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बाबू राव पेंटर और चंदूलाल शाह

मुम्बई से कॉमर्स में ग्रेजुएट चंदूलाल जयसिंह भाई शाह फिल्मों में अचानक आ गए। इस बारे में उनकी फिल्मों की हीरोइन और बाद में उनकी साथी फिल्मकार गौहर एक इंटरव्यू में बताती हैं: ‘होमी मास्टर शीरीं-फरहाद का निर्देशन कर रहे थे। मैं शीरीं बनी थी और खलील फरहाद। होमी मास्टर मुझे वह दृश्य समझा रहे थे जहां दो पुरुष शीरीं को पहाड़ से नीचे फेंक देते हैं।
जिस समय मदन थिएटर्स अपनी तिजोरियां भरने के लिए सेक्स अपील वाली फिल्में बना रहा था। उसी समय कुछ गंभीर और जिम्मेदार फिल्मकार भी काम कर रहे थे। बाबू राव पेंटर और चंदूलाल शाह फालके के बाद की पीढ़ी के उन फिल्मकरों में से थे, जो पूरी मेहनत से फिल्म बनाते थे। क्वालिटी के लिए वे किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं थे। बाबू राव पेंटर की फिल्म सैरंध्री पांडवों के अज्ञातवास की कहानी है। जब वे राजा विराट के महल में पहचान बदल कर रह रहे थे। द्रौपदी सैरंध्री नाम की दासी बनी हुई थी, जिसके साथ रानी का भाई कीचक दुव्र्यवहार करता है, तब भीम उसे मार डालता है। इस फिल्म में द्रौपदी और रानी की भूमिकाएं दो तवायफों गुलाब बाई और अनुसुइया बाई ने की थीं, जिनके नाम बदल कर कमला देवी और सुशीला देवी रख दिए गए थे। भीम और कीचक की भूमिकाओं में दो पेशेवर पहलवान बाला साहब यादव और झुंझार राव उतारे गए थे। इनकी कुश्तियां फिल्म का बड़ा आकर्षण थीं।यह फिल्म खाडिलकर के नाटक सैरंध्री पर आधारित थी। नाटक में कीचक को लॉर्ड कर्जन का प्रतीक बनाया गया था। इस तरह द्रौपदी भारतमाता का प्रतीक बन गई थी। इस नाटक के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई थी। इसलिए जब फिल्म बनकर तैयार हुई तो कई जगहों पर इस फिल्म का सार्वजनिक स्वागत भी किया गया था। सैंरंध्री की सफलता के बाद बाबूराव पेंटर ने वत्सलाहरण, सिंहगढ़, शाह को शह, साहूकारी पाश जैसी फिल्में बनाईं।

फिल्म इतिहासकार मनमोहन चड्ढा बाबू राव पेंटर के बारे में लिखते हैं: ‘उनका पूरा ध्यान कैमरा कोणों, सेटों की साज-सज्जा और विषय की प्रमाणिकता पर रहता था। जो विषय वह फिल्मांकन के लिए चुनते थे, उसमें पूरी तरह डूब जाते थे। उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि अभिनय पक्ष पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते थे… उनकी फिल्मों के सेट इतने भव्य और विशालकाय और प्रामाणिक होते थे कि लोग उन्हें देखने के लिए दूर-दूर से आते थे।

मुम्बई से कॉमर्स में ग्रेजुएट चंदूलाल जयसिंह भाई शाह फिल्मों में अचानक ही आ गए। इस बारे में उनकी फिल्मों की हीरोइन और बाद में उनकी साथी फिल्मकार गौहर एक इंटरव्यू में बताती हैं: ‘होमी मास्टर शीरीं-फरहाद का निर्देशन कर रहे थे। मैं शीरीं बनी थी और खलील फरहाद। होमी मास्टर मुझे वह दृश्य समझा रहे थे जहां दो पुरुष शीरीं को पहाड़ से नीचे फेंक देते हैं। तभी होमी मास्टर फिसल गए और उनका टखना टूट गया। दर्द से कराहते हुए होमी मास्टर ने चंदूलाल शाह को याद किया।

चंदू लाल शाह को यह पता लग चुका था कि फिल्म में गौहर मुख्य भूमिका में है। गौहर को उन्होंने इससे पहले शिलादित्य में काम करते देखा था। शाह आए और उन्होंने मास्टर की पटकथा बदल कर नई पटकथा लिखी। 1926 में उन्होंने फिल्म बनाई टाइपिस्ट गर्ल। इस फिल्म की नायिका रूबी मेयर्स उर्फ सुलोचना थी। गौहर भी उस फिल्म में थी, सहायक भूमिका में। गौहर ने इस बारे में एक इंटरव्यू में गिरीश करनाड को बताया: ‘मैंने कभी नायिका के अलावा दूसरी भूमिका नहीं की थी, लेकिन शाह ने मुझे मना लिया… इसके बाद शाह ने बहुत सी फिल्मों का निर्देशन किया और तब से मैंने सिर्फ चंदूलाल शाह की फिल्मों में ही काम किया।’

