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बीजेपी उहा-पोह में: येदि के साथ मिल सकता है बीजेपी का हाथ

उतराखंड, हिमाचल प्रदेश और अब कर्नाटक में बीजेपी की हार । कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के खिलाफ इतने खराब माहौल के बाद भी विधानसभा चुनावों में मिल रही हार के बाद बीजेपी को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति में बड़े बदलाव की जरूरत महसूस होने लगी है। यही वजह है कि वह अब न सिर्फ परंपरागत आदतों को बदलने की तैयारी में है, बल्कि वह कुछ ‘एक्शन’ की रणनीति भी अपनाने जा रही है। यही नहीं, उसके लिए अब यह भी जरूरी हो गया है कि वह एनडीए के बैनर तले अपने सहयोगियों का दायरा भी बढ़ाए, ताकि अगले साल जब वह पूर्ण बहुमत हासिल न कर पाए तो भी सत्ता तक पहुंचने के लिए उसे एसपी/बीएसपी जैसी पार्टियों के सामने मदद के लिए गिड़गिड़ाना न पड़े।
कहां हो रही है दिक्कत
बीजेपी के कई नेता खुद मान रहे हैं कि भ्रष्टाचार एक चुनावी मुद्दा है, लेकिन यही सब कुछ नहीं है। ऐसे में यह उम्मीद करना कि सिर्फ कांग्रेस का भ्रष्टाचार ही बीजेपी या एनडीए को सत्ता तक ले जाएगा, उचित नहीं है। अगर वाकई भ्रष्टाचार की वजह से ही कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया जा सकता होता, तो फिर कम से कम हिमाचल प्रदेश में तो कांग्रेस की वापसी नहीं हो सकती थी। भ्रष्टाचार की वजह से जिस वीरभद्र सिंह को केंद्रीय कैबिनेट से बाहर होना पड़ा, उनकी अगुवाई में ही राज्य में बीजेपी ने शानदार वापसी कर ली और बीजेपी ताकती रह गई।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दरअसल, बीजेपी ने भ्रष्टाचार को इतनी हाईप दी की वह खुद उसी के जाल में फंस गई। इसका नतीजा यह हुआ कि उसके हाथ से एक साल के भीतर ही तीन राज्य निकल गए। दूसरी ओर जिस कांग्रेस को उसने कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की, वह तीन राज्यों में वापसी कर गई। पार्टी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भ्रष्टाचार को लेकर देशव्यापी यात्रा की तो सवाल उठा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खड़ा करने वाले आडवाणी की पार्टी की राज्य सरकारें ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। यही उसके लिए भारी साबित हुआ। दूसरी ओर कांग्रेस भ्रष्टाचार में बदनाम तो हुई, लेकिन उसने इस मामले को लंबे वक्त तक खिंचने नहीं दिया, पार्टी में जो भी भ्रष्टाचार में रंगा पाया गया, बेशक दिखाने भर के लिए ही सही, उसे ठिकाने लगा दिया गया।
भाजपा के आक्रामक तेवर
राजनाथ सिंह की राज्य प्रभारियों की टीम में शामिल किए गए चेहरों से स्पष्ट हो गया है कि भाजपा अगले चुनावों के लिए स्पष्ट दृष्टि के साथ आक्रामक नीति लेकर मैदान में उतरने की तैयारी में है। नरेन्द्र मोदी के निकट सहयोगी अमित शाह को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपे जाने से यह भी स्पष्ट हो चला है कि भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी धीरे धीरे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के कंधों की ओर सरकने लगी है। लोकसभा चुनावों में 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश को नजरअंदाज कर कोई पार्टी दिल्ली पर राज करने के बारे में नहीं सोच सकती। राजनीतिक रूप से अति महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश अमित शाह को सौंपने से राजनाथ सिंह ने साफ कर दिया है
कि आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा की चुनावी रणनीति में मोदी की भूमिका अति महत्वपूर्ण रहेगी। चर्चा यह भी है कि संदेश देने के लिए मोदी को लखनऊ से चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। तेज-तर्रार वरुण गांधी को महासचिव की जिम्मेदारी देना और मीडिया मामलों में अनुभवी श्रीकान्त शर्मा को एक बार फिर मीडिया प्रभार बनाना भी राजनाथ सिंह का महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है।
बीजेपी की सबसे बड़ी चिंता यही है कि अगर यही 2014 में हुआ तो? यही वजह है कि बीजेपी के भीतर ही अब यह सुगबुगाहट होने लगी है कि क्या मुद्दे चुनने में उससे गलती हो रही है? हालांकि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह दावा कर रहे हैं कि एक राज्य की सरकार के लिए बीजेपी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं कर सकती। लेकिन इतना जरूर है कि अब पार्टी को लगता है कि भले ही भ्रष्टाचार का मामला उछालने से उसे कोई बड़ा राजनीतिक फायदा नहीं मिला, लेकिन उसने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ‘इमेज’ पर जरूर सवाल खड़े कर दिए हैं। उसके इस आंदोलन का यह असर जरूर हुआ है कि अब मनमोहन की छवि ऐसी नहीं रह गई है कि उनकी छवि के बूते कांग्रेस 2014 में जीत का दावा कर सके।
बीजेपी के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि वह सिर्फ बयानबाजी करती न दिखे। पार्टी को भी यह लगने लगा है कि संसद न चलने देने की उसकी रणनीति से यह जरूर है कि कांग्रेस की बदनामी हुई, लेकिन जनता में यह भी संदेश गया कि हर सत्र में विपक्ष की यह रणनीति अच्छी नहीं है। यही वजह है कि अब बीजेपी सड़कों पर उतरकर यह दिखाने की तैयारी में है कि वह सिर्फ बयानबाजी या संसद तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह सड़कों पर उतराकर जनता के बीच जा रही है। संगठन मजबूत
इसी आंदोलन के जरिए बीजेपी अपने संगठन को भी सक्रिय करने की रणनीति अपना रही है। कैडर आधारित पार्टी होने के बावजूद जिस तरह से उसके संगठन को एक्टिव होना चाहिए, वैसा नहीं है। यही वजह है कि पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद से ही राजनाथ सिंह इसी रणनीति पर कार्य कर रहे हैं कि कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जाए। इससे न सिर्फ चुनाव के वक्त फायदा होगा, बल्कि उन कार्यकर्ताओं के जरिए ही जनता को यह समझाया जा सकता है कि कांग्रेस का जाना और बीजेपी का आना क्यों जरूरी है।

