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मस्त कलंदर…सुंदर किन्नर गरीब नवाज का 801वां उर्स

अजमेर के ख्वाजा साहब यानी सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती कह लो या गरीब नवाज के नाम से पुकारो… इन्हें कौन नहीं जानता। इस दुनिया के सूफी संतों में सबसे बड़ा इनका ही नाम है। ख्वाजा का नाम लेते ही लोगों के मन में स्वत: उनके प्रति आस्था और श्रद्धा का सैलाब उमड़ आता है। उन्हें देखे बिना ही जैसे उनसे मोहब्बत हो गई हो, ऐसी भावना उनके भक्तों में आ जाती है। क्या हिंदू और क्या मुसलमान, ख्वाजा साहब का दरवाजा बिना जाति-धर्म बंधन और पहचान के सबके लिए खुला है। यहां आने वाला बंदा कभी खाली हाथ नहीं लौटता, इसलिए तो ख्वाजा साहब की बात ही निराली है। क्या तो इनकी शान-ओ-शौकत है और क्या इनके अकीदतमंदों की भक्ति है कि देश और विदेश के कोने-कोने से ख्वाजा के दरबार में पहुंचते हैं और झूम उठते हैं। पूरे वर्ष उर्स का इंतजार करते इनके बंदे, बिना किसी तकलीफ की परवाह किए इनके दर पर पहुंचते हैं।
गरीब नवाज के दीवानों की इस देश में कमी नहीं है। दीवानों की फेहरिस्त में हर वो नाम है जो ख्वाजा के दरबार में पहुंचता है। पर ख्वाजा के दीवानों में सबसे पहले नाम आता है तो वो हैं कलंदर-मलंदर और किन्नर। इनमें ख्वाजा के प्रति ऐसी दीवानगी है कि यहां पहुंचने वाला हर जायरीन ख्वाजा के बाद इन्हें देखकर ख्वाजा की मोहब्बत का एहसास कर उठता है। गरीब नवाज की दिल फरियादी भी देखिए कि उर्स की शान ही कलंदरों और किन्नरों से बनती है। ख्वाजा के शहर में घूमते मस्त कलंदरों और किन्नरों का हुजूम उर्स का मुख्य आकर्षण होता है। और फिर इनके सूफी रंग में रंगे ख्वाजा की भक्ति के गीत-संगीत पर तो हर कोई झूम उठता है।.. दमादम मस्त कलंदर… सूफी भजन पर
झूमने वाली दुनिया इन्हीं कलंदरों की देन है। इन कलंदरों की न तो कोई जाति है और न कोई धार्मिक पहचान। इनकी भक्ति का इजहार भी दुनिया में सबसे निराला है। देश भर से कलंदर और मलंदर दिल्ली स्थित निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर इकट्ठे होते हैं और यहां से मई में आग बरसते आसमान और तपती धरती पर नंगे पैर 13 दिन की पैदल यात्रा कर अजमेर दरगाह पहुंचते हैं। उर्स की शुरुआत कलंदरों की इजहार-ए- अकीदत से होती है। कलंदरों और मलंदरों का जुलूस देश भर में मशहूर है। ये अपने शरीर को कष्ट देकर गरीब नवाज के प्रति भक्ति का इजहार करते हैं। कलंदरों का जुलूस गंज स्थित उस्मानी चिल्ले से दरगाह तक पहुंचता है। उसके बाद ख्वाजा को इनकी ओर से चादर पेश की जाती है।