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जेएनयू की घटना विशुद्ध ‘राजद्रोह’

जेएनयू की घटना विशुद्ध ‘राजद्रोह’

हाल की दो घटनाओं का आपस में गहरा संबंध है, भले ही यह संबंध अनायास ही क्यों न हो। पहली घटना अमेरिका की ओर से पाकिस्तान को आठ स्न-16 लड़ाकू विमानों की बिक्री की है जिसे आतंकवाद से लडऩे में मदद का नाम दिया जा रहा है, जबकि दूसरी घटना जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों के एक समूह की ओर से किया गया वह विरोध मार्च है जिसके बाद उनके खिलाफ देशद्रोह के आरोप लगे और फिर उन गुनहगारों को तमाम राजनीतिक दलों ने आनन-फानन में समर्थन भी दे दिया। जैसा कि हम जानते हैं जेएनयू में हुए विरोध का नेतृत्व जेएनयू छात्र संघ की ओर से उस आतंकवादी अफजल गुरु की बरसी पर किया गया था, जिसे भारत की सरकार ने आतंकवाद के आरोपों में फांसी पर चढ़ा दिया था। इन दोनों ही घटनाओं को हम बड़ी आसानी से एक दूसरे के साथ जोड़ सकते हैं। भारत की संप्रभुता को निशाना बनाने के लिए पाकिस्तान अपनी जमीन और अपने संसाधनों का इस्तेमाल करता रहा है, और इस काम में जब अमेरिका जैसे देश आर्थिक मदद करते हैं, तो उसे अफजल गुरु और याकूब मेमन जैसे लोग ही अंजाम देते हैं। फिर एक और घटना सियाचिन में हिमस्खलन की है जिसने हम से हमारे उन बहादुर जवानों को छीन लिया जो हमारी सुख शांति के लिए हमारी रक्षा बाहरी आक्रमणों से करते हैं।

05-03-2016विडंबना यह है कि सारे राजनीतिक दल, कार्यकर्ता, पत्रकार और बुद्धिजीवी एक सुर से पाकिस्तान को लड़ाकू विमानों की बिक्री की निंदा करेंगे, वे सियाचिन के सैनिकों की शहादत को भी सम्मान देंगे, लेकिन वे परिसरों में छात्रों के विरोध के मुद्दे पर बंट जाएंगे जो देश की संप्रभुता पर निश्चित रूप से एक धीमे और गुपचुप युद्ध के समान है। कोर्ट की यह अवमानना तथाकथित धर्मनिरपेक्षों और नव-राष्ट्रवादियों को भी दिखाई नहीं पड़ती। और जब इस प्रकार की हैरान करने वाली और देशद्रोह की घटनाओं का समर्थन राजनीतिक दलों की ओर से किया जाता है, तब परिस्थिति और चिंताजनक बन जाती है क्योंकि इन दलों के लोग आखिरकार राज्यों और केंद्र की विधायिकाओं में हमारा प्रतिनिधित्व करने की होड़ में शामिल हैं। यही नहीं, उस भूमिका में उन पर इस देश की रक्षा बाहरी खतरों से करने की होगी। आर्थिक लाभ की तो बात ही छोड़ दीजिए क्योंकि स्वतंत्रता के कई दशक बाद भी उसकी जिम्मेदारी सिर्फ आम जनता के कंधों पर ही है। जेएनयू के प्रदर्शनकारियों के जुलूसों और उनकी मांगों के बीच राहुल और केजरीवाल जैसे लोकप्रिय जन नेताओं का जाकर समर्थन हासिल करना यह दिखाता है कि हम राजनीति के खेल में कितनी बुरी तरह फंस चुके हैं। विरोध करने के हमारे अधिकारों की गलत व्याख्या के कारण एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि धर्म, जाति और वर्ग सत्ता हासिल करने के कारगर राजनीतिक हथियार बन गए हैं।

