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नक्सलियों की बौखलाहट जरूरत है नक्सलवाद से निपटने के लिए समन्वित और संतुलित रणनीति की

उस दिन शनिवार था। ज्योतिष शिक्षा के सबसे बड़े संस्थान भारतीय विद्या भवन में आचार्य पाठ्यक्रम की मेदिनी की कक्षा में मैडम पद्मा राघवन ने भारत की कुंडली का विशलेषण करते हुए बताया कि ग्रहों की स्थिति के अनुसार इस साल भारत हिंसात्मक गतिविधियों की समस्याओं से जूझता रहेगा। बाद में आचार्य मनोज पाठक से इस संबंध में बात हुई तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की कुंडली सामने रख कर उन्होंने कहा कि भारत की इस वर्ष के वर्षफल की सिंह लगन की कुंडली के पांच ग्रह – शुक्र, मंगल, चन्द्र, सूर्य, बुध अंशात्मक रूप से करीब होकर अष्टम भाव में विराजमान हैं, जबकि राहु और शनि तीसरे भाव में तुला राशि में बैठे हैं। गुरू दशम भाव में हैं। ग्रहों की स्थिति बताने के बाद आचार्य मनोज पाठक ने कहा कि मंगल और सूर्य अष्टम में होने के कारण इस वर्ष भारत में राजनीतिक हिंसा अधिक होगी।

मैडम पद्मा राघवन के बाद आचार्य मनोज पाठक का वर्षफल की भारत की कुंडली का विशलेषण समान होने के बावजूद मैंने उसे अधिक गंभीरता से नहीं लिया। भारत इतना बड़ा देश है, आतंकवाद इसका नासूर बन चुका है। इतने बड़े देश में कहीं न कहीं हिंसा तो होती रहेगी। आचार्य मनोज पाठक का वर्षफल की कुंडली के विशलेषण में ऐसा कुछ नया नहीं लगा जो देश की जनता को नहीं मालूम हो। शाम को मैंने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी को उदय इंडिया के लिए साक्षात्कार हेतु उनके घर रायपुर में फोन किया। वहां उनके किसी सहायक ने मुझे बताया कि अजित जोगी ”परिवर्तन यात्रा” से लौट आए हैं, लेकिन सुकमा में भारी गोली बारी हुई है, अनेक नेता मारे गए हैं…आप टेलिविजन पर देखें।

टेलिविजन पर सुकमा में नक्सली हमले का समाचार बताया जा रहा था। विधानसभा में नेता विपक्ष महेन्द्र कर्मा और उनके बेटे को नक्सलियों ने अगवा कर लिया था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल को कई गोलियां लगीं हैं। इस हमले में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के कांग्रेस के नेताओं की अग्रिम पंक्ति खत्म कर दी। छत्तीसगढ़ में इसे अबतक का सबसे बड़ा नक्सली हमला माना जा रहा है।

टेलिविजन की खबरें सुनते हुए मेरा ध्यान भारतीय विद्या भवन के ज्योतिषाचार्यों की सुबह की गई भविष्यवाणी पर गया। यह निश्चित है कि नक्सलियों ने यह हमला ब्रह्मांड में घूम रहे नवग्रहों के कहने पर नहीं किया। कुंडली में बैठे नवग्रह अपनी उपस्थिति से किसी घटना के होने का केवल संकेत देते हैं, वह स्वयं कुछ नहीं कराते। ऐसे हमले तो आजादी के बाद भारत के नीति नियंताओं, नीतियों का क्रियान्वयन करने वाले अधिकारियों और नेताओं की नीयत कराती है। ठंडे कमरों में बैठ कर आंकड़ों के आधार पर कल्पना लोक में विचरते हुए नीतियां निर्धारित की जाएंगी तो उसके परिणाम सुकमा के नक्सली हमलों के रूप में ही होंगे।

नक्सली समस्या केवल आज के युग की देन नहीं हैं। भारत के आजाद होने के बाद से सरकार की नीतियों ने इसे जन्म दे कर इसका लालन-पालन किया है। यह समस्या तो देश के समक्ष पहले से ही खड़ी थी। आंकड़ों के झरोखों से इस समस्या को देखकर देश के कर्णधार आंखें बंद किए रहे और देश के नक्शे पर नक्सलियों का क्षेत्र ”लाल गलियारा” बन कर बढ़ता रहा है। नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र में विकास कार्यों के अभाव ने इस ”लाल गलियारेÓÓ में समानान्तर सरकार खड़ी कर दी है।

यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार 22 मई को अपने चार साल का कार्यकाल पूरा करने पर जारी किए अपने रिपोर्ट कार्ड में जब नक्सलवाद पर काबू पाने के लिए अपनी पीठ थपथपा रही थी, उस वक्त सुकमा में कांग्रेसी नेताओं पर जोरदार हमला करने के लिए नक्सली अपनी योजना को अन्तिम रूप दे रहे थे। इतिहास पर नजर डालने से साफ है कि नक्सलवाद अपने जन्म के बाद से अब तक कई रूप बदल चुका है। इसकी रणनीतियां भी पहले से भिन्न हो गई हैं। पश्चिम बंगाल में इसे काफी समर्थन मिला है। बाद में इसने पश्चिम बंगाल से फैलकर बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों तक ”लाल गलियारे” का रूप अख्तियार कर लिया। भयंकर निरक्षरता, गरीबी, तंगहाली और आर्थिक विषमताओं ने इसे खाद-पानी देने का काम किया और उन क्षेत्रों में इसकी जड़ें अधिक मजबूत होती चली गईं। इससे निपटने के लिए राज्य सरकारों ने भी सहानुभूति छोड़ सख्ती से निपटने की नीति अपनाई, लेकिन इनसे लोहा लेने के लिए भेजे गए सशस्त्र बल राज्य और केन्द्र सरकारों की नीतियों में उलझ कर इनका निशाना बनने लगे। सशस्त्र बल नक्सलियों की भूमि पर ही उनसे लोहा लेने गए थे, जहां के जंगलों के रास्ते उन्हें ठीक से मालूम भी नहीं थे। आरोप ये भी लगे हैं कि केन्द्रीय सशस्त्र बलों को राज्य पुलिस का पूरा सहयोग तक नहीं मिला। दूसरी ओर गोरिल्ला युद्ध में माहिर नक्सली जंगलों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं।

सरकारी व्यवस्था को अपना निशाना बनाने वाले नक्सली अब लोकतन्त्र पर हमला करने लगे हैं। आरम्भ में नक्सलवादी भू-स्वामियों और अमीरों को अपना निशाना बनाया करते थे और बाद में वे सशस्त्र बलों पर हमले करने लगे। आरम्भ में यह व्यवस्था के खिलाफ खड़ा आन्दोलन दिखाई देता था, लेकिन सकमा में ”परिवर्तन यात्राÓÓ से लौट रहे कांग्रेस के नेताओं पर घात लगा कर नृशंस तरीके से किया गया हमला लोकतन्त्र पर निशाना था। वैसे यह पहला मौका नहीं है जब नक्सलियों ने राजनेताओं को अपना निशाना बनाया हो। आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू पर नक्सलियों ने हमला किया था, लेकिन छत्तीसगढ़ के महेन्द्र कर्मा और नन्द कुमार पटेल जैसे साहसी नेता नायडू जितने भाग्यशाली नहीं निकले और लोकतन्त्र के लिए शहीद हो गए।

