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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपहास

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपहास

लांस नायक हनुमनथप्पा कोप्पड़ जब सियाचीन में देश रक्षा के दौरान बर्फ के तूफान में दबकर सेना के अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे, लगभग उसी दौरान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ मुट्ठी भर छात्र राष्ट्रविरोधी नारे लगाने में व्यस्त थे। वे देश तोडऩे के लिए मुट्ठियां हवा मे लहरा रहे थे और नारे लगा रहे थे, ” कश्मीर की आजादी तक जंग चलेगी’’ , ”भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी।’’ इससे ज्यादा विडंबना भला और क्या हो सकती है? अपने नवीनतम अनुसंधान, विद्वानों और नौकरशाहों के लिये जाना जाना जाने वाला जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय आज कुछ गलत वजह से सुर्खियों में है। यह विश्वविद्यालय विभिन्न विचारधाराओं को शरण देने की अपनी अनूठी संस्कृति के बारे में जाना जाता रहा है, लेकिन हाल में विश्वविद्यालय पर कुछ राष्ट्रविरोधी तत्वों ने डेरा जमा लिया है। ये राष्ट्रविरोधी तत्व, जो स्लीपर सेल की तरह बर्ताव करते आये थे, अचानक ही पिछले कुछ साल में सक्रिय हो गये हैं। 9 फरवरी को जो घटना जेएनयू में हुई उसे इससे अलग करके नहीं देखा जा सकता। इन देशद्रोही तत्वों को एक दशक के भीतर ही जेएनयू परिसर में तैयार किया गया है। विश्वविद्यालय का हिस्सा होने से लेखक कई घटनाओं का गवाह है, जो राष्ट्रविरोधी हैं। 2009 में दंतेवाड़ा में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 74 जवानों की हत्या पर इन तत्वों ने जैसी खुशी जाहिर की थी, उससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये कितनी विकृत प्रकृति के हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना की शुरुआत से ही वहां वामपंथ का प्रभुत्व रहा है, लेकिन पहले बहस और आंदोलन की संस्कृति राष्ट्र और समाज की भलाई के लिए होती थी। बाद में जेएनयू में वामपंथी अतिवादियों का दबदबा बढ़ा जिनकी राष्ट्रविरोधी तत्वों से सांठगांठ हो गई। उनका मकसद सिर्फ देश की बर्बादी की कामना करने वालों को पनाह देना था।

भारत-विरोधी नारे लगाने वाले और फांसी की सजा पाए आतंकवादी अफजल गुरु की प्रशंसा करने वाले छात्रों के खिलाफ उस वक्त कार्रवाई की गई, जब उन लोगों ने भारत की बर्बादी का नारा उछालकर सभी सीमाओं का उल्लंघन कर दिया। इन छात्रों के खिलाफ कार्रवाई जायज वक्त पर की गई, यही समय की मांग थी। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी पर यह दावा किया गया कि वह देशविरोधी नारे नहीं लगा रहा था, वह निर्दोष है और वह पूरी तरह से देश की अखंडता और संप्रभुता के लिए प्रतिबद्ध है और भारत के संविधान में विश्वास रखता है। लेकिन यह स्पष्ट है कि कन्हैया कुमार विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त छात्र समूह का अहम हिस्सा था, जिसकी वजह से वह जवाबदेही से बच नहीं सकता। उसे अदालत में अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा ही। यहां मामला महज कानूनी कार्रवाई का ही नहीं है, बल्कि देश के संविधान में दिये गये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में इन देशद्रोही तत्वों की गतिविधियों के खुलासे का भी है। कई परिसरों और सामाजिक क्षेत्रों में ऐसे तत्वों ने अपने पैर पसार लिए हैं। इस तरह की विभाजनकारी गतिविधियों के खुलेआम इजहार की वजह केन्द्र में पिछली यूपीए सरकार की ढिलाई है।

अब केंद्र में मोदी सरकार ने जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी को गंभीरता से लिया। ये राष्ट्रविरोधी तत्व एक तरफ देश के विभिन्न अंगों और संवैधानिक व्यवस्था की आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ सजा पाए आतंकवादी को शहीद बताते हैं जिसके हाथ बेगुनाहों के खून से सने रहे हैं और भारत के अुकड़े करने का आवाहन करते हैं। इस तरह के तत्वों पर लगाम लगाने के लिए केन्द्र सरकार ने अच्छा कदम उठाया है, लेकिन कुछ मामलों में निर्धारित तरीके से काम करने की जरूरत है। इस मामले को उसके तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने के लिये यह जरूरी है कि जो छात्र भारत विरोधी नारेबाजी कर रहे थे उन्हें उपयुक्त रूप से दंडित किया जाये। जेएनयू प्रशासन ने 9 फरवरी और उससे पहले क्या हुआ था उस पर एक बयान जारी करते हुए कहा था कि कुछ अराजक तत्व थे, जिन्होंने इस कार्यक्रम का आयोजन किया और विश्वविद्यालय में फ्री-स्पीच और बहस की संस्कृति का दुरुपयोग करके अपनी विभाजनकारी नीतियों को बढ़ावा देने का काम किया है। अगर हम इस बयान पर विचार करें तो एक प्रश्न यह उठता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने कार्रवाई के लिये पहले कोई कदम क्यों नहीं उठाया? असल में, इस घटना से परे जाकर विवि प्रशासन से यह पूछना चाहिए कि क्यों एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय पिछले कुछ वर्षों में चरमपंथी वाम दलों का अड्डा बन गया है? देश में अन्य विश्वविद्यालयों की तुलना में कुछ विश्वविद्यालयों के परिसरों में राजनीति, छात्र जीवन का अभिन्न हिस्सा है जैसे कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय किंतु जेएनयू, जो संविधान के खिलाफ जाने वाले छात्रों को मंच उपलब्ध कराता है, समाज के लिये एक नासूर की भूमिका अदा कर रहा है। इस तरह की गतिविधियां विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठिा को क्षति पहुंचाती हैं।

