ब्रेकिंग न्यूज़ 

दिल्ली में भी है जगन्नाथ मंदिर

पुरी के श्रीमंदिर की तर्ज पर हौजखास के जगन्नाथ मंदिर में भी हर साल रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। पूरे एक महीने तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन में हजारों की संख्या में भक्तगण भाग लेते हैं। रथ यात्रा के बारे में एक कथा मशहूर है। कहा जाता है कि प्रतिमा स्थापित करने के पश्चात भगवान जगन्नाथ ने राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडीजा से वरदान मांगने को कहा। राजा ने भगवान से कहा ”भगवन, हमारे बाद हमारे कुल में कोई ना रहे। भगवान ने आश्चय से पूछा कि राजन तुम्हारे 18 पुत्र हैं, इनका क्या होगा और तुम्हारी मृत्यु के पश्चात तुम्हारा पिंडदान कौन करेगा? ” उत्तर रानी ने दिया ”प्रभु, मैं चाहती हूं कि आप स्वयं हमारे यहां पुत्र के रुप में आएं और हमारा पिंडदान करें। ”
हिंदुओं के चार प्रसिद्ध धामों में से एक, पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर की स्थापना में कलिंग के दो राजाओं का योगदान माना जाता है। उपलब्ध ताम्रपत्रों के अनुसार कलिंग के गंगवंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंगदेव ने 10वीं और 11वीं शताब्दी के मध्य, मंदिर का निर्माण शुरू कराया। जिसे राजा अनंग भीमदेव ने पूर्ण कराया। सन 1559 तक मंदिर में पूजा-अर्चना होती रही। इसी वर्ष अफ गान सेनापति काला पहाड़ ने ओडिशा पर हमला कर दिया और मंदिर की मूर्तियों को खंडित करने के बाद पूजा-अर्चना पर भी रोक लगा दी।खुर्दा में रामचंद्र देव द्वारा स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के बाद, इन मूर्तियों का पुनरुद्धार कराया गया और विधि-विधान से पूजा पाठ की शुरूआत की गयी।
स्कंध पुराण और ब्रह्म पुराण आदि के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की पूजा गण (कबीला) प्रमुख विश्ववसु द्वारा नीलमाधव के रुप में की जाती थी। भगवान नीलमाधव की महिमा को सुनकर मालवा (मध्य प्रदेश) के नरेश इंद्रद्युम्न ने नीलमाधव की मूर्ति को खोजने के लिए पुजारी विद्यापति को भेजा। लेकिन विद्यापति कामयाब नहीं हो सके। विद्यापति की मुलाकात कबीले के सरदार और भगवान नीलमाधव के उपासक विश्ववसु की बेटी ललिता से हुई। विद्यापति ने ललिता से नीलमाधव के बारे पूछा। शादी करने की शर्त पर ललिता मंदिर के बारे में बताने को तैयार हुई। विद्यापति ललिता से शादी करने को राजी हो गए। नीलमाधव की महिमा सुनकर विद्यापति उनके दर्शन करने को आतुर हो गए। दर्शन के लिए उन्होंने अपने ससुर विश्ववसु से आग्रह किया। उन्होंने विद्यापति के सामने शर्त रखी कि मंदिर में पहुंचने तक आँखों पर पट्टी बांधनी होगी। विद्यापति इसके लिए तैयार हो गए।
बुद्धिमान विद्यापति मार्ग में सरसों गिराते गए, ताकि पौधों के बड़े होने पर मंदिर का मार्ग पहचाना जा सके। विद्यापति ने स्वदेश लौटकर नीलमाधव के बारे में राजा इंद्रद्युम्न को बताया। प्रतिमा का वर्णन सुनकर राजा इंद्रद्युम्न ने नील पहाड़ी की तरफ प्रस्थान किया, जहां विश्ववसु नीलमाधव की पूजा करता था। लेकिन राजा के पहुंचने से पहले ही नीलमाधव की प्रतिमा बालू में समाकर विलीन हो गयी। इससे राजा इंद्रद्युम्न बहुत दुखी हुए और प्रण किया कि जब तक भगवान के दर्शन नहीं होंगे, तब तक भोजन ग्रहण नहीं करेंगे। तभी आकाशवाणी हुई कि राजा परेशान मत हो। आकाशवाणी सुनकर राजा निश्चिंत हो गए। उन्होंने भगवान विष्णु का मंदिर बनवाया। जिसमें नारद द्वारा लायी गयी नरसिंह की प्रतिमा को स्थापित करवाया। इंद्रद्युम्न से नीलमाधव ने स्वप्न में प्रकट होकर कहा कि समुद्र तट पर सुंगधित लकड़ी का एक ग_र मिलेगा, उसी से मेरी मूर्ति बनवाओ। राजा इंद्रद्युम्न लकड़ी का गट्ठर लेकर आ गए। उस लकड़ी को मूर्ति का स्वरुप देने के लिए राजा ने कारीगरों की खोज की। लेकिन ऐसा कोई कारीगर नहीं मिला, जो स्वप्न के अनुरुप उस लकड़ी को आकार दे सके। तब स्वयं