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पाबंदी हो धर्मांतरण पर

पाबंदी हो धर्मांतरण पर

By शिरीष सप्रे

ईसाईयत और इस्लाम में धर्मांतरण अति आवश्यक भाग होने के कारण उन धर्मियों के स्वधर्मानुसार अधिकारों की व्यवस्था होनी चाहिए।माता-पिता द्वारा धर्म अथवा राष्ट्रीयत्व बदलने पर बच्चे को माता-पिता का अनुसरण करना चाहिए।

धर्मांतरण का मुद्दा इस समय छाया हुआ है। कहीं ईसाइयों को हिंदू बनाकर उनकी ‘घर वापसी’ करवाई जा रही है तो, कहीं हिंदुओं को धर्मांतरित कर ईसाई बनाया जा रहा है। इस प्रकार के समाचार प्रतिदिन समाचार पत्रों में छप रहे हैं। देश की संसद इस मुद्दे पर बार-बार स्थगित की जा रही है। इस कारण बीमा, कोयला जैसे अन्य कई महत्वपूर्ण विधेयक अटके पड़े हैं। इस तरह का वातावरण बनाया जा रहा है मानो अन्य सभी मुद्दे गौण हैं और धर्मांतरण का मुद्दा ही जीवन-मरण का प्रश्न है। पहले भी धर्मांतरण होते रहे हैं जो चुपके-चुपके हुआ करते थे, परंतु इस बार सामूहिक रुप से खुलेआम हो रहे हैं। वास्तव में धर्मांतरण के मुद्दे पर सार्थक बहस होने के बजाए केवल वातावरण को बिगाडऩे के प्रयास ही अधिक हो रहे हैं।

इस मुद्दे पर एक लंबी बहस स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हो चूकी है। वस्तुत: जब देश स्वतंत्र हुआ तब मिशनरियों में यह भय पैदा हुआ कि उनके धर्मांतरण के कार्यक्रमों पर नियंत्रण लग जाएगा। कई मिशनरियों को तो यह भी लगता था कि अब अपना बोरिया-बिस्तर समेटने का समय आ गया है। इसलिए इस संबंध में भारत के भावी राजकर्ताओं का मानस समझने की दृष्टि से उन्होंने गांधीजी को छोड़ अन्य नेताओं से संपर्क स्थापित किया। गांधीजी के विचार धर्मांतरण के संबंध में उन्हें मालूम ही थे इसलिए उन्हें टाल दिया।

लंदन के ‘द कॅथलिक हेराल्ड’ ने पंडित जवाहरलाल नेहरु से पूछा – ‘अपने धर्म के आचरण और प्रचार की स्वतंत्रता हो, हिंदी  ईसाइयों के प्रतिनिधिमंडल द्वारा कॅबिनेट मिशन को दी गई सूचनाओं के विषय में आपका मत क्या है?’ पंडितजी ने जवाब दिया – ‘जिसकी जडें मजबूत और निरोगी हों, ऐसा कोई सा भी धर्म फैले, यह विवेकसम्मत है और उसके फैलने के अधिकार में हस्तक्षेप  उसकी जड़ों पर आघात है। अगर विशिष्ट धर्म सार्वजनिक सुव्यवस्था को तकलीफ नहीं दे रहा हो अथवा उसके उपदेशक अनुत्सुक अन्य धर्मियों के गले अपना धर्म नहीं उतार रहे हों तो।’

रेव्हरंड स्टॅन्ले जोन्स सरदार वल्लभभाई पटेल, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, मौलाना आजाद और नेहरुजी से मिले। वल्लभभाई पटेल को मिशनरियों के स्वास्थ्य और शिक्षा कार्यों पर ऐतराज नहीं था। उनका मत था : परंतु, मिशनरी राजनैतिक उद्देश्यों के लिए सामूहिक धर्मांतरण ना करें, देश से एकरुप हों। राजगोपालाचारी मिशनरियों के धर्मांतरण के अधिकार के संबंध में सहमत थे। उनकी सूचना थी : परंतु, धर्म के कारण निर्मित हुए देश विभाजन के वर्तमान संकट के कारण धर्मांतरण बंद करें और परिस्थिति सुधरने तक विभिन्न मार्गों से जनसेवा करें। यह मान्य हो तो, ‘प्रोफेस’, ‘प्रैक्टिस’ और ‘प्रोपगेट’ के स्थान पर ‘बिलीफ’, ‘वर्शिप’ और ‘प्रीच’ हो। मौलाना आजाद मिशनरियों का इस्तिकबाल करते थे। परंतु, उनका आक्षेप मिशनरियों द्वारा किए जाने वाले सामूहिक धर्मांतरण पर था। नेहरुजी का प्रतिपादन था जो देश को अपना घर माने उसका स्वागत है। कांग्रेस ने अपने निर्वाचन प्रकटन में, प्रत्येक नागरिक को सार्वजनिक सुव्यवस्था और नीति की मर्यादा में सद्बुद्धि-विवेक से स्वतंत्रता और स्वधर्म प्रकटन एवं आचरण का अधिकार घोषित किया था।

