ब्रेकिंग न्यूज़ 

महिलाओं को आजादी भी चाहिए और पिंजरा भी

महिलाओं को आजादी भी चाहिए और पिंजरा भी

महाराष्ट्र में शनि शिंगनापुर मंदिर, केरल के साबरीमाला मदिर में प्रवेश को लेकर महिलाओं की मुहिम अभी चल ही रही है कि मुंबई में मुस्लिम महिलाओं ने एक नया मोर्चा खोल दिया है और ये मोर्चा खुला है हाजी अली में प्रवेश को लेकर। मुस्लिम महिलाएं हाजी अली में प्रवेश कर मत्था टेकना चाहती हैं लेकिन उसकी इजाजत उन्हे नहीं है। पिछले दिनों हाजी अली दरगाह के एक प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश देने की मांग को लेकर मुस्लिम महिलाओं ने प्रदर्शन किया।

यह घटना इस बात की प्रतीक है कि मुस्लिम महिलाएं भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की राह पर चल पड़ी हैं। मुस्लिम महिलाओं को दरगाह और मस्जिदों में जाने की इजाजत नहीं है। शरीयत के कानून के मुताबिक कोई भी महिला दरगाह, कब्र या मस्जिद में प्रवेश नहीं कर सकती। मुस्लिम महिलाओं पर सुनाए इस फरमान को गैर इस्लामिक करार करते हुए भारतीय मुस्लिम महिला आयोग ने इसका विरोध भी किया पर नतीजा सिफर ही रहा। मस्जिद में प्रवेश तो एक बात है, न जाने कितने मामले हैं जहां मुस्लिम महिलाओं पर पाबंदियां हैं। हिजाब हों या तीन बार तलाक कहकर रिश्ता तोडऩा हो या फिर एक पति को तीन औरतों के साथ बांटना, नुकसान केवल महिला का होता है। मगर समाज के सामने अपनी बात रखने की इजाजत इनका कानून इन्हें नहीं देता और जो आवाजें उठती हैं उन्हें हमेशा के लिए दबा दिया जाता है।

तीस साल पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजारा भत्ते पर एक मुस्लिम महिला शाहाबानो के पक्ष में दिए फैसले ने देशभर में बवाल मचा दिया था। मुस्लिम समाज के नेता इस फैसले से इस कदर नाराज थे कि उन्हें लग रहा था कि इस्लाम पर हमला किया गया है। उन्होंने राजीव गांधी की सरकार को मजबूर कर दिया कि वह संविधान संशोधन कर फैसले को खारिज करे। शाहबानो का मुकदमा एक मुस्लिम महिला की लड़ाई थी लेकिन इसके बाद लंबे समय तक शांति रही लेकिन अब मुस्लिम महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती जा रही हैं और मुस्लिम पर्सनल लॉ में संशोधन का मामला मुस्लिम महिलाओं का एक सशक्त आंदोलन बनता जा रहा है। इस कारण अलग से मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड बना। अब भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन भी इसमें कूद पड़ा है।

पिछले दिनों भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा है- ”1985 के शाहबानो प्रकरण के बाद से आज तक मुस्लिम महिलाओं को उनके जीवन के अधिकार के संदर्भ में कभी सुना नहीं गया! मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की बहस को कुछ रेवायती और पितृसत्तात्मक पुरुषों ने कब्जा रखा है और उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी सुधार के प्रयास को रोकने की ही कोशिश की है। ज्यादातर सभी मुस्लिम मुल्कों, जैसे मोरक्को, ट्यूनीशिया, टर्की, इजिप्ट, जॉर्डन आदि यहां तक कि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुस्लिम देशों में भी विवाह और परिवार के मामलों में पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध किया गया है- रेवायती नेताओं के कारण भारतीय मुसलमानों को यह सुविधा नहीं हासिल है परिणामस्वरूप, हमारे समाज में तीन-तलाक और बहु-विवाह के मामले जारी हैं।’’

पत्र में कहा गया है -”सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को अपना जवाब फाइल करने के लिए कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ लिंग-विभेद को संविधान की धारा 14,15 और 21 के तहत मूल अधिकारों का एवं अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन क्यों नहीं माना जाना चाहिए? हम भी मानते हैं कि मुस्लिम महिलाओं के साथ कानूनन भेदभाव संविधान की उक्त धाराओं का उल्लंघन है।’’

