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जेएनयू का जहर

जेएनयू का जहर

लगता है, मनुष्य में मानवता मर गई है। विश्वविद्यालय परिसरों में पिछले एक हफ्ते से जो कुछ हो रहा है, उस पर यकीन करना मुश्किल है। बुद्धिजीवी, अध्यापक और मीडिया, जिनका मूल स्वभाव युवाओं में देशभक्ति की भावना का संचार करना है, सभी देशद्रोहियों की तरह बर्ताव करने लगे हैं। स्वामी विवेकानंद ने हमारी युवा पीढ़ी में उच्च नैतिकता, हमारी महान संस्कृति और देशभक्ति की भावना भरने का आह्वान किया था। लेकिन, यहां तो अध्यापक नौजवानों को विभाजनकारी एजेंडे की सीख दे रहे हें। युवाओं को यह पढ़ाया और बताया जाता है कि कैसे आजादी हासिल करें। आखिर यह क्या है? क्या आजादी अपनी मातृभूमि के खिलाफ साजिश रचने के लिए चाहिए? या बंटवारे का एक और माहौल तैयार करने के लिए? हमारी अपनी ही संस्कृति को बर्बाद करने की आजादी का तो मतलब यह है कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत का पालन न किया जाए। हमारे महान भारतवर्ष में सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों का पालन किया जाता है, जहां सभी धर्मों को समान नजरिए से देखा जाता है। सनातन धर्म का विचार इतना व्यापक है कि उसके दायरे में सभी धर्म और सिद्धांत समा जाते हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि हमारी सांस्कृतिक सीमाओं से बाहर के इन गुमराह तत्वों की विभाजनकारी नीतियों को स्वीकार न किया जाए, न ही किसी को हमारे युवाओं के दिलोदिमाग को प्रदूषित करने की इजाजत दी जाए। ये प्रदूषणकारी तत्व हमारे देश में हजारों साल पहले भी थे, लेकिन हमारी संस्कृति और सामाजिक बनावट इतनी मजबूत है कि उनका कोई असर नहीं हो पाया। हमारे शास्त्रों ने हमें सिखाया है कि अपने दरवाजे खुले रखो, ताकि हर दिशा से तमाम अच्छाइयों का सार हम ग्रहण कर सकें, लेकिन, जो हमारे सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं, उन्हें फौरन खारिज कर दो। इसलिए विभिन्न विश्वविद्यालय परिसरों में निहितस्वार्थी तत्वों की मौजूदगी कोई नई नहीं है और अब मोदी सरकार के गठन के बाद उनकी हताशा खुलकर बाहर आने लगी है। कांग्रेस ने उन्हें शैक्षणिक संस्थाओं में काफी छूट दे रखी थी, ताकि वे हमारी शिक्षा व्यवस्था को दूषित और नष्ट कर सकें और किसी भी बहाने से हमारे समाज को बांट सकें।

इस पृष्ठभूमि में जेएनयू की ताजा घटना ने भारत के सामूहिक विवेक को झकझोर कर रख दिया है। वहां राष्ट्रविरोधी नारे लगे। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमें ऐसे नजारे का गवाह बनाना पड़ रहा है, जहां अफजल गुरु को शहीद बताया जा रहा हो। आखिर कोई कितना नीचे गिर सकता है। इससे स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति और बोली की आजादी के नाम पर राष्ट्रविरोधी तत्व हमारी शैक्षणिक संस्थाओं में नौजवानों के दिमाग में जहर घोलने की इजाजत पा रहे हैं। इन राष्ट्रविरोधी तत्वों को शुरुआत में ही मिटा दिया जाना चाहिए, वरना कहीं देर न हो जाए। वजह यह है कि माओवादियों, जेहादियों और कश्मीरी अलगाववादियों के बीच सांठगांठ लंबे समय से जारी है। इसका जीता-जागता सबूत अक्टूबर 2010 में जेएनयू में वह सेमिनार था जिसमें हुर्रियत के नेता सैयद अली शाह गिलानी, अरुंधति राय और माओवादी नेता वरवरा राव ने मंच साझा किया था। सेमिनार का विषय था ‘आजादी ही एकमात्र रास्ता।’ उसमें बड़ी संख्या में जेएनयू छात्रों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा, इन तत्वों ने 2010 में दंतेवाडा में सीआरपीएफ के 74 जवानों की हत्या पर जश्न भी मनाया था। इससे इन तत्वों के इरादों का पता चलता है। 2000 में जेएनयू में एक वामपंथी संगठन के दोस्ताना मुशायरे में सेना के दो जवानों को बुरी तरह पीटा गया, क्योंकि उन्होंने मुशायरे में देशविरोधी शायरी का विरोध किया था। इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर जेएनयू में जो हाल में हुआ, वह बेहद निंदनीय है। यह सतर्क हो जाने की चेतावनी की तरह है। आखिर राष्ट्रीय चरित्र का एक विश्वविद्यालय, जिसकी शिक्षा की गुणवत्ता, बौद्धिक और संतुलित असहमति के नाते सराहना की जाती रही हो, आज गलत वजहों से बगावत का केंद्र बन गया है।

यह कहने की जरूरत नहीं कि तथाकथित सेकुलर राजनेता इन राष्ट्रविरोधी तत्वों का समर्थन करके अपनी कब्र खोद रहे हैं। यह समझना मुश्किल है कि ये स्वंभू सेकुलर नेता, मीडिया और बौद्धिक जेएनयू की घटना की सच्चाइयों को जानने की कोशिश नहीं करना चाहते। अगर कोई भारत के टुकड़े करने की बात करे तो हमें परेशान क्यों नहीं होना चाहिए? अगर कोई महज मूर्ति पूजा का विरोध करके सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है तो राष्ट्रविरोधी उदगारों के लिए किसी को क्यों नहीं गिरफ्तार किया जाना चाहिए? बेशक, सरकार को बेकसूरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। लेकिन जब तक आरोपी बेकसूर न साबित हो जाए तब तक पुलिस पर आक्षेप लगाना उचित नहीं है। ऐसा लगता है कि गिरफ्तारी पर बेवजह भारी हो-हल्ला मच गया और उनके राष्ट्रविरोधी नारों पर चिंताएं नहीं जाहिर की गईं, जिसकी आलोचना होनी चाहिए। कोई कश्मीर मसले का समर्थन कर सकता है, लेकिन कोई अदालत द्वारा सजा पाए किसी आतंकवादी को शहीद कैसे बता सकता है? इस नजरिए से देखने पर यह किसी राष्ट्रीय सरकार का दायित्व बन जाता है कि देश में शांति और स्थायित्व कायम रहे और भावनाएं न भड़कें। यह मामला काफी गंभीर है, क्योंकि ये जानकारियां हैं कि देश में ऐसे समूह हैं जो पाकिस्तान के आतंकवादियों की मदद करते हैं। ऐसे मुश्किल वक्त में हमें असहमति और देशद्रोह में फर्क करने की दरकार है, न कि अपने मूल्यवान अभिव्यक्ति व वैचारिक असहमति की स्वतंत्रता को विदेशी आतंकवादियों का बंधक बना दिया जाए। इस स्वतंत्रता को बचाए रखकर भी देश को अपनी कानूनी प्रक्रिया के तहत घरेलू आतंकवादियों से निबटने से रोका नहीं जाना चाहिए।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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