ब्रेकिंग न्यूज़ 

लाल सलाम का खूनी खेल

ओडिशा के बिलमेला में 29 जून 2008 को 38 पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद ही नक्सलियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की जरुरत थी। लेकिन सरकार की जोड़-तोड़ और राजनीतिक नफा-नुकसान की गणना, उसकी राजनीतिक इच्छाशक्ति को कमजोर करती गयी, जिसका परिणाम 25 मई को सुकमा में कई राजनेताओं की हत्या की रुप में सामने आया।
नक्सली गतिविधियों के लिए कुख्यात दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) में 06 अप्रैल 2010 को नक्सलियों ने सीआरपीएफ कैंप पर हमला कर 76 जवानों की हत्या कर दी थी। उस समय भी मामला राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सिमटकर रह गया था। मई 2012 में सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण और 13 दिन बाद नाटकीय ढ़ंग से उनकी रिहाई के बाद भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए। नक्सलियों के मामले में राजनीतिक उदासीनता का अंदाजा इस बात से
लगाया जा सकता है कि कलेक्टर एलेक्स ने बाद में अपना स्थानांतरण करा लिया।
राजनीतिक मुद्दा बनने और मानवाधिकार जैसे संगठनों की शह पाकर नक्सली संगठनों ने दुस्साहसिक कदम उठाने से कभी परहेज नहीं किया। ओडिशा के मल्कागिरी में 16 जुलाई 2008 को बारुदी सुरंग विस्फोट में 21 जवानों की हत्या, 22 मई 2009 को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में 16 पुलिस जवानों की हत्या, 16 जून 2009 को झारखंड के पलामू में 11 पुलिसकर्मियों की हत्या और 29 जून 2010 को छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में सीआरपीएफ कैंप पर हमला कर 15 जवानों की हत्या, उनके तेवर को दिखाता है। सुरक्षाबलों पर लगाम ने नक्सलियों के हर अगले कदम को ज्यादा खतरनाक बनाने में मदद की है।
लेकिन सुकमा में नक्सलियों द्वारा कई नेताओं सहित 29 लोगों की हत्या के बाद सरकार को अपनी नक्सल-नीति की समीक्षा करनी चाहिए। महेन्द्र कर्मा हमेशा नक्सलियों के निशाने पर रहे। नक्सलियों के खिलाफ लोगों को जागरुक करने और आत्मरक्षा के लिए सलवा जुडूम स्थापित करने वाले कर्मा को लैंडमाइंस के जरिए पिछले साल नवंबर में भी मारने की कोशिश की गयी थी। उस हमले में कर्मा के सिक्यूरिटी गार्ड और पीएसओ मारे गए थे, लेकिन कर्मा बाल-बाल बच गए थे। 2005 में सलवा जुडूम की स्थापना के साथ ही महेन्द्र कर्मा नक्सलियों की हिटलिस्ट में आ गए। तब से उन पर कई हमले किए गए। अंत में 25 मई 2013 को उनकी हत्या हो गयी। इसके पहले भी कई भाजपा और कांग्रेस नेताओं की हत्या नक्सलियों ने की है।
• 29 जून 2008- बिलमेला (ओडिशा) में 38 पुलिसकर्मियों की हत्या।
• 16 जुलाई 2008- मल्कागिरी (ओडिशा) में बारुदी सुरंग में विस्फोट 21 जवानों की हत्या।
• 22 मई 2009- गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) में 16 पुलिस जवानों की हत्या।
• 16 जून 2009- पलामू (झारखंड)में 11 पुलिसकर्मियों की हत्या, उनके शरीर में बम प्लांट किया।
• 06 अप्रैल 2010-दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) में सीआरपीएफ कैंप पर हमला, 76 जवानों की हत्या।
• 29 जून 2010 – नारायणपुर (छत्तीसगढ़) में सीआरपीएफ कैंप पर हमला, 15 जवानों की हत्या।
• मई 2012- सुकमा कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण, 13 दिन बाद रिहाई।
• 25 मई 2013 – जगदलपुर में कांग्रेसी नेता के काफिले पर हमला 31 लोगों की हत्या।
इस साल होने वाले चुनावों के मद्देनजर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अपनी परिवर्तन यात्रा के तहत लगातार दौरे कर रही थी। इसी दौरे में कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा, विद्याचरण शुक्ल, उदय मुलियार, नंदकुमार पटेल और उनका बेटा, आदिवासी नेता फूलो देवी सहित 22 गाडिय़ों के काफिले में कई नेता और कार्यकर्ता सुकमा से जगदलपुर के लिए रवाना हुए थे। गीदम घाटी के नजदीक घात लगाए सैकड़ों नक्सलियों ने पेड़ गिराकर सड़क को जाम कर रखा था। काफिला जैसे ही घाटी के पास पहुंचा, नक्सलियों ने बमों और एके 47 से हमला कर दिया। महेन्द्र कर्मा ने खुद को नक्सलियों के सामने समर्पण करते हुए अन्य लोगों को नहीं मारने की गुजारिश की। लेकिन नक्सलियों ने उनकी बात को अनसुना कर दिया। उन्हें जिस प्रकार यातना देकर मारा गया, वो किसी हक की लड़ाई लडऩे वालों की नहीं हो सकती। कर्मा के शरीर को महिला नक्सलियों ने बंदूक के बटों से मारने के बाद डांस भी किया। उदय मुलियार का भी यही हश्र किया गया। वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल के सुरक्षाकर्मी ने शुक्ल से माफी मांगते हुए अंतिम बची गोली खुद को मारकर इसलिए जान दे दी, क्योंकि शुक्ल को बचाने में खुद को लाचार समझा। विद्याचरण शुक्ल के पीठ में तीन गोलियां लगी। उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। नक्सलियों का तांडव यहीं खत्म नहीं हुआ। उन्होंने नंदकुमार पटेल और उनके बेटे को अगवा कर, हत्या के बाद उनके क्षत-विक्षत शवों को जंगल में फेंक दिया।