भगवान विष्णु और विश्वकर्मा, मूर्तिकार और बढ़ई के रूप में राजा के समक्ष उपस्थित हुए। रुप बदलकर आये भगवान ने राजा की इच्छानुसार मूर्ति तैयार करने के लिए एक महीने का समय मांगा। साथ में उन्होंने शर्त रखी कि पूरे एक महीने तक उस कमरे में कोई न आये। पूरे 13 दिनों तक कमरे में निरंतर कार्य चलता रहा और उसकी ध्वनि बाहर तक आती रही। लेकिन 14वें दिन कमरे से आवाज आनी बंद हो गयी। तब राजा की धर्मपत्नी गुंडीजा चिंतित हो गयीं और कमरे का दरवाजा खोल दिया। तब तक भगवान का सिर्फ अद्र्ध-स्वरुप ही तैयार हुआ था। कारीगर के रुप में मौजूद भगवान ने शर्त की याद दिलाते हुए कार्य को अधूरा छोड़ दिया। मूर्ति को पूर्ण करने के लिए राजा ने बार-बार आग्रह किया। तब कारीगर बोले इसी अद्र्धनिर्मित प्रतिमा की स्थापना करो, क्योंकि इस कलियुग में भगवान तुम्हें अद्र्ध स्वरुप में ही दिखेंगे। दिल्ली में पांच मंदिर
पुरी के विश्वविख्यात श्रीमंदिर में भगवान जगन्नाथ और उनके बड़े भाई बलराम एवं बहन सुभद्रा की प्रतिमा स्थापित है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर को श्रीमंदिर भी कहा जाता है। भगवान जगन्नाथ के प्रति लोगों में श्रद्धा के कारण दिल्ली में उनके पांच विशालकाय मंदिर स्थापित हो चुके हैं। इन पांच मंदिरों में से हौजखास का जगन्नाथ मंदिर भी एक है। लगभग चार दशक पहले श्वेत संगमरमर से निर्मित यह भव्य मंदिर, वास्तुकला का अप्रतिम उदाहरण है। पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर ही हौजखास के मंदिर को बनाया गया है। इस मंदिर में प्रवेश करते ही दाएं भाग में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित है। अग्रपूजा का वरदान पाए भगवान गणेश से कुछ ही दूरी पर नंदी सहित भगवान शिव की प्रतिमा है। भगवान गणेश और भगवान शिव की प्रतिमा के पीछे, मध्य गृह में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलराम, बहन सुभद्रा, पथ-प्रदर्शक सुदर्शन, भूदेवी, श्रीदेवी और नीलमाधव की सप्तमूर्तियां स्थापित हैं। भूदेवी को सरस्वती और श्रीदेवी को लक्ष्मी भी कहा जाता है। मुख्य गृह की दीवारों पर शानदार नक्काशी की गयी है। नृत्य की मुद्रा में अप्सराओं और वसुओं, द्वारपालों और मृदंग बजाते नर्तकों की आकृति मन को मोह लेती हैं। लक्ष्मी की प्रतिमा धातु से निर्मित है, जिस पर सोने की परत चढ़ाया गया है। मां सरस्वती और लक्ष्मी की मनमोहक प्रतिमाएं भावविभोर कर देती है। इस पंचगृह के बाएं भाग में श्रीहनुमानजी की प्रतिमा है, जिन्हें भगवान जगन्नाथ का पथप्रदर्शक कहा जाता है। हनुमानजी के दर्शन किए बिना भगवान जगन्नाथ दर्शन को श्रद्धालु अधूरा मानते हैं। इन देवों और देवियों की प्रतिमा को पुरी से मंगाकर स्थापित किया गया है। मंदिर के मुख्य शिखर पर फहराता भगवा ध्वज भक्तों को अपनी तरफ आने को विवश कर देता है।
हमारा ट्रस्ट एक स्वतंत्र इकाई है
हौज खास स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर का संचालन श्रीनीलांचल सेवा संघ, दिल्ली द्वारा किया जाता है। ट्रस्ट के कार्यों की विस्तृत जानकारी के लिए संघ के सचिव रवीन्द्रनाथ प्रधान से उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता सुधीर गहलोत की खास बातचीत –दिल्ली में मंदिर बनवाने की क्या वजह है?
भगवान जगन्नाथ के भक्त पूरी दुनिया में फैले हैं। दिल्ली में भी हैं। लोग भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने रोज पुरी नहीं जा सकते। इसलिए लोगों की भक्ति और श्रद्धा को ध्यान में रखकर यहां मंदिर बनवाया गया है। सन 1966 में इस मंदिर के लिए स्थान का चयन किया गया था। कालाहांडी के तत्कालीन महाराजा पी.के. देव, श्री भ्रमर प्रधान, श्री दुर्योधन प्रधान और श्री दामोदर विश्वास के उद्यम से हौजखास में जमीन खरीदी गई। इसमें ओडिशा के पलंबर लोगों का विशेष योगदान है। 1 फरवरी 1979 को मंदिर में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा हुई।

