ब्रेकिंग न्यूज़ 

ली का भारत दौरा मीठी लेकिन खोखली बातें

चीन को भी अब भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने की जल्दी इसलिये लगती है कि वह अपने दूसरे सागरीय पड़ोसी देशों जापान, वियतनाम और फिलीपींस के साथ सीमा विवाद को लेकर उलझा हुआ है और यदि उसके दूसरे बड़े पड़ोसी भारत के साथ भी सीमा विवाद तनावपूर्ण बना रहेगा तो इससे चीन की काफी खराब छवि बनेगी।
प्रधानमंत्री ली ख छ्यांग भारत आए और भारतीयों को काफी गुदगुदाकर गए। प्रधानमंत्री बनने के बाद वह पहले विदेश दौरे पर भारत आए इसलिये सारी दुनिया की इस यात्रा पर नजर थी। क्या ली के कहे मुताबिक भारत और चीन वाकई में हिमालय पर चढ़कर हाथ मिलाएंगे? बदले हुए विश्व माहौल में यदि भारत और चीन वाकई में हाथ मिलाकर चलने लगेंगे, तो इससे विश्व सामरिक समीकरण में भारी उलटफेर हो जाएगा। आखिरकार दोनों एशिया की बड़ी ताकतें हैं और विश्व की आबादी की एक तिहाई। इसलिये दोनों के एक साथ होने से विश्व सत्ता संतुलन पूरी तरह भारत और चीन के पक्ष में झुका हुआ दिखाई देगा। लेकिन ली ने केवल मीठी बातों के अलावा ऐसा कुछ ठोस नहीं किया, जिससे यह लगे कि भारत और चीन सामरिक साझेदारी की खोखली बातों को ठोस नतीजा दिखाने वाले समझौतों से भर रहें हैं।ली अपने पहले विदेश दौरे पर निकले थे और इसके लिये भारत को चुनना भारत से अधिक पाकिस्तान को हैरत में डाल रहा था क्योंकि पाकिस्तान चीन को हर मौसम का दोस्त कहता है । इसे चीनी नेता के भारत के प्रति स्नेह के तौर पर पेश किया गया, लेकिन उनके जाने के बाद दोनों देशों के बीच जारी साझा बयान का विश्लेषण करने पर साफ उजागर होता है, कि दोनों के बीच मतभेद की खाई कहीं से भी कम नहीं हुई है। चीनी प्रधानमंत्री ने भारत के साथ सामरिक साझेदारी की बातें खूब कीं, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय मसलों पर सामरिक सहमति बनती तो यह जरूर साझा बयान में दिखता। मसलन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का साझा बयान में कोई जिक्र नहीं हुआ है। भारत सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का दावेदार है और भारत से दोस्ती को हिमालय की ऊंचाई तक पहुंचाने की बातें ली कर रहे हों तो यह तो उनसे अपेक्षा की ही जानी चाहिये कि वह सुरक्षा परिषद जैसे दुनिया के सबसे ऊंचे टेबल पर बैठाने के लिये भारत को अपना समर्थन घोषित कर देते। वैसे तो ली ने भारत को पड़ोसी बताते हुए कहा कि संकट में पड़ोसी पहले काम आता है दूर का रिश्तेदार बाद में। लेकिन जब पड़ोसी जमीन जायदाद को लेकर झगड़े पर उतारू हो तो दूर के दोस्त को ही बुलाना पड़ता है।

पाक में समझौता
चीनी नेता जब भारत के बाद पाकिस्तान पहुंचे तो वहां भारत की जमीन पर अपनी रेल और सड़क बनाने का समझौता कर लिया। भारत का जम्मू कश्मीर का वह इलाका जो पाकिस्तान के कब्जे में है पिछले कुछ सालों से चीन की गतिविधियों का अड्डा बना हुआ है। ली ने वहां से होकर पाकिस्तान के ग्वादार बंदरगाह और अपने शिन्चयांग प्रांत के बीच रेल और सड़क मार्ग बनाने का काम शुरू करने पर औपचारिक सहमति ले ली। यानी भारत से लौटते ही चीनी नेता ने भारत विरोधी पहला समझौता कर लिया, जिस पर भारत ने स्वाभाविक तौर पर अपना ऐतराज जताया।

