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JNU ना बने जेहादी निर्माण यूनिवर्सिटी

JNU ना बने जेहादी निर्माण यूनिवर्सिटी

पाकिस्तान जिंदाबाद, कश्मीर की आजादी तक जंग होगी जंग होगी, भारत की बर्बादी तक जंग होगी, ऐसे नारे कश्मीर घाटी में तो अक्सर सुनाई देते हैं। लेकिन पिछले दिनों दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी ये नारे गूंजे तो सारे देश में इसके खिलाफ आक्रोश भड़क उठा। देश की जनता समझ नहीं पा रही है कि देश की जनता के पैसे से चलनेवाला यह उच्च शिक्षा संस्थान कैसे कुछ देशद्रोहियों का अड्डा बना गया? क्यों वामपंथी दल और कांग्रेस इसपर शर्मसार होने के बजाय इसपर सियासत कर रहे हैं। वे क्यों देशविरोधी तत्वों का खुलकर विरोध करने के बजाय उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं। नतीजतन जेएनयू शिक्षा संस्थान कम और विचारधारा का युद्धक्षेत्र ज्यादा बन गया है। जेएनयू में व्यवस्था का विरोध करना तो हमेशा ही एक फैशन रहा है लेकिन छात्रों का एक तबका व्यवस्था का विरोध करते करते देश विरोधी रुख अख्तियार कर लेगा ऐसा किसी को नहीं लगा था। सबसे चिंता की बात तो यह है कि अभिव्यक्ति और अकादमिक स्वतंत्रता की कितनी ही बड़ी बड़ी बातें क्यों न की जाएं मगर देश की राजधानी स्थित प्रमुख विश्वविद्यालय अलगाववादियो और माओवादियों का गढ़ बन जाए, यह तो चिंतनीय बात है। आज जब सारी दुनिया आतंकवाद को लेकर परेशान है विशेषकर भारत पर आतंकवाद का खतरा सबसे घना है तब कुछ तबके आतंकवाद का समर्थन करने लगे यह बहुत खतरनाक बात है।

आज भले ही वामपंथी दल यह दावा कर रहे हैं कि उनका आतंकवाद और आतंकवादियों से कोई रिश्ता न हो लेकिन वामपंथी बुद्धिजीवी संसद पर हमले के जिम्मेदार अफजल गुरू की फांसी को जुडिसियल मर्डर साबित करने की कोशिश करते रहे हैं। वामपंथियों का गढ़ माने जानेवाले जवाहरलाल विश्वविद्यालय में आतंकवादी अफजल गुरू को फांसी देने पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें भारत विरोधी नारे लगाए गए। आजाद कश्मीर के पक्ष में भी जमकर नारेबाजी हुई । इस बारे में खबरें छपने के बाद दिल्ली पुलिस नींद से जागी और धरपकड़ शुरु हुई। युनिवर्सिटी के छात्र संघ के अध्यक्ष को गिरफ्तार किया गया। जेएनयू में एक तरह से आतंकवाद का समर्थन करनेवालों के लिए अफजल गुरू एक प्रतीक पुरूष बनते जा रहे हैं। उनकी स्मृति में कार्यक्रमों की आड़ में भारत के खिलाफ लोगों को भड़काने की साजिश रची जा रही है। जेएनयू में जिस तरह से अफजल गुरू और कश्मीर की आजादी के समर्थन में नारे लगे उसके पाकिस्तान में बैठे आतंकी सरगना हाफिज सईद के नाम से एक ट्वीट भी सामने आया। इस बात का पता लगना भी आवश्यक है कि इन कार्यक्रमों की फंडिंग कहां से हो रही है। इसके लिए पुलिस कार्रवाई तो जरूरी है।

