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इतिहास का ब्लैक होल 1945 के बाद नेताजी की कहानी

इतिहास का ब्लैक होल 1945 के बाद नेताजी की कहानी

By उद्दीपन मुखर्जी

प्रसिद्ध यथार्थवादी ई.एच. कार के मुताबिक,  ”वस्तुपरक होने का मतलब उसके शाब्दिक अर्थ निष्पक्ष, निर्मम, दो-टूक होने जैसा शायद ही लिया जाता है, इसके बदले झुकाव उस ओर होता है जिसकी जीत हो रही होती है……’’

ब्लैक होल यानी कृष्ण विवर के बारे में आम लोग तक जानते हैं। ब्रह्मांड में ब्लैक होल उसे कहते हैं, जिससे कोई रोशनी बाहर नहीं आती। यानी ब्लैक होल से कोई सूचना नहीं पाई जा सकती। यह अवधारणा दिलचस्प इसलिए भी है कि ब्लैक होल कभी बहुत तेज और ज्वलनशील सितारा रहा होगा। अब जरा कल्पना कीजिए कि बेहद तेज चमक वाला सितारा अपनी ऊर्जा गंवा बैठता है और मृत्यु के बाद किसी को अपनी ओर देखने की इजाजत नहीं देता।

ये बातें यहां अबूझ लग सकती हैं लेकिन जिसका ब्योरा हम यहां खोलने जा रहे हैं, उस संदर्भ में बेशक मौजूं लगने लगेंगी। इतिहास लेखन में अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि अगर जीत दूसरे पक्ष की होती तो शायद इतिहास कुछ और तरीके से लिखा गया होता। इतिहासकार ए.पी.जे. टेलर ने इतिहास लेखन में  ‘सही’ या ‘गलत’ के मौजूदा आंकलनों पर कई बार सवाल उठाया है। उनके मुताबिक जो सही या गलत लिखा गया है, वह जीतने वाले के पक्ष को देखकर लिखा गया है। अब असली सवाल पर आते हैं कि आखिर आजादी के बाद ‘विजयी’ पक्ष कौन है? कौन दरकिनार कर दिया गया और किसकी चर्चा नहीं होती? सच्चाई जो भी हो पर इसका नुकसान आखिर भारतीय लोगों को ही होता है।

दो पिस्तौल की कहानी
क्या हमने कहीं पढ़ा या सुना है कि भारतीय इतिहास का एक पात्र कोई तिरलोक सिंह चावला है? बिलाशक मुख्यधारा के इतिहास में ऐसा कोई नाम ढूढ़े शायद ही मिले, लेकिन तिरलोक सिंह की तरह अनेक पात्र हैं जिन्हें आप इतिहास का ब्लैक होल कह सकते हैं। उनकी कहानियों से जानकारी प्राप्त करने की कोशिश ऐसे अबूझ क्षेत्र में ले जाती है, जो मुख्यधारा के इतिहास के कथानकों में खो गया है।

कोलकाता के महाबोधि सोसाइटी के हॉल में 18 जनवरी 2011 को जुटे लोगों के दिमाग में ऐसे ही सवाल घुमड़ रहे थे। उनके चेहरों पर तनाव उभर आया था। करीब एक करोड़ आबादी वाले इस शहर की एक छोटी-सी बिरादरी वहां जमा थी और अपने ‘नेताजी’ के बारे में कुछ अहम जानकारियों से रू-ब-रू हो रही थी, जिनका 115वां जन्मदिन नजदीक ही था। 30-40 लोगों का यह जमावड़ा नेताजी के बारे में एक बहु-विवादित डॉक्युमेंटरी को देखने के लिए जुटा था।

आखिर हम नेताजी के बारे में क्या जानते हैं? यही न कि वे महान स्वतंत्रता सेनानी थे और दो बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। उनकी राय राष्ट्रपिता के विचारों से नहीं मिलती थी और कांग्रेस से बाहर जाने की यह भी एक बड़ी वजह थी। यह भी कि वे ‘फासिस्ट’ थे (जैसा कि फ्रांसिस फुकुयामा, पॉल सैम्युलसन और हमारे माक्र्सवादी भाई मानते रहे हैं) और जर्मनी तथा जापान गए, एक्सिस पॉवर्स से गठजोड़ किया, ताकि आजाद हिंद फौज के जरिए अपनी मातृभूमि को आजाद करा सकें। हालांकि वे, हमारे अधिकांश स्वतंत्रता सेनानियों की तरह नाकाम रहे और मध्ययुगीन लाल किले की प्राचीर से ‘नियति से साक्षात्कार’ संबोधन नहीं कर सके।