ट्रस्ट की क्या भूमिका है?
हमारी कोशिश है कि पुरी के श्रीमंदिर की तर्ज पर यहां धार्मिक गतिविधियों को चलाया जाय। मंदिर में पूजा-पाठ, मूल मंदिर की विधियों एवं विधानों द्वारा किया जाता है। आरती और भगवान को

भोग लगाने की प्रक्रिया और समय, पुरी के मूल मंदिर पर आधारित है। पुरी की विश्वविख्यात रथ यात्रा की तर्ज पर दिल्ली में भी इसका आयोजन किया जाता है। यह रथ यात्रा भी पूरे एक महीने चलती है।

आपके ट्रस्ट का पुरी के श्रीमंदिर ट्रस्ट से क्या संबंध है?
हमारा ट्रस्ट एक स्वतंत्र इकाई है। इसका पुरी के जगन्नाथ मंदिर को संचालित करने वाले श्रीमंदिर ट्रस्ट से कोई संबंध नहीं है।

भविष्य की योजना के बारे में बताएं?
हम धार्मिक कार्यों के साथ अपने सामाजिक कार्य को और वृहद करने पर विचार कर रहे हैं, जिससे दिल्ली में सड़कों पर रह रहे लोगों, अनाथ बच्चों और बुजुर्गों के लिए कुछ किया जा सके। उन्हें जरुरी सहायता पहुंचाने के विकल्पों पर हम विचार-विमर्श कर रहे हैं।

पुरी के श्रीमंदिर की तर्ज पर हौजखास के जगन्नाथ मंदिर में भी हर साल रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। पूरे एक महीने तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन में हजारों की संख्या में भक्तगण भाग लेते हैं।रथ यात्रा के बारे में एक कथा मशहूर है। कहा जाता है कि प्रतिमा स्थापित करने के पश्चात भगवान जगन्नाथ ने राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडीजा से वरदान मांगने को कहा। राजा ने
भगवान से कहा ”भगवन, हमारे बाद हमारे कुल में कोई ना रहे। भगवान ने आश्चर्य से पूछा कि राजन तुम्हारे 18 पुत्र हैं, इनका क्या होगा? और तुम्हारी मृत्यु के पश्चात तुम्हारा पिंडदान कौन करेगा? उत्तर रानी ने दिया ”प्रभु, मैं चाहती हूं कि आप स्वयं हमारे यहां पुत्र के रुप में आएं और हमारा पिंडदान करें। भगवान ने रानी की बात स्वीकार करते हुए, हर साल उनके यहां आने की बात कही। मुख्य मंदिर से रानी गुंडीजा के महल तक, जिसे माता गुंडीजा मंदिर भी कहा जाता है, भगवान जगन्नाथ हर साल रथयात्रा कर पहुंचते हैं। इस रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी रहती हैं। धर्मपत्नी लक्ष्मी को भगवान जगन्नाथ अपने साथ रथयात्रा में शामिल नहीं करते।दिल्ली का मंदिर ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है। यहां के पूजा-पाठ की पद्धति और विधि-विधान भी श्रीमंदिर के अनुसार ही संपादित किए जाते हैं। मंदिर के पुजारी पंडित जगबंधु दास का कहना है कि इस मंदिर में हर वर्ग के लोग आते हैं। मंदिर में आये एक भक्त रोहित कहते हैं ”मंदिर में शांति महसूस होती है। जीवन की भागम भाग में शांति ईश्वर के द्वार पर ही मिल सकती है। यहां बैठना बहुत अच्छा लगता है। शालिनी बताती हैं ”हम बच्चों में संस्कार, विनम्रता और पूर्ण व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए मंदिर आते हैं। शांति की खोज में भारत आने वाले विदेशी सैलानियों को बड़ी संख्या में इस मंदिर में देखा जा सकता है।

मंदिर गरीबों को नि:शुल्क भोजन, और फुटपाथों पर रात बिताने वालों को कंबल का वितरण भी करता है। नि:शुल्क नेत्र जांच शिविर और रक्तदान शिविर लगाये जाते हैं। मंदिर न्यूनतम शुल्क पर आवास भी उपलब्ध कराता है। मंदिर ओडिया लोगों और अन्य देशवासियों के बीच सांस्कृतिक पुल का कार्य करता है। ओडिशी नृत्य और रीति-रिवाजों की जानकारी उपलब्ध करायी जाती है। मंदिर धार्मिक और आध्यात्मिक क्रियाकलापों के साथ सामाजिक केन्द्र के रुप में भी पहचान बना रहा है।

 

सुरेश उनियाल

world of warplanes модыmfxbroker отзывы

Leave a Reply

Your email address will not be published.