लेकिन इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा बनाकर पुलिस कार्रवाई का विरोध किया जा रहा है। हमारा संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी जरूर देता है लेकिन वही संविधान इस अधिकार की सीमा भी तय करता है। किसी को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश के खिलाफ बगावत के लिए उकसाने या उसके लिए माहौल बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। उन लोगों की मंशा पर भी सवाल खड़े किए जाने चाहिए जो इसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखने की कोशिश कर रहे हैं। देशद्रोहियों को देशद्रोही कहना ही होगा। ‘भारत की बर्बादी’ के नारों के समर्थन में किसी तरह की बात करनेवालों को भी देशद्रोहियों की श्रेणी में रखना ही होगा। वो लाख चीखें लेकिन उनके नापाक मंसूबों को बेनकाब करने का वक्त आ गया है। छात्र संघ के अध्यक्ष की गिरफ्तारी और युनिवर्सिटी कैंपस में पुलिस के प्रवेश को लेकर भी बयानबाजी शुरू हो गई है। ऐसा करनेवाले ललबबुआओं को ये समझना होगा कि देश से बड़ा कोई संस्थान नहीं होता और जहां देश की बर्बादी की बात की जाए वहां पुलिस के जाने से रोकना भी देशद्रोह है।

कुछ अर्से पहले जब एक पत्रिका ने जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा बताते हुए एक कवर स्टोरी प्रकाशित की थी तो उसका काफी विरोध हुआ था लेकिन हाल ही के घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया कि उस खबर में काफी दम था। जेएनयू में अलगाववादी और आतंकवादी प्रवृत्तियां लगातार पनपती रही हैं। 2010 की बात है। जब दंतेवाड़ा में सेना के 76 जवानों को नक्सलियों ने मारा गया तो यहां पर अलगाववादी व नक्सल समर्थित छात्र संगठनों ने खुलेआम जश्न मनाया। इतना ही नहीं, समय-समय पर यहां के कई प्रोफेसरों द्वारा भारत की संस्कृति, सभ्यता व अखंडता को तोडऩेवाले विचार देशविरोधी संगठनों द्वारा आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों में प्रगट किए जाते रहे हैं। जेएनयू का माहौल ही अलग है, जहां सस्ता एवं रियायती भोजन, आवास एवं अध्ययन की सुविधा उपलब्ध है। यह सब भारत सरकार द्वारा दी जानेवाली आर्थिक सहायता से संभव हुआ। दरअसल जेएनयू एकमात्र ऐसा संस्थान है, जहां राष्ट्रवाद की बात करना गुनाह करने जैसा है। इसे वामपंथियों का गढ़ कहा जाता है, भारतीय संस्कृति को तोड़-मरोड़ कर गलत तथ्यों के साथ प्रस्तुत करना यहां आम बात है। मसलन जब पूरे देश में मां दुर्गा की पूजा होती है तो यहां ‘क्रिप्टोक्रिश्चियन’ कथित नव वामपंथी छात्र और प्रोफेसर ‘महिषासुर दिवस’ मनाते हैं। यहां के बुद्धिजीवी छात्रों को सिर्फ एक ही बात समझाई और घुट्टी में पिलाई जाती है कि कैसे भारतीय संस्कृति से द्रोह व द्वेष, भारतीय मूल्यों का विरोध, हिन्दू विरोध, देश विरोधी और समाज विरोधी कार्य करना है।

देशभर के नक्सल-माओवादी प्रभावित क्षेत्रों के भारत विरोधियों और अलगाववादी ताकतों को प्रकट एवं गुप्त समर्थन प्रदान करने की खुराक यहीं से मिलती है। दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर सार्इं बाबा को कुछ दिन पहले माओवादी विचार, देशविरोधी कार्य व गुप्त रूप से माओवादियों को सहयोग करने के आरोप में गिरफ्तार किया। वह दिल्ली विवि. में पढ़ाते थे, लेकिन उनके सभी राष्ट्र विरोधी कार्य यहीं से संचालित होते थे। विवि. छात्र संघ में काबिज छात्र संगठन माओवादी पार्टी समर्थित छात्र संगठन है। वह विश्वविद्यालय में सक्रिय रूप से कार्य करता है और नक्सलियों को सक्रिय रूप से समर्थन भी उसे यहीं से मिलता है। कुछ समय पहले इस संगठन का एक कार्यकर्ता-हेम मिश्र, महाराष्ट के गढ़चिरौली में माओवादी गतिविधियों में लिप्त पाया गया था।