प्रधानमंत्री को लिखा गया यह पत्र मुस्लिम महिलाओं की मुस्लिम समाज के मुल्ला मौलवियों को सीधे चुनौती है क्योंकि इसमें मुस्लिम महिलाओं ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में संशोधन की अपील की है। जबकि मुस्लिम नेता मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी संशोधन के लिए तैयार नहीं हैं। वे इसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप मानते हैं। पिछले दिनों एक टीवी बहस के दौरान एंकर ने एक मौलवी साहब से कहा कि भारत का सुप्रीम कोर्ट भी कॉमन सिविल कोड के पक्ष में है तो मौलवी साहब का जवाब था-ऊपर भी एक सुप्रीम कोर्ट है और मुस्लिम पर्सनल लॉ उसका बनाया हुआ है जिसे बदला नहीं जा सकता। इससे स्पष्ट है कि मुस्लिम नेता मुस्लिम पर्सनल लॉ में जरा भी परिवर्तन को तैयार नहीं हैं।

मुस्लिम नेताओ की सोच को चुनौती देने के लिए पिछले दिनों मुस्लिम महिला आंदोलन ने 10 राज्यों के 4710 मुस्लिम महिलाओं के बीच किये गये सर्वेक्षण के परिणाम प्रकाशित किये– 92.1 प्रतिशत महिलाएं मौखिक और एकतरफा तलाक पर प्रतिबन्ध की पक्षधर हैं, वहीं 91.7 प्रतिशत महिलाएं बहुविवाह के विरोध में हैं। 83.3 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि कोडिफायड मुस्लिम पारिवारिक लॉ बनाये जाने पर मुस्लिम महिलाओं को भी न्याय मिल सकेगा। इस आधार पर उनका कहना है कि हिन्दू, क्रिश्चियन, पारसी पर्सनल लॉ की तरह संहिताबद्ध मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाया जाना जरूरी है, यह मुस्लिम महिलाओं की बराबरी और गरिमा को सुनिश्चित करेगा।भारतीय मुस्लिम महिलाओं को न्याय शरीयत कानून 1937 में और डिजाल्युशन ऑफ मुस्लिम मैरेज एक्ट, 1939 में सुधार से अथवा नये मुस्लिम पर्सनल लॉ के निर्माण से ही सुनिश्चित किया जा सकता है।

संस्था ने वकीलों, धार्मिक विद्वानों से मशविरा करके मुस्लिम फॅमिली लॉ का ड्राफ्ट बनाया है जिसमें ये विषय शामिल हैं- शादी की न्यूनतम उम्र लडकी के लिए 18 और लड़के के लिए 21वर्ष, निकाह के समय दुल्हे के एक साल की आय के बराबर का न्यूनतम मेहर, मौखिक तलाक अवैध घोषित हो, तलाक 90 दिन के भीतर अनिवार्य आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया से हो, शादी में निर्वाह की जिम्मेदारी पति पर हो, यद्यपि पत्नी का स्वतंत्र आर्थिक आधार हो तो भी, मुस्लिम वीमेंस प्रोटेक्शन ऑन डाइवोर्स एक्ट, 1986 के अनुसार मेंटेंनेस, बहुविवाह अवैध घोषित हो, मां और पिता दोनों बच्चे के प्राकृतिक संरक्षक हों, बच्चे का संरक्षण (कस्टडी) उसके हितों और इच्छा के अनुसार हो, मुता निकाह भी अपराध की श्रेणी में शामिल किया जाए, सम्पत्ति के मामले में कुरान के नियम लागू हों, निकाहों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, तलाक, बहुविवाह नियमों के उल्लंघन की स्थिति में काजी को जिम्मेवार माना जाये।

यह पत्र इस बात का प्रमाण है कि मुस्लिम महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ती जा रही है और वे अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए संघर्ष करने को तैयार हैं। भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा है जो मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत है। वह कुरान और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों और कर्तव्यों के लिए काम करता है। इसके सदस्यों की संख्या 70,000 तक है, जो 13 राज्यों में फैली है। महिला आंदोलन की जैबुनिसा रेयाज का कहना है कि कुरान की रोशनी में ट्रिपल तलाक के मामलों में सुधार की बड़ी जरूरत है। तलाक में कानून की मदद मिले, सुलह की कोशिशों में भी ऐसी मदद मिले, जिसमें जवाबदेही बनती हो। मौजूदा तरीका बिल्कुल नाकाफी है।