इस हमले के लिए नक्सलियों का सबसे खुंखार दस्ता ‘मिलिट्री दलमÓ को जिम्मा सौंपा गया था। लिट्टे से ट्रेनिंग प्राप्त ‘मिलिट्री दलमÓ के अलावा इस हमले में महिलाओं और बच्चों का भी एक-एक दस्ता शामिल किया गया था। इस पूरे घटना को अंजाम देने के पीछे दंडकारण्य स्पेशल जोन कमेटी के सचिव रमन्ना, दक्षिण क्षेत्रीय कमेटी के सचिव गणेश उइके, मलौजुला वेणुगोपाल और पुलिस मुठभेड़ में मारा गया कुख्यात नक्सली किशनजी का भाई देवजी की रणनीति मानी जा रही है। नक्सलियों ने हमले को सलवा जुडूम के माध्यम से आदिवासियों का खून बहाने का बदला बताया है। आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा के परिवार को हफ्ते भर के अंदर गांव छोडऩे का फरमान भी नक्सलियों ने सुना दिया। धमकी को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार ने कर्मा के परिवार को जेड प्लस सुरक्षा और नंदकुमार पटेल के परिवार को जेड सुरक्षा देने का निर्णय लिया है।
सलवा जुडूम
सलवा जूडूम की स्थापना नक्सलियों से त्रस्त आदिवासियों के ऐसे समूह के रुप में की गयी थी, जो नक्सलियों से अपनी सुरक्षा कर सकें और सुरक्षाबलों को मदद कर सकें। सरकार ने इन युवाओं को हथियार उपलब्ध कराए थे। ऐसे लोगों को विशेष पुलिस अधिकारी यानी एसपीओ के तौर पर भर्ती किया गया था। इन्हें 3000 रुपए प्रति माह का भुगतान किया जाता है। एसपीओ माओवादियों के खिलाफ सुरक्षाबलों को मदद के साथ-साथ कई जगहों पर खुद भी अभियान भी चलाते थे।
2011 में अदालत ने छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र से कहा कि विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) के नाम पर आदिवासियों की भर्ती को रोका जाए। अदालत ने कहा कि इन आदिवासियों के पास माओवादियों से लडऩे के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं है और ऐसा करना कानून और संविधान के हिसाब से गलत है।
2005 में महेन्द्र कर्मा ने नक्सलियों से लडऩे और आत्मरक्षा के लिए सलवा जुडूम का गठन किया था। कर्मा सलवा जुडूम के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। सलवा जुडूम मसले पर भाजपा और कांग्रेस की एकराय रही है।
माना जाता है कि 12 मई को एडसमेटा में नक्सली होने के आरोप में 8 आदिवासियों की हत्या करने के कारण नक्सलियों ने इस घटना को अंजाम दिया है। नक्सलियों ने जगदलपुर दूरदर्शन केन्द्र पर हमला किया। 26 मई को नक्सलियों ने बस्तर जिले में बंद का भी ऐलान किया था। खुफिया एजेंसियों ने केन्द्र सरकार को चेताया था कि अगले एक माह में नक्सली किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं। लेकिन सरकार ने खुफिया एजेंसियों की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। 1967 में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी जिले के नक्सलबाड़ी में चारु मजूमदार और कानू सान्याल ने नक्सलपंथ की शुरूआत की थी। तब से लेकर आज तक नक्सली देश के लिए गंभीर समस्या बन गए हैं।नवंबर 2011 में कुख्यात नक्सली नेता किशनजी का पुलिस मुठभेड़ में मारा जाना, सुरक्षाबलों के लिए एक बड़ी सफलता थी। लेकिन नक्सलियों की शक्ति का आकलन करने में सरकार हमेशा से चूकती रही है। गुप्त रुप से शक्ति को संगठित करने में माहिर नक्सली, पहले की अपेक्षा ज्यादा मजबूती से उभरते हैं। नक्सली समस्या को हमेशा राजनीतिक समस्या की तरह देखा जाता रहा है। शायद यही वजह है कि मुद्दे को बनाए रखने और समय-समय पर भुनाने के लिए सरकार, न ही नक्सल प्रभावित इलाकों को पिछड़ा बनाए रखना चाहती है। इसीलिए नक्सल विरोधी अभियान को मजबूती देने से कतराती है। नक्सलियों की स्थिति का पता लगाने और सूचनातंत्र को मजबूत करने के लिए सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 2199 संचार टावर लगाने की मंजूरी दी थी। जिसमें 497 टावर छत्तीगढ़ में लगने थे। लेकिन सरकार की लापरवाही का आलम यह है कि पिछले तीन सालों से किसी भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र में टावर लगाने का काम नहीं किया गया।