आइए अब इसका विश्लेषण करते हैं। स्वतंत्रता से पूर्व के भारत में, अभिव्यक्ति की आज़ादी के माध्यम से राष्ट्रवादी अपने विचारों को व्यक्त कर लोगों को एकजुट किया करते थे। औपनिवेशिक सरकार जब कभी कोई ऐसा कानून लाती थी जो प्रेस और अभिव्यक्ति की आजादी को कम करने का प्रयास करता, तो जन आंदोलनों से इसका जबरदस्त विरोध किया जाता था। उस युग के राष्ट्रवादियों, यहां तक कि समाजवादियों और कम्युनिस्टों को भी मालूम था कि अभिव्यक्ति की आज़ादी क्या है और उन्होंने इस हथियार का इस्तेमाल भारत को उपनिवेशवाद और विदेशी प्रभुत्व के कलंक से मुक्त कराने के लिए किया। किंतु आज के समाजवादियों और कम्युनिस्टों ने इस आजादी को कहां पहुंचा दिया है? या हमें यह नहीं कहना चाहिए कि उन्होंने दुनिया भर में ख्याति प्राप्त करने वाली माक्र्सवाद, समाजवाद और साम्यवाद की विचारधाराओं का प्रयोग महज सत्ता और भ्रष्टाचार के अपने विचार का पोषण करने के लिए किया है। जवाहरलाल नेहरू और लाला लाजपत राय ने जहां नौजवानों में स्वराज की भावना का संचार किया था, वहीं आज के तथाकथित कम्युनिस्ट और धर्मनिरपेक्ष लोग उन्हीं नौजवानों में कैंपस की राजनीति से विभाजनकारी राजनीति और देश-विरोधी भावनाओं को भर रहे हैं। दुख होता है कि माक्र्स और लेनिन जैसे लोगों का स्थान अफजल गुरु और याकूब जैसे लोग ले रहे हैं।

राजनीति से जुड़े तमाम नेताओं को भले ही दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र, सियाचिन ग्लेशियर पर लड़ रहे सैनिकों की हालत पर विचार करने का समय न मिला हो, लेकिन उनके पास यह कहने का पर्याप्त अवसर था कि हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र, रोहित वेमुला की खुदकुशी का संबंध पिछड़ों के दमन और राजनीतिक विद्वेश से था। उनके पास वामपंथियों से जुड़े छात्र नेता, कन्हैया कुमार पर सरकारी कार्रवाई की निंदा करने का पूरा साहस था, जो ‘जो बिना डाकखाने वाले देश’ की उस प्रदर्शन का हीरो था जिसका आयोजन भारत की संसद पर हमले की साजि़श रचने वाले अफजल गुरु की बरसी पर किया गया था।

किसी ने भी वेमुला की खुदकुशी और याकूब मेमन को फांसी की सज़ा के खिलाफ उसके विरोध की निष्पक्ष जाँच की माँग नहीं की, लेकिन इतना अवश्य हुआ कि तमाम नेताओं ने इसे एक सरकारी हत्या का नाम दिया, जो दलितों के दमन का एक उदाहरण था। दुख होता है कि भारत के नेताओं का ऐसी घटना के प्रति इतना समर्पण है जो उन्हें राजनीतिक लाभ दे सकती है। हालांकि, उन्हें भारत-विरोधी घटनाओं और अभिव्यक्ति की आजादी के घोर दुरुपयोग की कोई चिंता नहीं है।

भारत में कैंपस की राजनीति का समर्थन स्वतंत्रता से पूर्व के राष्ट्रवादियों ने भी किया था जिन्होंने लोकतंत्र और सामाजिक-आर्थिक उत्थान में युवाओं को प्रमुख बल के रूप में देखा था। और इसके परिणाम भी सामने आए थे। अस्पृश्यता, बाल विवाह, जमींदारी और सांप्रदायिकता जैसी बुराइयों से लडऩे के लिए उस समय भारत के विश्वविद्यालयों को राजनीतिक रूप से शिक्षित किया गया, और उसका लाभ हमें आज भी मिल रहा है। हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद, भारत की राजनीति जब राष्ट्रवाद से वोट हासिल करने और बहुमत पाने की ओर चली गई, तब विश्वविद्यालय वर्ग आधारित और धर्म आधारित राजनीति के उर्वर क्षेत्र बन गए। विश्वविद्यालय के चुनावों में हिंसा और बाहुबल के साथ धनबल के इस्तेमाल से यह बात साबित हो जाती है। धीरे-धीरे और लगातार हो रहे इस परिवर्तन ने हमें इस हद तक ला दिया कि कैंपसों में राष्ट्र-विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार से किया जाने लगा है। यह शर्म की बात है कि कभी अपनी शैक्षणिक श्रेष्ठता के कारण प्रसिद्ध, जेएनयू आज सेक्स से लेकर ड्रग्स और हिंसा से लेकर राष्ट्र-विरोधी प्रदर्शनों के लिए कुख्यात हो गया है।


