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देश में इतनी कमजोर सरकार कभी नहीं रही यूपीए – 2 : कभी नर्म-नर्म, कभी गर्म-गर्म

केन्द्र सरकार जनता की नजर में मजाक बन गई है। लगभग हर मंत्रालय भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा हुआ है। कैग व सर्वोच्च न्यायालय जैसी संवैधानिक संस्थाएं लगातार सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही हैं। कांग्रेस पार्टी लाचार होकर इन सभी आरोपों का जवाब देने का प्रयास कर रही है। विपक्ष सदन चलने नहीं देता और कमजोर सरकार सदन चलवा नहीं पाती। आलम यह है कि बीते बजट सत्र में विपक्ष को बर्हिगमन करवाकर सरकार को अपना बजट पारित कराना पड़ा। भारत के इतिहास मे इतनी कमजोर सरकार शायद कभी नहीं रही।
यूपीए – 2 सरकार ने हाल ही में चार साल पूरे किए हैं। यह चार साल उसने किस तरह हांफते लडख़ड़ातेे पूरे किए हैं, इसका जवाब या तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बेहतर दे सकते हैं या फिर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी। अगर इन चार सालों पर नजर डाली जाए तो लगता है कि सरकार विवादों और घोटालों के ऐसे रोलर कोस्टर पर बैठी थी, जिसने उसे एक पल भी चैन नहीं लेने दिया। सरकार एक मुसीबत से निकलती, तो दूसरी मुसीबत मुंह बाए उसका स्वागत करती दिखती। एनडीए के बाद कांग्रेस जब वापस सरकार में आई तो शायद किसी को भी अंदाजा नहीं रहा होगा, कि उसके नेतृत्व में ये सरकार लगातार नौ साल तक सत्ता की कुर्सी संभाल पाएगी। हालांकि कुछेक मौकों को छोड़ दिया जाए तो कमोबेश यूपीए- 1 सरकार का पहला टर्म काफी अच्छा गुजरा। साल 2008 में मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार को दांव पर लगाते हुए परमाणु करार किया। अपने अर्थशास्त्रीय अनुभवों से जहां एक ओर भारतीय अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयां दीं, वहीं साल 2008 की वैश्विक मंदी से घरेलू अर्थव्यस्था को ऐसा संभाला कि दुनिया दंग रह गई। उन्होंने देश की विकास दर, प्रति व्यक्ति आय और भारतीय कृषि के विकास की नई इबारत लिखी।

सब नहीं है ठीक
यूपीए सरकार ने जहां एक ओर मनरेगा, सूचना का आधिकार जैसे क्रांतिकारी कानून दिए, वहीं देश के बुनियादी ढांचे को एक नई गति दी। आमतौर पर शांत रहने वाले मनमोहन की छवि ऐसे व्यक्ति की बनी, जो बिना ज्यादा बोले अपना काम चुपचाप और ईमानदारी से करने में विश्वास रखता हो। यही वजह रही कि उनकी सरकार के काम को देखते हुए साल 2009 में जनता ने एक बार फिर देश की सरदारी उनके हाथ में सौंपने में कतई गुरेज नहीं किया।

यूपीए 2 में शुरुआत से ही गड़बडिय़ों का दौर चला। महंगाई ने सरकार को बेहद कमजोर किया, वहीं नित नए घोटालों और विवादों ने सरकार की छवि को लगातार धूमिल किया। यूपीए 2 में सरकार में जो अराजकता देखने को मिली, वह अपने आप में एक मिसाल है। सभी मंत्री अपना-अपना राग अलाप रहे है। एक मंत्रालय दूसरे मंत्रालय का काम लटकाते पाया जाता है। प्रधानमंत्री का अपना एक गुट है, जो उनके कहने से ही काम करता है, तो गांधी परिवार के वफादार प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करने से नहीं चूकते। दूसरी ओर अफसरशाही धीरे-धीरे हावी हो रही है, जो अपनी मनमानी करती है। कुछ महीनों पहले राहुल गांधी ने उर्दू पत्रकारों से बातचीत के दौरान इस बात को खुद स्वीकार किया था कि सरकार को चला रहे वरिष्ठ अधिकारी किसी की नहीं सुनते। दूसरी ओर शहरी विकास मंत्रालय हो या सड़क परिवहन या फिर विमानन मंत्रालय सभी की फाइलें पर्यावरण मंत्रालय में अटकी हुई हैं। सूचना के अधिकार के चलते सरकारी अधिकारी कोई भी निर्णय लेने की बजाय फाइलें आगे खिसकाने का काम कर रहे हैं। सरकारी बयानों के मुताबिक, फिलहाल देश में 700 हजार करोड़ के बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट विभिन्न कारणों से लटके हुए हैं। कभी नौ के आंकड़े को छूने वाली विकास दर साल 2012-13 में पांच फीसदी पर उतर आई। इसके अलावा, कोयला घोटाले मामले में सीबीआई रिपोर्ट से छेड़छाड़ का मामला हो या रेलवे घूसखोरी कांड सबने सरकार के दामन को दागदार बनाया है।