बात सिर्फ नक्सलियों के खिलाफ अभियान तक ही सीमित है। सुरक्षाबलों के बंधे हाथों को फायदा देखकर खोला जाता है। सरकार ने नक्सलियों के नेटवर्क, प्रशिक्षण और हथियारों की सप्लाई का स्रोत जानने और उसे नष्ट करने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई। कई अभियानों में सुरक्षाबलों ने नक्सलियों की कमर तोड़ी, फिर भी कुछ समय बाद नक्सलियों ने मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। ऐसे में नक्सलियों का अंतर्राष्ट्रीय गिरोह या आतंकी संगठनों से सांठ-गांठ से इंकार नहीं किया जा सकता। बांग्लादेशी घुसपैठियों की बढ़ती तादाद और असामाजिक गतिविधियों में उनकी बढ़ती संलिप्तता, नक्सलियों को सीधा फायदा पहुंचाती है। लेकिन वोटबैंक की राजनीति की वजह से मामला हमले में मारे गए सुरक्षाबलों को मुआवजा देने की घोषणा तक सिमट कर रह जाता है। ऐसे में तमाम राजनीतिक मुद्दों को दरकिनार कर घरेलू स्तर के साथ-साथ, इनके अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क को ध्वस्त करने की जरुरत है।

छत्तीसगढ़ सहित में हाई अलर्ट घोषित करने के बाद सरकार ने आपात बैठक बुलाकर समीक्षा की। नक्सलियों की कमर तोडऩे के लिए 600 सीआरपीएफ जवानों को गृह मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ भेजा है। जिसमें चार कोबरा बटालियन भी शामिल है। नक्सली समस्या को खत्म करने के लिए सीआरपीएफ में कोबरा बटालियन के रुप में विशेष बटालियन का गठन किया था। हेलिकॉप्टरों से सर्च अभियान जारी है। इस कंबिंग ऑपरेशन में सीआरपीएफ के साथ-साथ स्थानीय पुलिस की भी मदद ली जा रही है। नक्सलियों की स्थिति का पता लगाने के लिए टोही विमानों के इस्तेमाल का भी संकेत मिल रहे हैं। इस तरह के अभियान सिर्फ सामयिक न होकर तब तक जारी रहने चाहिए, जबतक नक्सल समस्या जड़ से खत्म नहीं हो जाता।

 

सुधीर गहलोत

b2b поисковая системаcnjbvjcnm

Leave a Reply

Your email address will not be published.