PAGE 12-15

कई बुद्धिजीवी और कानूनविद मुस्लिम महिलाओं की इन मांगों का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमेन प्रोफेसर ताहिर महमूद का कहना है कि ट्रिपल तलाक पर पाबंदी लगा देनी चाहिए और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को समाप्त कर देना चाहिए। वे मुस्लिम लॉ पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ हैं। उनका कहना है कि मौलवियों ने समाज में सुधार की कोशिशों में रोड़े अटकाए। इसलिए इसमें न्यायपालिका के दखल की जरूरत है। दूसरी तरफ मुस्लिम नेता अडिय़ल रुख अपना रहे हैं। मुस्लिम नेता और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली का कहना था कि सर्वेक्षण को लेकर यह सैम्पल साइज बहुत छोटा है। इस सर्वे को मुस्लिम महिलाओं की आवाज न समझा जाए। उनका यह भी कहना था कि महिलाओं के लिए जो इंतजाम हैं, वे काफी हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि मौखिक तलाक को बनाए रखने की जरूरत है। उन्होंने इसके लिए हिंदू समाज में होने वाली दहेज-हत्या का उदाहरण दिया। उनका कहना है कि असफल शादी में बने रहने के दबाव के कारण हत्याएं होती हैं। उन्होंने कहा कि एकमात्र मुस्लिम धर्म ही ऐसी शादी से बाहर निकलने में महिलाओं की राह आसान बनाता है, जबकि अन्य दूसरे धर्म में यह इतना आसान नहीं है। इस्लाम के कई जानकारों का कहना है कि महिलाओं की आजादी और गरिमा के लिए संघर्ष करने का दावा करने वाले महिला आंदोलन की त्रासदी ही यही है कि वे अपनी आजादी कुरान के तहत चाहती है जबकि इस्लाम की कुल सोच महिलाओं को कमतर मानने की हैं इसलिए यदि वे सचमुच आजादी और बराबरी चाहती हैं तो उन्हें इस्लाम की बुनियादी सोच को नकारना होगा और आधुनिक सोच अपनानी होगी। लेकिन मुस्लिम महिला आंदोलन ऐसा साहस जुटा पाने में सक्षम नहीं हैं। आंदोलन की महिलाएं कहती है कि उन्हें समान नागरिक कानून नहीं चाहिए अपितु वे मुस्लिम पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध किये जाने की पक्षधर हैं। इस तरह उन्हें आजादी और बराबरी तो चाहिए लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ के दायरे में। कहना न होगा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ ही तो वह पिंजरा है जो उनको गुलामी से बांधता है। शायद मुस्लिम महिलाओं को आजादी भी चाहिए और पिंजरा भी।

मुस्लिम पर्सनल लॉ में संशोधन तो सारी मुस्लिम महिलाओं का मुद्दा है मगर मुस्लिमों के कई फिरकों में उनमें प्रचलित क्रूरतापूर्ण और दमनकारी रूढियों के खिलाफ महिलाएं पुरजोर तरीके से अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं। बोहरा समाज के सुधारवादी आंदोलन तो हमेशा ही सुर्खियों में रहे हैं। अब महिलाएं खतना के खिलाफ अपनी आवाज उठा रही हैं। बोहराओ में महिलाओं के खतने का चलन मौजूद है। महिलाओं या बच्चियों का खतना धार्मिक कारणों से होता है और वो भी सुन्न किए बिना। इस क्रूर परंपरा पर दुनिया के बहुत से देशों में पाबंदी है। अब भारत में भी कुछ बोहरा महिलाओं ने इस परंपरा पर रोक लगाने की मांग की है।

इस दर्द से गुजर चुकीं मासूमा रानाल्वी बताती हैं कि जब वो सात साल की थीं तब उनकी दादी उन्हें आइसक्रीम और टॉफियां दिलाने का वायदा कर बाहर ले गईं। वह बताती हैं, ‘वह मुझे एक जर्जर पुरानी इमारत में ले गईं। वहां एक दरी पर लिटाया। उन्होंने मेरे हाथ पकड़े और एक अन्य महिला ने मेरे पैर। फिर उन्होंने मेरी योनि से कुछ काट दिया। मैं दर्द से चिल्लाई और रोना शुरू कर दिया। उन्होंने उस पर कोई काला पाउडर डाल दिया और फिर मेरी दादी मुझे घर ले आईं। यह 40 साल पुरानी बात है। लेकिन मासूमा कहती हैं कि उनके साथ जो हुआ वह उसके सदमे से अब भी उबर नहीं पाई हैं।

इसलिए उन्होंने और कुछ अन्य बोहरा महिलाओं ने एक वेबसाइट में एक याचिका डाली है जिसमें सरकार से खतने पर पाबंदी लगाने की मांग की गई है। मासूमा कहती हैं कि इस परंपरा की वजह यह विश्वास है कि महिला यौनिकता पितृसत्ता के लिए घातक है और महिलाओं को सेक्स का आनंद लेने का कोई अधिकार नहीं है और जिस महिला का खतना हो चुका होगा, वो अपने पति के प्रति अधिक वफादार होगी। खतना अफ्रीका के कई देशों और मध्य एशिया में सदियों से जारी है लेकिन भारत के मुस्लिमों में इसका प्रचलन नहीं है। यहां सिर्फ दाऊदी बोहरा समुदाय में इसका चलन है। बोहरा महिला नेत्रियां कहती हैं-इस परंपरा की कुरान में इजाजत नहीं है। अगर होती तो भारत में सभी मुसलमान इसका पालन करते। हमारे समुदाय में यह इसलिए चल रही है क्योंकि कोई इस पर सवाल नहीं उठाता’