कुछ समय पूर्व वामपंथियों की देश व समाज तोडऩे की नीति कुछ और होती थी लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आया है। आज इन्होंने अपने चेहरे व अपने वैचारिक लड़ाई के क्षेत्र बदल लिए हैं। अब वे लेनिन की बातों की तोतारटंत नहीं करते बल्कि उनके स्थान पर वे सेकुलरवाद, अल्पसंख्यक अधिकार, मानवाधिकार, महिला अधिकार व समाज के वंचित तबके के अधिकारों का सहारा लेकर अपने कार्यों को बड़ी ही आसानी के साथ अंजाम देते हैं। इस जहर की लहलहाती फसल को विश्वविद्यालय के प्रत्येक स्थान पर देखा जा सकता है। जेएनयू परिसर दीवारों पर लिखे नारों, पंफलेट और पोस्टरों से पटा रहता है। इनमें से अधिकतर नारे व पोस्टर भारतीय संस्कृति, सभ्यता व समाज व देश को विखंडित करने वाले होते हैं।

05-03-2016

विवि.की बौद्धिक संस्कृति की बात करें तो ये संस्थान बहुजन संस्कृति का राग अलापते देखा जा सकता है। हिन्दू समाज की विविधता, जो उसकी थाती है, उसकी गलत तरीके से व्याख्या कर यहां के प्रोफेसर हिंदू समाज को तोडऩे का भरसक प्रयास करते हैं। यहां के नव वामपंथी छात्र और ईसाई विचार के ध्वजवाहक प्रोफेसर साल दर साल परिसर के अन्दर ही समाज व देश तोडऩे वाले साहित्य को विवि. के नए सत्र से प्रारम्भ और समाप्त होने तक कम मूल्य पर उपलब्ध करवाते हैं। देशभर से प्रतिवर्ष आने वाले सामान्य युवाओं को यही पुस्तकें और इन्हीं प्रोफेसरों व नव वामपंथी छात्र संगठनों का सान्निध्य उन्हें बौद्धिक खुराक के रूप में मिलता है और असल में यही जेएनयू की पहचान है।

विवि. में कुछ नव वामपंथी छात्र व प्रोफेसरों की मिलीभगत से ठीक विजयादशमी के बाद महिषासुर शहादत दिवस मनाने का प्रचलन शुरू हुआ। ‘महिषासुर’ दिवस मनाने वाले अपने आप को पिछड़े,वंचित एवं वनवासियों का प्रतिनिधि बताते हैं तथा महिषासुर को पिछड़े ,वंचित एवं वनवासियों के नायक के रूप में प्रदर्शित करते हैं। इस काम में इनका साथ कई वामपंथी पत्रकार दे रहे हैं। ईसाई मिशनरी परिसर में महिषासुर एवं बहुजन संस्कृति पर बौद्धिक बहस के माध्यम से यह प्रचारित करती हैं कि पिछड़ा वर्ग, वंचित एवं वनवासी ही भारत का मूल निवासी है और बाकी सभी विदेशी हैं। आर्य बाहर से आए हैं जिन्होंने छलपूर्वक यहां के मूल निवासियों व वंचितों को अपनी संस्कृति का गुलाम बना लिया। इसलिए वे पत्रिका के माध्यम से हिन्दू-देवताओं को अभद्र भाषा से संबोधित करते हैं। मिशनरी आर्य-अनार्य के सिद्धांत को पुन: परिभाषित कर रही हैं। दलित और आदिवासियो को मिलाकर एक नया नाम देती है -‘बहुजन। यहां तक की कुछ छात्रों के मुताबिक तो ईसाई मिशनरियों के इशारों पर यह उच्च वर्ग और वंचित समाज के मध्य संघर्ष कराकर ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के कार्य में मदद कर रहे हैं।

जेएनयू में अक्सर हिन्दुओं में आपसी वैमनस्य बढ़ाने के लिए नव वामपंथी छात्रों व ईसाई मिशनरियों द्वारा कार्यक्रम किए जाते हैं। उन कार्यक्रमों का एक ही लक्ष्य होता है कि भारतीय परंपरा पर प्रहार किया जाए। हिन्दू समाज की वर्ण व्यवस्था के नाम पर इन कार्यक्रमों में जहर घोलने की साजिश की जाती है। असल में इस जहर के पीछे एक बड़ी साजिश काम कर रही है। यह तंत्र जानता है कि कौन ऐसा वर्ग है जो बड़ी ही आसानी के साथ इनका शिकार हो सकता है। इसलिए वह वर्ण व्यवस्था को चुनते हैं और उसके बारे में भ्रामक बातें बोलकर भोले-भाले हिंदू नवयुवकों को बरगलाते हैं। इस कारण जेएनयू हिन्दुत्व विरोधी शक्तियों का केन्द्र बन गया है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर यहां देश-विरोधी लोगों के भाषण कराए जाते हैं, तो खाने-पीने की आजादी की आड़ में हिन्दुओं की भावना के साथ खिलवाड़ किया जाता है। जेएनयू छात्र संघ के चुनाव के दौरान इस बात पर बहस खूब हुई कि जेएनयू में गोमांस क्यों नहीं खाया जाए? अपने आपको अति प्रगतिशील कहने वाले कई छात्र नेताओं ने चुनावी घोषणापत्र में यह भी कहा कि वे चुनाव जीत गए तो जेएनयू परिसर में गोमांस परोसने के लिए संघर्ष करेंगे।

