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लोकतंत्र और आतंकवाद के बीच जंग

46 डिग्री सेल्सियस को पार करती तीखी झुलसन के बीच छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की विकास-यात्रा में दो दिन उनका पीछा करने के दौरान बीच-बीच में उनसे छोटे-छोटे संवाद के अवसर मिले। राज्य के मैदानी हिस्सों के नौ विधानसभा क्षेत्रों में इस यात्रा के दूसरे चरण में उनसे हुई बातचीत के टुकड़ों को इस साक्षात्कार में पिरोया गया है। छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा के इतिहास में किसी राजनीतिक दल पर सबसे बड़ा हमला 25 मई की दोपहर को कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ पर हुआ, जिसमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री नंदकुमार पटेल और पूर्व नेता प्रतिपक्ष श्री महेन्द्र कर्मा सहित चौबीस व्यक्ति शहीद हो गये। आपकी त्वरित प्रतिक्रिया?
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और त्रासद घटना है। यह सीधे हमारे लोकतंत्र पर हमला है। नंदकुमार पटेल और माननीय महेन्द्र कर्मा वरिष्ठ राजनेता थे। उनकी शहादत से प्रदेश और देश की बड़ी क्षति हुई है। महेन्द्र कर्मा दो दशकों से नक्सलवादियों के खिलाफ बड़ी बहादुरी के साथ लड़े। उनके ऊपर पहले भी चार बार नक्सली हमले हुए थे। उनके पंद्रह-सोलह परिजन नक्सली हमलों में मारे गये थे। इसलिए उन्हें मालूम था कि नक्सली मुख्यरूप से उन्हीं को निशाना बनाने के लिए आए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार श्री कर्मा गोलियों की बौछार के बीच अपने वाहन से बाहर निकल कर दोनों हाथ खड़े करते हुए सीधे नक्सलियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी पहचान बता दी। मुझे बताया गया है कि नक्सलियों ने गोलियों की पूरी मैग्जीन उनके सिर में उतार दी। उसके बाद भी उनके चेहरे को बंदूक के बट से कुचला गया। कर्मा जी जिस बहादुरी से नक्सलियों से जूझते रहे, उसी वीरता से उन्होंने शहादत दी। उनके इस जज्बे को प्रणाम करता हूं। नन्दकुमार पटेल जी और उनके साथियों पर नक्सलियों के कायराना हमले में शहीद हुए सभी मित्रों को मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देता हूं। उनके दुखद अवसान को भारतीय लोकतंत्र के लिए महान बलिदान के रूप में दर्ज किया जायेगा।

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का आरोप है कि परिवर्तन यात्रा पर निकले कांग्रेसियों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गई थी?
कर्मा जी को जेड श्रेणी की सुरक्षा दी गई थी। इस बर्बर संहार की न्यायिक जांच के आदेश दे दिये गये हैं। उस जांच से सारी स्थितियां स्पष्ट हो जाएंगी।

श्री जोगी ने नक्सलियों से निपटने में आपकी सरकार पर विफलता का आरोप लगाते हुए तुरंत राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है।
नक्सली चुनौती के बरक्स यह गंभीर राजनीतिक संकट का समय है। इसलिए फिलहाल इसे लेकर राजनीति न करना उचित होगा। दरअसल नक्सली कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी या अन्य किसी भी पार्टी के विरोधी न होकर समूचे लोकतंत्र के शत्रु हैं। उन्होंने किसी भी पार्टी को नहीं बख्शा है। 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के शासनकाल में उत्तर बस्तर में नारायणपुर के निकट नक्सलियों ने घात लगाकर पुलिस पार्टी पर हमला किया था, जिसमें तेजस्वी युवा पुलिस डी.एस.पी. भास्कर दीवान शहीद हो गये थे। सुरक्षाकर्मियों के अलावा नक्सली निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को चुन-चुनकर निशाना बनाते हैं। हमारे आदिवासी मंत्री केदार कश्यप के बड़े भाई और भाजपा के वरिष्ठ नेता तानसेन कश्यप की नक्सलियों ने उनकी कुलदेवी के मंदिर में हत्या कर दी थी। नक्सली पंचायत स्तर से लेकर लोकसभा तक के सभी जनप्रतिनिधियों की जान के दुश्मन हैं। भाजपा के पचास से अधिक छोटे-बड़े जनप्रतिनिधियों की नक्सली हमलों में शहादत हुई है। इसलिए इसे दलीय राजनीति का मुद्दा नही बनाना चाहिए।

