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दीर्घायु की कुंजी खोजने का दावा

वैज्ञानिक वर्षों से उम्र को थामने वाले उपाय खोजने में जुटे हुए हैं।अभी तक उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली है, हालांकि इस बारे में बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं। अब कुछ वैज्ञानिकों का ख्याल है कि वे दीर्घायु की कुंजी खोजने के काफी करीब पहुंच गए हैं। नई रिसर्च से पता चलता है कि हमारे मस्तिष्क का एक छोटा सा हिस्सा बुढ़ापे की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। रिसर्चरों का अनुमान है कि दीर्घायु की कुंजी मस्तिष्क के हाइपोथैल्मस नामक हिस्से में छिपी हुई है।गौरतलब है कि मस्तिष्क का यह हिस्सा भूख, प्यास, शारीरिक तापमान और थकान को नियंत्रित करता है। अमेरिका में अल्बर्ट आइंस्टीन कालेज ऑफ मेडिसिन के रिसर्चरों का कहना है कि उन्होंने हाइपोथैल्मस में एक ऐसी संकेत प्रणाली खोजी है जो वृद्धावस्था से जुडी हुई है। प्रमुख रिसर्चर, प्रो. डोंगशेंग काई का कहना है कि वैज्ञानिक अभी तक यह नहीं समझ पा रहे थे कि बुढ़ापे की प्रक्रिया शरीर के विभिन्न ऊतकों में अलग-अलग होती है या शरीर का कोई विशिष्ट अंग इस सारी प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।

अब नए अध्ययन से यह स्पष्ट हो गया है कि हाइपोथैल्मस वृद्धावस्था के कई पहलुओं को नियंत्रित करता है। सबसे ज्यादा रोमांचक बात यह है कि हाइपोथैल्मस के संकेत मार्ग में परिवर्तन करके बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा करना और उम्र बढ़ाना संभव है, हालांकि अभी यह प्रयोग सिर्फ चूहों पर किया गया है। प्रो. काई का कहना है कि उम्र बढऩे के साथ शरीर के विभिन्न ऊतकों में सूजन होने लगती है। ह्रदय रोग, स्नायु रोग और कैंसर जैसे वृद्धावस्था के रोगों में भी सूजन देखी जाती है। प्रो. काई और उनके सहयोगियों ने कई वर्षों की रिसर्च के बाद यह पाया कि हाइपोथैल्मस में होने वाली सूजन से उत्पन्न होने वाली समस्याएं ह्रदय रोग और डाइबीटिज जैसी बीमारियों को जन्म दे सकती हैं।

वैज्ञानिक बुढ़ापे की प्रक्रिया के पीछे आणविक कारणों को भी समझने की कोशिश कर रहे हैं। बर्कली स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (यूसी) में किए गए एक अध्ययन में इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली है और साथ ही इससे वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों के इलाज के नए तरीके विकसित करने की उम्मीद जग गई है। यूसी के रिसर्चरों ने अपने एक प्रयोग में एक बूढ़े चूहे की रक्त स्टेम कोशिका में एक दीर्घायु जीन मिला कर उसकी आणविक घड़ी को पीछे खिसका दिया। इससे बूढ़ी स्टेम कोशिकाओं में नई जान आ गई और वे फिर से नई रक्त स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में समर्थ हो गई। दीर्घायु जीन का नाम ‘सर्ट3’ है। यह दरअसल ‘सर्ट’ समूह का प्रोटीन है जो रक्त स्टेम कोशिकाओं को स्ट्रेस से निपटने में मदद करता है।

