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लाल गढ़ में झोलेवालों का आतंक बरकरार

लाल गढ़ में झोलेवालों का आतंक बरकरार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के परिसर में रहने वालों या उसके जानकारों के लिए 9 फरवरी 2016 की घटना में कुछ भी नया नहीं था क्योंकि वहां ऐसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं। याद कीजिए, नब्बे के दशक के मध्य में हवाला कांड के उजागर होने पर परिसर से एक आतंकवादी शहाबुद्दीन गोरी को गिरफ्तार किया गया था। 1996 में भाकपा-माले की छात्र इकाई आइसा (एआइएसए) ने छात्रों को संबोधित करने के लिए कश्मीर घाटी से आतंकवादियों को बुलाया था लेकिन परिसर में राष्ट्रवादियों ने वह आयोजन नहीं होने दिया था। 2000 में एक वामपंथी संगठन द्वारा आयोजित मुशायरे में भारत विरोधी शायरी पर विरोध जताने पर सेना के दो जवानों की बुरी तरह पीटा गया था। 2009 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा में 70 से ज्यादा अद्र्धसैनिक बल के जवान मारे गए तो परिसर में आइसा और दूसरे नक्सली गुटों ने जश्न मनाया और भारतीय झंडे को जलाया था। कुछ साल पहले जेएनयू के एक छात्र को नक्सलों से संबंध रखने के लिए गिरफ्तार किया गया, जो देश के कई हिस्सों में लोगों को अगवा करने में शामिल था।

ये तो कुछ ही घटनाएं हैं। ऐसी अनेक घटनाएं वहां होती रही हैं जो कभी बाहर नहीं आ पातीं। पाठकों को यह जानकर हैरानी होगी कि ऐसी घटनाओं के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि ऐसे तत्वों को परिसर में निहितस्वार्थी तत्वों की शह प्राप्त होती है। मीडिया भी ऐसी घटनाओं को कभी गंभीरता से नहीं लेता। अगर मीडिया ने हाल की घटना को भी नहीं उठाया होता तो यह भी आई-गई हो जाती।

इस पर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ हमेशा की तरह अभिव्यक्ति की आजादी, जेएनयू की स्वायत्तता वगैरह पर खतरे का हल्ला शुरू हो गया है। गिरफ्तारी के खिलाफ हर रंग के राजनैतिक नेता परिसर में पहुंच गए। विडंबना देखिए कि बंगाल और केरल में सत्ता में पहुंचने या यहां तक कि जेएनयू में भी किसी को अभिक्यक्ति की आजादी की इजाजत न देने वाली माकपा भी हमें इस पर भाषण पिला रही है। देश में इमरजेंसी लगाने वाली और अपने 60 साल के शासन में कई बार विरोध का गला घोंट चुकी कांग्रेस भी अभिव्यक्ति की आजादी की आवाज बुलंद कर रही है। जबकि कांग्रेस सैटानिक वर्सेस पर पाबंदी लगा चुकी है, निर्भया कांड और अन्ना आंदोलन के दौरान छात्रों के आंदोलन पर बुरी तरह कहर बरपा चुकी है।

असल में कांग्रेस ने कम्युनिस्टों को जगह दिलाने के लिए ही जेएनयू की स्थापना की थी इसलिए यह स्वाभाविक है कि देश की एकता और संप्रभुता की कीमत पर भी वह उनका बचाव करे। दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहां अलगाववादी नारे गूंजे, जहां अफजल गुरु और मकबूल बट को हीरो बताया गया हो, ऐसे मुद्दे को भी राजनैतिक शह-मात का खेल बनाया जा रहा है।

अब कहा यह जा रहा है कि कुछ हाशिए के वाम गुटों ने यह आयोजन किया था। सवाल यह है कि इसकी इजाजत किसने दी? दूसरा सवाल है कि अब इस घटना से दूरी बनाने वाले आइसा, एसएफआई जैसे संगठनों ने उसे रोकने के लिए कुछ क्यों नहीं किया? क्या यह एक वाम गुट के द्वारा दूसरे को शह देने का मामला है या फिर रोग कहीं ज्यादा गंभीर है जो सतह पर नहीं दिखता है?

इन सवालों के जवाब तलाशने होंगे और ये पूरी जांच-पड़ताल से ही सामने आ सकते हैं। अगर खबरों की मानें तो इन आयोजनों को घाटी के अलगाववादी गुटों के समर्थन के संकेत मिलते हैं और कुछ के मुताबिक तो इन्हें हाफिज सईद का आशीर्वाद भी प्राप्त था। अगर इनमें रत्ती भर भी सच्चाई हो तो इन्हें अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जाने नहीं दिया जा सकता। अगर ये खबरें सच हैं तो इससे राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर सवाल खड़े होते हैं और इनकी पूरी पड़ताल की दरकार है।