भारत में मुक्त भाषण पर कानून

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राष्ट्रद्रोहियों ने जो कुछ भी किया वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किया। लेकिन हमें एक बात याद रखनी चाहिए कि अमेरिकी संविधान की तरह ही हमारे संविधान ने भी छुपे तौर पर ‘चेक एंड बैलेंस’ की प्रणाली प्रदान की है। हमें भारत के संविधान में मौजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तथ्यों के विषय में पता होना चाहिए। संविधान में मौजूद अनुच्छेद 19(1)(ए) देश के सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसके अनुसार ”सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होना चाहिए।’’ लेकिन यह स्वतंत्रता बिनाशर्त नहीं है, यह संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में उल्लेखित उचित प्रतिबंध के तहत है। इसके दो उद्देश्य थे। पहला यह अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित करने वाले हर मौजूद कानून की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। दूसरा यह राज्य अधिकृत कानून भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित में अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, शालीनता और नैतिकता, अदालत की अवमानना के संबंध में, मानहानि या किसी अपराध के लिये दिये गये अधिकार पर उचित प्रतिबंध लागू करता है। हास्यास्पद यह है कि ये प्रतिबंध संविधान में मई 1951 में -जवाहर लाल नेहरू द्वारा लागू पहले संशोधन के दौरान जोड़े गये थे- जिन्हें देश का अब तक का सबसे उदार नेता माना जाता है। तब से अनुच्छेद 19 (2) का हवाला कई सारे कानूनों के जायज ठहराने के लिये दिया जाता रहा है। मसलन, राजद्रोह, मानहानि, अदालत की अवमानना, अश्लीलता, सरकारी गोपनीयता, अभद्र भाषा वगैरह जो अभिव्यक्ति की आजादी पर भी चोट करते है।

राजद्रोह पर कानून

इस पूरे मामले में विवाद का एक मुद्दा छात्र संघ के नेता पर राजद्रोह का आरोप लगाने का भी है। राजद्रोह मूलत: भारतीय दंड सहिता (आईपीसी)1862 में अस्तित्व में नहीं आया था, यह आईपीसी में 1870 में जोड़ा गया और इसका विस्तार 1898 में किया गया। धारा 124 ए के तहत यदि कोई व्यक्ति राजद्रोह का अपराध करता है, नफरत फैलाने या अवमानना का प्रयास करता है या असंतोष फैलाने का प्रयास करता है तो वह दंड का अधिकारी है। यह शब्दों में हो सकता है, बोल कर या लिखित में हो सकता है या हस्ताक्षर, प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व के तौर पर या किसी और तरह से हो सकता है। राजद्रोह के लिए अधिकतम सजा आजीवन कारावास हो सकती है। धारा 124 ए स्पष्ट तौर पर ”असंतोष’’ की भावनाओं की अभिव्यक्ति को देशद्रोह और शत्रुता में शामिल करता है।

सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या

1950 में संविधान लागू होने के शुरुआती दौर में कुछ उच्च न्यायालयों ने आईपीसी की धारा 124 ए को अनुच्छेद 19 (1) (1)के खिलाफ बताया था हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 1962 में बिहार राज्य बनाम केदारनाथ सिंह केस के दौरान आईपीसी की धारा 124 ए की वैधता बरकरार रखी। भारत के मुख्य न्यायाधीश बीपी सिन्हा की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि अनुभाग के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर प्रतिबंध लगाया गया है, लेकिन प्रतिबंध सार्वजनिक व्यवस्था के हित में थे और जहां मौलिक अधिकार के साथ अनुमत विधायी हस्तक्षेप के दायरे के भीतर था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून ने व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के हित के बीच सही संतुलन बैठाने की सही कोशिश की है। जेएनयू में हुई घटना के आयोजकों ने स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का इस्तेमाल ज्यादा ही खुलकर कर लिया।

ऐसी आजादी निस्संदेह ‘भारत’ के संविधान के द्वारा ही दी गई है- जिस संवैधानिक अधिकारों के दम पर भारत विरोधी नारे लगाये जा रहे थे। जहां अनुच्छेद 19(1) भाषणों, सभाओं और संगठन बनाने की आजादी देता है, तो वहीं दूसरी तरफ अनुच्छेद 19(2) द्वारा दिये गये अधिकारों पर उचित नियंत्रण लगाता है। अगर भारत विरोधी नारे लगाये गये, और शिकायतें दर्ज कराई गई, तो दिल्ली पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी होगी। इसलिये तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए गिरफ्तारियां और जांच करना आवश्यक है। इस मामले में पुलिस कार्रवाई नहीं करती है तो ये अराजकता को खुला निमंत्रण होगा। लोगों को भारत की बर्बादी के लिये उकसाना अभिव्यक्ति की आजादी की कानूनी सीमा से बाहर है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारत की संप्रभुता और सार्वभौमिकता पर खतरा आने नहीं दिया जा सकता और लगता है छात्रों ने यह समझने में भूल कर दी है कि यह हर तरह के संवैधानिक अधिकारों पर लागू होता है।

सौरभ दुबे

(लेखक शहीद भगत सिंह कॉलेज में प्राध्यापक है और जेएनयू के छात्र रह चुके है)

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