भारतीय संविधान में ‘मूलभूत स्वतंत्रता’ में धार्मिक स्वतंत्रता का समावेश होना अपेक्षित था। धार्मिक स्वतंत्रता में धर्म-प्रकटन (प्रोफेस), आचरण (प्रेक्टिस) अंतर्भूत होंगे इस विषय में मतभेद नहीं थे, परंतु निम्न बातों में मतभेद एवं तीव्र भावनाएं थीं : धर्मप्रसार (प्रोपगेट) और उसकी मर्यादा। उदाहरण के लिए सख्ती, धोखाधड़ी, प्रलोभन द्वारा किए हुए धर्मांतरण, अज्ञानियों का धर्मांतरण, धर्मांतरित पालकों की संतति का धर्म आदि पर मतभेद थे।

भारतीय संविधान का अंतिम प्रारुप तय करने के पूर्व, ‘मूलभूत अधिकार’ जैसे विषयों के संबंध में समादेशक समितियां और उपसमितियां स्थापित की गईं। अनेक बार चर्चा करके इन समितियों और उपसमितियों ने बनाए हुए प्रतिवृत्त संविधान परिषद के सम्मुख चर्चा के लिए रखे गए। सुझाई हुई धाराओं, वाक्यांशों, उनके क्रमांक और उनके स्पष्टीकरणों में अनेक बार बदलाव हुए।

‘मूलभूत अधिकार’ इस संबंध में क. मा. मुन्शी ने उपसमिति को 17 मार्च 1947 को प्रस्तुत की हुई सूची : 1. सार्वजनिक सुव्यवस्था, नीति और स्वास्थ्य से सुसंगत रहने वाली प्रत्येक नागरिक को सद्विवेकबुद्धि, स्वतंत्रता और स्वधर्म आचरण एवं प्रकटन का अधिकार, इनमें उपासना की आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक कामों का समावेश नहीं। 2. माता-पिता या पालक की सहमति के बिना 18 वर्ष।

देश स्वतंत्र होनेवाला है इसकी कल्पना चर्च नेताओं को 1937 से थी। संयुक्त राष्ट्रसंघ से विभिन्न ईसाई संगठनों के निकट संबंध थे। भारत के चर्च नेताओं को वैश्विक स्तर पर होनेवाली ईसाई हलचलों की कल्पना थी। भारतीय संविधान के संबंध में उन्होंने विस्तृत विचार किया था। उनके उद्देश्य स्पष्ट थे। नेशनल ईसाई कौंसिल ने एक शिष्टमंडल भेजकर संविधान परिषद के सारे ईसाई सदस्यों को इस संबंध में तैयार किया था। ‘नेशनल ईसाई कौंसिल रिव्यू’ में इस संबंध में सतत लेख आ रहे थे। ईसाई नेताओं ने संविधान समिति के अपने उद्देश्यों का सतत पीछा किया।

संविधान परिषद के सदस्यों ने जो प्रतिपादन किए थे उनका सारांश संक्षेप में इस प्रकार है –

रत्नस्वामी- ईसाईयत और इस्लाम में धर्मांतरण अति आवश्यक भाग होने के कारण उन धर्मियों के स्वधर्मानुसार अधिकारों की व्यवस्था होनी चाहिए। माता-पिता द्वारा धर्म अथवा राष्ट्रीयत्व बदलने पर बच्चे को माता-पिता का अनुसरण करना चाहिए।

एच. सी. मुकर्जी (यह ईसाई थे)- धर्म प्रसार के समान स्वतंत्रता का भी अंतर्भाव हो।

रत्नस्वामी- ‘प्रसार’ में उपदेशों के साथ-साथ चित्रपट, आकाशवाणी आदि आधुनिक प्रचार साधनों का भी समावेश होना चाहिए।

क. मा. मुन्शी- भाषण की स्वतंत्रता में किसी भी प्रकार के उपदेशों का समावेश होता है। प्रचार में उपदेशों से अलग भी कुछ हो तो वह क्या है यह मालूम होना चाहिए। मेरा इस संबंध में विरोध है।

अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर- अमेरिका में भी यह विशेषाधिकार नहीं। अपने यहां भाषण की स्वतंत्रता है। ‘प्रसार’ का अधिकार मुझे मान्य नहीं।

एच. सी. मुकर्जी- संतति के धर्मांतरण के विषय का वाक्यांश हटाया जाए। उचित जांच के बाद मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित किए बगैर धर्मांतरण मान्य नहीं होगा, यह (22वां) वाक्यांश हटाया जाए।