अब ख्वाजा के दीवानों में अगला नाम आता है किन्नरों का, वह भी सुंदर किन्नरों का। ख्वाजा के शहर में आकर किन्नर अपने सौंदर्य का भरपूर प्रदर्शन करते हैं और ख्वाजा की भक्ति में खोकर अपने किन्नर होने के एहसास को भुला देते हैं। इनकी दरियादिली ही है कि गरीब नवाज के पास आकर वे अपने लिए कुछ नहीं मांगते, बल्कि जिन्हें वे दुआएं देते हैं उनके लिए यहां आकर दुआ मांगते हैं। और जिन लोगों की दुआएं पूरी हो गईं, उनके लिए ये किन्नर गरीब नवाज का शुक्रिया अदा करते हैं। इसी के साथ ये देश और दुनिया में अमन-शांति की दुआ मांगते हैं। इनका एक रूप और यहां देखने को मिलता है कि ये अपनी बेशुमार दौलत को यहां आने वाले अकीदतमंदों की खिदमत में गुप्त रूप से लगा देते हैं। गरीब नवाज के नाम पर अपनी दौलत को सामाजिक कार्यों में लगाते हैं। किन्नरों की महफिल उर्स का सबसे बड़ा आकर्षण है। महंगे से महंगे कपड़े, खूबसूरत गहने, ब्रांडेड कॉस्मेटिक्स से मेकअप कर अपने आप को ये इतना सुंदर बना लेते हैं कि बॉलीवुड सुंदरियां भी पीछे रह जाएं। रजब की सात तारीख को इनकी महफिल सजती है तो गरीब नवाज का शहर भी झूम उठता है। कव्वाली की धुनों पर ये अपने नृत्य कौशल का जलवा बिखेरते हैं। इनकी दिलकश अदाएं जायरीनों का दिल जीत लेती हैं। किन्नर दुनिया की अकेली प्रजाति है, जिसमें जाति या धर्म का कोई बंधन नहीं है। न इनके गौत्र हैं और न ही ये किसी जातिय बंधन में बंधे हैं। ये हर धर्म और हर समाज के धार्मिक कार्यक्रमों में पूरी शिद्दत के साथ शिरकत करते हैं। इसके बावजूद ख्वाजा साहब को ये अपने सबसे करीबी मानते हैं। इनमें गुरु-शिष्य की परंपरा आज भी सख्ती से निभाई जाती है। ये जुलूस के रूप में ख्वाजा साहब को चादर पेश करते हैं। रजब के चांद के साथ उर्स शुरू
हमारा ट्रस्ट एक स्वतंत्र इकाई है
हौज खास स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर का संचालन श्रीनीलांचल सेवा संघ, दिल्ली द्वारा किया जाता है। ट्रस्ट के कार्यों की विस्तृत जानकारी के लिए संघ के सचिव रवीन्द्रनाथ प्रधान से उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता सुधीर गहलोत की खास बातचीत –दिल्ली में मंदिर बनवाने की क्या वजह है?
भगवान जगन्नाथ के भक्त पूरी दुनिया में फैले हैं। दिल्ली में भी हैं। लोग भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने रोज पुरी नहीं जा सकते। इसलिए लोगों की भक्ति और श्रद्धा को ध्यान में रखकर यहां मंदिर बनवाया गया है। सन 1966 में इस मंदिर के लिए स्थान का चयन किया गया था। कालाहांडी के तत्कालीन महाराजा पी.के. देव, श्री भ्रमर प्रधान, श्री दुर्योधन प्रधान और श्री दामोदर विश्वास के उद्यम से हौजखास में जमीन खरीदी गई। इसमें ओडिशा के पलंबर लोगों का विशेष योगदान है। 1 फरवरी 1979 को मंदिर में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। ट्रस्ट की क्या भूमिका है?
हमारी कोशिश है कि पुरी के श्रीमंदिर की तर्ज पर यहां धार्मिक गतिविधियों को चलाया जाय। मंदिर में पूजा-पाठ, मूल मंदिर की विधियों एवं विधानों द्वारा किया जाता है। आरती और भगवान को