आज सरकार जनता की नजर में मजाक बन गई है। लगभग हर मंत्रालय भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा हुआ है। कैग व सर्वोच्च न्यायालय जैसी संवैधानिक संस्थाएं लगातार सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही हैं। कांग्रेस पार्टी लाचार होकर इन सभी आरोपों का जवाब देने का प्रयास कर रही है। विपक्ष सदन चलने नहीं देता और कमजोर सरकार सदन चलवा नहीं पाती। आलम यह है कि बीते बजट सत्र में विपक्ष को बर्हिगमन करवाकर सरकार को अपना बजट पारित कराना पड़ा। भारत के इतिहास मे इतनी कमजोर सरकार शायद कभी नहीं रही। भ्रष्टाचार के आरोपों से कई सांसदों को जेल जाना पड़ा। मंत्रियों के इस्तीफे हुए। गृह, वित्त, विदेश के साथ-साथ रेल, ग्रामीण विकास व कानून जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय के मंत्रियों में फेरबदल करने पड़े। एक तरफ कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, टूजी घोटाला, कोयला घोटाला, रक्षा सौदों में घोटाला, रेल मंत्रालय में घूसखोरी मामला, जिसमें लाखों करोड़ों रुपये की हेराफेरी सामने आई तो दूसरी ओर बढ़ती महंगाई और कानून व्यवस्था का चरमरा जाने से आम आदमी बेहद परेशान है। इस सबके बीच लगातार अपने सहयोगियों की तेवरबाजी और फिर उनके छूटते साथ ने भी सरकार को कमजोर किया है।

भीतरी सुरक्षा और विदेश नीति
आतंकवाद और नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहे देश को पिछले कुछ सालों में इस मोर्चे पर काफी राहत मिली है। आतंकवाद की पिछली एकाध घटनाओं को छोड़ दें तो माना जा सकता है कि सरकार काफी हद तक इन पर रोक लगाने में कामयाब हुई है। इस दौरान दिल्ली, पुणे और हैदराबाद में आतंकी कार्रवाई हुई, लेकिन कुछ मामलों में यह प्रतिक्रियात्मक हमला भी था। सरकार नक्सलवाद से निपटने में काफी हद तक कामयाब दिखी है। नक्सलग्रस्त इलाकों को मुख्य धारा से जोडऩे की कोशिशों के साथ-साथ इन इलाकों में विकास कार्यक्रमों में तेजी लाकर सरकार ने अपने संवेदनशीलता दिखाने की कोशिश की है।

दूसरी ओर भले ही सरकार अमेरिका, ब्रिटेन व जर्मनी जैसे देशों के साथ अपने रिश्तों की मजबूती के तमाम दावे करे, लेकिन पड़ोसी देशों के साथ उसके रिश्तों के मोर्चे पर मनमोहन सरकार की कमियां साफ उजागर हुई हैं। पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका व मालदीव जैसे देशों के साथ हमारी कूटनीति कमजोर साबित हुईं। पाकिस्तान के साथ चाहे सीमा पार से आतंकवाद का मामला हो या फिर पाक सैनिकों द्वारा भारतीय सैनिकों के शवों का अपमान की घटना या फिर सरबजीत की रिहाई का मामला, हर बार पाकिस्तान सरकार भारत सरकार की कोशिशों पर पानी फेरती रही। 26/11 मामले में भारत द्वारा दिए गए डोजियर की अनेदखी और भारतीय जवानों के शवों के अपमान पर दी गई भारत सरकार की चेतावनी को जिस तरह से पाकिस्तान ने नजरअंदाज किया है, वह भारत सरकार की कूटनीतिक कमजोरी की बानगी है। चीन द्वारा भारतीय सीमा में लगातार घुसपैठ और बीङ्क्षजग में दिल्ली की शिकायतों पर ध्यान न दिया जाना भी सरकार की नाकामी है।