जेएनयू के ढोंगी


05-03-2016

रोहित वेमुला की आत्महत्या और जेएनयू के एक छात्र नेता की गिरफ्तारी पर विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से जिस प्रकार समर्थन और एकजुटता का सैलाब उमड़ा वह महज उस ढोंग और दोहरे मानदंडों को दिखाता है, जिसमें हम स्वतंत्रता से पहले भी जकड़े थे और आज भी जकड़े हैं जबकि लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली की सरकार को हमारी धड़कन माना जाता है। सबसे पहले तो एक सीधे सवाल का स्पष्ट उत्तर चाहिए। ‘कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’, ‘पाकिस्तान जि़ंदाबाद’, ‘अफजल गुरु की न्यायिक हत्या’- क्या ये नारे और अभिव्यक्तियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं या वे राष्ट्र-विरोधी हैं?

कई लोग कह सकते हैं कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं लेकिन कोई भी उनके पीछे की संपूर्ण राष्ट्र-विरोधी भावना से इनकार नहीं कर सकता है। सारी पार्टियों ने इस नारेबाजी की निंदा की है, चाहे वह कांग्रेस हो, सीपीआई, सीपीएम या आप, फिर क्यों उनके सारे शीर्ष नेता जेएनयू कैंपस में एकजुट हो गए और गिरफ्तार छात्र नेता की रिहाई की माँग करने लगे? इस बात से ही भारतीय राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ कैंपस की राजनीति का ढोंग बेनकाब हो जाता है। और फिर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का माहौल हमेशा से ही वामपंथ से प्रभावित रहा है, और इसका कारण न केवल छात्रों का साम्यवाद के प्रति झुकाव रहा है बल्कि अधिकांश शिक्षकों की दिलचस्पी भी वामपंथी विचारधारा को लेकर रही है।

यही कारण है कि उनके कैंपस में जब देशद्रोह की गंभीर घटना सामने आई तब ‘जेएनयू बचाओ’ आंदोलन चलाने वाले जेएनयू के चरम वामपंथी छात्रों के संगठनों और शिक्षक संघों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। इसकी बजाए, उन्हें पुलिस की छापेमारी से चिंता होने लगी कि इससे शैक्षणिक उत्कृष्टता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और उनके प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की साख गिरेगी। यह देखकर हैरानी होती है कि किसी को भी इस बात की जरा सी भी चिंता नहीं कि एक ऐसे विश्वविद्यालय के परिसर में राष्ट्र-विरोधी तत्व सक्रिय हैं जिसे शैक्षणिक उत्कृष्टता को बनाए रखने के लिए सरकार की ओर से इतनी बड़ी धनराशि मिलती है। अफसोस की बात है कि ‘कन्हैया को रिहा करो’जैसे नारे जेएनयू में लगाए जा रहे हैं, जबकि सिर्फ एबीवीपी और अन्य दक्षिणपंथी समूह इनका विरोध कर रहे हैं। यही नहीं, यदि जेएनयू की चौंकाने वाली घटना के आयोजक, उमर खालिद को सबसे पहले गिरफ्तार किया जाता, तब देश के कई नेता इसे भयावह सांप्रदायिक रंग देने में देर नहीं करते, जैसा कि रोहित के कथित दलित संबंध को सरकार के खिलाफ राजनीतिक रूप से जमकर भुनाया गया।