असली सवाल यह है कि क्या जेएनयू की अध्यापक बिरादरी ने देशहित के खिलाफ तत्वों को सुरक्षित पनाहगाह दे रखा है? बेशक इन अध्यापकों में ज्यादातर अपने वैचारिक रुझान की वजह से यहां नौकरी पाए हैं और इनमें ज्यादातर अपने युवा अवस्था में भाकपा, माकपा, भाकपा-माले की छात्र इकाइयों में सक्रिय रहे हैं। ऐसी हर घटना के बाद बार-बार यही सफाई दी जाती है कि जेएनयू दूसरी जगहों जैसा नहीं है, यहां हर किसी को कुछ भी और किसी भी तरीके से कहने की आजादी है। इससे लंबे दौर में विश्वविद्यालय का नुकसान ही होने वाला है क्योंकि वहां ऐसी तमाम गतिविधियों में जुडऩे की छूट इस भरोसे मिल जाती है कि अध्यापक समुदाय तो बचा ही लेगा।

फिर, ऐसी सभी सफाई और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हर चीज को जायज ठहराने की कोशिश जारी रही तो छात्र किसी भी हद तक जा सकते हैं। ऐसे विचारों के पैरोकारों ने छात्रों को कानून अपने हाथ में लेने की छूट दी है और जब चीजें काबू से बाहर हो गईं तो सफाई पेश कर रहे हैं। अब हम तमाम तरह की दलीलें सुन रहे हैं और जेएनयू को बचाने की मुहिम सुनाई पड़ रही है।

05-03-2016

इससे कोई भी राजी होगा कि जेएनयू को बचाया जाना चाहिए लेकिन सवाल है कि किसके लिए? क्या जेएनयू को उनके लिए बचाया जाना चाहिए जो एक खास तरह की विश्वदृष्टि के नशे में दूसरे तरह के विचार वालों का माखौल उड़ाते रहे हैं और विश्वविद्यालय में वर्षों से विभिन्न पदों पर काबिज हैं? क्या विश्वविद्यालय को उन लोगों के चंगुल से बचाया जाना चाहिए जो वहां यह विचार फैलाते हैं कि भारत कोई एक राष्ट्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीयताओं का समूह है?

क्या इसे उन लोगों के लिए बचाया जाना चाहिए जिन्होंने वहां फैकल्टी में दाखिले का यह आधार बना रखा है कि ”तुम मेरे शिष्य का ध्यान रखो और मैं तुम्हारे’’? क्या इसे उन लोगों के लिए बचाया जाना चाहिए जो लंबे समय से मानते आ रहे हैं कि परिसर को राष्ट्रविरोधी विचारों को हवा देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है और अलगाववादी गतिविधियों के कंट्रोल रूम के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है?

जब तक इस सवाल के सही जवाब नहीं मिल जाते कि आखिर जेएनयू किसके लिए बचाओ, ऐसा लगता है कि हर कीमत पर राष्ट्रविरोधी आयोजन के कर्ताधर्ताओं को बचाना ही एकमात्र लक्ष्य है। अगर यह होने दिया गया तो यह विश्वविद्यालय के लिए ही नुकसानदेह होगा इसलिए जेएनयूटीए समेत सभी को इस मामले में सफाई देनी चाहिए। जेएनयूटीए ने 14 फरवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोहरा रवैया ही जाहिर किया जिससे यह नहीं पता चलता की ‘जेएनयू बचाओ’ किसके लिए है?

मुझे यह सवाल अक्सर परेशान करता रहा है कि अगर उनके कहे के मुताबिक देशविरोधी नारे लगाने वाले लड़के मुट्ठी भर हैं तो ‘जेएनयू बिरादरी’ क्यों कभी ऐसे तत्वों को अलग-थलग करने की नहीं सोचती, क्यों अध्यापक ऐसे तत्वों के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते? आज भी जेएनयू की दीवालों पर नगालैंड, मणिपुर, असम, केरल और कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले पोस्टर चिपके हुए हैं। असली बात यह है कि लंबे समय से देशविरोध गतिविधियों को जारी रखने की इजाजत दी जाती रही है और अब इसे नजरअंदाज करना संभव नहीं है। जवाबदेही भाकपा, माकपा, भाकपा-माले जैसी पार्टियों और अध्यापकों की भी है जो यह कहकर बच नहीं सकते कि कुछ अनजाने चेहरे इसके लिए जिम्मेदार हैं।

असली संदेश यही है कि हम जेएनयू के पूर्व छात्रों को विश्वविद्यालय पर गर्व है और इसलिए हम यही उम्मीद करते हैं कि विश्वविद्यालय राष्ट्रविरोधियों और अलगाववादियों का अड्डा न बन जाए।

मैं अपने छात्र दिनों में विश्वविद्यालय में यह सब करीब से देख चुका हूं कि आपके ग्रेड भी इससे तय होते हैं कि आपका वैचारिक रुझान क्या है। सो, अगर आप एबीवीपी से जुड़े हैं तो कोई कार्डहोल्डर टीचर बी ग्रेड ही देगा। आप भाग्यशाली हुए तो भले ए ग्रेड पा जाएं। इसी तरह आपको अगर दूसरी विचारधारा का गइड मिल गया तो समझिए सब गुड़ गोबर है।

संदीप महापात्रा

(लेखक जेएनयू छात्र संघ के भूतपूर्व अध्यक्ष है)

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