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जेएनयू संकट का राजनीतिकरण

जेएनयू संकट का राजनीतिकरण

यह सवाल पिछले कुछ दिनों में कई दोस्तों ने मेरे सामने रखा कि निर्विवाद रूप से देश की बेहतरीन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से जुड़े मौजूदा संकट के बारे में मेरा नजरिया क्या है? जवाब देने के पहले, आइए जरा इस संकट पर नजर डाल लें। यह छात्रों के एक तबके के ”गैर-कानूनी’’ जमावड़े से भड़का, जहां ”कश्मीर की आजादी तक जंग चलेगी, भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी’’ जैसे नारे लगाए गए। इसके बाद पुलिस परिसर में गइ्र्र और जेएनयू छात्र संघ (जेएनयूएसयू) के अध्यक्ष को गिरफ्तार किया। उस पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया है। निचली अदालत में उसकी पेशी के दौरान अदालत के परिसर में कुछ अध्यापकों ओर छात्रों के साथ कथित तौर पर कुछ वकीलों ने मारपीट भी की। इस बीच विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने जेएनयूएसयू अध्यक्ष सहित कई छात्रों को प्रथमदृष्टया दोषी पाया और उन्हें फिलहाल मुअत्तल कर दिया दिया है। इसके खिलाफ जेएनयू के छात्रों ओर अध्यापकों के आंदोलन को अब कई दूसरे विश्वविद्यालय परिसरों से भी समर्थन मिल रहा है। इसमें खासकर कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में तो जाने-पहचाने कश्मीरी आतंकवादियों और कश्मीर को भारत से अलग करने के वही नारे न सिर्फ दोहराए गए, बल्कि मणिपुर को भी भारत से अलग करने की मांग भी उठाई गई!

मेरी राय में जेएनयू संकट से दो मूल मुद्दे उभरते हैं। एक ओर वे लोग हैं जिनका मानना है कि लोकतांत्रिक भारत में विचारों और अभिव्यक्ति की पूरी आजादी है इसलिए कोई कुछ विचार व्यक्त करता है या मांग करता है तब तक सरकार उसमें दखल नहीं दे सकती जब तक कोई हिंसा नहीं होती। दूसरी ओर कुछ लोगों का मानना है कि कोई भी अधिकार, चाहे वह मूलभूत अधिकार ही क्यों न हों, निरपेक्ष नहीं है, खासकर जब मामला देश की एकता और अखंडता का हो। उनकी नजर में जेएनयू राष्ट्रविरोधियों का गढ़ बनती जा रही है और उसे केंद्र सरकार से खैरात देने की दरकार नहीं है क्योंकि आखिरकार यह करदाताओं के पैसे से ही दिया जाता है। इन ईमानदार करदाताओं का पैसा छात्रों की शिक्षा के लिए तो दिया जाना चाहिए मगर राष्ट्रविरोधी राजनीति के लिए नहीं दिया जाना चाहिए। इस तरह यह दलील विश्वविद्यालय को ”बंद’’ करने के पक्ष में है।

ऐसे में, मेरा नजरिया क्या होना चाहिए? आखिर मैं भी जेएनयू का छात्र होने के नाते उतना ही गर्व महसूस करता हूं, जितना कोई और। मैं भी अनेक छात्रों की तरह जेएनयू की छात्र राजनीति में सक्रिय हुआ करता था। मैं जेएनयूएसयू का भी हिस्सा था। एक बार जेएनयू परिसर में पुलिस अत्याचारों की वजह से मैं लाठी झेल चुका हूं और 21 दिनों तक तिहाड़ जेल की हवा खा चुका हूं (उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और वे इमरजेंसी के दिन भी नहीं थे। इसलिए परिसर में पुलिस का प्रवेश कोई नई बात नहीं है)। तो, मौजूदा विवाद पर मेरा नजरिया इस प्रकार है :

एक, यह कहना कोरा बकवास है कि जेएनयू राष्ट्रविरोधी विश्वविद्यालय है। हां, वहां कुछ राष्ट्रविरोधी तत्व हो सकते हैं, उनकी पहचान की जानी चाहिए और उन्हें अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए। लेकिन उन कुछ मुट्ठी भर तत्वों की वजह से पूरे विश्वविद्यालय को राष्ट्रविरोधी नहीं करार दिया जा सकता। इस विश्वविद्यालय से अकादमिक, अफसरशाही, कारपोरेट, मीडिया या सेना लगभग हर क्षेत्र में कुछ बेहतरीन प्रतिभाएं निकली हैं। मैं भी आज जो हूं, इसी विश्वविद्यालय की वजह से हूं।

