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तौबा मेरी वैलंटाईन डे से

तौबा मेरी वैलंटाईन डे से

अंग्रेजी नववर्ष के दिन मैं शाम को खाना खाकर — और वह भी शाकाहारी — आराम से सो गया। मेरी नींद तब भटकी जब रात 12 बजे लोगों ने पटाखे फोड़े। मेरे एक परम हितैषी मित्र को जब पता चला तो वह बहुत दु:खी हुआ और चिन्तित भी। वह कहने लगा कि मुझे तो इस बात की चिन्ता है कि तेरा नया साल कैसे शुभ होगा जब तू किसी बढिय़ा होटल नहीं गया, शराब नहीं पी और किसी की बीवी के साथ डांस नहीं किया। उसकी चिन्ता को ध्यान में रखते हुये मैंने भी यह दकियानूसी छोड़ आधुनिक बनने का निर्णय ले लिया। इस बार मैंने अच्छे ढंग से वैंटेलाइन डे मनाने की सोची। जब इस बात का मेरे एक और दोस्त को पता लगा तो वह हंसने लगा और मुझ पर कटाक्ष करने भी। कहने लगा कि अपनी उम्र तो देख। मैंने बुरा नहीं मना। मैंने उसे समझाया कि मैंने अपनी परम्पराओं को छोड़ यह तीज-त्यौहारों पर व्रत रखकर भूखे मरने की संस्कृति त्याग दी है। अब मैं आधुनिक बनना चाहता हूं। रही उम्र की बात तो मैंने बताया कि मैंने सारी रूढि़वादिता को तिलांजलि दे दी है। अब मैं उदारवादी सैकुलर बुद्धिजीवी बन गया हूं जो न जाति, न धर्म, न लिंग, न आयु और न क्षेत्र के आधार पर भेदभाव बरतने के पक्ष में है। बहुत हो चुका। अब तो मैं अपने ढंग से जीयूंगा जो मेरा संवैधानिक अधिकार भी है। तो प्यार के इस शुभ पर्व पर मैं निकल पड़ा घर से बाहर। किसी ने बताया कि कनाट प्लेीस में इस प्रकार का बड़ा जमघट्टा लगा रहता है। मैंने जेब को नोटों से भर लिया। अगर और ज़रूरत पड़ी तो मैं एटीएम बर्त लूंगा। मुझे एक बड़ी सजी-संवरी महिला दिखी अकेली। मैं समझ गया कि यह भी मेरी तरह साथी की तलाश में है। मैंने उससे पूछ लिया — मेरी वैलंटाइन बनोगी?

पट से बोली — तेरी बीवी नहीं है क्या ?

मैंने कहा — बीवी तो है पर वैलंटाइन कोई नहीं। तभी तो मैं अकेला उसे ढूंढने निकला हूं।

वह बोली — तो बीवी को ही साथ ले आते।

मैंने उसे समझाया — लगता है आप इस धंधे में नई-नवेली हैं। आपको पता नहीं कि वैलंटाईन डे अपनी पत्नि के साथ नहीं, प्रेमिका के साथ मनाया जाता है। क्यों? उसने पूछा। मैंने बड़े सहज भाव से उसे समझाया — वैलंटाइन डे तो प्रेमी और प्रेमिका का पर्व है। तुम इस संस्कृति से अनभिज्ञ लगती हो। पति-पत्नि दिवस तो कर्वाचौथ होती है जब पति के लिये पत्नि व्रत रखती है।

उसका ज्ञान बढ़ाने के लिये मैं आगे बोला — आपको पता है कि जिस सन्त-महात्मा ने इसका चलन किया था उसने कहीं नहीं शर्त नहीं लगाई कि वैलंटाईन केवल तुम्हारी पत्नि ही हो सकती है। वरन् वह इसे वैलंटाईन डे का नाम न देकर से वाईफ डे कह सकते थे। सभी जानते हैं कि सब को दूसरे की पत्नि ही अधिक सुन्दर लगती है। व्यक्ति को प्रेम अपनी से नहीं दूसरे की पत्नि से ही होता है।

मैंने देखा कि उस महिला ने माथे पर बिन्दी लगा रखी थी। वैसे तो बिन्दी आजकल कई विवाहिता भी नहीं लगातीं और कई कंवारियां भी लगा लेती हैं। पर उसकी बिन्दी से मुझे लगा कि वह विवाहिता ही थी। मैंने पूछ ही लिया — मुझे तो आप विवाहित लगती हैं।

उसने तुरन्त कबूल किया — हां, मैं विवाहित हूं। तो फिर आप अपने पति के साथ क्यों नहीं आई यहां? मैंने भी पूछ मारा। उसने बताया — वह आये नहीं । मैंने तो कहा था।