लेकिन जो बातें हम कम जानते हैं या जानने की इच्छा रखते हैं, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं :

  • क्या नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को ताइहोकु (अब ताइपेयी) हवाई अड्डे पर हवाई दुर्घटना में हो गई थी?
  • अगर हां, तो भारत सरकार तोक्यो में रेंकोजी मंदिर से उनकी कथित अस्थि-अवशेष क्यों नहीं लाई है?
  • अगर उस दुर्घटना में नेताजी की मौत नहीं हुई, जैसा कि परिस्थितिजन्य सबूतों और कई अध्येताओं, राजनीतिकों वगैरह ने ‘साबित’ करने की कोशिश की है तो फिर वे कहां गए और उनका क्या हुआ?
  • भारत सरकार ने नेताजी से जुड़े कई वर्गीकृत दस्तावेजों (एक अनुमान के मुताबिक करीब 30 दस्तावेज) को सार्वजनिक क्यों नहीं किया?
  • केंद्रीय सूचना आयोग ने जब 1950 में एक आधिकारिक इतिहासकार के लिखे आजाद हिंद फौज के इतिहास को सार्वजनिक करने के लिए सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन को मंजूरी दी तो भारत सरकार अपनी ही बनाई संवैधानिक संस्था को चुनौती देने के लिए अदालत क्यों पहुंच गई?
  • आजादी के छह दशक बाद भी भारत सरकार यह बेतुकी दलील क्यों दे रही है कि वर्गीकृत दस्तावेजों को सार्वजनिक कर दिया गया तो मित्र देशों से भारत के संबंध नुकसानदेह और अपमानजनक हो सकते हैं?

तिरलोक सिंह चावला एक मामूली आदमी हैं। वे जमीन-जायदाद का कारोबार करते हैं और अपने परिवार के साथ बैंकॉक में रहते हैं। वे बुजुर्ग हो चले हैं इसलिए किसी आतंकवादी संगठन में हिस्सेदारी करके भारत की सुरक्षा के लिए खतरा भी नहीं बन सकते। हालांकि उनके नाम एक अपराध दर्ज है जिसकी सजा वे लगातार भुगत रहे हैं। वे अपनी ही मातृभूमि के लिए अछूत बन गए हैं। उनके बेटे ने भारत के प्रधानमंत्री से मिलने की जुगत भी की, लेकिन वे उनकी झलक भी नहीं पा सके। असल में सरदार तिरलोक सिंह आजाद हिंद फौज के दौर में थाईलैंड में नेताजी के सचिव हुआ करते थे। वे आज भी उस दौर को गर्व से याद करते हैं और अपने नेता की तस्वीरें दिखाते हैं। उनका अपराध बस इतना ही नहीं है। वे उन ‘गैर-वफादारों’ में से हैं जिन्होंने अंग्रेजों के आदेश की अवहेलना करके अपने देश को आजाद कराने के लिए लड़ाई लड़ी।

तिरलोक का दूसरा बड़ा अपराध यह है कि उनके पास दो पिस्तौल हैं, जो आज बस किसी संग्रहालय में रखने के ही काम आ सकती है। ये पिस्तौल उन्हें उनके नेता ने थाईलैंड से रवान होते समय दी थी। तिरलोक सिंह को नेताजी के वे आखिरी शब्द आज भी याद हैं, ”चावला, हम लाल किले में मिलेंगे।’’

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तिरलोक सिंह को आज भी उम्मीद है कि नेताजी लौट आएंगे। उनकी एक अंतिम इच्छा है कि इन दो पिस्तौल को भारत सरकार को सौंपा जाए, लेकिन 21वीं सदी में हमारे नेताओं को कहां इन सब चीजों की फुर्सत है।

दो तरह की धारणाएं
आजाद भारत में नेताजी को लेकर दो मान्यताएं प्रचलित हैं, जो लिखी-पढ़ी गई हैं। सवाल है कि किस पर यकीन किया जाए?