कांग्रेस का आरोप है कि करीब एक दशक के आपके शासनकाल में पूरा छत्तीसगढ़ नक्सलवाद की गिरफ्त में आ गया है। देश जानना चाहता है कि नक्सलियों के सबसे मजबूत गढ़ अबूझमाड़ को आप कैसे और कब तक बूझेंगे?
बस्तर में नक्सलवाद या वामचरमपंथ का विस्तार छ: दशक में हुआ है। जब 1947 में कामरेड बी.टी. रणदिवे के आह्वान पर पंडित नेहरू की सरकार को उखाड़ फेंकने के ध्येय से सशस्त्र विद्रोह हुआ था तो सुरक्षा दस्तों ने त्वरित बल प्रयोग के द्वारा उसको बुरी तरह कुचल दिया था। तब बहुत सारे चरमपंथी कामरेड वारंगल से लगे दक्षिण बस्तर में दाखिल हो गये थे। तब वे शक्तिहीन और शस्त्रहीन थे। इसलिए एक-डेढ़ दशक तक चुप रहते हुए स्थितियां अनुकूल होने की प्रतिक्षा करते रहे। 25 मार्च 1966 को जब विशुद्ध राजनीतिक कारणों से तत्कालीन मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने जगदलपुर के राजमहल में पुलिस से धावा बुलवा कर अनेक आदिवासियों सहित लोकप्रिय नरेश प्रवीरचंद्र भंजदेव की हत्या करवा दी तो वाम चरमपंथियों को मर्माहत आदिवासियों का विश्वास पाने का एक अवसर मिला। तब तक काकतीय यूनिवर्सिटी वारंगल वामपंथियों का एक बड़ा संस्थान बन चुका था। चूंकि प्रवीरचंद्र भंजदेव स्वयं काकतीय राजपूत थे और उनके पूर्वजों ने वारंगल से आकर बस्तर में अपना राज्य स्थापित किया था, इसलिए वारंगल के इन चरमवामपंथियों को एक भावनात्मक मुद्दा मिल गया। इस तरह छत्तीसगढ़ को भूख, कुपोषण, और कुशासन विरासत में मिले थे। जहां ये तीन व्याधियां होती हैं वहां किसी भी उग्रवाद के पनपने की स्थितियां बन जाती हैं…

राजनीतिक चलन सा हो गया है कि अपनी समस्याओं की तोहमत पूर्ववर्ती सरकारों पर मढ़ दी जाए। इतनी गंभीर समस्या से किनारा करने के लिए क्या आप भी यही नहीं कर रहे हैं?
मध्यप्रदेश का सर्वाधिक अविकसित और सुविधाहीन क्षेत्र बस्तर था। सरकारी कर्मचारी इसे ‘कालापानी’ कहा करते थे। इसलिए मध्यप्रदेश में परिपाटी सी बनी हुई थी कि अक्षम और भ्रष्ट अधिकारियों को दंडित करने के लिए उनका तबादला दुर्गम स्थानों पर कर दिया जाता था। कुछ अपवादों को छोड़कर आधी सदी तक बस्तर में इसी प्रवृत्ति के कर्मचारी-अधिकारी पदस्थ किये जाते रहे। जो बस्तर को जानते हैं उनका कहना है बस्तर को पुलिस, वन विभाग और राजस्व के कर्मचारियों ने खूब लूटा। बस्तर के आदिवासी बहुत शांत हैं, परंतु उतने ही स्वाभिमानी भी हैं। अंग्रेजों के समय से शोषण और दमन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह करते रहे हैं। 1910 का भूमकाल प्रसिद्ध है। अपने समय के शिखर नक्सली नेता कोंडापल्ली सीतारमैया ने बस्तर की स्थितियों का जायजा लिया। उनके एक निकट संबंधी दक्षिण बस्तर में आकर बस गये। वे बस्तर के वनवासी की विप्लवी प्रकृति को नक्सलवाद से जोडऩे की जुगत में जुटे रहे। तब से अब तक बस्तर की तीन-चार पीढिय़ों को नक्सलवाद से जोडऩे के संगठित प्रयास किए जाते रहे हैं। शोषण और दमन करने वाले सरकारी अमले को जब नक्सलियों ने हिंसा के द्वारा आतंकित कर दिया तो उन्हें आदिवासियों का विश्वास जीतने में मदद मिली। नतीजतन बस्तर में नक्सलवाद भरपूर फला फूला।