मैंने कहा — तसल्ली कर लो कि वह घर में ही हैं या कि आपकी तरह वह भी बाहर हैं। वह समझदार निकली। मैंने देखा उसने पति को मोबाइल पर नहीं लैंडलाइन पर फोन लगाया। बुड़बुड़ाई — उठा नहीं रहे। फिर एकदम पीछे मुड़ी और तेज कदम से वापस जाने लगी। उसके चेहरे पर चिन्ता की झलक थी। मेरी बात उसे सच्ची लगी। पर बाद में मैं पछताया। मैंने तो दोनों की वैलंटाइन डे की मौज में खलल डाल दिया है।

थोड़ी देर बाद मुझे एक और सुन्दर-जवान लड़की दिख गई। मैं उसकी ओर देख मुस्कराया। उसे यह कहने की हिम्मेत कर ही दी — क्या आप मेरे साथ चाय-काफी पी सकती हैं?

भौं चढ़ा कर बोली — तेरी कोई मां-बहन नहीं है?

मैंने बड़े सहज भाव से कहा — ईश्व-र की कृपा से वह तो दोनों हैं पर आज न तो मदरज़ डे है और न सिस्टडजऱ् डे। आज तो वैलंटाइन डे है और मैं उसी की तलाश में भटक रहा हूं। वैसे तो मुझे लगता है कि हम दोनों की मंजिल एक है।

05-03-2016

हां, बात तो तुम्हारी ठीक है पर मैं तो किसी की प्रतीक्षा में हूं — उसने ईमानदारी से बता दिया। कुछ हतोत्सानहित होकर मैंने कहा — अच्छा तो मैं चलता हूं। मुझे जाता देख उसने मुझे पीछे से आवाज दी — सुनो, अभी तुम यहीं इधर-उधर घूम लो। यदि आध घंटे तक वह न पहुंचा तो मैं उसका और इन्तजार नहीं करूंगी। तुम मुझे इधर देख लेना। हम दोनों कहीं जाकर वैंटलाईन डे मना लेंगे। अच्छा कह कर मैं भी अपनी नई तलाश में निकल पड़ा। आगे निकला तो थोड़ी देर बाद एक महिला अकेली बैंच पर बैठी थी। मुझे लगा कि वह भी मेरी ही तरह किसी वैलंटाईन की प्रतीक्षा में है। मैं बैंच पर उससे कुछ दूरी पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद मैंने हिम्मत बटोर कर उसे ”हैप्पी वैलंटाइन डे’’ कह ही दिया। वह भड़क उठी। बोली — अपनी शक्ल’ देखी है?

मैंने कहा — मैडम, आपको इस शुभ दिन के आदर्शों का ज्ञान नहीं लगता। न ही आपको हमारे उत्कृष्ट मानवाधिकारों का ज्ञान है।

जा, जा। बड़ा आया तू मुझे आदर्शों व परम्पञराओं का पाठ पढ़ाने वाला — वह भड़क उठी। मैंने उसे समझाया कि मैडम यह प्यार के इजहार का दिन है, लड़ाई-झगड़े या बहस का नहीं।

तू मेरी नजरों से दूर हो जा। पता नहीं कहां से मनहूस आज इस शुभ दिन पर मेरे सामने आ गया — उसने फिर घृणा भरे स्वर में कहा।

मुझे भी गुस्सा आ गया। मैंने उसे चेतावनी दे दी — मैं तुम्हारे खिलाफ मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खडख़ड़ाऊंगा। तुम्हें जेल भिजवाकर ही चैन लूंगा। जा, तू मेरी नजरों से दूर हो जा। तूने जो करना है कर पर मेरे इस शुभ दिन को आज खराब मत कर — यह बड़बड़ाती हुई वह चली गई। मेरा मन खराब कर गई वह। मैं कुछ देर तक अकेला बैंच पर बैठा रहा, सोचता रहा। थोड़ी देर लेट गया। मेरा मन शांत हो गया। वैलंटाइन भावना एक बार फिर भड़क उठी। मैं फिर घूमने लगा। इतने में एक और महिला अकेली विचरती मिल गई। मैं समझ गया कि वह भी मेरी ही तरह भटक रही है। मैंने उसे कहा — आओ कहीं बैठें, बातचीत करें। वह बोली — चाचा, अपनी उम्र तो देख। मैं तुरन्त बोला — मैडम, शायद आपको इस महान दिवस की बारीकियों की समझ नहीं है। जिस महान सन्त-महात्मा ने यह पावन दिन बनाया उसने कोई न्यून्तम या अधिकतम आयु सीमा निर्धारित नहीं कर रखी है। हमें तो उसके मुताबिक चलना है। चाचाजी, आप कौन सा ग्रंथ पढ़ कर आये हो जो ऐसा व्याख्यान दे रहे हो? वह चुटकी ले रही लगती थी। मैं भी कम तो था नहीं। मुझ में कुछ दम-खम था तभी तो वैलंटाइन डे मनाने निकला था। मैंने तर्क दिया — मैडम, यह पवित्र दिन सभी मना सकते हैं जिनके पास दिल है और दिल तो सबके पास होता है चाहे वह बूढ़ा हो, जवान हो या बालक। जिसके पास दिल होगा वह प्यार भी करेगा और उसका इजहार भी। और उसी भावना को समर्पित है यह दिन। पर वह मेरी पूरी बात सुने बिना ही वहां से खिसक गई क्योंकि उसके पास मेरी बात काटने के लिये तर्क नहीं था। खैर, मैं भी अपनी लगन का पक्का था। आखिर मेरी तलाश पूरी हुई। एक सुन्दरी को मैंने मुस्कारा कर देखा। उसने उसका उत्तर भी एक आकर्षक मुस्कान से दिया। मैंने कहा — चलो, रेस्तरां में बैठकर कुछ खाते-पीते हैं और बातचीत भी करेंगे।