सकमा में हमले के संबंध में त्वरित टिप्पणी करते हुए उस दिन ”परिवर्तन यात्रा” से लौटे अजित जोगी को टेलिविजन पर सुना। उनका निशाना सीधा रमन सिंह सरकार पर था। रमन सिंह सरकार पर आरोप लगाते हुए अजित जोगी की पहली मांग थी कि भाजपा की यह सरकार नक्सलवाद से निपटने में सक्षम नहीं है और इसे बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना था कि सकमा के नक्सली हमले को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए, मिल कर इस समस्या का हल निकला जाना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि चुनावों की तैयारी कर रहे छत्तीसगढ़ में सकमा ही मुख्य मुद्दा बनेगा। नक्सली भी शायद यही चाहते हैं। वास्तव में नक्सली चुनाव चाहते ही नहीं, लेकिन वह इस बात को भूल रहे हैं कि भारतीय लोकतन्त्र में फैसले गोलियों से नहीं मतपत्रों से होते हैं। नक्सलियों को स्थानीय निवासियों से सहानुभूति तो मिल सकती है, लेकिन यदि उन्हें यह मुगालता है कि उन्हें भारी जनसमर्थन प्राप्त है तो वह मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे हैं। यदि उन्हें भारी जनसमर्थन ही प्राप्त होता तो वे हाथ में बंदूक न लेकर, मतपत्र लेते और अपने नेताओं को चुनावों में जितवा कर अपनी मांगें पूरी कराते। लेकिन वे जानते हैं कि बंदूक के सहारे ही उन्हें जनसहानुभूति मिली है जो पूरी तरह से सतही है। लोकतन्त्र की शक्ति के आगे उनकी बंदूक की ताकत कुछ काम नहीं आएगी। वैसे भी उनके प्रभाव क्षेत्र में सेंध लगी हुई है। उनकी ताकत ओडिसा और छत्तीसगढ़ के इलाकों में सिमटती दिखाई दे रही है जहां घने जंगल हैं। आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यातायात और संचार सुविधाएं नगण्य हैं। यहां के स्कूल और अस्पताल नक्सलियों के निशाने पर रहे हैं। सकमा के नक्सली हमले में लोकतन्त्र के लिए शहीद होने वाले नेताओं को सलाम किया जाना चाहिए। ऐसे नेता ही लोकतन्त्र की असली ताकत होते हैं। लोकतन्त्र में अनेक कमियां हो सकती हैं, लेकिन इन नेताओं का सकमा जैसे नक्सल प्रभावी क्षेत्रों में चुनाव अभियान के लिए जाना और उसी क्षेत्र से लौटना लोकतन्त्र की ताकत दिखाता है। ”सलवा जुडूमÓÓ के जन्मदाता माने जाने वाले महेन्द्र कर्मा से नक्सलवादी इसीलिए नाराज थे कि उन्होंने नक्सलवाद के खिलाफ आत्मरक्षा के लिए आदिवासियों के हाथों में बंदूकें थमा दीं। उन्हें आर्थिक सहायता देने के रास्ते खोले। आदिवासियों से उनके निकट सबंधों ने नक्सलियों में भय पैदा किया हुआ था। वह जमीनी नेता थे और लगातार जनसंपर्क में जुटे रहते थे। महेन्द्र कर्मा पर पहले भी दो बार नक्सली हमले हुए, लेकिन वे हमले भी इस जमीनी नेता महेन्द्र कर्मा की हिम्मत को पस्त नहीं कर सके। अपने साथियों की जान बचाने के लिए नक्सलियों के सामने समर्पण करना महेन्द्र कर्मा की जाबांजी की मिसाल है। उन्हीं पर 100 गोलियों की बरसात कर उनके शव पर नाचना नक्सलवादियों में अपराधी तत्वों का घुसना और उनकी घोर नृशंसता का नमूना है। दूसरी ओर नन्द पटेल नक्सली समस्या को कानून-व्यवस्था की नहीं बल्कि सामाजिक-राजनीतिक समस्या मानते थे और चाहते थे इसका हल उसी रास्ते से निकले। इतने बड़े हमले के बाद भी गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का विदेश में रहना कई प्रकार के सवाल खड़े कर रहा है। यह वक्त सवाल खड़े करने का नहीं, बल्कि नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों के राज्यों की सरकारों और केन्द्र सरकार को मिल बैठ कर इसका हल खोजने की जरूरत है। ऐसा नहीं कि इस समस्या का हल नहीं निकल सकता। जरूरत है तो पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और सुपर कॉप के.पी.एस. गिल जैसे पुलिस अधिकारियों की। पंजाब के आतंकवाद के दौरान मेरी मुलाकात जब बेअंत सिंह से हुई थी, तो उन्होंने कहा था कि ”गिल कोई एक्शन लेने से पहले मुझ से अनुमति नहीं लेते। मुझे उन पर विश्वास है कि वह करेंगे वह देश, पंजाब और जनता के हित में होगा। उन्हें मुझ पर विश्वास है कि वह जो एक्शन लेंगे उसमें मेरी स्वीकृति होगी।” पंजाब का आतंकवाद देश को अब भूलता जा रहा है। लेकिन एक वक्त था जब पंजाब के आतंकवाद ने देश के कई राज्यों को अपनी चपेट में लिया हुआ था। दिल्ली में भी उसकी धमक सुनाई दी थी। लेकिन राजनैतिक नेतृत्व और प्रशासिनक मशीनरी ने मिल कर उसे समाप्त कर दिया।

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों की धमक सभी को सुनाई दे रही है। ऐसे में सकमा के हमले पर राजनीति करना नक्सलवाद को ऑक्सीजन देने के समान होगा। हालांकि राज्य में कांग्रेस के अग्रिम नेतृत्व के एक बड़े हिस्से का सफाया हो गया है। जो बचा है वह भी सकते में है। लेकिन इस हमले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार का हमला नक्सलियों की बौखलाहट और अपनी कमजोरी का अहसास होने का संकेत है। केन्द्र और राज्य सरकारों को इस समस्या के हल के लिए दुहरी नीति अपनानी चाहिए। इसमें एक तरफ तो आदिवासी क्षेत्रों का जितना तेजी से अधिक से अधिक विकास किया जा सकता है, वह किया जाना चाहिए और दूसरा नक्सलवाद से निपटने के लिए किसी प्रकार की कोताही नहीं बरतनी चाहिए। इसके लिए केन्द्र और सभी राज्य सरकारों को हाथ मिला कर आगे बढऩे की जरूरत है। एनआईए से सकमा के हमले की जांच इस दिशा में सही पहल मानी जा सकती है।

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