आपके नेतृत्व में पिछले करीब दस वर्षों से छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है, आपने नक्सली समस्या के समाधान के लिए क्या किया?
यह बेहद जटिल समस्या है। दरअसल यह किसी एक राज्य की नहीं बल्कि राष्ट्रीय समस्या है। आठ-नौ राज्यों के 180 से अधिक जिले इसकी गिरफ्त में हैं। स्वयं प्रधानमंत्री कई बार मान चुके हैं कि नक्सली हिंसा देश की आंतरिक समस्या के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसलिए इसका समाधान राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित रणनीति बना कर करना चाहिए। हमारी पहली प्राथमिकता उन कारणों को तलाशने और उन्हें दूर करने की रही है जिनसे किसी भी प्रकार का उग्रवाद या आतंकवाद जन्मता और फैलता है। इसमें पहला कारण है भूख। मैंने बस्तर के वनवासी के जीवन-दर्शन, इतिहास, संस्कृति, लोकपरंपराओं और लोक जीवन पर उपलब्ध साहित्य का यथासंभव अध्ययन किया है।

मुख्यमंत्री के रूप में, उससे पूर्व केंद्रीय मंत्री और मध्यप्रदेश में विधायक के तौर पर बस्तर की खूब यात्राएं की हैं। उनसे जीवंत संपर्क बनाये रखने का प्रयास किया है। सच कहूं तो बस्तर के घने वन और वहां के भोले मदमस्त निवासी मुझे सदा सम्मोहित करते रहे हैं। बस्तर स्थायी रूप से मेरे चिंतन और चिंता में रहा है। हमारी सरकार नक्सल समस्या की समाप्ति के लिए दीर्घकालिक और त्वरित दोनों रणनीतियां बना कर चल रही है। हम शिक्षा और विकास के विस्तार के द्वारा आदिवासी को शेष भारत की मुख्यधारा में लाने के लिए बड़े पैमाने पर योजनाएं चला रहे हैं। परंतु दिक्कत यह है कि नक्सली पुल-पुलिया, सड़क और रेलमार्ग बनने नहीं देते हैं जो बने हुए हैं उन्हें क्षतिग्रस्त करते रहते हैं।

सुरक्षा दस्तों की गोलियों से अनाथ होते आदिवासी-बच्चों के लिए सरकार क्या कर रही है?
आप एडसमेटा की जिस घटना की ओर संकेत कर रहे हैं, उसकी न्यायिक जांच के आदेश दिए गए थे। मामला न्यायाधीन है। इसलिए उस पर कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। उस मुठभेड़ में एक सुरक्षाकर्मी भी शहीद हुआ। कुछ आहत भी हुए। फिर यह तथ्य भी बहुज्ञात है कि नक्सली बच्चों और महिलाओं को पुलिस मुठभेड़ के समय अपनी ढाल बना कर चलते हैं। बस्तर की उन घटनाओं पर भी तो ध्यान दिया जाना चाहिए जिनमें नक्सली जनअदालत में तीन आदिवासियों की पिटाई कर ग्रामीण को फांसी पर लटका दिया गया। पुलिस कैंप पर गोलीबारी की गई। भरे बाजार एसडीएम पर नक्सली हमला हुआ।

छ: मई को बस्तर के दंतेवाड़ा से आरंभ हुई विकास-यात्रा का शुभारंभ श्री लालकृष्ण आडवाणी ने देवी दंतेश्वरी की उपासना के बाद हरी झंडी लहरा कर किया था। उस वक्त वहां एकत्र आदिवासी स्त्रियों, पुरूषों और किशोरों की भारी भीड़ देखकर वह आत्मविभोर हो गए थे। वहां अनेक महिलाएं मौजूद थीं जो अपने छ: महीने के, साल-सवा साल के बच्चों को हाथों में उठाए मेरे निकट आने का प्रयास कर रही थीं।

रायपुर से रमेश नैयर

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