पहली आधिकारिक या सरकारी मान्यता है। उसके मुताबिक, नेताजी की मौत हवाई दुर्घटना में हो गई थी। इसके विपरीत दूसरी धारणा रखने वाले लोग संख्या में थोड़े हैं मगर हवाई दुर्घटना के बाद भी उनके जीवित रहने की बातें बताकर विवाद खड़ा करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं।

जाधवपुर विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर समर गुहा खुद स्वतंत्रता सेनानी और नेताजी के सहयोगी रहे हैं। 1967 में सांसद बनने के बाद वे नेताजी की 1945 में रहस्यमय गुमशुदगी को लेकर संसद में लगातार आवाज बुलंद करते रहे। हालांकि शाहनवाज खान जांच आयोग दिसंबर 1955 में ही हवाई दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु पर अपनी ‘मुहर’ लगा चुका था।

फिर भी गुहा ने अपनी मुहिम जारी रखी। नए सिरे से जी.डी. खोसला की अगुआई में एक सदस्यीय जांच कमेटी (1970-74) बैठी, जिसे पत्रकार अनुज धर की किताब ‘बैक फ्रॉम डेड’ में लीपापोती आयोग कहा गया है। इसने भी माना कि नेताजी की मौत ताइहोकु हवाई दुर्घटना में हो गई थी।

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हालांकि  गुहा फिर भी हार मानने को तैयार नहीं थे। इमरजेंसी में वे जेल में डाल दिए गए। जेल में उन्होंने एक किताब लिखी : नेताजी, जिंदा या मुर्दा!’ इसमें कुछ गुप्त दस्तावेजों और सुरागों का हवाला था जिससे मोरारजी देसाई सरकार शाहनवाज आयोग और खोसला जांच समिति की रिपोर्टों को खारिज करने के लिए सहमत हो गई। गुहा ने दुर्घटना की बात का खंडन किया। क्या ऐसा करते हुए वे कुछ और सुरागों से परिचित थे जिनका जिक्र किताब में नहीं हो पाया था? कम से कम धर तो अपनी किताब में यही संकेत देते हैं, ”समर गुहा ने संसद में जब ईश्वर की शपथ लेकर कहा कि नेताजी जिंदा हैं तो उनके दिमाग में भगवान जी थे।’’ (पृष्ठ 311)।

अब आईए फिर कोलकाता के महाबोधि सोसाइटी के हॉल में लौटते हैं जहां 18 जनवरी को स्रिफ्ट फाउंडेशन के अमलान कुसुम घोष अपनी डॉक्युमेंटरी ‘ब्लैक बॉक्स ऑफ हिस्ट्री’ दिखा रहे थे। इसमें 1945 के बाद नेताजी के जीवित रहने की कई संभावनाओं पर नजर दौड़ाई गई थी। हालांकि अमलान बाबू उन्हीं तथ्यों को रख रहे थे जो धर की किताब में पहले ही आ चुके हैं या प्रोफेसर गुहा संसद में अपने विस्तृत बयान में रख चुके थे या फिर डॉ. मधुसूदन पाल को जिसमें पूरा यकीन था और उसी के आधार पर जाधवपुर विश्वविद्यालय की डॉ. पूरबी राय ने 1990 के साम्यवाद के दौर के बाद रूस पर अपना अध्ययन किया था।

सरकारी आयोगों ने इन मान्यताओं को खारिज कर दिया, लेकिन दो लोगों के बयानों को खारिज करना आसान नहीं है। इनमें एक हैं थेवर, जिनकी मूर्ति संसद भवन में लगी है। थेवर का दावा था कि वे 1950 में जनवरी से अक्टूबर तक आठ महीने नेताजी के साथ रहे थे। उन्होंने सरेआम पत्रकारों के सामने दावा किया कि नेताजी उस समय असम की सीमा के पार चीन के सिक्यांग जिले में थे और एशिया लिबरेशन फोर्स में भारतीय प्रतिनिधि की भूमिका अदा कर रहे थे (धर की किताब, पृष्ठ 353)। धर के मुताबिक थेवर ने यह भी दावा किया कि ”सुभाष बाबू को जापानी मनचुरिया ले गए….’’ (पृष्ठ 354)।

