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भारत पर हमला

मौजूदा हमले का सन्देश साफ है कि माओवादियों ने देश के राजनीतिक नेतृत्व को युद्ध के लिए ललकारा है। क्या छत्तीसगढ़ या किसी अन्य राज्य की सरकार अकेले ये लड़ाई लड़ सकती है? नहीं, इस आंतरिक युद्ध का सामना करने का सामथ्र्य, कौशल, योग्यता और संसाधन देश के किसी भी राज्य के पुलिस बल के पास न तो हैं और न ही हो सकते हैं।

जिन लोंगों को लगता है कि 25 मई का नक्सली हमला सिर्फ छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेताओं पर था वे भारी मुगालते में हैं। ये सच है कि इस हमले में शहीद तो कांग्रेस के नेता हुए पर माओवादिओं ने असली निशाना तो भारत और उसके स्थापित राष्ट्रीय मूल्यों पर साधा है। इसे सोनिया गांधी ने एकदम ठीक परिभाषित किया कि ये देश के ‘प्रजातांत्रिक मूल्यों पर हमला है’। सोनिया गांधी के इस बयान से ये उम्मीद जगती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर माओवादी खतरे के खिलाफ यूपीए सरकार और खासकर कांग्रेस में एकमत बनेगा, जिससे देश एक समन्वित, ठोस और कारगर नीति इस अघोषित युद्ध के खिलाफ बना सके। सुरक्षा के बारे में थोड़ी सी भी चिंता रखने वाला हर भारतीय जानता है कि आजादी के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा पर आया हुआ ये सबसे बड़ा खतरा है।

याद कीजिये कि जब 2010 में तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने माओवादियों पर सख्त कदम उठाने की बात कही थी, तो किस तरह से तथाकथित मानवाधिकारवादिओं ने हो हल्ला मचाना शुरू किया था और कांग्रेस का ही एक खेमा तलवार लेकर उनके पीछे पड़ गया था। इनमें दिग्विजय सिंह, के केशव राव, जय राम रमेश और किशोर चंद्र देव आदि नेता शामिल हैं। सोनिया गांधी ने तब 14 मई 2010 को आम कांग्रेस जनों के नाम एक पत्र लिखा था, जिसमे माओवाद पनपने के ‘मूल कारणों’ में जाने की आवश्यकता बताते हुए उनके निराकरण पर जोर दिया गया था।

बिलकुल साफ था कि वे कठोर पुलिस एक्शन से सहमत नहीं थीं। पी चिदंबरम के साथ उस वक्त तब के केंद्रीय वित्तमंत्री और आज के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ही खड़े हुए थे। सोनिया के पत्र के बाद स्वाभाविक था कि केंद्र सरकार की सख्त नीति की योजना ठंडे बस्ते में डाल दी गई थी।

मौजूदा हमले का सन्देश साफ है और वो है कि माओवादियों ने देश के राजनीतिक नेतृत्व को युद्ध के लिए ललकारा है। क्या छत्तीसगढ़ या किसी अन्य राज्य की सरकार अकेले ये लड़ाई लड़ सकती है? नहीं, इस आतंरिक युद्ध का सामना करने का सामथ्र्य, कौशल, योग्यता और संसाधन देश के किसी भी राज्य के पुलिस बल के पास न तो हैं और न ही हो सकते हैं। ये लड़ाई तो पूरे देश की है, और जब तक केंद्र सरकार और उसे चलाने वाली पार्टी की सोच माओवादी समस्या के प्रति एक नहीं होगी, तब तक उससे लडऩे के लिए बनाई जाने वाली वाली योजनाएं और रणनीतियां कामयाब हो ही नहीं सकती। बिलकुल साफ है कि माओवादियों के इरादे ‘विकास की कमी और पिछड़ेपन’ के कारण पैदा नहीं हुए हैं, और न ही आदिवासियों और पिछड़े समुदायों के लिए उनके मन में सच्ची सहानुभूति है। वे तो सिर्फ इन लोंगों का इस्तेमाल अपने खतरनाक राजनीतिक इरादों के लिए कर रहे हैं। वो है हमारी लोकतान्त्रिक वयवस्था को उखाड़ फेंकना।

बड़ी मुश्किल से हासिल इसी राजनीतिक व्यवस्था का अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने वाले तथाकथित उन मानवाधिकारवादी बुद्धिजीविओं के रुख पर आज सबसे ज्यादा हैरानी हो रही है, जो माओवादिओं के पक्ष में बोलने का कोई मौका नहीं चूकते। उनसे पूछा जाना चाहिए कि उनके होठ अब तक सिले हुए क्यों हैं? माओवादियों के खिलाफ की गई पुलिस की हर कार्रवाई को फर्जी बताने वाले ये लोग अब चुप क्यों हैं? हमारी संवैधानिक न्याय प्रक्रिया का बड़ी होशियारी से इस्तेमाल करने वाले ये लोग अब कहां गायब हैं? क्या इन हत्याओं के भी मूल कारणों को ‘गरीबी और पिछड़ापन’ बताकर उन्हें ये जायज ठहरायेंगे? क्या सुकमा में जाकर राजनीतिक सभा करना ऐसा बड़ा अपराध है कि इतने नेताओं को मौत की नींद सुला दिया जाए? क्या मारे गए लोगों के कोई मानवाधिकार नहीं थे? क्या अब ये बुद्धिजीवी जंगलों में जाकर हत्यारों को समझाने का काम करेंगे? या फिर ये इस सच को स्वीकार करेंगे कि वे इनके मुखौटे भर हैं?

हर बार वनवासी जीवन मूल्यों की दुहाई देने वाले बुद्धिजीवी क्या मानेंगे कि अगर इन परम्पराओं और तौर तरीकों के प्रति थोड़ा सा भी आदर हत्यारों के मन में होता तो इस सामूहिक नरसंहार में उन्होंने इतनी नृशंसता न बरती होती। मृतकों के शव इस तरह क्षत विक्षत न किये जाते। बस्तर के टाइगर महेंद्र कर्मा की लाश पर नृत्य न किया जाता। बर्बरता और क्रूरता के इन निशानों को देखकर किसी का भी दिल भर आएगा। ध्यान देने की बात है कि खुद छत्तीसगढ़ आकर मौत का ये मंजर देखने के बाद सोनिया का ये बयान आया है। राहुल गांधी ने भी इसी तरह की बात कही। ये बात सही है कि काफी देर हो चुकी है और तब से अब तक माओवादी अपने पैर और पसार चुके हैं। फिर भी देर आयद दुरुस्त आयद।

 

उमेश उपाध्याय

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