इन सबके बावजूद सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं, जिसने न सिर्फ इस देश की जनता के जीवन को छुआ है, बल्कि देश की किस्मत को बदलने की कोशिश की है। समाज के हाशिए पर पड़े कई तबकों को विकास की मुख्यधारा में लाने का काम जो यूपीए सरकार ने अपने पिछले दौर में शुरू किया था, वो यूपीए – 2 में भी जारी रहा। इस दौरान सरकार ने महिलाओं, एससी-एसटी व अल्पसंख्यकों के लिए काफी काम किया। महिलाओं को लेकर सरकार ने काफी संवेदनशीलता दिखाई है। जहां एक ओर सरकार ने महिलाओं की सामाजिक व आर्थिक स्थिति को मजबूत करने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई योजनाएं चलाईं, वहीं उनको सशक्त बनाने के लिए नए कानून बनाने से लेकर पुराने कानून में संशोधन तक किया। सबला, मातृत्व सहयोग योजना, प्रियदर्शिनी व नेशनल विमन एम्पावरमेंट मिशन जैसी योजनाएं यूपीए -2 की देन हैं। सरकार ने एंटी रेप कानून में बदलाव किया और कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीडऩ के खिलाफ कानून लेकर भी आई। यूपीए 2 में सरकार ने शिक्षा का अधिकार, मनरेगा का विस्तार, डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर जैसी तमाम योजनाएं लागू कीं। सेहत के क्षेत्र में काफी काम हुआ। गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच के लिए जहां राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत की गई, वहीं शहरों में रहने वालों के लिए हाल ही में कैबिनेट ने राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन को मंजूरी दी है। इस दौरान सरकार ने घरेलू अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश की हिस्सेदारी बढ़ाई है। इसके लिए सरकार ने रिटेल से लेकर इंश्योरेंस तक में और विमानन से लेकर ब्रॉडकास्टिंग तक में विदेशी निवेश के रास्ते खोले।

राजनैतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यूपीए 2 सरकार की मंशाएं नेक थीं, लेकिन उनके अमल के मामले में सरकार को उतनी कामयाबी नहीं मिली। गठबंधन की मजबूरी से बंधी फैसला न ले पाने वाली छवि के दायरे में कैद सरकार अपना कार्यकाल खत्म करते-करते काफी आक्रामक और मजबूत इरादों के साथ दिखाई देने लगी है। अब उसका पूरा फोकस अगले साल होने वाले आम चुनावों पर है। अपने चार साल पूरे कर चुकी सरकार अब पूरी तरह से चुनावी मूड में दिखाई देने लगी है। आगे के लिए उसका लक्ष्य जहां एक ओर अपने बचे हुए कामों और योजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर उनके अंजाम तक पहुंचना रहेगा, वहीं दूसरी ओर वह इन चार सालों में अपने किए गए कामों की रिपोर्ट जनता को देने में जुटेगी। अपनी उपलब्धियों की जानकारी लोगों तक पंहुचाने की कवायद तो सरकार ने भारत निर्माण कैंपेन के जरिए शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में सरकार अपने सहयोगियों और विपक्ष के दबाव से निकलकर फूड सिक्योरिटी, भूमि सुधार सहित कुछ आर्थिक बिलों को पास कराने पर काम करेगी। सरकार की नजर अब संसद के मॉनसून सत्र पर टिकी हैं। फूड सिक्योरिटी बिल अगर इस सत्र में पास हो जाता है तो ठीक है, वर्ना सरकार आध्यादेश के जरिए इस पर आगे बढऩे के विकल्प पर विचार कर रही हैं। इस बिल के जरिए सरकार की निगाहें देश की उस 67 फीसदी गरीब आबादी पर है, जो इससे सीधे जुड़ी है। इसी तरह से भूमि अधिग्रहण बिल के जरिए सरकार की योजना किसानों की सहानुभूति पाने की है। इस दौरान सरकार अपनी उन तमाम योजनाओं और बिलों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी, जिसका वादा उसने अपने चुनावी घोषणापत्र में किया था। सरकार का मकसद अपने इसी रिपोर्ट कार्ड के जरिए अगले आम चुनावों में जनता के दरबार में जाने का रहेगा। इतना ही नहीं, अगर सरकार अपने इस प्रयास में नाकाम रहती है तो फिर उसका सारा जोर इन महत्वपूर्ण बिलों के पास न होने का ठीकरा विपक्ष के सिर पर फोड़ने का रहेगा। आखिरी साल में सरकार की प्राथमिकता खुद पर लगे तमाम दागों को धोने की रहेगी, जिससे उसकी छवि सुधर सके। कर्नाटक चुनावों के नतीजों और दो केंद्रीय मंत्रियों अश्विनी कुमार व पीके बंसल के इस्तीफे को इसी कवायद से जोड़कर देखा जा रहा है।