भोग लगाने की प्रक्रिया और समय, पुरी के मूल मंदिर पर आधारित है। पुरी की विश्वविख्यात रथ यात्रा की तर्ज पर दिल्ली में भी इसका आयोजन किया जाता है। यह रथ यात्रा भी पूरे एक महीने चलती है।

आपके ट्रस्ट का पुरी के श्रीमंदिर ट्रस्ट से क्या संबंध है?
हमारा ट्रस्ट एक स्वतंत्र इकाई है। इसका पुरी के जगन्नाथ मंदिर को संचालित करने वाले श्रीमंदिर ट्रस्ट से कोई संबंध नहीं है।

भविष्य की योजना के बारे में बताएं?
हम धार्मिक कार्यों के साथ अपने सामाजिक कार्य को और वृहद करने पर विचार कर रहे हैं, जिससे दिल्ली में सड़कों पर रह रहे लोगों, अनाथ बच्चों और बुजुर्गों के लिए कुछ किया जा सके। उन्हें जरुरी सहायता पहुंचाने के विकल्पों पर हम विचार-विमर्श कर रहे हैं।

पुरी के श्रीमंदिर की तर्ज पर हौजखास के जगन्नाथ मंदिर में भी हर साल रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। पूरे एक महीने तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन में हजारों की संख्या में भक्तगण भाग लेते हैं।रथ यात्रा के बारे में एक कथा मशहूर है। कहा जाता है कि प्रतिमा स्थापित करने के पश्चात भगवान जगन्नाथ ने राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडीजा से वरदान मांगने को कहा। राजा ने
भगवान से कहा ”भगवन, हमारे बाद हमारे कुल में कोई ना रहे। भगवान ने आश्चर्य से पूछा कि राजन तुम्हारे 18 पुत्र हैं, इनका क्या होगा? और तुम्हारी मृत्यु के पश्चात तुम्हारा पिंडदान कौन करेगा? उत्तर रानी ने दिया ”प्रभु, मैं चाहती हूं कि आप स्वयं हमारे यहां पुत्र के रुप में आएं और हमारा पिंडदान करें। भगवान ने रानी की बात स्वीकार करते हुए, हर साल उनके यहां आने की बात कही। मुख्य मंदिर से रानी गुंडीजा के महल तक, जिसे माता गुंडीजा मंदिर भी कहा जाता है, भगवान जगन्नाथ हर साल रथयात्रा कर पहुंचते हैं। इस रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी रहती हैं। धर्मपत्नी लक्ष्मी को भगवान जगन्नाथ अपने साथ रथयात्रा में शामिल नहीं करते।दिल्ली का मंदिर ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है। यहां के पूजा-पाठ की पद्धति और विधि-विधान भी श्रीमंदिर के अनुसार ही संपादित किए जाते हैं। मंदिर के पुजारी पंडित जगबंधु दास का कहना है कि इस मंदिर में हर वर्ग के लोग आते हैं। मंदिर में आये एक भक्त रोहित कहते हैं ”मंदिर में शांति महसूस होती है। जीवन की भागम भाग में शांति ईश्वर के द्वार पर ही मिल सकती है। यहां बैठना बहुत अच्छा लगता है। शालिनी बताती हैं ”हम बच्चों में संस्कार, विनम्रता और पूर्ण व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए मंदिर आते हैं। शांति की खोज में भारत आने वाले विदेशी सैलानियों को बड़ी संख्या में इस मंदिर में देखा जा सकता है।मंदिर गरीबों को नि:शुल्क भोजन, और फुटपाथों पर रात बिताने वालों को कंबल का वितरण भी करता है। नि:शुल्क नेत्र जांच शिविर और रक्तदान शिविर लगाये जाते हैं। मंदिर न्यूनतम शुल्क पर आवास भी उपलब्ध कराता है। मंदिर ओडिया लोगों और अन्य देशवासियों के बीच सांस्कृतिक पुल का कार्य करता है। ओडिशी नृत्य और रीति-रिवाजों की जानकारी उपलब्ध करायी जाती है। मंदिर धार्मिक और आध्यात्मिक क्रियाकलापों के साथ सामाजिक केन्द्र के रुप में भी पहचान बना रहा है।

 

प्रीति जोशी

 

on in french translationполиграф мастер Харьков

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