05-03-2016

यह समझ लेना चाहिए कि यह जेएनयू की अकेली ऐसी घटना नहीं है जिसने भारत की संप्रभुता को ठेस पहुंचाने का काम किया है। इस विश्वविद्यालय के कैंपस में पहले भी कई बार आतंकवादियों की मौत की जयजयकार हो चुकी है, और इन सबके लिए वह छात्र राजनीति जिम्मेदार है जिसे अल्पसंख्यक समूह के छात्रों का वोट चाहिए। दूसरी तरफ, विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन घटना में हस्तक्षेप नहीं किया। और देखिए आज हम कहां आ गए हैं। जेएनयू के शिक्षक और छात्र मांग कर रहे हैं कि आरोपी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई न की जाए, इसकी बजाए वे विश्वविद्यालय को बाहरी दखल से बचाने के लिए एकजुट हो गए हैं, जिसके पीछे की मंशा जेएनयू को साम्यवाद के चरम और बेतुके स्वरूप के चंगुल में फंसा कर रखने की है, जिसका लक्ष्य गरीबों का उत्थान करना नहीं है, इसका एकमात्र मकसद देश का विभाजन करना है और उन हिस्सों पर समाजवादी राज्य के नाम पर शासन करना है।

यह डीयू या जेएनयू छात्र संघ चुनाव में कुछ सीटों की जीत की छोटी-मोटी लड़ाई नहीं है। यह एबीवीपी, एनएसयूआई, आइसा या कुछ और छात्र संघों की लड़ाई भी नहीं है। यह देश की सर्वोच्चता और संप्रभुता पर सुनियोजित और स्पष्ट हमला है और इससे किसी राजनीतिक बहस या किसी विश्वविद्यालय की समिति के जरिए नहीं बल्कि देश के कानूनी प्रावधानों के मुताबिक निपटा जाना चाहिए। यह सही है कि भारतीय संविधान ने हम सभी को अपने विचारों और अपनी चिंताओं की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार दिया है। अंबेडकर का यही संविधान सुप्रीम कोर्ट को उसका रक्षक बनाता है, और उसी कोर्ट ने उस आतंकवादी को दोषी ठहराया और सजा सुनाई जिसके नारे लगाए गए और जिसका सम्मान जेएनयू में उस तथाकथित ‘बिना डाकखाने वाले देश’ के प्रदर्शन के दौरान किया गया। इन नारेबाजी करने वालों ने, या कहें कि ‘ढोंगियों’ ने अंबेडकर को नीचा दिखाया है।

राजनीति भी बड़ी अनोखी है। विज्ञान के सिद्धांतों के जहां निश्चित पैमाने और एक आयु होती है, वहीं राजनीतिक के सिद्धांत सदैव बदलते रहते हैं, वह भी विशेष तौर पर भारत में, जहां साम्यवाद, समाजवाद, पूंजीवाद की हर बार राजनीतिक समूहों की आवश्यकता के अनुसार नई व्याख्या कर दी जाती है। कोई आश्चर्य नहीं कि माक्र्स, लेनिन और स्टालिन जैसों का स्थान याकूब मेमन और अफजल गुरु जैसे लोग ले रहे हैं। वही राहुल गांधी जिनका विरोध जेएनयू कैंपस में कुछ वर्ष पहले भाषण देने के दौरान वाम समूहों ने किया था, और जिस कैंपस में कांग्रेस के प्रति नफरत थी, वहीं राहुल गांधी को लेफ्ट के नेताओं के साथ मंच साझा करते देखा गया और इन सभी का निशाने पर थी बीजेपी के नेतृत्व वाली भारत की केंद्र सरकार।

फिर कई लोगों का यह भी तर्क है कि अभिव्यक्ति तब तक देशद्रोह का हिस्सा नहीं होती जब तक कि लोग हिंसा पर उतारू न हो जाएं। सच में? अगर ऐसा ही है तो कल वही लोग सड़कों पर उतरेंगे, वे न केवल अफजल या याकूब की जयजयकार करेंगे बल्कि हाफिज सईद और लखवी का गुणगान भी करेंगे, वे पाकिस्तान के साथ एकजुटता का प्रदर्शन करेंगे और उन्हें न्योता देंगे कि वे आएं और भारत के लोकतंत्र को धराशायी कर दें। यह सब हो भी रहा है, वह भी भारत के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक, जेएनयू में, और इसकी हिस्सेदार ऐसी तमाम राजनीतिक पार्टियां हैं जो धर्मनिरपेक्ष और वास्तव में राष्ट्रवादी होने का दावा करती हैं।