फ्रंक न्थनी (अंग्लो इंडियन नेता) – ईसाइयों को इन दोनों बातों से आत्मीयता, घनिष्ठता है।

डॉ. श्यामाप्रसाद मुकर्जी – 22 वां वाक्यांश हटाया ना जाए।

चर्चा के बाद मूल सूची में ‘प्रकटन’, ‘आचरण’ के साथ ‘प्रसार’ डाला गया।

फ्रॅन्क ‘न्थनी – ईसाइयों को ‘आचरण’ और ‘प्रसार’ का मूलभूत अधिकार देने के बाद संतति के धर्मांतरण के विषय में मर्यादा डालकर वह अधिकार वापिस ना लिया जाए।

आर. पी. ठाकुर (दलित वर्ग)- साधारणतया दलित वर्ग के लोग धर्मांतरण के बलि होते हैं। उनके अज्ञान का लाभ उठाकर धर्म प्रचारक उन्हें लालच में डालकर उनका धर्मांतरण करते हैं। यह ‘धोखाधड़ी’ में आता है क्या? वैसा ना होने पर मुन्शी अपने वाक्यांश में सुधार करें।

रेव्ह. जे.जे.एम. निकल्स रॉय – अच्छी आध्यात्मिक शक्ति के विरुद्ध कानून ना बनाए जाएं। 12 अथवा 18 वर्ष की आयु के नीचे के युवाओं को प्रभु का बुलावा आया तो उन्हें धर्मांतरण से परावृत्त ना किया जाए।

पुरुषोत्तमदास टंडन – 18 वर्ष की आयु के लड़के ने 100 रुपये की झोपड़ी बेची तो वह व्यवहार अवैध ठहरता है। परंतु, इसी लड़के द्वारा अपना धर्म बदलने के लिए वह समझदार है, ऐसा हमारे बंधु कह रहे हैं। धर्म का मूल्य 100 रुपये से कम है क्या? अज्ञानियों का धर्मांतरण हमेशा से ही दबाव और अयोग्य प्रभाव के कारण होता है। अधिकांश कांग्रेसजन ‘प्रसार’ के विरुद्ध हैं फिर भी हमारे ईसाई मित्रों का आदर रख हमने ‘प्रसार’ शब्द को रखने की मान्यता दी है। परंतु, अब अज्ञानियों का धर्मांतरण मान्य करने के लिए हमें कहा जा रहा है, यह तो अति हो रही है।

डी. एन. दत्ता- बहुसंख्य कांग्रेसजन ‘प्रसार’ शब्द रखने के पक्ष में हैं।

रेव्ह. जेरोम डिसूजा – इसमें परिवार के अधिकार का तत्व है। सभी वाक्यांश ध्यानपूर्वक शब्द रचना के लिए समादेशक समिति के पास वापिस भेजें।

अल्गु राय शास्त्री – लोभवश धर्मांतरण करने वालों के बच्चों को भी धर्मांतरण के लिए बाध्य ना किया जाए। छत्तीसगढ़ जैसे ‘एक्स्ल्यूडेड एरिआज’ में केवल मिशनरियों का प्रवेश है। यह रोका जाना चाहिए। असम में ईसाइयों की संख्या तीन सौ गुना बढ़ गई है।

जगत नारायण लाल – अल्पसंख्यकों के मामले में यह सभागृह अधिकतम की मर्यादा तक गया है। विश्व के किसी भी देश के संविधान में धर्म ‘प्रसार’ करने का अधिकार मान्य नहीं किया गया है। इससे अधिक अल्पसंख्यकों ने मांगा तो बहुसंख्यकों की उदारता का अनुचित लाभ ठहरेगा।

अनंत शयनम अय्यंगर – आत्माएं बचाने के लिए नहीं, बल्कि समाज का विघटन करने के लिए धर्म का उपयोग किया जा रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। संख्या बढ़ाकर विधिमंडल में अधिक स्थान प्राप्त का अवसर तुम्हें चाहिए क्या? धर्मांतरण ना चलने दें। वह करना हो तो संबंधित व्यक्ति न्यायाधीश के सामने प्रतिज्ञा पर वैसी उसकी इच्छा है कहे। विषय पुनर्विचार के लिए वापिस भेजें।

आर. व्ही. धुलेकर – देश का पुन: विभाजन करने के लिए अपने गुट की संख्या बढ़ाने के प्रयत्न चल रहे हैं। देश का पुन: विभाजन हो, ऐसा विभाजन के लिए कारण रहने वालों की इच्छा है। हमारी इच्छा है और दस साल बाद कोई ऐसा ना कहे, हमारा भी राष्ट्र है।