रिसर्चरों ने जब बूढ़े चूहे की रक्त स्टेम कोशिकाओं में सर्ट3 मिलाया तो नई रक्त स्टेम कोशिका बनने लगी। यह इस बात का सबूत था कि बूढ़ी रक्त स्टेम कोशिका के कार्य में वृद्धावस्था से जुड़ी गिरावट न सिर्फ रुक गई बल्कि उनमें पुनर्जीवित होने की क्षमता भी उत्पन्न हो गई। जीव वैज्ञानिकों को पहले से इस बात की जानकारी थी कि सर्ट ग्रुप के प्रोटीन बुढ़ापे की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं लेकिन यूसी टीम के अध्ययन में पहली बार यह साबित हुआ कि यह प्रोटीन बुढ़ापे से जुड़ी गिरावट को पलट भी सकता है। पिछले 10-20 वर्षों में वैज्ञानिकों को बुढ़ापे की प्रक्रिया को समझने में कई सफलताएं मिली हैं। बुढापे को अब अनियंत्रित और बेतरतीब प्रक्रिया नहीं माना जाता। यह बहुत
ही नियंत्रित प्रक्रिया है, लेकिन इसमें फेरबदल की गुंजाइश है। प्रमुख रिसर्चर डेनिका चेन के अनुसार एक अकेले जीन के परिवर्तन से जीवन काल बढ़ाया जा सकता है। प्रश्न यह है कि क्या हम इस प्रक्रिया को समझ कर वृद्धावस्था को पलट सकते हैं?बुढ़ापे की प्रक्रिया में सर्ट ग्रुप के प्रोटीन की भूमिका उजागर होने के बाद वैज्ञानिक इसे और ज्यादा गहराई से समझने की कोशिश कर रहे हैं। सर्ट3 प्रोटीन कोशिका के माइटोकोंड्रिया में पाया जाता है। कोशिका का यह हिस्सा विकास और मृत्यु को नियंत्रित करने में मदद करता है। पिछले अध्ययनों में पता चला था कि सर्ट3 जीन कैलोरी में कटौती के दौरान सक्रिय होता है। प्रयोगों में यह बात भी सामने आई कि कैलोरी में कटौती अनेक प्रजातियों में जीवन काल बढ़ाने में सहायक होती है।

बुढ़ापे के प्रभावों को समझने के लिए रिसर्चरों ने वयस्क स्टेम कोशिकाओं के काम का अध्ययन किया। वयस्क स्टेम कोशिकाएं ऊतको के रखरखाव और उनकी मरम्मत के लिए जिम्मेदार होती हैं। उम्र बढऩे के साथ स्टेम कोशिकाओं के इस फंक्शन में कमी आती है। रिसर्चरों ने अपने अध्ययन के लिए रक्त स्टेम कोशिकाओं को चुना, क्योंकि वे रक्त प्रणाली को पूरी तरह से पुनर्गठित करने की क्षमता रखती हैं।

रिसर्चरों ने सबसे पहले ऐसे चूहों की रक्त प्रणाली का अध्ययन किया, जिसमें सर्ट3 प्रोटीन के जीन को निष्क्रिय कर दिया गया था। हैरानी की बात यह थी कि युवा चूहों में सर्ट3 की गैरमौजूदगी से कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन जैसे-जैसे इन चूहों की उम्र बढ़ी, सर्ट3 से युक्त सामान्य चूहों की तुलना में उनमे रक्त स्टेम कोशिकाओं की संख्या घटती गई और नई रक्त कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने की उनकी क्षमता भी कम हो गई। इससे पता चलता है कि युवा कोशिकाओं में रक्त स्टेम कोशिकाएं ठीक ठाक ढंग से काम करती हैं और उन्हें बहुत कम ‘ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस’ का सामना करना पड़ता है।

ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस शरीर के भीतर मेटाबोलिज्म अथवा कोशिकाओं में कुदरती रासायनिक प्रक्रियाओं का एक नुकसानदायक बायप्राडक्ट है। इससे शरीर पर बोझ बढ़ता है। युवावस्था में शरीर की एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली कम स्ट्रेस को आसानी से झेल सकती है, लेकिन उम्र बढऩे के साथ हमारा सिस्टम ठीक से काम नहीं करता, क्योंकि हम या तो ज्यादा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस उत्पन्न करते हैं या उसे हटा नहीं पाते। इन स्थितियों में हमारी सामान्य एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली काम नहीं करती और हमें सर्ट3 की जरुरत पड़ती है, लेकिन उम्र के साथ सर्ट3 का लेवल भी कम हो जाता है। रिसर्चरों ने जब बूढ़े चूहों में सर्ट3 का लेवल बढ़ाया, तो उनकी रक्त स्टेम कोशिकाएं पुनर्जीवित होने लगीं जिससे उनकी रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ गया।

 

मुकुल व्यास

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