हिन्दुओं के साबरीमाला और शनि शिंगनापुर मंदिरों की तरह मुस्लिमों के धार्मिक स्थलों पर भी महिलाओं से भेदभाव हो रहा है। जिनके खिलाफ वे अपनी आवाज मुखर कर रही हैं। मुंबई के वर्ली सी फेस में स्थित हाजी अली दरगाह एक प्रमुख दर्शनीय स्थल है। मगर दरगाह के बहुत करीब तक महिलाओं का जाना गंभीर गुनाह माना जाता है। दरगाह के न्यासियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट को पत्र लिखकर इस बात की जानकारी दी है। हाजी अली दरगाह के गर्भगृह में प्रवेश पर रोक के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पहले न्यासियों से गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के नियम पर पुर्नविचार करने को कहा था

हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाली महिलाओं के वकील ने अदालत में दलील दी कि अन्य दरगाहों या धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी नहीं है फिर हाजी अली दरगाह में पाबंदी क्यों है। इस पर दरगाह के न्यासियों ने पत्र लिखकर कोर्ट को बताया कि पुरूष मुस्लिम संत की मजार के बहुत निकट महिलाओं का प्रवेश इस्लाम के अनुसार गंभीर गुनाह है। यह संवैधानिक कानून और खासकर संविधान के अनुच्छेद 26 से संचालित होता है जो न्यास को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का मौलिक अधिकार देता है। इस मसले पर किसी तीसरे पक्ष का इस तरह का हस्तक्षेप अनुचित है। भारतीय महिला आंदोलन की नूरजहां सोफिया नियाज और जाकिया सोमन ने एक साथ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बॉम्बे हाई कोर्ट में पीआईएल दायर की। कोर्ट के सामने हाजी अली दरगाह के ट्रस्ट ने अपना पक्ष रखा कि इस्लाम के अनुसार पुरुषों की कब्र के आस-पास महिलाओं का जाना ‘महापाप’ है। ट्रस्ट के फैसले से महिलाएं खुश हैं। खुश हैं क्योंकि मजार पर भीड़भाड़ के कारण होने वाली छेड़छाड़ की घटनाएं अब कम हो गई हैं। संविधान की धारा 26 के तहत ट्रस्ट को यह मौलिक अधिकार दिया गया है कि वह धार्मिक मामलों के फैसले स्वयं ले और इसमें किसी तीसरे पक्ष की दखलअंदाजी न हो।

सोफिया कहती हैं कि यह दलील बहुत हास्यास्पद थी फिर इस्लाम में यह कहां कहा गया है कि महिलाएं मजार के पास नहीं जा सकती हैं? और अगर ऐसा है तो मुंबई की जिन 19 दरगाहों में मैं गई हूं, उनमें से सिर्फ 7 (हाजी अली सहित) ही ऐसे क्यों हैं, जहां महिलाओं के जाने पर पाबंदी लगा दी गई है। क्या यह मान लिया जाए कि बाकी दरगाह इस्लाम की तौहीन कर रहे हैं।

इससे पहले दरगाह के मकबरे के पास महिलाओं को जाने से रोकने को चुनौती देने वाली याचिका पर कोर्ट ने कहा था कि अगर इस मामले को प्रबंधन ने जल्द ही नहीं सुलझाया तो वह इस मामले से जुड़े सभी पक्षकारों का पक्ष जानकर उचित निर्णय करेंगे।

इस्लाम में महिलाओं के संघर्ष की जो कुलबुलाहट सुनाई देती है वह कोई मुकम्मल रूप ले पाती है या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन वूमन इन इस्लाम- पुस्तक के लेखक रामस्वरूप का कहना है -‘इस्लाम को अरब में जो विरासत मिली थी उसमें महिलाओं का स्थान बहुत ऊंचा नहीं था लेकिन इस्लाम के आने के बाद हालत बदतर हो गई। महिलाओं को कमतर बतानेवाली परंपराओं को ईश्वर द्वारा दिए गए निर्देशों का दर्जा मिल गया। इस्लाम में महिलाओं के स्थान की समस्या कानूनी कम और सैद्दांतिक ज्यादा है। आज इस्लाम में महिलाओं की जो स्थिति है वह धर्मशास्त्रों में उसकी कमतर स्थिति से निकली है। जब तक इस सोच को नहीं बदला जाएगा मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिलना तो दूर रहा बेहतर दर्जा मिल पाना भी आसान नहीं होगा।

 सतीश पेडणेकर

зубные импланты ценафото моторных яхт

Leave a Reply

Your email address will not be published.