हुसैन इमाम – धोखाधड़ी और सख्ती से हुई कोई सी भी बात अवैध है, ऐसे कई निर्णय हैं। परंतु, यह बात मूलभूत अधिकारों की सूची में ना डाली जाए।
हुसैन इमाम की सूचना, मत संग्रह के पश्चात सम्मत हुई। दबाव और अयोग्य प्रभाव द्वारा किया हुआ धर्मांतरण अवैध है, यह वाक्यांश मूलभूत अधिकारों में से हटाए जाने पर ‘नेशनल क्रिश्चियन्स रिव्यू’ (अक्टूबर 1947) में एक ईसाई पत्र लेखक ने आनंद व्यक्त किया।

प्रो. के. टी. शाह – प्रचार की स्वतंत्रता का दुरुपयोग ना हो। अबोध बच्चे और शारीरिक-मानसिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्तियों का धर्मांतरण करने के उद्देश्य से स्कूल, महाविद्यालय, रुग्णालय, आश्रम आदि संस्थाओं का अपवाद किया जाए, ऐसी सूचना मैं प्रस्तुत करता हूं।

लोकनाथ मिश्रा – अपने देश को निधर्मी राज्य घोषित किया है। देश में अनेक धर्म हैं। तुम धर्म स्वीकारनेवाले ही वाले हो तो देश में प्रचंड बहुसंख्यकों का हिंदूधर्म ही रहना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष राज्य हिंदू बहुल देश द्वारा अल्पसंख्यकों को दिखाया हुआ सर्वाधिक औदार्य है। अपने देश की प्राचीन संस्कृति को नजरअंदाज करने के लिए धर्मनिरपेक्ष राज्य यह पिच्छल शब्द प्रयोग में लाया गया है। लोगों को धर्म प्रसार करना हो तो करने दो। परंतु, उसका समावेश मूलभूत अधिकारों में ना करें। इसके कारण वैमनस्य बढ़ेगा। ‘प्रसार’ शब्द मूलभूत अधिकारों में से हटाया जाए।

पंडित जवाहरलाल नेहरु – विषय क्या है यह मुझे मालूम पड़ेगा क्या?

लक्ष्मीकांत मैत्रा – अपनी विरासत संपन्न है। सभी को धर्म प्रकटन, आचरण, प्रसार के समान मूलभूत अधिकार मिलना चाहिए। ईसाइयों ने उत्साह और उन्मादपूर्वक धर्मांतरण नहीं किए हैं।

रोहिणी कुमार चौधरी – धर्मप्रचार में अन्य धर्मियों पर किचड़ उछालने, उदा. भगवान श्रीकृष्ण और मूर्तिपूजा की निंदा पर कठोर दंड की व्यवस्था संविधान में होना चाहिए।

टी. टी. कृष्णमाचारी – ‘प्रसार’ और ‘धर्मांतरण’ का अधिकार सभी को दिया गया है।

इतनी चर्चा के उपरांत ईसाइयों के धर्म प्रसार का अधिकार, वस्तुत: (अज्ञानी व्यक्ति सहित) धर्मांतरण का अधिकार मान्य हुआ।

संविधान का गठन होते समय गांधीजी जीवित थे। इस विषय पर उनके विचार ‘क्रिश्चियन मिशन्स: देअर प्लेस इन इंडिया’ (1941) में संकलित हुए हैं। परंतु, आश्चर्य यह है कि उनके विचारों की दखल किसी ने भी नहीं ली। यहां तक कि कांग्रेसियों तक ने।

वस्तुत: यदि धर्म परिवर्तन बुद्धिपूर्वक किया गया है तो कोई हर्ज नहीं, परंतु ऐसे धर्मांतरण कुछ ही लोग करते हैं अधिकतर धर्मांतरण धन आदि का लोभ अथवा जोर-जबरदस्ती से ही किए जाते हैं। यही वस्तुस्थिति है। जो भी हो इस तरह के धर्मांतरण वैमनस्य बढ़ाने का ही काम करते हैं। यह वैमनस्य असंतोष ही फैलाता है जो देश के विकास व प्रगति लिए घातक है। वर्तमान में लगभग जितने भी धर्मांतरण हो रहे हैं उनमें बहुलता किसी लालच या स्वार्थ की ही है। देश में शांति बने रहे, बेवजह के विवाद ना खड़े हों इसके लिए अब आवश्यक हो गया है कि उपर्युक्त प्रकार के धर्मांतरणों पर पाबंदी ही लगा दी जाए। हां, जो लोग बुद्धिपूर्वक धर्मांतरण करना चाहें वे चाहें तो धर्मांतरण कर एक धर्म से दूसरे धर्म में खुशी-खुशी जाएं। इसमें कोई ऐतराज नहीं। वर्ना इसी तरह से सामूहिक धर्मांतरणों के आयोजन प्रतिस्पर्धात्मक ढ़ंग से होते ही रहेंगे और धर्म का मजाक बनता रहेगा।

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