जिस तरह से सरकार ने ‘भारत निर्माण’ के तहत अपनी सरकार के कामों का प्रचारात्मक अभियान शुरू किया है, उसे देखते हुए एक संभावना यह भी जताई जा रही है कि सरकार वक्त से पहले भी चुनाव करा सकती हैं। एनडीए के दौर में इंडिया शाइनिंग की चकाचौध से बहराई तत्कालीन सरकार ने तय समय से छह महीने पहले चुनावों का ऐलान करके हवा का रूख अपने पक्ष में करना चाहा, लेकिन जनता ने उनकी बनावटी चमक को मानने से इनकार कर दिया। लेकिन राजनैतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि एनडीए की गलतियों से सबक लेते हुए और मौजूदा दौर के राजनैतिक माहौल को देखते हुए सरकार ऐसा कोई भी जोखिम उठाने से बचना चाहेगी। दूसरी ओर चर्चा यह भी है कि मॉनसून सत्र के बाद महत्वपूर्ण बिलों को पास कराकर सरकार चुनावों के लिए हरी झंडी दिखा सकती है।

सत्ता की त्रिमूर्ति
यूपीए में सत्ता के दो केंद्र दिखाई दे रहे हैं, कांग्रेस में सत्ता की त्रिमूर्ति उभरती दिख रही है। भले ही कांग्रेस साल 2014 में किसी खास चेहरे को आगे कर चुनाव में उतरने की बात न कह रही हो, लेकिन त्रिमूति के नेतृत्व में चुनाव लडऩे की बात कहकर कांग्रेस ने खुद अपने यहां सत्ता के तीन केद्रों का संकेत दे दिया है। सत्ता के दो केंद्रों के मामले को पार्टी भले ही विपक्ष और मीडिया का शिगूफा करार देती रही हो, लेकिन यह भी सच है कि इस बारे में फैली आग का धुंआ कांग्रेस मुख्यालय की चिमनी से ही निकला था। हलाकि इसे लेकर पार्टी और सरकार की ओर से लगातार सफाई दी जाती रही, यहां तक कि चौथे साल के आयोजन में भी जहां यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को औपचारिक तौर पर मंच से तो प्रधानमंत्री और राहुल गांधी को अनौपचारिक रूप से मीडिया से कहना पड़ा कि यूपीए अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के बीच कोई दूरी नहीं है, दोनों के रिश्ते बेहद सौहादपूर्ण हैं। आने वाले बारह महीनों में अगर इस सरकार को अपनी छवि को सुधारना है, तो इन तीनों सत्ता के केंद्रों को अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना होगा।
गौरतलब है कि मनमोहन सिंह तकनीकी रूप से सरकार के मुखिया है। वह राजनीतिज्ञ नहीं, बल्कि अर्थशास्त्री हैं। उनकी ईमानदारी और देश की प्रगति के प्रति उनका लगाव ही उनकी पूंजी थी। लेकिन अगर एक तरफ 2जी व कोयला घोटाले जैसे मामलों ने

‘मि. क्लीन’ कहलाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दागदार बनाया है, तो बढ़ती महंगाई पर काबू न पा पाना भी उन की क्षमता पर सवाल खड़े कर रहा है। आज आम धारणा यह होती जा रही है कि सरकार विदेशी मल्टीनैशनल के हाथों में खेल रही है। मनमोहन को अपनी छवि पर चढ़े इस आवरण को उतारना होगा। कोयला आवंटन में उन्हें उन नामों को उजागर करना होगा, जिन्होंने यह आवंटन करवाए थे। महंगाई कम करने के लिए ठोस उपाय ढूंढने होंगे। साथ ही, जो गलतियां उनकी सरकार से हुई, उन्हें स्वीकार कर जनता के दरबार में जाना होगा। समझदार जनता जानती है कि काम करने वाले ही गलतियां करते हैं।