भारतीय सामरिक हलकों में यह पूछा जा रहा है कि जब ली ने भारत को अपने विदेश दौरे का सबसे पहला पड़ाव बनाने का फैसला किया तब चीन ने अपने सैनिक भारतीय इलाके में क्यों भेज दिये? क्या चीन भारत को दोहरा संदेश देना चाह रहा था? ऐसा तो हो नहीं सकता कि चीनी सेना पाक सेना की तरह है, जो अपने राजनीतिक नेतृत्व की बात नहीं मानती हो? साफ है कि चीन भारत के राजनीतिक संकल्प की परीक्षा ले रहा था। हालांकि लद्दाख की देपसांग घाटी में 19 किलोमीटर भीतर घुस आई चीनी सेना को वापस लौटना पड़ा लेकिन दूसरे इलाके में एक भारतीय सैन्य निरीक्षण चौकी को हटवा कर ही।

भारत और चीन के बीच जब भी शिखर बैठक होती है सीमा मसला सबसे प्रमुखता से उभरता है और इस बार भी चीन के प्रधानमंत्री ली ख छ्यांग ने जब अपने पहले विदेश दौरे में भारत को चुना तो उनसे काफी उम्मीदें की जाने लगी थीं, लेकिन उनके दौरे के एक महीना पहले जब चीनी सैनिकों ने लद्दाख की देपसांग घाटी में घुसपैठ कर दी तो भारतीय राजनयिक पर्यवेक्षक हैरान रह गये। प्रधानमंत्री ली का भारत दौरा हो जाए इसके लिये चीन ने अपने सैनिकों को पीछे तो हटा लिया, लेकिन अपनी शर्त मनवाकर। भले ही वह शर्त कुछ छोटी ही थी लेकिन भारत को भी झुकना पड़ा। लद्दाख के दूसरे इलाके से नियंत्रण रेखा के भीतर चुमार में भारतीय सेना द्वारा बनाए गए एक टिन के शेड को भारत को हटाना पड़ा। इससे साफ हुआ कि चीन भारत के साथ सीमा विवाद को अपनी ही शर्तों पर हल करना चाहता है और प्रधानमंत्री ली ख छ्यांग सीमा मसले का हल खोजने के इरादे से भारत नहीं आ रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनसे बातचीत के दौरान यह साफ कर दिया कि यदि सीमा पर तनाव के हालात बने रहेंगे तो भारत और चीन के रिश्ते आगे नहीं बढ़ पाएंगे।

बदले माहौल में
बदले हुए विश्व माहौल में आज चीन को भारत के साथ की अधिक जरूरत है इसलिये भारत दौरे में ली ने भारतीयों को खुश करने की कोई कसर नहीं छोड़ी, हालांकि खुश करने के लिये जो ठोस कदम चीन को उठाने चाहिये वे नहीं उठाए गए। चीन पिछले अढ़ाई दशकों से यह कदम उठाने से हिचकिचा रहा है जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी चीन गए थे, तब 1988 में, चीन ने कहा था कि सीमा मसला दोनों देशों को विरासत में मिला है और यह काफी जटिल है इसलिये इसके हल में वक्त लगेगा। तब तक भारत और चीन को दूसरे क्षेत्रों में रिश्ते बेहतर करने चाहिये। चीन की बात मानकर भारत ने आज चीन के साथ आर्थिक रिश्तों को गहरा करते हुए सालाना व्यापार 70 अरब डालर तक पहुंचा दिया और आज भी चीन वही राग अलाप रहा है कि विरासत में मिले इस विवाद को हल करने में वक्त लगेगा।

हालांकि सीमा पर शांति व विश्वास बनाए रखने के लिये चीन ने भारत के साथ कुछ महत्वपूर्ण कदम जरूर उठाए हैं लेकिन जहां तक सीमा मसले के हल का सवाल है चीन कभी एक कदम आगे और दो कदम पीछे हटने की रणनीति पर चलता रहा है। एनडीए के शासनकाल में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस मसले के जल्दी हल के लिये चीन को राजी कर लिया था और इस इरादे से दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने अपने विशेष प्रतिनिधियों की नियुक्ति की थी। 2003 के बाद से अब तक विशेष प्रतिनिधियों की यह बातचीत 15 दौर पूरे कर चुकी है, लेकिन कोई प्रगति नहीं हासिल हुई। इसलिये कि चीन अरुणाचल प्रदेश का तवांग का इलाका लेने पर अड़ा है और भारत यह इलाका चीन को दे नहीं सकता।