वे सीधे तौर पर अफजल या याकूब की बरसी भले ही ना मना रही हों, लेकिन कन्हैया और अन्य देशद्रोहियों के साथ उनकी मिलीभगत अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें उसी लक्ष्य की ओर ले जा रही है।

जेएनयू, डीयू, हैदराबाद यूनिवर्सिटी तथा शिक्षा के अन्य स्थानों को गंदी और देशद्रोही राजनीति से मुक्त कराना निहायत जरूरी हो गया है। यदि ऐसा सक्रियता से और तुरंत नहीं किया गया, तो यह न केवल इन केंद्र में शिक्षा प्राप्त कर रहे युवाओं के दिमाग में जहर घोल देगा, बल्कि हमें बंटे हुए भारत के हालात में पहुंचा देगा, जहां ऐसे ही देशद्रोहियों और बागियों का शासन कायम होगा। जेएनयू के राष्ट्र-विरोधी तत्वों को सजा दिलाने के बाद सबसे पहले लिंगदोह समिति की सिफारिशों पर पुनर्विचार करना होगा और जेएनयू में शिक्षकों (जो अधिकांश मामलों में न केवल वामपंथी विचारधारा को मानते हैं बल्कि उनका प्रचार भी करते हैं) के चयन के मानदंडों को नए सिरे से तय करना होगा।

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शिक्षा और शिक्षण के संस्थान देश की संप्रभुता और सांप्रदायिक सौहार्द का अपमान कर रहे हैं। उन्होंने माक्र्सवाद और माओवाद को विकृत और बेतुका अर्थ दे दिया है, जिसके कारण वक्त आ गया है कि हम दखल दें। युवा ही हमारा भविष्य हैं, इस कारण हमें अपने भविष्य को राजनीतिक और नैतिक रूप से भ्रष्ट नहीं होने देना चाहिए। तथाकथित नव-राष्ट्रवादियों के पागलपन और अभिव्यक्ति की देशद्रोही आज़ादी की वकालत करने वालों से अंबेडकर की विरासत की रक्षा करनी ही होगी।


जेएनयू में भारत-विरोधी नारेबाज़ी का हिस्सा बनने का आरोप एक प्रभावशाली कम्युनिस्ट नेता की बेटी पर भी लगा है। अब इसकी कल्पना करना मुश्किल नहीं कि एक दिन ऐसा आएगा जब भारत का नेतृत्व ऐसी देशद्रोही मानसिकता वाले छात्र नेताओं के द्वारा किया जाएगा, बशर्ते उन्हें अपने विचारों का प्रचार करने की छूट दे दी जाए, जैसी माँग कार्यकर्ता कर रहे हैं। जरा उस समय के बारे में सोचिए जब इस प्रकार के लोग राज्य की विधानसभा में और भारत की संसद में हमारा नेतृत्व करेंगे, और तब आतंकवादियों के खिलाफ अदालतों में मुकदमा चलाने से न्यायपालिका को बाहर रखने का बिल उनके सामने लाया जाएगा और उसी बिल में सांसदों और विधायकों को किसी भी राष्ट्र-विरोधी तत्व को आज़ाद करने का अधिकार देने का भी प्रावधान होगा। यही नहीं, फाँसी पर चढ़ाए जा चुके आतंकियों को जनता की माँग पर शहीद घोषित कर दिया जाएगा। और तो और पाकिस्तान को लड़ाकू विमान बेचे जाने पर कहा जाएगा कि हमारे पड़ोसी की आतंकवाद-विरोधी अभियान में मदद की जा रही है, तब सीमाओं से घुसपैठ पर भी कोई रोक नहीं रह जाएगी। जी हाँ, एक दिन तस्वीर कुछ ऐसी ही होगी यदि इस सरकार की प्रशंसा करने की बजाए कन्हैया कुमार और एसएआर गिलानी (संसद हमले में बरी होने वाले) जैसे लोगों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार करने के लिए उसकी निंदा की जाती है। यदि वेमुला आत्महत्या मामले को मीडिया और विपक्ष की मर्जी पर छोड़ दिया जाता, तो वह दिन दूर नहीं था जब ऊपर की गई कल्पना वास्तविकता बन गई होती।