इस सिलसिले में दूसरे व्यक्ति हैं सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज मनोज मुखर्जी। भारत सरकार ने फिर 1999 में उनकी अगुआई में नेताजी के रहस्य की गुत्थी सुलझाने के लिए एक सदस्यीय आयोग का गठन किया था। उन्होंने अब तक की सरकारी धारणा पर प्रश्नचिन्ह लगाया और मई 2006 में अपनी रिपोर्ट पेश की, लेकिन तब तक केंद्र में एनडीए की जगह कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार आ चुकी थी और उसने इस भारी-भरकम रिपोर्ट को बिना कोई कारण बताए धूल फांकने को छोड़ दिया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद में इसे पेश करने के साथ कार्रवाई रिपोर्ट भी प्रस्तुत किया और कहा कि सरकार आयोग के निष्कर्षों को स्वीकार नहीं करती है। आयोग ने कहा था कि नेताजी की मौत ताइहोकु हवाई दुर्घटना में नहीं हुई थी और रेंकोजी मंदिर में रखी अस्थियां उनकी नहीं हैं। सरकार की कार्रवाई रिपोर्ट को वकील रूद्रज्योति भट्टाचार्य ने 2006 में चुनौती दी। यह मामला अभी लंबित है।

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न्यायमूर्ति मुखर्जी जांच के दौरान जापान गए और वहां उस डॉक्टर से पूछताछ की जिसने 1945 में नेताजी का मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी किया था। दिलचस्प यह है कि यह जाहिर हुआ कि प्रमाण-पत्र किसी जापानी इचिरो ओकुरा के नाम जारी किया गया था।

2005 में ताइवान की सरकार ने आधिकरिक रूप से कहा कि ताइहोकु में 18 अगस्त 1945 के आसपास कोई हवाई दुर्घटना नहीं हुई थी। ऐसे दस्तावेजों, बातचीत और सबूतों के आधार पर न्यायमूर्ति मुखर्जी इस नतीजे पर पहुंचे कि नेताजी की मौत अगस्त 1945 में नहीं हुई थी। इस तरह एक ही संभावना बचती है कि वे चीन के रास्ते रूस में चले गए हों। कथित तौर पर जर्मन जेरोविन के एक भारतीय इंजीनियर अर्धेंदु ने सरकार को बताया था कि वह 1948 में साइबेरिया के किसी स्थान पर नेताजी से मिला था। उसके कहने के मुताबिक, नेताजी ने उससे कहा कि ”मैं जल्दी ही भारत जाने की उम्मीद कर रहा हूं।’’ (धर की किताब, पृष्ठ 215)।

डॉ. पूरबी राय ने अपने शोध के दौरान रहस्य को खोलने की कोशिश की, लेकिन भारत सरकार के अडिय़ल रवैए के कारण सब पर पानी फिर गया। सरकार ने रूस से नेताजी के बारे में गुप्त सैन्य दस्तावेजों को हासिल करने की कभी कोशिश नहीं की। फिर भी राय कुछ घटनाओं को जोड़कर इस नतीजे पर पहुंचीं कि नेताजी 1945 के बाद जिंदा थे और वे रूस में थे। स्टालिन की सरकार ने उनके साथ बुरा सलूक नहीं किया। हालांकि 1953 में स्टालिन की मृत्यु के बाद नेताजी को लेकर नेहरू और ख्रुश्चेव के बीच कोई बातचीत हुई हो ऐसा हो सकता है, लेकिन राय के पास इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं है।

हालांकि नेहरू के पास भी कोई पुख्ता सबूत नहीं था कि नेताजी की मृत्यु 1945 में हो गई थी। उन्होंने 1962 में नेताजी के भाई सुरेश बोस को चिट्ठी में लिखा, ”आपने मुझसे नेताजी की मृत्यु का प्रमाण भेजने को कहा है। मैं आपको कोई स्पष्ट और सटीक प्रमाण नहीं भेज सकता।’’

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खोज जारी रही
नेताजी की खोज खासकर 1960 के दशक में तब से जारी है जब क्रांतिकारी तथा नेताजी की सहयोगी लीला रॉय ने पाया कि नेताजी जिंदा हैं और उत्तर प्रदेश-नेपाल सीमा पर नीमसर नामक जगह में रह रहे हैं। घोष की डॉक्यूमेंटरी में नीमसर के उन लोगों से बातचीत है जो कथित तौर पर महान नेता के संपर्क में आए। वे सभी यही कहते हैं कि 1960 के दशक में यहां रहने वाले नेताजी ही थे। हालांकि वे हमेशा परदा डाले रहे और गुमनामी बाबा के नाम से जाने गए।