सत्ता का केन्द्र
सोनिया गांधी इस सरकार की सबसे ताकतवर सत्ता का केंद्र हैं। उन्होंने ही मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाकर सत्ता से दूर रहने की मिसाल स्थापित की थी। सोनिया ही थीं कि जिन्होंने दो कदम आगे चलकर यूपीए को बांधे रखा। सोनिया के चलते ही मुलायम और मायावती यूपीए सरकार के तारनहार बने रहे, लेकिन अपनी सेहत के चलते पिछले दो सालों में सोनिया ने जब से मनमोहन या राहुल के भरोसे चीजों को छोड़ा, हालत बिगड़ती चली गईं। सरकार के संकटमोचक कहे जाने वाले प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के बाद सोनिया तमाम मौकों पर पार्टी और सरकार को दिशा निर्देश देती दिखाई दीं। अपनी सधी हुई रणनीति के जरिए सोनिया ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों में कांग्रेस की पंसद को परवान चढ़वाया और बिफरे हुए मुलायम सिंह यादव हों या एनसीपी के नेताओं को समझा बुझाकर सरकार में समन्वय के सुरों को थामे रखा। हाल ही में सीबीआई मामले और रेल घूसखोरी मामले में सरकार की हो रही फजीहत के बीच अपने कड़े तेवरों से उन्होंने संकेत देने की कोशिश की कि कुछ लोगों को बचाने के लिए सरकार और पार्टी की छवि से समझौता नहीं किया जा सकता। इससे पहले भी महिला सुरक्षा को लेकर वह अपने तमाम सरोकार देश के सामने रखती रही हैं। दो मंत्रियों के इस्तीफे और कर्नाटक में दागी विधायकों को सरकार से दूर रखने के निर्देश देकर सोनिया गांधी एक बार भ्रष्टाचार के प्रति अपनी जीरो टॉलरेंस की उसी नीति की तरफ बढ़ती दिखाई दे रही हैं, जिसका संकेत उन्होंने यूपीए – 2 की शुरुआत में दिया था। आने वाले समय में सोनिया गांधी को संगठन की लगाम अपने हाथों लेनी होगी।

राहुल गांधी पार्टी के भीतर तीसरे पावर सेंटर के रूप में उभरे हैं। हालांकि कांग्रेस का एक धड़ा उन्हें प्रधानमंत्री बनवाने पर उतारू है, पर सिर्फ चंद चाटुकारों के चाहने से कुछ नहीं होता। सत्ता जनता सौपतीं है, सत्ता के लिए जनता से समर्थन मिले, ऐसा कुछ उन्हें करना चाहिए। हालांाकि प्रधानमंत्री के मुद््दे पर कई बार राहुल खुद कह चुके हैं कि यह उनकी प्राथमिकता में नहीं है, बल्कि उनकी असली प्राथमिकता संगठन की मजबूती है। गुजरात में थोड़े स्तर पर तो कर्नाटक में राहुल ने काफी सक्रियता से परदे के पीछे से चुनावी संचालन किया। सबकी बात सुनने और सबको अपनी बात कहने का मौका देकर, जहां एक ओर राहुल पार्टी में लोकतांत्रिक तंतुओं को मजबूत करने में जुटे हैं, तो वहीं बीच-बीच में अनुशासनहीनता की बात कह कर व जिम्मेदारी के साथ जवाबदेही की बात कहकर वह अपने कड़े तेवरों को संकेत भी देते रहे हैं। हाल ही में दिल्ली संगठन के लोगों से मुलाकात में जिस तरह से उन्होंने कहा कि आपकी अध्यक्ष नरम हैं, पर मैं कठोर हूं, उससे साफ जाहिर है कि राहुल संगठन की अपनी मजबूत हैसियत का अहसास कराना चाहते हैं। हालाकि अगर कांग्रेस त्रिमूर्ति के इस चेहरे को भी चुनावों में उतारना चाहती है, तो उसे अपने इस मौन युवराज को जनता से जुड़े मामलों और नाजुक मौकों पर अपनी सोच सामने रखने के लिए बुलवाना होगा। दरअसल, इस देश की जनता राहुल गांधी को किसी त्रासदी के बाद पीडि़तों के आंसू पोछने के साथ-साथ देश के आम मामलों पर उनकी राय या सोच भी जानना चाहती है। जनता उनसे भी जवाब चाहती हैं, क्योंकि चुनाव के समय वहीं रैलियों में जाकर वोट मगते हैं। राहुल को अपनी शैली को बदलना होगा, जो बातें वह करते आए हैं, उसे उन्हें अपनी कृति में ढालना होगा। चाटुकारों की बजाए जनता की नब्ज जानने वालों को सुनना होगा।

 

उदय इंडिया ब्यूरो

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