टाइपिस्ट गर्ल सुलोचना
1907 में एक एंग्लो यूरोपियन परिवार में जन्मी, टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में काम करने वाली रूबी मेयर्स को फिल्मों में लाने का श्रेय कोहिनूर फिल्म्स के मोहन भवनानी को है। पहले तो उसने काम करने से मना कर दिया था। वजह वही महिलाओं का फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। अभिनय का उसे जरा भी अनुभव नहीं था लेकिन एक बार जब सुलोचना के नाम से कैमरे के सामने कदम रखा, तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1925 में वह देश की सबसे ज्यादा पैसे लेने वाली हीरोइन बन गई थी। बताते हैं कि मोहन भवनानी ने उनकी पहली ही फिल्म ‘वीर बालाÓ के लिए उन्हें एक हजार रुपए महीने पर रखा था। यह कितनी बड़ी रकम थी, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैे कि मुम्बई में तब उनसे ज्यादा तनख्वाह सिर्फ मुम्बई के गवर्नर को मिलती थी। भूरी आंखोंवाली इस रूप की रानी की सुंदरता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उस दौर में हॉलिवुड में ग्रेटा गार्बों और मर्लिन डेटरीज की जितनी धूम थी, भारत में सुलोचना की उतनी ही धूम थी।

चंदूलाल शाह ने उसे अपनी पहली ही फिल्म टाइपिस्ट गर्ल में गौहर के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका दी। सुलोचना के लिए वह फिल्म मील का पत्थर साबित हुई। फिल्म हिट थी और सुलोचना को बहुत लोकप्रियता मिली। अगले साल बलिदान सुलोचना की दूसरी लगातार हिट फिल्म थी। 1927 में ही सुलोचना की फिल्म वाइल्ड कैट ऑफ बॉम्बे प्रदर्शित हुई थी। उसमें सुलोचना ने आठ भूमिकाएं की थीं।

अगले दो साल सुलोचना ने निर्देशक आर.एस. चौधरी के साथ तीन फिल्में कीं। तीनों रोमांटिक फिल्में थीं। माधुरी और अनारकली 1928 में प्रदर्शित हुई थी और 1929 में इंदिरा बी.ए. मूक फिल्मों के समय की ये श्रेष्ठतम फिल्मों मंं से थीं। सुलोचना की ख्याति का आलम यह था कि खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन करते गांधीजी पर बनी एक लघु फिल्म दिखाई जा रही थी तो इसके साथ ही फिल्म माधुरी मे सुलोचना का एक लोकप्रिय डांस का दृश्य भी ध्वनि प्रभावों को जोड़कर डाल दिया गया था।

ध्वनि के आने के बाद सुलोचना के फिल्मी जीवन में भी दूसरी नायिकाओं की ही तरह एक ठहराव आ गया। बोलती फिल्मों का मतलब था, हिंदी में ठीक तरह से अपने संवाद बोल सकना। एक साल सुलोचना ने जमकर हिंदी सीखी और 1932 में माधुरी के सवाक संस्करण के साथ वापसी की। इसके बाद उनकी कुछ और फिल्मों के सवाक संस्करण बने। इंदिरा एम.ए. (1934), अनारकली (1935), बॉम्बे की बिल्ली (1936) के साथ सुलोचना की सफल वापसी हुई। अब उसे 5000 रुपए महीने मिलने लगे। 1933 से 1939 के बीच मूक फिल्मों के सबसे बड़े स्टार डी. बिलिमोरिया के साथ सुलोचना की कई बड़ी फिल्मों बनीं। 1953 में सुलोचना को एक बार फिर अनारकली फिल्म में काम करने का मौका मिला, लेकिन इस बार वह अनारकली की भूमिका में नहीं, अनारकली की मां की भूमिका में थी, अनारकली की भूमिका बीना राय ने निभाई थी।

1983 में मुम्बई के एक फ्लैट में सुलोचना की मौत हुई। अंतिम समय में कोई उनके आस-पास नहीं था। इतनी बड़ी नायिका की ऐसी अनाम मौत!

ज्यूरी में हैं प्रतियोगिता में नहीं
कान फिल्म समारोह की शुरुआत ही भारत के लिए एक आश्चर्य के साथ हुई। यह तो सभी जानते थे कि समारोह की ओपनिंग फिल्म ‘द ग्रेट गेट्सबाइ’ है। चूंकि अमिताभ बच्चन इस फिल्म में एक छोटी सी भूमिका में हैं, इसलिए इसकी स्क्रीनिंग के मौके पर उन्हें भी बुलाया जाएगा। लेकिन यह अमिताभ के लिए और पूरे भारत के लिए आश्चर्य की बात थी कि इस मौके पर अमिताभ को फिल्म के नायक लियनार्दो दे कैप्रीयो के साथ मंच पर बुला लिया गया।यह सम्मान की बात जरूर है कि स्टीवन स्पीलबर्ग और आंग ली के साथ-साथ प्रतियोगिता की ज्यूरी में विद्या बालन भी शामिल है। इस साल लघु फिल्मों की ज्यूरी में नंदिता दास को भी शामिल किया गया है। नंदिता दास को इससे पहले 2005 के कान फिल्म समारोह की ज्यूरी में भी शामिल किया गया था।

भारत को भले ही इस समारोह के अतिथि देश का दर्जा दिया गया है लेकिन भारत की कोई भी फिल्म यहां प्रतियोगिता खंड में शामिल नहीं है। भारत की आधिकारिक एंट्री ‘बॉम्बे टॉकीज’ को ‘मिडनाइट सिनेमा’ के खंड में रखा गया है जिसके बारे में बताया जाता है कि इस खंड में थोड़ी कोशिशों के बाद किसी भी फिल्म को शामिल करवाया जा सकता है। अमित कुमार की डेब्यू फिल्म ‘मानसून शूटआउट’ को भी इसी खंड में प्रदर्शित किया जा रहा है।

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