यह मामला काफी नाटकीय है। क्या नेताजी वाकई गुमनामी बाबा के रूप में तीन दशकों (1954-85) तक जिंदा रहे और कभी खुलकर सामने नहीं आए? धर ने अपनी किताब में भगवानजी और लीला रॉय की मार्च 1963 की बातचीत का हवाला दिया है, जिसमें नेताजी उनसे कहते हैं, ”मेरे बाहर आने से किसी को लाभ नहीं होगा, न देश को, न जनता को और न मुझे। भारत दुनिया की ताकतों का दबाव नहीं झेल पाएगा।’’

किस दबाव की बात नेताजी करते हैं? क्या उनके एक्सिस पॉवर्स की तरफ होने के कारण युद्ध अपराधी के तमगे की है? जो भी हो हारे हुए के प्रति इतिहास विनम्र नहीं होता।

अब दो बातें भगवानजी के बारे में देखिए। एक, उनके हाथ की लिखावट नेताजी की 1945 के पहले की लिखावट से मिलती है। दूसरी, फैजाबाद 1985 में भगवानजी के कमरे से मिले उनके दांत का डीएनए परीक्षण बोस परिवार के लोगों से मिलता है। 25 जून 2003 को विशेषज्ञ बी. लाल ने यह निष्कर्ष निकाला जबकि भारत सरकार के दो विशेषज्ञों नेे इसे खारिज कर दिया। धर ने उदय इंडिया को ई-मेल से बताया कि, ”मेरी समझ के मुताबिक, हाथ की लिखावट के विशेषज्ञों की रिपोर्ट को दुनिया भर की अदालतों में स्वीकार किया जाता है। भगवानजी के मामले में किसी बुजुर्ग के द्वारा 30 साल तक दो भाषाओं में लिखावट की नकल करना असंभव है।’’ उन्होंने आगे कहा, ”डीएनए रिपोर्ट के बारे में मैंने किताब लिखने के दौरान ही कहा कि भारत सरकार के विशेषज्ञों की बात पर यकीन नहीं किया जा सकता। डीएनए जांच अमेरिका या ब्रिटेन की किसी स्वतंत्र प्रयोगशाला में कराया जाना चाहिए।’’

नेताजी या भगवान जी?
न्यायमूर्ति मुखर्जी 26 नवंबर 2001 को भगवानजी से जुड़े सामान के बक्से को खोलने जिला ट्रेजरी में गए। उसमें एक जोड़ी जर्मन बायनोकुलर, एक करोना टाइपराइटर, एक पाइप, एक रोलेक्स घड़ी (नेताजी की घड़ी), पांच दांतों का एक डिब्बा, गोल चश्मे और कुछ अंग्रेजी की किताबें मिलीं। यह देखकर न्यायमूर्ति मुखर्जी भी घोष से अनौपचारिक बातचीत में कह बैठे कि उन्हें 100 प्रतिशत यकीन है कि भगवानजी ही नेताजी थे। घोष ने यह रिकॉर्ड कर लिया तो मुखर्जी ने मौन साध लिया। फिर 18 जनवरी 2010 को घटनाओं ने एक और मोड़ लिया, जब प्रोफेसर नंद चक्रवर्ती ने दावा किया कि भगवानजी उर्फ नेताजी की मृत्यु 16 सितंबर 1985 को भी नहीं हुई। जयश्री प्रकाशन (जिसे लीला रॉय ने शुरू किया था) के मौजूदा संपादक बिजॉय नाग शायद इस रहस्य के बारे बता सकते हैं। वे नीमसर और फैजाबाद में भगवानजी से जुड़े रहे हैं। जयश्री प्रकाशन में कई किताबें इस बारे में ‘महाकल उर्फ भगवानजी उर्फ नेताजी’ शीर्षक से छपी हैं।

पाठकों को अब इस रहस्य का कुछ अंदाजा हो गया होगा, लेकिन खुलासा तो सिर्फ भारत सरकार के नेताजी से संबंधित वर्गीकृत दस्तावेजों के सार्वजनिक करने से हो पाएगा।

कदम कदम बढ़ाए जा,
खुशी के गीत गाए जा
ये जिंदगी है कौम की,
तू कौम पे लुटाए जा’’

गुमनामी बाबा थे नेताजी?