तवांग का इलाका मैकमेहोन रेखा के भारत की ओर है और भारत इसे ही वास्तविक सीमा मानने की बात करता है। वास्तव में यह रेखा 1914 में ब्रिटिश भारत, तब के स्वतंत्र देश तिब्बत और चीन के प्रतिनिधियों के बीच मैकमेहोन रेखा के नाम से बनी थी, लेकिन चीन इस रेखा को यह कह कर मान्यता नहीं देता कि न तो अंग्रेज भारत के वास्तविक प्रतिनिधि थे और न ही तिब्बत के प्रतिनिधि को चीन की मान्यता मिली थी। आज तिब्बत को चीन के अंग के तौर पर भारत ने मान्यता दी है, इसलिये भारत को अब चीन की बात माननी पड़ेगी। लेकिन मनमोहन-ली साझा बयान से उम्मीद की कुछ किरणें दिखती हैं।

पछतावा हुआ
2005 में तब के चीनी प्रधानमंत्री वन च्या पाओ के भारत दौरे में सीमा मसले के हल के लिये एक समझौता हुआ था जिसे राजनीतिक पैमाना और निर्देशक सिद्धांत शीर्षक से जारी किया गया था। इस समझौते में यह साफ कहा गया था कि सीमा मसले का हल खोजते वक्त दोनों देश एक दूसरे के इलाके में बसी आबादी की भावनाओं और संवेदनशीलता की कद्र करेंगे। यानी यदि अरुणाचल प्रदेश के लोग भारत में ही रहना चाहते हैं, तो वह इलाका भारत का ही होगा। इसलिये चीन को बाद में इस समझौते पर पछतावा हुआ और इस समझौते से वह मुकरने वाली बातें करने लगा। अब यदि प्रधानमंत्री मनमोहन और प्रधानमंत्री ली के बीच बातचीत के बाद जारी साझा बयान में यदि फिर से 2005 के समझौते की याद दिलाई गई है तो यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि चीन इसे आधार बना कर सीमा मसले के हल पर बातचीत को राजी है। इसके लिये चीन ने सीमा मसले के हल के लिये प्रधानमंत्री के विशेष प्रतिनिधि शिवशंकर मेनन को चीन बुलाया है।

आमंत्रण
जून के अंत तक दोनों देशों के बीच सीमा मसले पर 16 वें दौर की बातचीत के लिये वह पेइचिंग जा सकते हैं। चीन ने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी चीन दौरे के लिये इसी साल आमंत्रित किया है इसलिये यह माना जा सकता है कि चीन भारत के साथ मधुर रिश्तों को लेकर कुछ गंभीर है। मनमोहन के चीन जाने के पहले चीन यदि 2005 के सीमा बयान के आधार पर आगे बढऩे के संकेत नहीं देता है तो प्रधानमंत्री मनमोहन के लिये घरेलू स्तर पर अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता साबित करनी मुश्किल होगी।

चीन को भी अब भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने की जल्दी इसलिये लगती है कि वह अपने दूसरे सागरीय पड़ोसी देशों जापान, वियतनाम और फिलीपींस के साथ सीमा विवाद को लेकर उलझा हुआ है और यदि उसके दूसरे बड़े पड़ोसी भारत के साथ भी सीमा विवाद तनावपूर्ण बना रहेगा तो इससे चीन की काफी खराब छवि बनेगी। इसके अलावा अमेरिका जिस तरह चीन की बढ़ती ताकत पर लगाम लगाने के लिये एशिया के पुर्नसंतुलन की नीति लागू करना चाहता है उससे चीन के माथे पर शिकन पैदा होने लगी है। चीन नहीं चाहता कि उसके साथ सीमा विवाद की वजह से भारत अमेरिकी खेमे में रहे। जापान भी भारत से सामरिक और आर्थिक रिश्ते गहरा कर भारत को अपने खेमे में रखना चाहता है। दुनिया की बड़ी ताकतें जिस तरह भारत को अपने खेमे में लाना चाहती हैं चीन के लिये वह चिंता की बात है। इसलिये चीन की यह कोशिश है कि वह भारत के दोस्त के तौर पर दिखे और लुभावनी बातें कर भारत को विरोधी ताकतों के खेमे में जाने से रोके।

 

रण जीत

wobs.uaукладка ламината расценки на работу

Leave a Reply

Your email address will not be published.