दूसरे, मैं अपने विश्वविद्यालय के दिनों से यकीन करता रहा हूं, असहमति और अभिव्यक्ति तथा बोली की स्वतंत्रता महान मूल्य हैं। मैं बतौर संपादक हमेशा इन मूल्यों को आगे बढ़ाता रहा हूं। मेरी राय में लोकतंत्र में हर विवादास्पद मुद्दे को बहस और बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए, न कि हिंसा के जरिए। इसी वजह से मैं निचली अदालत परिसर में जेएनयू प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा की घोर भत्र्सना करता हूं।

दरअसल, पत्रिका के इस अंक में मैंने मौजूदा विवाद पर जेएनयूएसयू के तीन पूर्व अध्यक्षों से लिखवाया जबकि मैं इस विषय पर उनके विचारों से पूरी तरह सहमत नहीं हूं। मैंने यह भी आश्वस्त किया कि मेरे सहयोगी कुछ दूसरे जेएनयूएसयू अध्यक्षों के विचारों को भी पर्याप्त जगह दें। इनमें माकपा नेता सीताराम येचुरी (जिनकी राजनीति के खिलाफ मैंने परिसर में भी लोहा लिया लेकिन हमेशा उनके प्रति आदर का भाव रखा), डी.पी. त्रिपाठी (राज्यसभा सदस्य) और प्रो. आनंद कुमार (इन दोनों से मेरे व्यक्तिगत रिश्ते प्रगाढ़ रहे हैं जबकि उनकी राजनीति से मैं सहमत नहीं हूं) प्रमुख हैं।

तीसरे, सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मैं व्यवस्था विरोधी होने और राष्ट्रविरोधी होने के बीच साफ-साफ फर्क करता हूं। मेरे जेएनयू के दिनों में हमने कभी भारत की राष्ट्रीयता, उसकी एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था पर बहस नहीं की, बल्कि इनके खिलाफ विचारों को चुनौती देते रहे हैं। इसलिए मुझे किसी राजनैतिक सत्ता की नीतियों की धज्जियां उड़ाने में कोई दिक्कत नहीं है। जैसे हम उस दौर में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की आलोचना करते हैं इसलिए अगर कोई मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों या गड़बडिय़ों की आलोचना करता है तो कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए।

हालांकि जब आलोचना इस स्तर पर उतर जाए कि हमारी राष्ट्रीयता के वजूद को ही चुनौती देने लगे तो मामला अलग हो जाता है। इसलिए मेरा यह पक्का मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी निरपेक्ष कभी नहीं हो सकती। मैं इस मामले में अपने प्रिय दोस्त, जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष एन.आर. मोहंती से सहमत नहीं हूं, जिन्होंने अमेरिका का उदाहरण दिया है, जहां अधिकार संपूर्ण और निरपेक्ष होते हैं। उन्होंने इस मामले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के कुछ प्रसिद्ध फैसलों का हवाला दिया है। इस संबंध में उनको मेरा जवाब यह है कि किसी देश की न्यायपालिका शून्य में फैसले नहीं सुनाती, उसके फैसले देश की तत्कालीन स्थितियों से प्रभावित होते हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का संविधान के पहले संशोधन के महत्व पर फैसला अमेरिका पर 9/11 हमले के पहले सुनाया गया था। सो, आश्चर्य नहीं कि आज अमेरिका में कोई भी पूर्ण और निरपेक्ष अधिकारों की बात नहीं करता।

दरअसल, आज अगर आप अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की इमारत के बाहर कोई प्रतिरोध करने का संकेत भी दें तो आप गिरफ्तार कर लिए जाएंगे, जुर्माना लगाया जाएगा और जेल भेज दिए जाएंगे। चैटग्रुप या ई-मेल पर बात करने वाले बच्चे भी गिरफ्तार किए जा सकते हैं, उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है, जेल भेजा जा सकता है, जैसा कि कुछ दिन पहले ही वर्जिनिया और दूसरे राज्यों में कुछ किशोरों के साथ हुआ। हर अमेरिकी सरकार लगातार गोपनीयता पर जोर देती है, असुविधाजनक दस्तावेजों को सार्वजनिक निगाहों से दूर रखती है और उसके ”सुरक्षा तंत्र’’ को भेदने की कोशिश करने वालों को दंडित करती है। अमेरिकी सेना अपने अधिकारियों और जवानों की बोली पर पूर्ण नियंत्रण रखती है और उन पूर्व अधिकारियों पर भी पूरा नियंत्रण रखती है जो उसकी गोपनीय सूचनाओं से परिचित होते हैं। यहां तक कि अगर आपके ”भाषण लाड़ाकू’’ हों तो आप सिखचों के भीतर जा सकते हैं। आप किसी को भड़काने के लिए भी जेल जा सकते हैं। अगर ”दंगा भड़काने’’ वाला भाषण हो तो जेल जा सकते हैं। अगर आप ”बेतुका खतरा’’ पैदा करने की कोशिश कर रहे हों तो भी आपकी अभिव्यक्ति की आजादी आपको जेल में पहुंचा सकती है।

