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सत्यम् शिवम् सुन्दरम्

सत्यम् शिवम् सुन्दरम्

बहुमूल्य वस्तुऐं हमें उतना आकर्षित नहीं कर पाती हैं, जितना कि एक छोटे से घास के फूल का सौन्दर्य हमारे मन को लुभा लेता है। सुंदरता को देखा नहीं जाता, अनुभव किया जाता है। जब तक हम सुंदरता को केवल बाहरी रूप से देखते हैं, अर्थात चक्षु से देखकर दिमाग में ही सीमित रखते हैं, तब तक हम पूरी तरह से उसे अनुभव नहीं कर पाते हैं और जब तक अनुभव नहीं कर पाएंगे तब तक हम उसका आनंद नहीं ले सकते हैं। असली सुंदरता को देखने के लिए एक सुंदर मन की आवश्यकता होती है। जब मन सुंदर हो तो पूरी दुनिया सुंदर हो जाती है। मन को सुंदर बनाने के लिये मन को एक छोटे शिशु जैसा बनाना पड़ता है।

हमारे नित्य क्रियाशील जीवन में हमारे सामने दृष्यमान हर छोटी चीज में मौजूद सौन्दर्य को कुछ क्षण अनुभव करना जरूरी है। यह दुनिया बहुत सुंदर है। मिट्टी में उगी घास से लेकर आसमान में मुक्त मंडराते बादल तक हर चीज में सुंदरता भरी हुई है। शिशु के चेहरे पर खिली हंसी से लेकर एक वृद्ध के बिना दांत के खाना खाने तक में सौन्दर्य छुपा है। सुंदरता का एहसास करने के लिये एक स्वच्छ मन होना चाहिए। प्रकृति के हर हिस्से में सौन्दर्य भरा हुया है। बस उसे समेटने की जरूरत है। हम जितना अधिक उसे समेट सकें उतना अधिक अपने जीवन को सुन्दर बना सकते हैं। व्यस्त जीवन से थोड़ा सा समय निकाल कर प्राकृतिक सौन्दर्य से अपने हृदय को प्रभावित करने की जरूरत है।

कुदरत की बनाई इस दुनिया में हर चीज निश्चित है बस एहसास करने की जरूरत है। भगवान ने इंसान को धरती पर खाली नहीं भेजा है। हमारे साथ-साथ हमारे सम्पूर्ण विकास के लिए अनेक उत्पाद भी भेजे हैं। व्यक्ति के चारों तरफ उपस्थित हर चीज का मोल समझकर कार्य में लगा सके वही व्यक्ति अपना जीवन सुखमय बना सकता है। मनुष्य का चिंताशील होना उसके लिए जरूरी है, लेकिन उसकी चिन्ताशीलता उसे, उससे दूर रखती है। अपने आप को एक छोटे शिशु की तरह समझ कर छोटी-छोटी बात पर हम खुश नहीं हो पाते हैं, दूर की सोचकर हमेशा परेशान रहते हैं। हम अपने विकास के लिए कितने प्रयास करते हैं, लेकिन जिन कार्यों के द्वारा हमारा भीतरी विकास हो सकता है उसका ध्यान नहीं करते हैं। जैसे हमारी दृष्टि में आने वाली हर सुन्दर वस्तु को अगर हम अपने भीतरी चक्षुओं से देखने का प्रयास करें तो अत्यंत आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। जो वस्तु सुन्दर है वह साधारण रूप से सबको आकर्षित करती है। जब हम कुछ क्षण उसके सौन्दर्य में खो जाते हैं हमारे मन में एक अपूर्व सन्तुष्टि भाव आ जाता है।

सुन्दरता अथवा सौन्दर्य क्या होता है? हमे दिखाई देने वाली हर वस्तु को हम सुंदर नहीं कह सकते हैं। सुन्दरता वह होती है जिसे देखकर कुछ क्षण मन को आनंद मिले। ऐसा कहा जा सकता है कि सुन्दर वह चीज होती है जिसे देखकर मन को सुकून मिलता है। सुंदर चीज ना केवल हमारे चक्षुओं को आकर्षित करती है, बल्कि हमारे मन को भी अपनी तरफ खिंचती है। देखा जाए तो इस प्राकृतिक सौन्दर्य में भले ही छोटा सा पक्षी भी क्यों न हो, उसमें भी ईश्वर बसा है, उसमें भी सौन्दर्य है। हमें प्राकृतिक सौन्दर्य का एहसास निकट से करना चाहिए ताकि न केवल हमारा हृदय सुन्दर बन सके, बल्कि हमारा शरीर, हमारा जीवन सब कुछ सुन्दर-ही-सुन्दर बन सके।

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