यहां किस किस तरह के छात्र रहे हैं यह आप इस घटनाओं से जान सकते हैं। आप सब हवाला कांड से वाकिफ हैं क्योंकि इसमें आडवाणी जी का नाम आया था। लेकिन यह कोई नहीं बताता कि इसका पर्दाफाश कैसे हुआ। यह घटना 1991 की है। पुलिस को एक हवाला नेटवर्क का पता चला जिसमें कश्मीर के आंतकवादियों को दिल्ली से पैसा भेजा जा रहा था। पुलिस ने छानबीन की तो पता चला कि इस हवाला रैकेट का सरगना जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पीएचडी छात्र है। उसका नाम शाहबुद्दीन गौरी था। जेएनयू परिसर के अंदर कावेरी होस्टल में रहता था। रातोंरात पुलिस विश्वविद्यालय परिसर में घुसी और शाहबुद्दीन को गिरफ्तार कर ले गई। पुलिस को वो हवाला डायरी, जिसमें सबका नाम था, इसी छात्र के कमरे से मिली थी। गिरफ्तार होने के बाद वामपंथी संगठनों ने काफी उपद्रव मचाया था। शाहबुद्दीन को बेकसूर बता कर उसकी गिरफ्तारी को सत्ता का दमन करार दिया था। बाद में इस होनहार छात्र पर केस चला और सजा भी मिली। वामपंथी छात्र नेता उससे मिलने तिहाड़ जेल भी जाया करते थे।

सवाल शाहबुद्दीन गौरी का नहीं है सवाल तो यहां के वामपंथी छात्र संगठनों और प्रोफेसरों का है, जो आंतकी संगठनों के साथ रिश्ता रखने वाले, आतंकियों को पैसा मुहैय्या करने वाले के भी समर्थन में खड़े हो गए। 90 के दशक में ऐसे और भी कई छात्र थे जिन्हें आतंकवादियों को समर्थन देने के जुर्म में पुलिस चुपचाप गिरफ्तार करके ले गई। संसद पर हमला करने वाले आरोपियों, चाहे वह अफजल गुरू हो या फिर एस ए आर गिलानी, हमले से पहले इन सब का जेएनयू परिसर आना जाना था। जब उन्हें आरोपी बनाया गया तब भी वामपंथी संगठनों ने उन्हें बेकसूर बताया था। अफजल गुरु के फांसी के बाद नक्सली छात्र संघठन डीएसयू ने एक शोकसभा रखी थी जिसमें गिलानी को बुलाया गया था। इस पर काफी हंगामा हुआ था। वामपंथी संघठनों द्वारा आतंकवादियों को मंच प्रदान करने की यह अकेली घटना नहीं है। 1990 के दशक में वामपंथी संगठनों ने लगभग सभी कश्मीरी अलगाववादियों व आतंकवादियों को बुलाकर सेमिनार कराया और कश्मीर की भारत से आजादी की मांग का समर्थन भी किया।

वामपंथियों द्वारा जेएनयू के अकादमिक श्रेष्ठता की बात की जाती है लेकिन विश्व के नामी विश्वविद्यालयों की श्रेष्ठता सूची में जेएनयू का दूर-दूर तक नाम नहीं है। जेएनयू अकादमिक्स का नहीं आदोलनों का गढ़ ज्यादा है। इस कारण सवाल उठ रहा है कि देश की जनता की गाढ़ी कमाई का इतना सारा पैसा क्यों जेएनयू पर खर्च किया जा रहा है। क्या यह जनता के पैसे की बर्बादी नहीं है।

सतीश पेडणेकर

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