड़ें जमा सकती है। लोगों को गृह मंत्री राजनाथ सिंह से देश के प्रथम गृह मंत्री बल्लभ भाई पटेल की तरह कार्रवाई करने की अपेक्षा है। जेएनयू के इस राष्ट्रद्रोही कांड के तार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर में आतंकवाद फैलाने वाले लोगों से जुड़े पाये गये हैं। नारे लगाने वालों की अगुवाई कर रहे उमर तो कश्मीर के अलगाववादी नेताओं का गुर्गा निकला। हाल ही में सहिष्णुता के नाम पर विशेष वर्ग के कुछ फिल्मी कलाकारों ने सुरक्षा के नाम पर देश को बदनाम करने की कोशिश की थी। सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाये। इसका नतीजा ये हुआ कि अब देश के टुकड़े-टुकड़े करने बालों ने सिर उठाये, जिन्हें तथाकथित घटिया सोच के बुद्धिजीवि प्रश्राय दे रहे हैं।

जेएनयू में कम्युनिस्ट विचारधारा के शिक्षकों का बोलबाला है और देश को अस्थिर करने के पीछे अभिव्यक्ति की आजादी के नाम का सहारा ले रहे हैं। अब वर्षों बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का छात्र, छात्र यूनियन में पहुंचा। केन्द्र में मजबूत राष्ट्रवादी भाजपा सरकार आई इसलिए वर्षों से चल रहे इस राष्ट्रविरोधी ग्रुप की पोल खुल गई।

आश्चर्य की बात है कि पिछले वर्ष अक्टूबर में जेएनयू में होने वाली राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की रिपोर्ट दिल्ली पुलिस ने गृह मंत्रालय को भेजी थी। उसके बाद भी पुलिस इस बारे में सरकार को जानकारी देती रही है। जेएनयू प्रशासन को भी इसकी भनक थी, फिर भी इतने बड़े कांड का घट जाना किसके सिर मढ़ा जायेगा? केन्द्र सरकार का लचीलापन, सहिष्णुता का डर या दिल्ली पुलिस की निष्क्रियता या जेएनयू का कमजोर प्रशासन या अलगाववादियों के बदलते पैंतरे। आखिर कहीं-न-कहीं तो चूक हुई है।

भारत के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते प्रभाव और अपने पैरों पर खड़े होने की ओर अग्रसर होते हुये देखकर राष्ट्रद्रोहियों के मन में जलन हो रही है। वही लोग मोदी सरकार को अस्थिर करने के लिए कूटनीतिक चालें चल रहे हैं। मोदी सरकार रहे या जाये। अगले चुनाव में भाजपा बहुमत में आये या न आये लेकिन नरेन्द्र मोदी जैसे कट्टर राष्ट्रवादी नेता जो अपने आप को भारत का प्रथम सेवक कहते हैं, उनसे ऐसे सांपों के फन कुचलने के लिये लोग इंतजार कर रहे हैं।

डॉ. विजय खैरा

(लेखक पेशे से डॉक्टर, स्वतंत्र विचारक, लेखक और राजनेता हैं। ये उनके अपने निजी विचार हैं)

 

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