इन उदाहरणों से मेरी यह राय ही पुष्ट होती है कि अभिव्यक्ति की आजादी निरपेक्ष नहीं हो सकती। समस्या तब होती है जब हमारे देशद्रोह या सुरक्षा संबंधी कानूनों का इस्तेमाल चुनींदा मामलों में किया जाता है। इससे जेएनयू विवाद के संदर्भ में यह दलील देने वालों को दम मिल जाता है कि अगर कश्मीर घाटी में आए दिन अलगाववादी बगावत की बात करते हैं तो जेएनयू के बेचारे छात्रों को क्यों सजा दी जानी चाहिए। पर इसका जवाब आसानी से दिया जा सकता है। शायद इसकी पूरी जानकारी नहीं है कि अंग्रेजों का बनाया देशद्रोह कानून या 1980 में इंदिरा गांधी सरकार का बनाया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जम्मू-कश्मीर राज्य में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत लागू नहीं होता है।

लेकिन राष्ट्रविरोधियों के खिलाफ कानून के चुनींदा इस्तेमाल की बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। जरा मोदी सरकार की इस मामले में असहायता पर गौर कीजिए। दिल्ली में पुलिस उसके अधीन है इसलिए जेएनयू के छात्रों के खिलाफ तो उसने कार्रवाई कर ली, लेकिन पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में ऐसा ही अपराध करने वाले खुला घूम रहे हैं। इससे भी बढ़कर यह है कि मोदी सरकार हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के घटनाक्रम पर पूरी तरह बचाव की मुद्रा में रही है। वहां रोहित वेमुला ने दुर्भाग्य से आत्महत्या कर ली लेकिन वे भी कश्मीर के स्व-निर्णय के अधिकार और देश के सुप्रीम कोर्ट द्वारा आतंकवादी घोषित एक आतंकवादी को फांसी की सजा के खिलाफ नारे लगाने में शामिल थे। इस मामले में रोहित की राष्ट्रविरोधी छवि उसके ”दलित’’ होने के नाते फीकी पड़ गई। सो, आश्चर्य नहीं कि जेएनयूएसयू के अध्यक्ष की गिरफ्तारी में कई नेता, जिनमें मोदी के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भी शामिल हैं, कह रहे हैं कि वह दोषी हो तब भी उसे छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि वह बिहार का ”भूमिहार’’ है।

दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में कानून से अधिक संकीर्ण राजनैतिक स्वार्थों (इस मामले में पहचान की राजनीति) को तवज्जो दी जाती है। इसलिए मैं जेएनयू विवाद के कानूनी पहलू पर गौर नहीं कर रहा हूं। इसका ख्याल तो न्यायपालिका रखेगी। अगर आरोप कानून के दायरे में नहीं ठहरते तो गिरफ्तार किए को छोडऩा पड़ेगा। लेकिन विवाद कानूनी समाधान से ही नहीं मिटेगा क्योंकि वह राजनैतिक रूप ले चुका है। मोदी के आलोचक इसे उनके फासीवाद की मिसाल की तरह पेश करेंगे और सत्तारूढ़ पार्टी के लोग इसका इस्तेमाल मोदी को महान राष्ट्रवादी बताने के लिए करेंगे।

मेरी दिलचस्पी यह सच्चाई पता लगाने में है कि क्या वाकई जेएनयू में भारत विरोधी ताकतें छात्र संघों में इस कदर घुसपैठ कर चुकी है कि भारत की आंतरिक सुरक्षा को खतरा पहुंचा सकें। आखिरकार यह जग जाहिर है कि माओवादियों और आइएसआइ के पैसे से सक्रिय जेहादी तत्वों (जिनमें ज्यादातर अलगाववादी हैं) के बीच गहरी सांठगांठ है। ये खबरें भी हैं कि माओवाद में यकीन करने वाले कुछ छात्रों ने जेएनयू परिसर में कश्मीर की आजादी का नारा लगाने के लिए कुछ बाहरी तत्वों को बुलाया था। मुझे यह भी शक है कि कहीं जेएनयू विवाद जानबूझकर जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा की गठजोड़ की सरकार नए सिरे से बनाने की कोशिशों में फच्चर लगाने के लिए तो नहीं किया गया। जम्मू-कश्मीर में फिलहाल राष्ट्रपति शासन है।

सच्चाई तो पूरी जांच-पड़ताल से बाहर आ पाएगी। इसलिए हमें दिल्ली पुलिस या दूसरी सुरक्षा एजेंसियों पर लानत मलामत नहीं करनी चाहिए। मेरे लिए संपूर्ण अधिकारों से ज्यादा भारतीय राष्ट्र का स्थायित्व जरूरी है। आखिर, अधिकार राष्ट्र से ही निकलते हैं, अधिकारों से राष्ट्र नहीं बनता।

प्रकाश नंदा

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