भारतीय राष्ट्रवादी सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु के बाद भारतीय जनसंघ (भारतीय जनता पार्टी का पुराना नाम) के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीन दयाल उपाध्याय और भूतपर्व यूनियन रेलवे मंत्री और कांग्रेस नेता ललित नारायण मिश्रा ने लगातार कभी न सुलझने वाली गुत्थी को सुलझाने की कोशिश जारी रखी। जबकि दूसरी तरफ सरकार की तरफ से कई जांच आयोग और समितियां भी गठित की गईं थीं। जांच एजेंसियों ने सच की तह तक पहुंचने के लिए दिन-रात एक कर दिया।

सुभाष चन्द्र बोस आजाद हिंद फौज और भारतीय राष्ट्र सेना के नेता थे। उन्होंने अपने निर्वासन काल में एक भारतीय सरकार की स्थापना की और आजादी से पहले दो बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। 18 अगस्त 1945 को सुभाष चन्द्र बोस की ताइवान (ताइपे) विमान दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के बाद भी वो देश में लगातार गुप्त रूप से रह रहे थे, लोगों का ऐसा मानना था।

सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु की पुष्टि करने के लिए भारत सरकार ने शाहनवाज समिति और जस्टीस एम.के. मुखर्जी आयोग का भी गठन किया, ताकि सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का पता लगाया जा सके। लेकिन ये समिति और आयोग हकीकत तक नहीं पहुंच सके।

1956 में शाहनवाज समिति के चार सदस्य सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु की पुष्टि  करने के लिए जापान पहुंचे, लेकिन पड़ताल को आगे नहीं बढ़ाया जा सका, क्योंकि भारत सरकार ने ताइवान सरकार से जांच में सहयोग करने का कोई अनुरोध नहीं किया था। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में जस्टिस मुखर्जी आयोग ने इस जांच को आगे बढ़ाया, लेकिन जांच में ताइवान सरकार ने निसंदेह इस बात का खुलासा किया कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान में कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था। संयुक्त राज्य के गृह विभाग के द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट ने भी ताइवान के इस खुलासे का समर्थन किया। जस्टिस मुखर्जी आयोग ने ये भी दावा किया कि रेंनकोजी मंदिर में सुभाष चन्द्र बोस की अस्थियां रखी गई थीं, लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को 2006 में खारिज कर दिया।

ऐसा कहा जा रहा था कि बोस पूर्व सोवियत संघ पहुंच गए थे। जहां साइबेरिया में उन्हें बंदी बना लिया गया था। शोधकर्ता वी.पी. सैनी और डॉ. पूरबी रॉय के मुताबिक राष्ट्रवादी नेता सोवियत संघ से ही गायब हो गए थे।

वहीं दूसरी तरफ ये भी कहा जा रहा है कि भगवानजी उर्फ गुमनामी बाबा जो कि फैजाबाद के रामभवन में 1985 तक ठहरे हुए थे, वो कोई और नहीं बल्कि सुभाष चन्द्र बोस ही थे। आधिकारिक तौर पर मुखर्जी आयोग को कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले थे कि भगवानजी उर्फ गुमनामी बाबा ही बोस थे, लेकिन एक लघु फिल्म दिखाई गई जिसे देख कर न्यायधीश ने कहा की भगवान जी ही सुभाष चन्द्र बोस थे। ‘बैक फ्रॉम डेड’ पुस्तक के लेखक और पत्रकार अनुज धर ने अपनी पुस्तक में सुभाष चंद्र बोस के रहस्य को लेकर सरकार से कहा कि सरकार को इस रहस्य को यादगार बनाने के लिए निहित स्वार्थ के तहत आगे आना चाहिए। लेखक को इस बात का पूरा यकीन है कि सरकार सुभाष के सच को ढूंढ़ लेगी और जानकारी को बताने के लिए भी तैयार होगी।

पत्रकार और लेखक अनुज धर ने दावा किया है कि भारत सरकार को स्वेड्स की पुस्तक से सबक लेना चाहिए। इस पुस्तक के अनुसार, एक दशक के अथाह प्रयासों के बाद आखिरकार रॉल वॉलेनबर्ग के बारे में रूसियों से पता चला और सच्चाई सबके सामने आ गई और इसका शुरूआती बिंदु रूस रहा। इस पूरे खेल का अंत रूस या फैजाबाद में हुआ।

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