पटाक से वह बोली — चलो। मैं एक अच्छे से रेस्तरां में ले गया। घुसते समय मैंने उसका हाथ पकडऩा चाहा तो हाथ पीछे करते हुये बोली — यहां कोई देख लेगा। बाद में कहीं एकान्त में चलेंगे। मैं और भी प्रफुल्लित हो उठा। मैंने उसे दिल खोल कर खिलाया। उसने भी बड़े प्या र से जी भर कर खाया। जो उसने खाना चाहा वह मैंने मना नहीं किया और जो मैंने खिलाया वह उसने नहीं। वह मेरी भावनाओं की कदर कर रही थी और मैं उसकी। बिल तो बड़ा आया पर उसके साथ हंसी-मजाक और उसकी मुस्कान के जादू के आगे कुछ नहीं था। बाहर निकले तो उसे साथ ही में एक बढिय़ा गिफ्ट शॉप दिखाई दे गई। कहने लगी — कुछ देखें।

मैंने भी बड़ी दिलेरी से कहा — हां-हां ज़रूर। उसने चीज़ तो बहुत जबर्दस्त पसन्द की, बढिय़ा। मैंने उसकी पसन्द की तारीफ की। वह बहुत खुश हुई। बिल भारी था। वह अपने पर्स से पैसे निकालने लगी। मैंने कहा — क्या। कर रही हो? मेरे होते बिल तुम दोगी?

यह मेरी मर्दानगी को चुनौति थी। मेरा ध्यान उस तरफ भी था कि उसे अब मैं कहां ले जाऊ जहां अकेले में प्यार का इजहार कर सकूं, सारे दिन की थकान-भटकान को सकून मिले। बिल इतना निकला कि मेरी जेब में पूरे पैसे न थे। मैंने उसे दिलेराना अंदाज में आश्वस्त किया — कोई बात नहीं मेरे पास एटीएम है। मेरी इज्जत बच गई। बिल तो पूरा दिया गया पर खाली हो गई मेरी जेब भी और एटीएम भी। उस गिफ्ट के लिफाफे को जब मैंने उठाना चाहा तो बोली — नहीं, आप क्यों तकलीफ करेंगे। इसे मुझे ही उठाने दीजिये। बाहर निकले तो अभी सोच ही रहा था कि आज के भाव विभोर क्षण के लिये एकान्त स्थान लोधी गार्डन ठीक रहेगा या इंडिया गेट कि उसने प्यारी मुस्कान से कहा — बाई-बाई। फिर मिलेंगे।

और वह एकदम ओझल हो गई। जैसे ही मैं उसे ढूंढने की कोशिश कर रहा था मेरी नजर एक बोर्ड पर पड़ी जिसपर लिखा था — आप सीसीटीवी की निगरानी में हैं।

मेरा दिल बैठने लगा। क्या होगा यदि किसी ने मेरी बीवी को सीसीटीवी की रिकार्डिंग दिखा दी? मैं मायूस मन:स्थिति से अभी जूझ ही रहा था कि मोबाइल बज उठा — कहां घूम रहे हो? श्रीमतीजी पूछ रही थीं। मैं दोस्तों के पास चला गया था। घर आ रहा हूं। रास्ते में हूं — मैंने कहा। श्रीमतीजी बोलीं — तो आती बार रास्ते। से दस किलो चावल, दो किलो चीनी व दो किलो रिफाइंड आयल लेते आना। एक वफादार, आज्ञाकारी व समर्पित पति की तरह मैंने कह दिया — हां, ले आऊंगा। पर याद आया। न पैसे जेब में हैं और न एटीएम में। क्या करूं? चलो, दुकानदार की मिन्नत कर लूंगा। उधार ले लूंगा। पर कान पकड़े। हाय, मेरी तौबा। वैलंटाईन डे मुझ जैसों के बस की बात नहीं है।

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