स्वामी विवेकानंद, अंबेडकर, महात्मा गाँधी, पटेल और बोस की विरासत को कभी न कभी सबने याद किया है, लेकिन क्या हम सच में भारत को लेकर उनके विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके विचारों का पालन करते हैं? कई दशकों तक बंगाल पर शासन करने वाले कम्युनिस्टों की अयोग्यता साबित हो चुकी है। क्या वे यह भूल गए हैं कि साम्यवाद का मकसद बुर्जुआ और सर्वहारा वर्ग के बीच की खाई को पाटना था। वह राष्ट्र-विरोधी ताकतों के समर्थन में आवाज़ उठाने की हिमायत नहीं करता था। वह कभी सरकार के कामकाज में संसद के बाहर या अंदर अड़ंगे डालने की वकालत नहीं करता था। आतंकवाद और आतंकवादी कार्रवाइयों के समर्थन में किसी भी राज्य के कैंपस में होने वाले प्रदर्शनों का समर्थन करना उन सभी के लिए शर्म की बात है जो खुद को गाँधी के अनुयायी बताते हैं। महात्मा की विचारधारा पर तमाम साहित्य उपलब्ध हैं और वे इन तथाकथित नव-राष्ट्रवादियों को यह बताने के लिए काफी हैं कि कई दशकों तक चला उनका संघर्ष जनता की भलाई के लिए था, जिसमें सारे वर्ग, समुदाय, जातियाँ शामिल थीं। उनका मकसद कभी भारत को टुकड़े-टुकड़े करना नहीं था। गाँधी, नेहरू, पटेल या तिलक भी नागरिक स्वतंत्रता के हिमायती थे, लेकिन उन्होंने कभी भारत-विरोधी विचारों का समर्थन नहीं किया।

कला, साहित्य, विज्ञान और आविष्कार जैसी अनेक राज्य-प्रायोजित गतिविधियाँ की जा सकती हैं, तो फिर इन राष्ट्रद्रोहियों की राज्य-प्रायोजित देशद्रोह की माँग कैसे स्वीकार की जा सकती है? वे चाहते हैं कि सरकार उन विरोध प्रदर्शनों और जुलूसों को अनुमति दे जिनमें आतंकवादियों की कार्रवाई का जश्न मने और उनकी बरसी मनाई जाए, वे चाहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्हें सारी कानूनी हदों को तोडऩे दिया जाए और वे राजनीतिक फायदे का एक हथियार बन जाएँ। वे भारत को जाति, धर्म और वर्ग पर बाँट देना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि देश सांप्रदायिकता के चंगुल में फंसा रहे, जिससे कि उनका राजनीतिक हित सधता रहे। यह अब जन साधारण पर निर्भर करता है कि वे जेएनयू और हैदराबाद विश्वविद्यालय की गतिविधियों को भारत-विरोधी मानते हैं या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। यह निर्णय आपको करना है कि सरकार ने जेएनयू के साजि़शकर्ता पर देशद्रोह का आरोप लगाकर सही किया है या नहीं। भारत की संप्रभुता की रक्षा, सियाचिन और कश्मीर में सैनिकों की शहादत का सम्मान करने की जि़म्मेदारी हमारे ऊपर है। इस बढ़ते उपद्रव को रोकना भी हमारा दायित्य है, अन्यथा अंडेबडकर ने संसद को लेकर जो सपना देखा था उसे ऐसे कई अफजल गुरु और याकूब मेमन तबाह कर देंगे।

सुनील गुप्ता

 

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