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सर्वशक्तिमान नहीं हो सकती सी.बी.आई.

सी.बी.आई. को सरकार का तोता नही बनाया जा सकता। उसके कार्य में सरकार का दखल भी नही होना चाहिए, पर सी.बी.आई. चुनी हुई सरकार या देश के प्रधानमंत्री के प्रति भी अपनी जबावदेही से स्वतंत्र नही की जा सकती। ऐसा हुआ तो उसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं और राज्यों का पुलिसिया राज केन्द्र में भी होने की सम्भावनाओं से इंकार नही किया जा सकता।

उच्चतम न्यायालय द्वारा सी.बी.आई. को सरकारी पिंजरे का तोता कहने के बाद उसे स्वतंत्र इकाई बनाने के प्रयास शुरू हो गये है। इसके लिये एक केन्द्रीय मंत्रिमंडल समूह, वित्तमंत्री चिदम्बरम की अध्यक्षता में गठित कर दिया गया है। यह समूह सी.बी.आई. को स्वायत्ता दिये जाने के बारे में रिपोर्ट तैयार करेगा।

एक मायने में सी.बी.आई. स्वतंत्र ही है, अनगिनित जघन्य अपराध और भ्रष्टाचार की गुत्थियां सुलझाने के रिकार्ड उसके खाते में है, इसलिये आम आदमी सी.बी.आई. के नाम तक से डरता है और हर बड़े और महत्वपूर्ण अपराध की जांच सी.बी.आई. से करवाना चाहता है। उच्च न्यायालय की टिपप्णी सही और सटीक है। क्योंकि जिस मामले की सुनवाई उसके पास थी, उस मामले में सरकार का दखल दिखाई दे रहा था। यह बात और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जब खुद सी.बी.आई. का डायरेक्टर कहे कि उसकी एजेंसी स्वतंत्र रूप में कार्य नही कर पाती है।

इस फैसले ने कई बेहद महत्वपूर्ण विषय चर्चा के लिये उठा दिये हैं। सबसे पहले तो क्या सी.बी.आई. की रिपोर्ट सरकार को देखने का अधिकार है या नही। क्या अंतरिम रिपोर्ट या किसी केस की प्रगति की जानकारी सरकार देख सकती है, यानही। यदि सरकार सी.बी.आई. की रिपोर्ट भी नही देख सकती है, तो क्या सी.बी.आई. को पूरी तरह बेलगाम कर दिया जायेगा। आखिरकार चुनी हुई सरकार और मंत्रियों की जबावदेही संसद और जनता के प्रति होती हैं, अत: सरकार से किसी भी सरकारी अफसर या एजेंसी को पूर्णत: मुक्त नहीं किया जाना चाहिये। सरकार से मुक्त सिर्फ न्यायिक प्रणाली ही रह सकती है।

सरकार की भूमिका सी.बी.आई. ही क्यों हर जांच में नगण्य होनी चाहिये, लेकिन सरकार का दखल किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। जांच में केवल उसी विभाग के वरिष्ठ विशेषज्ञ अधिकारी ही विवेचना में सम्मलित किये जा सकते हैं।

दूसरा प्रश्न है कि सी.बी.आई. को स्वतंत्र करने से उसके दूध के धुले होने

की पक्की गारंटी नहीं हो सकती। विशेष तोर पर जबकि एजेंसी के अधिकारी स्वयं सी.बी.आई. में नहीं के बराबर है। इसका कोई कॉडर नही है। इसके वरिष्ठ अधिकारी प्रदेशों के कॉडर से आते हैं और उन्हें कार्यकाल पूरा करने के पश्चात अपने कॉडर में वापिस जाना होता है, अत: उन पर उनके कॉडर प्रदेश के नेताओं का दबाब रहना स्वभाविक है। एजेंसी के सभी पुलिस अधिकारी मुख्यमंत्री की दया पर निर्भर होते है। तैनाती के अलावा वे तरक्की आदि के लिये भी मुख्यमंत्री के निर्णय से बंधे रहते हैं। जिस सी.बी.आई. की पूर्ण स्वायत्ता ही नही पूर्ण स्वतंत्रता की बात की जा रही है, उसके अधिकारीगण प्रदेश नेताओं के चंगुल से पूणर्त: स्वतंत्र नही हो पाते।

तीसरी बात एजेंसी के सभी वरिष्ठ अधिकारी अपने प्रदेश काडर में लगभग एक दशक सेवा करने के बाद सी.बी.आई. में प्रतिनियुक्ति पर पांच वर्ष के लिये आते है। ये अधिकारी प्रदेश में हर तरह की पुलिसिया कार्यवाही से वाकिफ होते हैं और मंत्री या मुख्यमंत्री के दबाब से बाहर कभी नहीं निकल पाते। इतने लम्बे कार्यकाल में स्वतंत्र निष्पक्ष अधिकारी भी राजनैतिक दबाब में ही बना रहता है। न जाने कितने अधिकारियों को राजनैतिक दबाब में काम नही करने के कारण भारी कीमत, चुकानी पड़ती है। चौथी बात, सी.बी.आई. में वही अधिकारी आ पाते है जिसकी सी.आर. ऑउटस्टेंडिंग होती है, जिनकी सी.आर. ठीक नही होती वह नही आ पाता। प्रतिकूल प्रवष्टि सिर्फ उन अधिकारी को मिलती है, जो ऊपर के दबाब में न आकर काम करते है या मुख्यमंत्री जैसे राजनेताओं की बात मानने से इंकार करते है। इस तरह कई अच्छे अधिकारियों की प्रदेश में ही सेवा पूरी हो जाती है। अच्छी सी. आर. लिखवा कर राजनैतिक आकाओं की आंकाक्षा पूर्ण करने के बाद वे केन्द्र में पंहुच जाने की पात्रता रखते हैं।

जिस सी.बी.आई. को पूर्ण स्वतंत्र करने की बात चल रही है, उसके अधिकारी उसी राज्य पुलिस से आते है, जो पूरे देश में बदनाम है जिसे एक बार इलाहाबाद होई कोर्ट के न्यायाधीश ने अपने निर्णय में गुंडा या डाकू जैसे सम्बोधन से भी नवाजा था। पुलिस की ज्यादतियों से कौन परिचित नही है। किस तरह लाइसेंस की एन.ओ.सी. राज्य पुलिस से मिलती है, किस तरह मुकदमे जड़े जाते है या किस तरह अपराधियों को पुलिस प्रश्रय देती है, किसी से छिपा नही है यही अधिकारी सी.बी.आई में आते हैं। यदि, सी.बी.आई. में आकर ये बेलगाम हो जायेंगे, तो प्रजातंत्र के बजाय पुलिस ही सरकार पर नियंत्रण का अधिकार प्राप्त कर लेगी।

उच्चतम न्यायालय इस पर टिप्पणी करता या नही पर सी.बी.आई. को सरकार का तोता नही बनाया जा सकता। उसके कार्य में सरकार का दखल भी नही होना चाहिए, पर सी.बी.आई. चुनी हुई सरकार या देश के प्रधानमंत्री के प्रति भी अपनी जबावदेही से स्वतंत्र नही की जा सकती। ऐसा हुआ तो उसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं और राज्यों का पुलिसिया राज केन्द्र में भी होने की सम्भावनाओं से इंकार नही किया जा सकता।

 

डा0 विजय खैरा

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