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अक्सर तुलसी पर लिखते हुए विद्वान आलोचक वाल्मीकि रामायण को तो भूल जाते हैं, लेकिन नरेंद्र कोहली की रामकथा ‘अभ्युदय’ पर बात करते हुए तुलसीदास की ‘रामचरित मानस’ को नहीं भूल पाते। कोहली की मौलिकता पर सवालिया निशान लगाकर उन्हें खारिज करने की हर संभव कोशिश करते हैं। जबकि आचार्य विष्णुकांत शास्त्री और सूर्यप्रसाद दीक्षित जैसे आचार्य उन्हें शलाका और व्यास सम्मान से सम्मानित करने लायक सहज ही समझ लेते हैं। शायद इसीलिए विष्णुकांत शास्त्री में नरेंद्र कोहली को विवेकानंद जैसा तेज नजर आता है। नरेंद्र कोहली की नयी किताब है ‘स्मृतियों के गलियारे से’। नरेंद्र कोहली को पिछले दिनों ‘व्यास सम्मान’ से अलंकृत करने की घोषणा हुई, जिसके अंतर्गत उन्हें ढ़ाई लाख रुपये की राशि मिलेगी। यहां यह जानना दिलचस्प है कि आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने नरेंद्र कोहली को हिंदी अकादमी, दिल्ली का शलाका सम्मान दिए जाने की घोर वकालत न की होती, तो शायद ही उन्हें यह सम्मान मिल पाता।अपनी ताजा किताब ‘स्मृतियों के गलियारे से’ में नरेंद्र कोहली ने विष्णुकांत शास्त्री तथा अन्य सर्जकों और व्यक्तियों के कुछ यादगार वृत्तांत दर्ज किए हैं : ‘अयोध्या में राम मंदिर को लेकर संसद में कोलाहल हो रहा था। सारे तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष’ सांसद भारतीय जनता पार्टी का विरोध करने के बहाने राम मंदिर का विरोध कर रहे थे। मंदिर की निंदा की ओट में रामजी की निंदा हो रही थी। सहसा शास्त्री जी आवेश में आ गए और उन सारे महारथियों से अकेले ही लोहा लेने के लिए भिड़ गए। वे इतने आवेश में थे कि सुषमा स्वराज आशंकित हो उठीं। उन्होंने उन्हें शांत करने का प्रयास किया, तो शास्त्री जी बोले, ”वे मेरे राम की निंदा कर रहे हैं और मैं चुपचाप सुनता रहूं।’नरेंद्र कोहली अपने इस संस्मरण में लिखते हैं कि मृदुभाषी और शांत रहने वाले शास्त्री जी का यह रूप देखकर कोई भी समझ सकता है कि अपने मानापमान की चिंता न करने वाले शास्त्री जी सिद्धांतों, आदर्शों और अपने आदर्श पुरुषों की अवहेलना और उपेक्षा नहीं सह पाते थे। कोहली जी के मन में स्वामी विवेकानंद के जीवन की कुछ घटनाएं उभरती हैं, जहां वे अपने मानापमान, महत्व, उपेक्षा, निंदा-स्तुति की तनिक भी चिंता नहीं करते। किंतु भारत माता, भारतीय धर्म और भारतीय संस्कृति के सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष की किसी भी सीमा तक जा सकते थे। अमेरिका में जब एक नीग्रो ने उन्हें अपना जाति भाई मानकर उनसे हाथ मिलाना चाहा, तो उन्होंने सहर्ष उसकी इच्छा पूरी की। जब लोगों ने पूछा कि आपने उसे क्यों नहीं बताया कि आप नीग्रो नहीं भारतीय हैं, तो उनका उत्तर था कि वे किसी और को नीच और स्वयं को ऊंचा बताने के लिए संसार में नहीं आए हैं। भारत लौटते समय स्वामीजी जलपोत के डेक पर खड़े थे और एक पादरी मना करने के बावजूद हिंदू धर्म की निंदा करता चला जा रहा था, तो स्वामी जी क्रुद्ध होकर बोले कि यदि तुम अब भी चुप नहीं हुए, तो उठाकर समुद्र में फेंक दूंगा। उनका क्रोध और बल देखकर पादरी वहां से खिसक गया।

लेखन यात्रा में नरेंद्र कोहली को विष्णुकांत शास्त्री जैसे अनेक लोग मिले, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व से उन पर गहरा असर डाला। जिसे वे भूल नहीं पाए और कागज पर उतार दिया। उनकी ऐसी रचनाएं ‘स्मृतियों के गलियारे से’ (भावना प्रकाशन, ए-109, पटपडग़ंज, दिल्ली-91) में संग्रहीत हैं। इसमें एक तरफ विष्णुकांत शास्त्री जैसे सर्जक-राजनेता हैं, तो दूसरी तरफ बाबा नागार्जुन जैसे फक्कड़ कवि। राष्टï्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हैं, तो प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नगेंद्र भी। इन बड़े-बड़े नामों के साथ अनेक अल्प ज्ञात लोगों पर भी नरेंद्र कोहली ने बड़े मन से लिखा है।

 बलराम

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