अब लाख टके का सवाल यह है कि क्या पार्टी फिर से येदियुरप्पा के साथ हाथ मिलाएगी। उमा भारती, मदनलाल खुराना, कल्याण सिंह को पार्टी बाहर का रास्ता दिखाकर वापस स्वीकार कर चुकी है, लेकिन यह सब कार्य इतनी देरी से होता रहा है कि इन नेताओं का जनाधार ही सिमट गया। यानी जब लौटे तो पार्टी में वे कोई बड़ी भूमिका नहीं निभा पाए। ऐसे में पार्टी क्या येदियुरप्पा को ‘जीरो’ होने से पहले वापस लेगी? अगर लोकसभा चुनाव की दृष्टिï से देखा जाए तो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात जैसे राज्यों में उसके और सुधार की गुंजाइश कम है। कर्नाटक में जिस तरह से अब सफाया हुआ है, उससे यह साफ है कि अगर बीजेपी ने येदि से हाथ मिलाकर चुनाव लड़ा होता तो भले ही सरकार न बनती, लेकिन इतनी दुर्गति न होती। ऐसे में पार्टी क्या येदि को वापस ले सकती है।

हालांकि चुनाव में सब जायज का नारा देने वाला बीजेपी का एक वर्ग जरूर चाहेगा कि लोकसभा चुनाव में कर्नाटक में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए येदि वापस आ जाएं। या कम से कम बीजेपी उनसे हाथ ही मिला ले। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी इसके लिए मानेंगे, इस पर संशय है। इसकी वजह है कि कर्नाटक चुनाव से पहले और बाद में भी वह लगातार कहते रहे हैं कि येदि को बाहर करने में हुई देरी की वजह से ही पार्टी की दुर्गत हुई है? ऐसे में येदियुरप्पा को वापस लाना उतना आसान नहीं है।

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